हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


(पढने के लिये रेखांकित शीर्षक पर कल्कि करें)

हिन्दू महा सागर – ऐक परिचय

प्रथम प्रकरण – विचारधारा

(सभी प्राणियों में ऐक ही सृजनकर्ता की छवि का प्रत्यक्ष आभास होता है। विभिन्नता केवल शरीरों में ही है।यही हिन्दू धर्म की मुख्य विचारघारा है।    संसार का प्रथम मानव धर्म प्राकृतिक नियमों पर आधारित था जो कालान्तर आर्य धर्म, स्नातन धर्म तथा हिन्दू धर्म के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ।)           

  1. सृष्टि और सृष्टिकर्ता
  2. स्नातन धर्म के जन्मदाता
  3. सम्बन्ध तथा प्रतिबन्ध
  4. धर्म का विकास और महत्व
  5. स्नातन धर्म – विविधता में ऐकता 

दूसरा प्रकरण – देवी देवता

(हिन्दू ऐक ही ईश्वर को निराकार मानते हुये उसे कई रूपों में साकार भी मानते हैं तथा जन साधारण को व्याख्या करने के लिये चिन्हों का प्रयोग भी करते हैं जो ईश्वरीय शक्ति के वैज्ञियानिक रूप को दर्शाते हैं। संसार की गति विधियों का जो विधान प्राचीन ऋषियों ने कल्पना तथा अनुभूतित तथ्यों के आधार पर किया उसी के अनुसार आज भी विश्व की सरकारें चलती हैं। सृष्टि के विधान में जब भी कोई कर्तव्य विमुख होता है और अधर्म बढने लगता है तो सृष्टिकर्ता सृष्टि के संचालन धर्म की पुनः स्थापना कर देते हैं।)

  1. निराकार की साकार प्रस्तुति 
  2. प्राकृति का व्यक्तिकरण
  3. संसार का प्रशासनिक विधान
  4. विष्णु के दस अवतार

तीसरा प्रकरण – हिन्दू साहित्य

तीसरा प्रकरण – मानव ज्ञान के मौलिक ग्रंथ

(कई धर्मों में आस्थाओं पर टिप्पणी करना अपराध माना जाता है किन्तु हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति वैचारिक रूप से स्वतन्त्र है। हिन्दू धर्म में बाईबल या कुरान की तरह कोई एक पुस्तक नहीं जिस का निर्धारित पाठ अनिवार्य हो। हिन्दू ग्रंथों की सूची बहुत विस्तरित है लेकिन हिन्दू चाहे तो की किसी ऐक पुस्तक को, अथवा सभी को, और चाहे तो किसी को भी ना पढे़। हिन्दू ग्रंथों के कारण ही विश्व में भारत को विश्व गुरू माना जाता था। वेद, उपनिष्द, दर्शनशास्त्र, रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं किन्तु धर्म निर्पेक्षता के ढोंग के कारण भारत सरकार ने ही उन्हें केवल हिन्दू साहित्य समझ कर शिक्षा के क्षेत्रों में अछूता छोड़ दिया है।)                       

  1. हिन्दूओं के प्राचीन ग्रंथ
  2. उपनिष्द – वेदों की व्याख्या
  3. दर्शनशास्त्र – तर्क विज्ञान
  4. समाजिक आधार – मनु समृति
  5. रामायण – प्रथम महाकाव्य
  6. विशाल महाभारत
  7. मानव इतिहास – पुराण
  8. पाठ्यक्रम मुक्त हिन्दू धर्म

चौथा प्रकरण – व्यक्तिगत जीवन

(जीवन में आदर्शों की आधारशिला यम नियम हैं। जिन के अभ्यास से गुण अपने आप ही विकसित होने लगते हैं। सभी जीव काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की भावनाओं से प्रेरित हो कर कर्म करते हैं। आवेश की प्रधानताओं के अनुसार ही व्यक्तित्व बनता है। आवेशों को साधना से नियन्त्रित और संतुलित किया जा सकता है। जीवन में आत्म-निर्भरता, आत्म-नियन्त्रण, दक्ष्ता, तथा मितव्यता पर बल दिया जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मानव को जीवन के चार मुख्य उद्देश हैं जिन में से धर्म अकेले ही मोक्ष की राह पर ले जा सकता है। जीवन को चार प्राकृतिक भागों में विभाजित किया है, जिन्हेंब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम कहा जाता है। आजकल के जीवन में तनाव का मुख्य कारण आश्रम जीवन पद्धति का लुप्त होना है।)

  1. आदर्श जीवन का निर्माण
  2. मानव जीवन के लक्ष्य 
  3. व्यक्तित्व विकास
  4. जीवन के चरण

पाँचवां प्रकरण – हिन्दू समाज

(सामाजिक वर्गीकरण आज भी सभी देशों और जातियों में है जो नस्ल, रंग-भेद, या विजेता और पराजित  अवस्था के कारण है। वहाँ निचले वर्ण से ऊँचे वर्ण में प्रवेश लगभग असम्भव है, किन्तु हिन्दू समाज में मनु के वर्गीकरण का आधार रुचि, निपुणता, परस्पर-निर्भरता, श्रम-विभाजन, श्रमसम्मान तथासमाज के लिये व्यक्ति का योग्दान था। जन्म से सभी निम्न वर्ण माने जाते हैं किन्तु सभी अपने पुरुषार्थ से योग्यता और उच्च वर्णों में प्रवेश पा सकते हैं। यह दुर्भाग्य है कि आजकल सरकारी विभाग केवल जन्म-जाति के आधार पर पिछडेपन के प्रमाण पत्र, आरक्षण और विशेष सुविधायें राजनेताओं के स्वार्थ के  कारण प्रदान कर देते हैं। अन्य देशों और धर्मों की अपेक्षा हिन्दू समाज में प्राचीन काल से ही स्त्रियों को स्वतन्त्रता प्राप्त रही है। स्त्रियों के लिये कीर्तिमान के तौर पर ऐक आदर्श गृहणी को ही दर्शाया जाता है ताकि स्त्री पुरुष ऐक दूसरे के प्रतिदून्दी बनने के बजाय सहयोगी बने। धर्मान्तरण कराने के लिये हिन्दू विरोधी गुट छुआ-छूत, सती प्रथा तथा कन्याओं के वध का दुष्प्रचार करते रहै हैं जबकि हिन्दू समाज में सामाजिक शिष्टाचार का महत्व सभ्यता के आरम्भ से ही है।)

  1. हिन्दू समाज का गठन
  2. वर्ण व्यवस्था का औचित्य
  3. हिन्दू समाज और महिलायें
  4. सती तथा भ्रूण हत्या
  5. हमारी सामाजिक परम्परायें

छठा प्रकरण – प्राकृतिक जीवन

(पूजा पाठ करना प्रत्येक व्यक्ति का निजि क्षेत्र है। मन्दिरों का महत्व विद्यालयों जैसा है। क्रियाओं को निर्धारित प्रणाली से करना ही रीति रिवाज कहलाता है जो घटना के घटित होने के प्रमाण स्वरूप समाज में प्रसारण के लिये किये जाते हैं। यह समय और समाज की ज़रूरतों के अनुसार बदलते रहते हैं। पर्व नीरस जीवन में परिवर्तन तथा खुशी का रंग भरने के निमित हैं। हिन्दू पर्व भारत की ऋतुओं, पर्यावरण, स्थलों, देश के महा पुरुषों तथा देश में ही घटित घटनाओं के साथ जुड़े हैं। हमें विदेशों से पर्व उधार लेने की कोई आवश्यक्ता नहीं है। साधना का ऐक महत्व पूर्ण अंग वृत लेना है। साधनायें आवेशों, विकारों, मनोभावों तथा इन्द्रियों पर नियन्त्रण करने में सहायक है।)

  1. पूजा और रीति रिवाज
  2. पर्यावरण सम्बन्धित पर्व 
  3. राष्ट्र नायकों के पर्व
  4. वृत और स्वस्थ जीवन 

सातवां प्रकरण – हिन्दू गौरव

(वैज्ञानिक तथ्यों के मोती भारत के प्राचीन साहित्य में जहाँ तहाँ बिखरे पडे हैंक्योंकि विज्ञान के सभी विषय वेदों में बखान किये गये हैं। आज से हजारों वर्ष पूर्व भारत में उच्च शिक्षा के लिये विश्विद्यालय थे जहाँ से वैज्ञायानिक विचारों का उदय हुआ लेकिन आज से केवल आठ सौ वर्ष पूर्व तक विश्व की अन्य मानव जातियाँ डार्क ऐज में ही जीवन व्यतीत कर रही थीं। ज्ञान विज्ञान के सभी विषयों पर मौलिक शब्दावली और ग्रंथ भारत में लिखे गये थे। उदाहरण स्वरूप कुछ ही विषयों की जानकारी संक्षिप्त में यहाँ दी गयी है।)

  1. उच्च शिक्षा के संस्थान
  2. विज्ञान-आस्था का मिश्रण
  3. सृष्टि का काल चक्र
  4. गणित क्षेत्र में योगदान
  5. भारत का भौतिक ज्ञान
  6. तकनीकी उपलब्द्धियाँ
  7. ज्योतिष विज्ञान
  8. चिकित्सा क्षेत्र के जनक
  9. आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति

आठवां प्रकरण –कला-संस्कृति

(भाषा, भोजन, भेष, भवन और भजन देश की संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं। पाश्चात्य देशों के लोग जब तन ढकने के लिये पशुओं की खालें ओढते थे और केवल मांसाहार कर के ही पेट भरते थे तब भी भारत को ऐक अत्यन्त विकसित और समृद्ध देश के रूप में जाना जाता था। संस्कृत आज भी कम्पयूटरों के उपयोग के लिय सर्वोत्तम भाषा है और इस का साहित्य सर्वाधिक मौलिक, समृद्ध और सम्पन्न है। साहित्य सर्जन की सभी शैलियों का विकास भारत में ही हुआ था। भारतीय जीवन में अध्यात्मिक्ता के साथ साथ मर्यादित विलासता का भी समावेश रहा है। भारतीय खेलों के लिय किसी विश्ष्ट तथा महंगे साजोसामान की जरूरत नहीं पडती। विश्व में लगर प्रबन्ध का प्राचीनतम प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता स्थल से ही मिले हैं। भारतीय संगीत तुलना में आज भी पाश्चात्य संगीत से अधिक विस्तरित, वैज्ञानिक, कलात्मिक और प्रगतिशील है।)
 
  1. देव-वाणी संस्कृत भाषा
  2. विश्व को साहित्यिक देन
  3. समृद्ध भारतीय जन जीवन
  4. खेल कूद के प्रावधान 
  5. भारत की वास्तु कला
  6. हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति

नौवां प्रकरण – सैन्य क्षमता

(प्रजातान्त्रिक प्रतिनिधि सरकार की परिकल्पना को भारतवासियों ने रोम तथा इंग्लैंड से कई हजार वर्ष पूर्व यथार्थ रूप दे दिया था। राजगुरू राजाओं पर अंकुश रखते थे। भारत को ऐक समृद्ध सैनिक महाशक्ति माना जाता था। युद्ध-भूमि पर प्राण त्याग कर वीरगति पाना श्रेष्ठतम, और कायरता को अधोगति समझा जाता था। प्रथम शताब्दि में युद्ध कला, युद्ध-नियम तथा शस्त्राभ्यिास के विषयों पर संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे गये थे। भारत के प्राचीन ग्रन्थों में आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व विमानों तथा विमानों की संचलन प्रणाली सम्बन्धी निर्देश भी उपलब्द्ध हैं जिन में प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मिक जानकारी उपलब्द्ध है।)

  1. राजनीति शास्त्र का उदय
  2. राष्ट्वाद की पहचान – हिन्दुत्व
  3. भारत की सैनिक परम्परायें
  4. वीरता की प्रतियोग्यतायें
  5. प्राचीन वायुयानों के तथ्य
  6. अवशेषों से प्रत्यक्ष प्रमाण

दसवां प्रकरण – ज्ञानकोषों की तस्करी

ज्ञान-विज्ञान, कला और सभ्यता के सभी क्षेत्रों के जनक हिन्दूओं के पूर्वज ही थे। पाश्चात्य देशों के साथ भारतीय ज्ञान का प्रसार सिकन्दर से ही आरम्भ हुआ था। भारतीय ग्रन्थों के यूनानी भाषा में अनुवाद से आधुनिक विज्ञान का पुनर्जन्म योरुप रिनेसाँ के काल में हुआ। रिनेसाँ के युग में भारत खोजने के लिये योरूपीय देशों में होड सी मच गयी थी। भारत के ऋषियों ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पाश्चात्य बुद्धजीवियों की तरह कोई पेटेन्ट नहीं करवाये इस लिये जैसे जैसे योरुपीय उपनेषवाद विश्व में फैला तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान का हस्तान्तिकरण हो गया और विज्ञान के क्षेत्र से चर्च का हस्तक्षेप सीमित करने के लिये ‘धर्म-निर्पेक्षता’ का प्रयोग आरम्भ हुआ।

  1. भारत का वैचारिक शोषण
  2. भारतीय बुद्धिमता की चमक
  3. भारतीय ज्ञान का निर्यात
  4. योरुप में भारतीय रोशनी
  5. भारतीय ज्ञान का हस्तान्तिकरण
  6. पश्चिम से सूर्योदय पूर्व में अस्त

ग्यारहवां प्रकरण – विनाश लीला

देश तथा धर्म के लिये अपने शहीदों की उपेक्षा करने से बडा और कोई पाप नहीं होता। अति सदैव बुरी होती है। हिमालय की गोद में हिन्दू अपनी सुरक्षा के प्रति इतने निशचिन्त हो गये थे कि उन का संजोया हुआ सुवर्ण युग इस्लाम की विनाशात्मक काली रात में परिवर्तित हो गया। दिखावटी रीति रिवाजों और पाखण्डों का चलन बढ जाने से निर्धन लोग इस्लाम कबूलने लग गये। कर्मयोग को त्याग हिन्दू पलायनवाद पर आश्रित हो गये। अपने ही देश में आपसी असहयोग और अदूरदर्शता के कारण हिन्दू बेघर और गुलाम होते गये।

  1. क्षितिज पर अन्धकार
  2. इस्लाम का अतिक्रमण
  3. हिन्दू मान्यताओं का विनाश
  4. इस्लामीकरण का विरोध
  5. कुछ उपेक्षित हिन्दू शहीद
  6. अंग्रेजों की बन्दर बाँट

बारहवां प्रकरण – वर्तमान

धर्म राष्ट्रीयता से ऊपर होता है – बटवारे के बाद जब भारत की सीमायें ऐक बार फिर सिमिट गयीं तो हिन्दूओं को पाकिस्तान से निकलना पडा था। प्राचीन इतिहास से नाता तोड कर हम विश्व के सामने नवजात शिशु की तरह  प्रचारित किये गये विवादस्पद ‘राष्ट्रपिता’ का परिचय ले कर अपनी नयी धर्म-निर्पेक्ष पहचान बनाने में लगे हुए हैं। काँग्रेसी नेताओं ने आक्रान्ताओं को खण्डित भारत का फिर से हिस्सेदार बना लिया है और मुस्लमानों को प्रलोभनों से संतुष्ट रखना अब हिन्दूओं के लिये नयी ज़िम्मेदारी है। अपने वोट बैंक की संख्या बढा कर अल्पसंख्यक फिर से भारत को हडप जाने की ताक में हैं। उन्हों ने भारत में रह कर धर्म-निर्पेक्ष्ता के लाभ तो उठाये हैं किन्तु उसे अपनाया नहीं है। हमारे राजनैता उदारवादी बन कर अपने ही देश को पुनः दासता की ओर धकेल रहै हैं। हिन्दू धर्म सरकारी तौर पर बिलकुल ही उपेक्षित और अनाथ हो चुका है। हिन्दूओं की पहचान, राष्ट्रीय स्वाभिमान और आत्म-सम्मान  सभी कुछ नष्ट हो रहै हैं। हिन्दूओं में आज अपने भविष्य के लिये केवल निराशा और पलायनवाद है। अगर हमें अपनी संस्कृति की रक्षा करनी है तो एक राजनैतिक मंच पर इकठ्ठे होना पडे गा, उस सरकार को बदलना होगा जिस की नीति धर्म-निर्पेक्ष्ता की नही – धर्म हीनता की है़। गर्व से कहना हो गा कि हम हिन्दू हैं  और आदि काल से भारत हमारा देश है।  अगर अभी नहीं किया तो फिर कभी नहीं  होगा !  

  1. बटवारे के पश्चात भारत
  2. हिन्दू विरोधी गुटबन्दी
  3. आरक्षण की राजनीति
  4. अलगावादियों का संरक्षण
  5. अपमानित मगर निर्लेप हिन्दू
  6. हिन्दूओं की दिशाहीनता
  7. धर्म हीनता या हिन्दू राष्ट्र?
  8. ऐक से अनेक की हिन्दू शक्ति
  9. अभी नहीं तो कभी नहीं

निम्नलिखित हिन्दू महासागर का भाग नहीं हैं।

हिन्दू जागृति

हिन्दू गौरव

चेतावनी

राष्ट्रीयता

हिन्दू समाज

हमारे राजनेता

वर्तमान

मोदी सरकार

हमारा मीडिया

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Comments on: "हिन्दू महा सागर – विषय सूची" (3)

  1. आप का ब्लाग देखा जो कि ऐक सराहनीय प्रयास है और युवाओं में चेतना तथा राष्ट्रभक्ति की लौ जगाने की क्षमता रखता है। मेरी शुभकामनायें आप के साथ हैं। – चाँद शर्मा फेसबुक

  2. Chand Sharma ji….kripaya mujhe FB par join karen. request bhejen. bdhanywad.JAY SHREE RAM

  3. श्री मान प्रथम प्रकरण में लिंक तीन और चार गलत है दोनो एक दुसरे की जगह लगे हुए हैं.

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