हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


आजकल बड़े नगरों में व्यक्तित्व विकास के कई केन्द्र भारी फ़ीस ले कर युवाओं को नौकरियों के प्रशिक्षण देते हैं। वहाँ व्याख्यानों, गोष्ठियों  तथा सामूहिक वार्तालाप के माध्यम से युवाओं को अंग्रेज़ी में बातचीत करना तथा शिष्टाचार के गुर सिखाये जाते हैं। वास्तव में यह प्रशिक्षण सीमित होता है और किसी ना किसी नौकरी या पद विशेष के लिये ही कुछ सीमा तक उपयुक्त होता है। इसे मानवी व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कहा जा सकता।

हर व्यक्ति को पद तथा परिस्थितिनुसार कार्य प्रणाली भी बदलनी पड़ती है। प्रत्येक व्यवसाय की कार्य शैली तथा कार्य स्थल का वातावरण ऐक दूसरे से भिन्न होता है। अतः कार्य स्थल के वातावरण और कार्य शौली के अनुसार प्रत्येक कार्य वर्ग के लिये अलग अलग क्षमताओं की आवश्यक्ता भी पड़ती है। व्यक्ति तथा उस के कार्य क्षेत्र को आसानी से ऐक दूसरे के अनुकूल नहीं बदला जा सकता। व्यक्तित्व विकास के आधुनिक पाठयक्रम का क्षेत्र किसी ऐक व्यवसाय तक ही सीमित होता है।          

व्यक्तित्व विकास का मूल उद्दैश्य मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को इस प्रकार विकसित करना होना चाहिये कि व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में अपना कार्य सक्ष्मता से कर सके। भारत की प्राचीन व्यक्तित्व विकास पद्धति इस कसौटी पर सक्ष्म है। 

क्रिया के निमित आवेश 

शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक आवश्यक्ताओं की पूर्ति के साथ साथ सभी जीव अपनी भावनाओं से भी प्रेरित हो कर अपने अपने कर्म करते हैं। हिन्दू विचारघारा में पाँच प्रकार की तीव्र भावनाओं के आवेशों की पहचान की गयी है जो समस्त जीवों में ऐक समान है। यह भावनायें हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार।

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार में से किसी भी भावना का आवेश आते ही शरीर में ऐक प्रकार की रसायनिक क्रिया अपने आप आरम्भ हो जाती है जो मानव की बुद्धि को प्रभावित कर देती हैं। प्रभाव सकारात्मिक हो तो आवेश बुद्धि का सहायक बन कर कर्म का मार्ग भी दर्शाते हैं और उस के लिये साहस और क्षमता भी अर्जित कर देते हैं। ऐसी अवस्था में आवेश की रसायनिक क्रिया से प्रोत्साहित मानव अपनी जान की बाज़ी लगा कर दूसरे की जान बचाता है, ख्याति पाने के लिये असाध्य काम भी कर लेता है। आवेश के प्रभाव से ग्रस्त मानव में थोडे समय के लिये अदभुत क्षमता पैदा हो जाती हैं जिस पर बाद में मानव स्वयं ही अपनी छिपी हुई क्षमता पर आश्चर्य करने लगता है। यह आवेशों का सकारात्मिक पक्ष है।

इस के विपरीत यदि आवेश नकारात्मिक हों तो मानव चोरी, हत्या, बलात्कार, और कई बार आत्महत्या आदि करने को उद्यत हो उठता है। इस कारण से इन भावनात्मिक आवेशों को विकार भी कहा गया है और इन को नियन्त्रण में रखना आवश्यक है। इन्हीं विकारों के कारण पशु पक्षी भी सहवास, भोजन, ठिकाने, सुरक्षा तथा अपने प्रभाव के लिये मानवों की तरह ही लडते हैं। आवेश के नकारात्मिक प्रभाव से ग्रस्त मानव और पशु के स्वभाव तथा कर्म में कोई अन्तर नहीं होता।

आवेशों का जीवन में प्रभाव

प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी ऐक अथवा अनेक आवेशों अथवा विकारों के प्रभाव के अधीन होता है। यही आवेश कई बार व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान भी बन जाते हैं। कुछ लोग स्वभाव से अहंकारी होते हैं। कुछ उग्र स्वभाव के, कुछ कामुक तथा अप्राकृतिक आदतों के शिकार भी होते हैं। लोभ या मोह वश कुछ लोग सामाजिक तथा नैतिक मर्यादाओं को लाँघ कर अपने स्वजनो और मित्रों या किसी ऐक ही व्यक्ति का हित करने में लगे रहते हैं। कई लालच और लोभ में इतने ग्रस्त होते हैं कि उन के जीवन में अन्य कर्तव्यों का कोई महत्व नहीं रहता। आवेशों तथा विकारों में फर्क की लकीर अति सूक्षम होती है जैसे किसी असाध्य कार्य की पूर्ति स्वाभिमान बन जाती है तो किसी असाध्य कार्य को पूरा करने का केवल दावा करना अहंकार बन जाता है। क्रोध के आवेश में रण भूमि में शत्रु की हत्या करना वीरता है किन्तु क्रोध या अभिमान वश स्वार्थ के लिये किसी की हत्या करना दण्डनीय अपराध होता।

कुछ आवेश माता पिता से संस्कारों के रूप में जन्मजात होते हैं तो कुछ संगति तथा रहवास के वातावरण के कारण अपने आप पनप उठते हैं। मानव की आवश्यक्ताये भी उस के अर्जित आवेशों के स्वभावानुकूल ही बनती हैं जिन की पूर्ति के लिये मानव कर्म करते रहते हैं और फल पाते हैं। किसी ऐक ही अच्छे या बुरे कर्म से मानव जीवन में अच्छे-बुरे कर्मों के अटूट चक्कर आरम्भ हो जाते हैं जहाँ से बाहर निकल पाना कई बार असम्भव भी हो जाता है। 

मानव के शरीर में जिस प्रकार का आवेश प्रधान होता है उसी के अनुसार व्यक्ति का स्वभाव और व्यक्तित्व बन जाता है। कोई झगडालु, ईर्षालु, लालची, दबंग, डरपोक या रसिक आदि बन जाता है तो कोई वीर, निडर, दयालु और दानवीर बन जाता है। सभी मानव अपने अपने आवेशानुसार कर्म कर के उसी प्रकार के परिणाम भी भुगतते है। आवेश दुधारी तलवार की तरह हैं। आत्म सम्मान के आवेश से प्रेरित हो कर ही कुछ लोग वीरता और साहस के काम कर जाते है जिस के कारण व्यक्ति, परिवार और समाज गर्वित होता है और इस के विपरीत कुछ अहंकार के कारण छोटी सी बात पर ही दूसरों की हत्या कर देते हैं और फाँसी पर लटक जाते हैं। वह अपने परिवारों के लिये दुःख और लज्जा का कारण बन जाते हैं।

आवेश नियन्त्रण

मानव संसाधन विकास के पाठ्यक्रम में पाश्चात्य दार्शनिक अब्राहम मासलो की ‘नीड थियोरी पढाई जाती है और इस के अन्तर्गत निजि आवश्यक्ताओं की पूर्ति को ही कर्म का निमित माना गया है। अब्राहम मासलो के अनुसार निजि आवश्यक्तायें शारीरिक तथा मानसिक क्रमशः निम्न और उच्च श्रेणियों में विभाजित की गयी हैं जिन्हें पूरा करने के लिये मानवों को प्रेरणा मिलती है। लेकिन अब्राहम मासलो का ज्ञान और सिद्धान्त अधूरे हैं। उस में यह नहीं बताया गया कि आवश्यक्तायें जन्म ही क्यों लेती हैं ? इस तथ्य का उत्तर आवेशों के भारतीय सिद्धान्त में छुपा है। आवेशों के सक्रिय होने पर ही इच्छाओं और आवश्यक्ताओं का जन्म होता है जिन की पूर्ति के लिये पुरुषार्थ करना पडता है। इसीलिये इच्छाओं पर नियन्त्रण रखने पर बल दिया जाता है।  

आवेशों को संतुलित रखना जरूरी है। यदि आवेशों पर नियन्त्रण ना किया जाय तो वह विकार बन कर सब से बडे शत्रु बन जाते हैं और जीव को विनाश की ओर धकेल देते हैं। अपने आवेशों को नियन्त्रित करना, तथा विपक्षी के नकारात्मिक आवेशों को अपनी इच्छानुसार सकारात्मिक बनाना ही किसी व्यक्ति की क्षमता और सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। इसी को दक्षता और कार्य निपुणता कहते हैं।

आवेशों को साधना के माध्यम से, स्वेछिक अनुशासन से, यम नियमों से नियन्त्रित किया जा सकता है ताकि उन का साकारात्मिक लाभ उठाया जा सके। काम को ब्रह्मचर्य, स्वच्छता, और सदाचार से, क्रोध को सत्य और अहिंसा से, लोभ को संतोष और अस्तेय की भावना से, मोह को वैराग्य, निष्पक्ष्ता और कर्तव्य परायणता से, तथा अहंकार को अपारिग्रह, सरलता, ज्ञान शालीनता तथा सेवा सहयोग से वश में रखा जा सकता है। यम नियम का निरन्तर अभ्यास ही प्राणी को पशुता से मानवता की ओर ले जाता है। जब तक आलस्य और अज्ञान की परिवृतियों को यम नियम से नियन्त्रित नहीं किया जाये गा मानव का व्यक्तित्व संतुलित नहीं हो सकता।

स्वेच्छिक अनुशासन

हिन्दू समाज में निजि रुचि अनुसार व्यवसाय चुनने तथा स्वैच्छिक अनुशासन पर बल दिया जाता है। अनुशासन को सैनिक तरीकों से लागू नहीं करवाया जाता। प्रत्याशी को आत्म-निरीक्षण, स्वैच्छिक अनुशासन तथा स्वाध्याय के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। जीवन के संस्कारों की आधारशिला बचपन से ही माता पिता घर के वातावरण में रख देते हैं तथा फिर उसी दिशा में व्यक्तित्व का विकास  निरन्तर चलता रहता है। बालक को आदर्शवाद के सामाजिक सिद्धान्त घर के वातावरण में माता पिता के संरक्षण में प्रत्यक्ष सिखाये जाते है। यम नियम बालक के मानवी विकास की दिशा में प्रथम एवमं महत्व पूर्ण कदम है। यदि इन का पालन दैनिक जीवन की प्रत्येक क्रिया में किया जाये तो चाहे हम विश्व के किसी भी स्थान पर रहैं और किसी भी धर्म अनुयायी हों, हमारे जीवन की अधिकतर समस्यायें तो पैदा ही नहीं होंगी। यदि दूसरों के कारण समस्यायें उत्पन्न हो भी गयीं तो वह प्रभावित किये बिना अपने आप ही निषक्रिय भी हो जायें गी तथा यम नियमों का पालन करने वाले के जीवन में कोई तनाव और हताशा नहीं होगी।

आत्म विकास

श्रीमद् भागवद गीता में मानव के आत्म विकास के चार विकल्प योग साधनाओं के रूप में बताये गये हैं उन में से प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि अनुसार किसी भी साधना का मार्ग अपने लिये चुन सकता है। कर्मठ व्यक्ति कर्म योग साधना को अपना सकते हैं। भाग्य तथा ईश्वर के प्रति श्रद्धालु भक्ति मार्ग को अपने लिये चुन सकते हैं। इसी प्रकार तर्कवादी राज योग से अपने निर्णय तथा कर्म का चेयन करें गे और योगी संनयासी तथा दार्शनिक साधक ज्ञान योग से ही कर्म करें गे।

मध्य मार्ग इन सभी साधनाओं का मिश्रण है जिस में छोड़ा बहुत अंग निजि रुचि अनुसार चारों साधनाओं से लिया जा सकता है।

सारांश यह है कि इस प्रकार से जो व्यक्तित्व निर्माण हो गा वह विश्व भर में सभी परिस्थितियों में सफल रहे गा। हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं कि आज भी भारत के विद्यार्थी विदेशों में सफल हैं जहाँ उन्हीं देशों के स्थानीय छात्र उन से स्पर्धा नहीं कर पाते। भारतीय सैनिक प्रथम तथा दूसरे महायुद्ध के कठिनत्म प्रदेशों में भी सक्षम रहै जब कि अन्य देशों के सैनिक उन कठिनाईयों को झेल नहीं पाये। वियतनाम जैसे छोटे देश के सामने अमेरिका जैसे समर्द्ध तथा शक्तिशाली देश के सैनिक समझोता कर के वहाँ से सुरक्षित निकलने का मार्ग खोजने के लिये मजबूर हो गये थे।  भारत का वाहन चालक विदेशों में भी धडल्ले से गाड़ी चला सकता है लेकिन एक विदेशी चालक अति-आधुनिक कार को अपने देश से बाहर नहीं चला सकता। इस प्रक्रिया में भारतीय व्यक्ति की मानसिक तथा शारीरिक क्षमता छिपी हुयी है जो उसे सभी परिस्थितियों का सामना करने का हौसला देती है। यह गुणवत्ता आधुनिक तकनीक से नहीं उपजी अपितु इस का श्रेय भारतीय जीवन के उन मूल्यों को जाता है जो व्यक्ति को हर कठिन परिस्थिति का सामना करने के लिये प्रोत्साहित करती हैं। भारतीय व्यकतित्व विकास पद्धति हर अग्नि परीक्षा में सफल होती रही है।  

तुलनात्मिक विशलेषण 

भारतीय पाठ्यक्रम में स्दैव आत्म-निर्भरता, आत्म-नियन्त्रण, दक्ष्ता, तथा मितव्यता पर बल दिया जाता रहा है। गुरुकुल वातावरण में व्यसनों, ऐशवर्य तथा अकर्मणता के लिये कोई स्थान नहीं था। स्वस्थ शरीर में स्वच्छ मन को लक्ष्य रख कर य़ोग साधना के दूारा व्यक्ति का विकास किया जाता था। उसी पद्धति का ही आज स्वामी रामदेव पुर्नप्रचार सफलता पूर्वक कर रहै हैं।

आजकल व्यक्ति की वास्तविक कमियों को बनावटी ढंग से छुपा दिया जाता है उस में योग्यताओं को विकसित नहीं किया जाता। बनावटी शिष्टाचार, वेषभूषा तथा ‘वर्क कलचर केवल आवरण हैं जो असली पर्सनेलिटी को थोडी देर के लिये ढक देते हैं। पाश्चात्य व्यक्तित्व विकास पद्धति मानव को दूसरे मानव से प्रतिस्पर्धा करने के लिये उकसाती है। सदाचारी बनने के बजाय मानव स्वेच्छाचारी तथा पूर्ण स्वार्थी बन कर समाज में दूसरों को मात देने की राह पर चलने लगता है। वह समाज को जोडने के बजाय समाज को तोड़ कर निजि सफलता को ही प्राथमिकता देता है। पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से यही क्रम आजकल हमारे विद्यालयों, दफतरों तथा जीवन के हर क्षेत्र में हो रहा है जिस के कारण निराशा, हताशा तथा निरंकुशता का वातावरण ही समाज में पनप रहा है। हिन्दू व्यक्तित्व सृष्टि के सभी जीवों में एकीकरण ढूंडता है, प्रतिस्पर्धी नहीं।

हिन्दू व्यक्तित्व विकास पद्धति मानव को निजि कर्तव्यों की ओर प्रोत्साहित करती है निजि अधिकारों तथा स्वार्थों की ओर नहीं। निजि कर्तव्यों में सर्व प्रथम देश, समाज तथा परिवार की प्राथमिक्ता है और निजि स्वार्थ सभी के पश्चात आता है। दैनिक कार्य क्षैत्र में सर्वप्रथम पर्यावरण, पशु पक्षियों के प्रति उत्तरदाईत्व को स्थान दिया गया है। पाश्चात्य व्यवसायिक कम्पनियाँ जिस सामाजिक उत्तरदाईत्व की केवल चर्चा करती हैं वह भारतीयों ने दैनिक जीवन शैली में सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही अपना लिया था। विदेशों में कोई व्यक्ति स्वैच्छा से पीपल, बरगद या तुलसी के पौधै को पानी नहीं देता ना ही चींटियों से ले कर बड़े जानवरों के लिये गर्मी में पेय जल की व्यव्स्था ही करता है। भारत में यह कार्य किसी मजबूरी से नहीं अपितु निजि व्यक्तित्व की प्रेरणा से किया जाता है। मोक्ष (टोटल सेटिस्फेक्शन) की परिकल्पना व्यवसायिक संतुष्टि (जोब सेटिस्फेक्शन) से कहीं ऊँची परिकल्पना है। अतः हिन्दू व्यक्तित्व विकास पद्धति मानव को मानवता का अभिन्न अंग बनने को प्रेरित करती है तभी उस का पूर्ण वास्तविक विकास होता है – केवल नौकरी पाने के लिये विकास नहीं करवाया जाता।

जीवन में ऐकीकरण

आजकल हर व्यक्ति की ‘प्राईवेट लाईफ ‘और ‘प्बलिक लाईफ में ऐकीकरण नहीं होता। इस का अर्थ यह हुआ कि यदि कोई व्यक्ति जो समाज में ईमानदार, सत्यवादी और चरित्रवान होने का दावा करता है वह अपने निजि जीवन में बेइमान, झूठा या व्यभिचारी भी रह सकता है। यह व्यकतित्व का विकास नहीं विनाश है क्यों कि अन्दर बाहर व्यक्ति को ऐक समान ही होना चाहिये।

ज्ञान को केवल प्राप्त कर लेना ही मानव जीवन का लक्ष्य नहीं है। शिक्षा तथा शिष्टता के सदाचारी गुणों को दैनिक क्रियाओं में निरन्तर अपनाना भी आवश्यक है। केवल यह जान लेना कि इमानदारी और सत्य का पालन करना चाहिये पर्याप्त नहीं जब तक इमानदारी और सत्य को मन, वचन तथा कर्म से जीवन के हर प्रत्यक्ष और अपर्त्यक्ष रूप में अपनाया और दर्शाया ना जाये। यम नियम तथा गीता के योग इन्हीं को व्यक्तित्व विकास की सीढियाँ मानते हैं।

पाश्चात्य जीवन पद्धति केवल कामचलाऊ नौकरी पाने के लिये ही विकसित करती है और मानव को ऐक दूसरे का प्रतिस्पर्द्धी बना कर स्वार्थी जीवन जीने के लिये प्रोत्साहित करती है जबकि भारतीय जीवन शैली व्यक्ति को परिवार, समाज और पर्यावरण के कल्याण और पूर्ण विकास की ओर विकसित करती है।   

चाँद शर्मा 

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