हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में

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22 – हिन्दू समाज का गठन


आदि मानव अपने सभी काम स्वयं करता था। वह भोजन के लिये आखेट करता था, स्वयं ही पकाता था, और अपना तन ढकने के लिये सामान भी स्वयं ही जुटाता था। स्त्री हो या पुरुष प्रत्येक प्राणी इसी प्रकार अपना निर्वाह करता था। किन्तु सभी विविध प्रकार के कार्य करने के लिये सक्षम नहीं थे। प्रत्येक मानव को सभी तरह की जानकारी भी नहीं थी। हर मानव में अपना बचाव करने या सोचने की क्षमता भी ऐक जैसी नहीं थी, इस लिये उन का ऐक दूसरे पर निर्भर होना स्वाभाविक ही था। 

कालान्तर सभी अपनी अपनी रुचि तथा क्षमता के अनुसार काम का चैयन करने लगे। जो बलिष्ट थे, उन्हों ने कमज़ोरों को सुरक्षा प्रदान करनी शुरु कर दी तथा बदले में कमजोर उन को भोजन तथा अन्य पदार्थ देने लग गये। कमजोर तथा क्षमता रहित मानव, सक्षमों और बलिष्ठों को अन्य सुविधायें और सेवायें प्रदान करने लगे। जो सर्वाधिक सक्षम और निपुण थे, वह अग्रज तथा सलाहकार बन गये। जो डरपोक, कमजोर, अशक्त थे वह अग्रजों के सेवादार बनते गये। अपनी अपनी रुचि, अनुभव, तथा क्षमतानुसार मानव एक दूसरे के ऊपर निर्भर होने लगे। इस प्रकार भारत से शुरु हो कर विश्व भर में रुचि, कार्य विशेषता, तथा कार्य दक्षता के अनुसार सामाजिक वर्गीकरण होने लग गया। इस वर्गी करण का आधार आपसी निर्भरता, तथा काम का स्वैच्छिक बटवारा था। वर्गीकरण किसी दबाव, अन्याय या भेद भाव के कारण नहीं था। वह निजि आवशक्ताओं, रुचि और क्षमता के अनुसार प्राकृतिक था। 

वर्ण व्यवस्था

यदि कोई स्वेच्छा से किसी वस्तु को अपना ले तो उसे उस वस्तु का ‘वर्ण करना’ कहा जाता है। मनु महाराज विश्व में समाजशास्त्र के जन्मदाता थे। उन्हों ने मानव समाज के लिये रुचि, अनुभव, क्षमता और परस्पर निर्भरता के आधार पर सामाजिक वर्गीकरण को औपचारिक रूप दिया ताकि समाज का प्रत्येक सदस्य अपनी रूचि और क्षमतानुसार सभी वर्गों के लिये अपना योगदान दे सके, और बदले में उसे भी जीवन की वह सभी सुविधायें प्राप्त हों जिन का जुटाना उस की निजी क्षमता के बाहर हो। परस्पर निर्भरता, श्रम विभाजन, श्रम निपुणता और श्रम का सम्मान इस व्यवस्था के आधार थे। परस्पर निर्भरता के कारण समाज और संगठित भी हो गया।

मनु सहाराज ने कामों के अनुसार, उस समय के समाज का गठन किया था। उन्हों ने समाज में चार वर्ण बनाये जिन्हें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र की संज्ञा दी गयी। जो वर्गीकरण मनु महाराज ने प्राचीन काल में किया था, वह आज भी विश्व भर में प्रसांगिक है। सभी सभ्य तथा विकसित देशों में उसी आधार पर श्रम का वर्गीकरण आज भी चल रहा है। केवल श्रम कर्मियों के पहचान नई संज्ञाओं से होती है, किन्तु वर्गीकरण का आधार आज भी वैसा है – जैसा मनु महाराज ने निर्मित किया था।

मनु महाराज के चार मुख्य सामाजिक वर्ण इस प्रकार थे जिन में सभ्यता के विकास के साथ साथ नये व्यवसाय भी कालान्तर जुडते गयेः- 

शूद्र

जन्म से सभी अशिक्षित, तथा अनसिखिये होते हैं। आखेटी समुदायों में अनसिखियों को बोझा ढोने का कांम दिया जाता था। कालान्तर उन्हीं में से जब कुछ लोगों ने कृषि क्षेत्र में छोटा मोटा मज़दूरी करने का काम सीखा, तो वह आखेट के बदले कृषि का काम करने लग गये। अधिकतर ऐसे लोगों में जिज्ञासा की कमी, अज्ञानता, तथा उत्तरदाईत्व सम्भालने के प्रति उदासीनता की मानसिक्ता रही। वह अपनी तत्कालिक आवश्यक्ताओं की पूर्ति के इलावा कुछ और सोचने में असमर्थ और उदासीन रहे। उन के भीतर वार्तालाप करने की सीमित क्षमता थी जिस कारण वह समुदाय की वस्तुओं का दूसरे समुदायों के साथ आदान प्रदान नहीं कर सकते थे।

समुदाय में इन की संख्या तो अधिक थी किन्तु योग्यताओं की कमी के कारण उन में नेतृत्व का अभाव था। वह दूसरों के निर्देशों का पालन करते रहे जो उन से अधिक सक्षम थे। फलस्वरूप उन्हें शूद्र अथवा कामगारों की श्रेणी की संज्ञा दी गयी। समाज में उन के योगदान का महत्व आधार शिला जैसा था, जिस के उपर सामाजिक शिखर का निर्माण किया जाना था। उन्हें अविकसित कहना उचित होगा किन्तु उन्हें किसी भी तर्क से उपेक्षित नहीं कहा जा सकता। आज भी इन्हें ‘अनस्किल्ड लेबर ’ माना जाता है और सभी जगह कार्य क्षेत्र में उन का स्थान दूसरों की अपेक्षा निम्न ही होता है।

वैश्य

धीरे धीरे आखेटी समुदाय कृषि अपनाने लगे। समुदाय के लोग कृषि तथा कृषि से जुड़े अन्य व्यव्साय भी सीखने लगे। समुदाय के लोगों ने भोजन तथा वस्त्र आदि की निजि ज़रूरतों की आपूर्ति भी कृषि क्षेत्र के उत्पादकों से करनी शुरु कर दी थी। उन्हों ने कृषि प्रधान जानवर पालने शुरु किये और उन को अपनी सम्पदा में शामिल कर लिया। श्रम के बदले जानवरों तथा कृषि उत्पादकों का आदान प्रदान होने लगा। मानव समुदाय बनजारा जीवन छोड़ कर कृषि और जल स्त्रोत्रों के समीप रहने लगे। इस प्रकार का जीवन अधिक सुखप्रद था।

जैसे जैसे क्षमता बढी उसी के अनुसार नये कृषक व्यवसायी समुदाय के पास शूद्रों से अधिक साधन आते गये और वह ऐक ही स्थान पर टिक कर सुखमय जीवन बिताने लगे। अब उन का मुख्य लक्ष्य संसाधन जुटाना, तथा उन को प्रयोग में ला कर अधिक सुख सम्पदा एकत्रित करना था। इस व्यवसाय को करने के लिये व्यापारिक सूझबूझ, व्यवहार-कुशलता, परिवर्तन-शीलता, वाक्पटुता, जोखिम उठाने तथा सहने की क्षमता, धैर्य, परिश्रम, तथा चतुरता की आवशक्ता थी।

जिन लोगों में यह गुण थे या जिन्हों ने ऐसी क्षमता प्राप्त करी वह वैश्य वर्ग में प्रवेश कर गये। वैश्य कृषि, पशुपालन, उत्पादक वितरण, तथा कृषि सम्बन्धी औज़ारों के रख रखाव तथा क्रय-विक्रय का धन्धा करने लगे। उन का जीवन शूद्रों से अधिक सुखमय हो गया तथा उन्हों ने शूद्रों को अनाज, वस्त्र, रहवास आदि की सुविधायें दे कर अपनी सहायता के लिये निजि अधिकार में रखना शुरु कर दिया। इस प्रकार सभ्यता के विकास के साथ जब अनाज, वस्त्र, रहवास आदि के बदले शुल्क देने की प्रथा विकसित होने लगी तो उसी के साथ ही ‘सेवक’ व्यव्साय का जन्म भी हुआ। निस्संदेह समाज में वैश्यों का जीवन स्तर तथा सम्मान शूद्रों से उत्तम था। आज सभी देशों में वैश्य ‘स्किल्ड या प्रशिक्षशित वर्ग बन गया है। 

क्षत्रिय 

बनजारा आखेटियों, कृषकों के समाज के विस्तार तथा विकास के साथ साथ शूद्रों तथा वैश्यों का जीवन स्तर भी उन्नत होने लगा था। कृषि उत्पादनो, पशुओं तथा उन के दूारा संचित सम्पदा को पडौसी वनजारा समुदायों से लूट मार का भय भी पनपने लगा था। सभ्यता के विकास में जो समुदाय अभी भी अविकसित थे वह अपनी अवश्यक्ताओं की पूर्ति लूटमार से करते थे। वह वैश्यों तथा शूद्रों की कडे परिश्रम की कमाई ऐक ही झटके में लूट कर ले जाते थे।

अतः धन सम्पदा तथा वैश्य शूद्रों के जीवन की रक्षा के लिये भी कुछ प्रबन्ध करना जरूरी हो चुका था। इस कार्य के लिये अतिरिक्त युवा पुऱुषों की आवश्यक्ता थी जो बलिष्ट, अस्त्र शस्त्रों में निपुण, निर्भीक, इमानदार तथा पडोसी लुटेरों से प्रतिस्पर्धा में अपना प्रभुत्व स्दैव रख सकें। इस जोखिम भरे कार्य के लिये निरन्तर युद्ध अभ्यास करते रहना भी जरूरी था, जिस के लिये युवाओं को अन्य जिम्मेदारियों से मुक्त रखना पड़ता था। उन की निजि आवश्यकिताओं की पूर्ति का भार शूद्रों तथा वैश्यों को ही ग्रहण करना पडा। उन के लिये समुदाय के प्रति निष्ठावान होने के साथ साथ वीर, परिश्रनी, रणकुशल, चतुर, बलवान, तथा स्चरित्र होना भी अनिवार्य माना गया।

इस प्रकार जिस नये वर्ग का जन्म हुआ उसे क्षत्रिय कहा गया। जब पडौसियो के साथ युद्ध नहीं होता था तो क्षत्रिय वर्ग के लोग समाज में दैनिक प्रबन्धन का कार्य भार भी सम्भालने लगे थे। कालान्तर वह अन्य वर्गों के मध्य तालमेल, देख भाल तथा नियन्त्रण और निर्देशन भी करने लगे। समुदाय को अनुशासित रखने का उत्तरदाईत्व क्षत्रियों के कार्य क्षैत्र में आ गया। इस नये उत्तरदाईत्व में न्याय प्रदान करना तथा न्याय की रक्षा करना भी शामिल हो गया। यहीं से मानव समाज में राजा तथा राज्य पद्धति का चलन आरम्भ हुआ। वीर, चरित्रवान, न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ पुरुष को ही राजा बनने के उपयुक्त समझा जाता था। आजकल यही वर्ग ‘ऐडमिनिस्ट्रेटर ’, ‘मैनेजर ’ या प्रशासनिक वर्ग कहलाता है।  

ब्राह्मण

जब सभी संसाधन जुटाने तथा उन की रक्षा करने में व्यस्त रहने लगे तो ऐसे व्यक्तियों की आवश्यक्ता भी पडने लगी जो यह सुनिश्चित कर सकें कि समुदाय में सभी लोग अपने अपने कर्तव्यों का निर्वाह भली भान्ति कर रहे हैं या नहीं। कोई अपनी शक्ति का दुरोप्योग तो नहीं कर रहै। ऐसे लोगों को समुदाय की भलाई के लिये सोच विचार करने का उत्तरदाईत्व भी दिया गया। समुदाय को प्रशिक्षशित करने का कार्यभार भी उन्हें सौंपा गया। 

इस जिम्मेदारी को सम्भालने के लिये इस वर्ग के लोगों का सुशिक्षशित, सुशील, सत्यवादी, दूरदर्शी, अनुभवी, तथा पवित्र विचारों का होना बहुत ज़रूरी था। इस वर्ग के लोगों को ब्राह्मण कहा गया तथा उन को समुदाय को प्रशिक्षित करने का उत्तरदाईत्व सोंपा गया। उन्हें पठन – पाठन की ज़िम्मेदारी दी गयी। उन की योग्यता के उपलक्ष में उन्हें समाज में सर्वोत्तम तथा सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया। वह अपने पद की गरिमा बनाये रखने के लिये सात्विक भोजन ग्रहण करते थे और सादा जीवन व्यतीत करते थे। उन का समय समाज हित के चिन्तन में कटता था। 

नेतृत्व के गुण समान रुप से सभी प्राणियों में नहीं पाये जाते अतः ऐसे गुणी लोगों की संख्या समाज में थोड़ी थी। इसी कारण इस वर्ग में प्रवेश बहुत थोड़े लोगों को ही मिला। अपने गुणों के कारण समाज में यह वर्ग अत्याधिक प्रभावशाली तथा प्रतिष्ठित था। इन्हीं कारणों से कालान्तर यह वर्ग अन्य वर्गों दूारा प्रतिस्पर्धित भी बन गया। आजकल इसी वर्ग के लोग ‘डायरेक्टर्स, उच्च प्रशासनिक अधिकारी, न्यायधीश, ‘प्रोफ़्सर’ और बुद्धिजीवी कहे जाते हैं।    

क्षमता आधारित शिखर

उल्लेखनीय है कि सामाजिक वर्गीकरण के शिखर का निर्माण नीचे से ऊपर की ओर हुआ था – ऊपर से नीचे नहीं। जैसे जैसे लोग अपनी क्षमता बढ़ाते गये वह उच्च वर्गों की तरफ अग्रसर होते गये। जिन्हों ने निजि योग्यताओं की अनदेखी की वह निचली पादान से आगे नहीं बढ़ पाये। यह नियम ब्राह्मणों पर भी लागू था। मनु महाराज ने मनु समृति में यह स्पष्ट किया है कि अशिक्षशित ब्राह्मण केवल नाम-मात्र का ही ब्राह्मण होता है।   

           यथा काष्ठमयो हस्ती .यथा चर्ममयो मृगः।

                              यश्र्च विप्रोSनधीयानस्त्रयस्ते नां बिभ्रति ।। (मनु स्मृति 157)

अर्थात – जैसे काठ का हाथी और चमड़े का मर्ग, वैसे ही अनपढ़ ब्राह्मण केवल नामधारी होता है।

विश्व के अन्य देशों की कई सभ्यताओं में दूसरे समुदायों से लोगों का पकड कर अपने अपने समाज में निचले स्तर पर दास बना कर रखने का चलन था। आक्रान्ता, विजेता तथा उन के परिवार के लोग बंधकों के स्वामी बने रहते थे। इस के विपरीत हिन्दू समाज में ब्राह्मण हिन्दू समाज में बाहर से नहीं आये थे। हिन्दू समाज में सभी अशिक्षशित सर्वप्रथम शूद्र माने जाते थे। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात ही वह जनेऊ घारण कर उच्च वर्णों में प्रवेश पा सकते थे। क्षत्रिय विश्वमित्र को भी ऋषिपद प्राप्त करने के लिये बहुत तपस्या करनी पडी थी, और ब्रह्मऋषि का पद पाना तो उन के लिये भी अति कठिन कार्य था।

सर्व संगत वर्गीकरण

विश्व की सभी सभ्य देशों में सामाजिक गठन का आधार हिन्दू समाज की तरह ही है। केवल नाम ही बदले गये हैं। सभी धर्मों में ब्राह्मणों की तरह पादरी, मौलवी समाज के अग्रज हैं, सभी धर्मों में क्षत्रियों का उत्तरदाईत्व सैनिकों का है, कृषिक अर्थ व्यवस्था सम्भालते हैं और अशिक्षितों को समाज में निम्न स्तर ही प्राप्त हैं। कोई भी सभ्य देश ऐसा नहीं है जहाँ अशिक्षितों को उच्च सत्ता प्रदान की गयी हौ। व्यवसाय जगत में भी आधुनिक कम्पनियों का गठन मुख्यता इन्हीं चार वर्णों के ढाँचे पर खड़ा है केवल पदों का नाम आधुनिक है। यदि हम ध्यान मे आंकलन करें तो आधुनिक कम्पनियों तथा देशों की शासन प्रणाली के पदाधिकारियों तथा कर्मियों की जीवन शैली भी मनु के विधानानुसार ही होती है।

चाँद शर्मा

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