हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


हिन्दू मतानुसार धर्म तथा अध्यात्मिक्ता प्रत्येक व्यक्ति का निजि क्षेत्र है। ईश्वर तथा आत्मा का सम्बन्ध अटूट है। किसी व्यक्ति पर कोई दबाव नहीं कि वह कोई मन्दिर बनवाये या किसी विशेष समय और स्थल पर जा कर किसी विशेष ढंग से पूजा अर्चना करे। हिन्दूओं के लिये उन के अपने शरीर में ही परमात्मा का वास होता है। जब हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश आदि तत्वों से बना है तो इन सभी तत्वों के देवता भी हमारे शरीर में ही वास करते है। हमारे शरीर में सूर्य की गर्मी तथा चन्द्र की शीतलता होने के कारण उन का भी वास है। मानव में ब्रह्मा की सर्जन शक्ति, विष्णु की पोषण शक्ति तथा शिव की संहारक शक्ति भी है, अतः हिन्दू धर्म यह घोषणा भी करता है – जो ब्रह्माण्डे सो ही पिण्डे। हमारे शरीर में ईश्वर तथा देवताओं का वास है। इसी कारण मन्दिर को भी मानव शरीर का प्रतीक मान कर मन्दिरों के भवन के सभी भागों के नाम भी शरीर के अँगों की तरह ही होते हैं।  

रामायण और महाभारत काल में यज्ञशालाओं का उल्लेख तो है परन्तु मन्दिरों का उल्लेख नहीं है। सम्भवता मन्दिरों का निर्माण बुद्ध काल में जब मठ और विहार बने तभी बुद्ध की प्रतिमाओं के साथ साथ अन्य देवी देवताओं की स्थापना भी मन्दिरों में करी गयी। वास्तव में मन्दिरों का महत्व विद्यालयों जैसा है जहाँ समाज के लिये अध्यात्मिकता की कक्षायें लगायी जाती हैं। मन्दिरों ने विभिन्न पर्वों के माध्यम से हिन्दू धर्म, समाज, संस्कृति, कला तथा हस्त कलाओं के उत्थान में विशेष योग्दान दिया है। देश के दूर दराज़ इलाकों में फैले हुये मन्दिरों नें सामाजिक सम्मेलन स्थलों की भूमिका भी निभायी है तथा देश की ऐकता को मज़बूत किया है। कुम्भ आयोजन तथा जगन्नाथ रथ यात्रा इस के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं जब लोग लम्बी दूरी तय कर के निर्धारित समय पर स्वेच्छा से एकत्रित होते हैं। मन्दिर, पर्व तथा रीतिरिवाज हिन्दू जीवन शैली का अविभाज्य अंग हैं।

भारत को ऐकता सूत्र में पिरोने के अतिरिक्त मन्दिरों नें समाज के लिये सूचना केन्द्रों तथा समुदायों में ताल मेल करने में भी सहायता की है। भारत में पर्यटन को भी तीर्थयात्राओं के माध्यम से प्रोत्साहन मिलता रहा है।

रीति रिवाजों का महत्व

हिन्दू धर्म में प्राकृतिक जीवन तथा समाज में प्राणी मात्र के कल्याण पर विशेष बल दिया जाता है। किन्तु इन भावात्मिक शब्दों को क्रियात्मिक रूप देना हर किसी की योग्यता के बस की बात नहीं। जब तक कोई गति-विधि दिखाई ना पडे, कोई भी भावनात्मिक तथा दार्शनिक काम जन साधारण की कल्पना से बाहर रहता है। भावनाओं को साकार करने का कार्य रीति रिवाज करते हैं। रीति रिवाजों का अस्तीत्व भोजन में मसालों की तरह का है। जिन के बिना जीवन ही नीरस और फीका हो जाये गा। किसी भी क्रिया को निर्धारित परणाली से करना ही रीति रिवाज होता है ताकि सभी को क्रिया के आरम्भ होने तथा समाप्त होने का प्रत्यक्ष आभास हो जाये और क्रिया में से कोई भी मुख्य कडी छूट ना जाये। किन्तु जब राति रिवाज क्रिया का यथार्थ लक्ष्य छोड कर केवल दिखावा बन जाते हैं या समय और साधनों की समर्थ से बाहर निकल जाते हैं तो वह बेकार का बोझ बन जाते हैं। 

विश्व में कहीं भी कोई मानव समाज ऐसा नहीं है जहाँ लोगों ने सारे रीति रिवाज छोड़ कर केवल भावनात्मिक क्रियाओं के सहारे जीवन व्यतीत किया हो। जैसे पूजा पाठ करना या बलि देना आदि रीतिरिवाज हैं उसी प्रकार झण्डा लहराना, शप्थ लेना, या विश्वविद्यालयों में गाऊन पहन कर प्रमाण पत्र गृहण करना भी रीति रिवाज ही हैं जो किसी घटना के घटित होने के प्रत्यक्ष प्रमाण के साथ साथ जीवन में क्रियात्मिकता और उल्लास भर देते हैं।

प्रथा तथा रीति रिवाज समय और समाज की ज़रूरत के अनुसार बदलते रहते हैं। पहले साधक प्रातः ब्रह्म महूर्त में या सूर्योदय के समय, दोपहर, तथा सूर्यास्त के समय लगभग अनिवार्य तौर से ध्यान लगा कर किसी ना किसी मंत्र का जाप करते थे, या मूर्तियों की पूजा अर्चना तथा आरती करते थे, हवन आदि करते थे। समय के अभाव के कारण आज कल यह प्रथायें या तो लुप्त हो चुकी हैं या संशोधित कर के संक्षिप्त रूप में करी जाती हैं। सब कुछ स्वेच्छिक है।

किसी भी प्रथा या रीति रिवाज को जब मन और श्रद्धा से किया जाये तो वह उनुकूल वातावर्ण उत्पन्न करने में सहायक हैं। साधक आसानी से अपने को मन वाँछित दिशा में केन्द्रित कर सकता है तथा दैनिक गतिविधियों से अपने आप को अलग कर के ईश्वरीय शक्ति का आभास महसूस कर सकता है। यह मनोवैज्ञानिक क्रिया है।

पूजा अर्चना के रीति रिवाजों में दो तरह के नित्य-नियम हैं जिन्हें दैनिक नित्य-नियम और घटना प्रधान विधान कह सकते हैं । दैनिक नित्य-नियम के विधान निजि सान्त्वना के लिये होते हैं। घटना प्रधान विधान किसी विशेष घटना के घटित होने के घटित होने पर किये जाते हैं।

रीति रिवाजों का प्रावधान सभी मानव समाजों में तथा धर्मों में किसी ना किसी रूप में है। थोडा बहुत अन्तर स्थानीय भूगौलिक, आर्थिक तथा राजनैतिक कारणों से है। हिन्दू राति रिवाज सरल, आसान तथा परिवर्तनशील हैं। उन्हें समय तथा आवश्यक्तानुसार बदला जा सकता है। समाज हित में रीजि रिवाजों को बदलने की क्रिया सर्व सम्मति अथवा बहु सम्मति से होनी चाहिये, व्यक्तिगत सुविधा के लिये नहीं।  

व्यक्तिगत पूजा

संध्या, होम तथा पूजा स्वेच्छिक, व्यक्तिगत दैनिक नित्यक्रम हैं। उपासक किसी भी स्थान को चुन कर अपनी समय, साधनों तथा सुविधानुसार सभी या कुछ दैनिक नित्यक्रमों को कर सकता है। यह दैनिक नित्यक्रम ऐकान्त में या सार्वजनिक स्थल पर अकेले या परिवार के साथ कर सकते हैं। नित्यक्रम मन्दिर, सामाजिक केन्द्र, पार्क या किसी भी मनचाहे स्थान पर किया जा सकता है। उल्लेखनीय बात यह है कि यह दैनिक नित्यक्रम निजि संन्तुष्टि के लिये हैं जिस से दूसरों को असुविधा नहीं होनी चाहिये। व्यक्तिगत दैनिक नित्यक्रम का विधान केवल सुझाव मात्र है जिसे सुविधानुसार बदला जा सकता हैः-

  1. संध्या संध्या का लक्ष्य अपनी इच्छानुसार किसी स्वच्छ और पवित्र स्थान पर शान्ति से बैठ कर ईश्वर का समर्ण करना है। किसी भी दिशा की ओर मुँह किया जा सकता है क्यों कि ईश्वर तो सर्व-व्यापक है। साधारणत्या उचित समय प्रातः सूर्योदय से पहले और सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात का है जव कि दैनिक गतिविधियाँ पूर्ण हो चुकी हों। उपासक ईश्वर का धन्यवाद चाहे तो मूक रह कर केवल मन से, चाहे तो धीरे से, या लाऊडस्पीकर लगा कर मनचाही भाषा में, गद्य, पद्य, मंत्रोच्चारण कर के, या गीत गा कर भी कर सकता है । ईश्वर को सभी कुछ स्वीकार हैं लेकिन लाऊडस्पीकर अवश्य ही आस पास के लोगों तथा स्थानीय प्रशासन का ध्यान आकर्षित करे गा। किसी भी प्रकार के वस्त्र पहने जा सकते हैं। मौलिक बात यह है कि स्थल स्वच्छ, शान्त होना चाहिये तथा दूसरों की शान्ति भंग ना हो।
  2. होम होम ऐक वैदिक क्रिया है जो निराकार ईश्वरीय शक्ति के प्रति की जाती है। मन्त्रोच्चारण के साथ साथ अग्नि के अन्दर सुगन्धमय पदार्थों की आहूतियाँ डाल कर वातावरण को प्रदूषणमुक्त किया जाता है। अग्नि में जलाने से सुगन्धित पदार्थों की क्षमता कई गुणा बढ़ जाती है। होम व्यक्तिगत अथवा सामूहिक तौर पर भी किया जा सकता है।
  3. पूजा आराधना – पूजा आराधना की परिक्रिया संध्या की अपेक्षा क्रमशा औपचारिक क्रिया है, किन्तु इस क्रिया के कुछ या सभी उपक्रमों को उपासक की सुविधानुसार परिवर्तित अथवा स्थगित भी किया जा सकता है। ईश्वर की अर्चना पद्धति की रूप-रेखा विशिष्ठ व्यक्तियों के सत्कार की परम्परा जैसी ही बन गयी है। मुख्यता आराधक मन ही मन में प्रतिष्ठापित मूर्ति के माध्यम से अपने आराध्य देवी-देवता की छवि को निहारता हुआ स्तुति करता है। मूर्ति की उपासना की निम्नलिखित परम्परागत क्रियायें हैं – सर्व प्रथम मन से आराध्य देवी – देवता का आवाहन किया जाता है। आराध्य को आसन पर आसीन कराया जाता है तथा सत्कार स्वरूप आराध्य के पग धोये जाते हैं। फिर पेय जल तथा जलपान परस्तुत किया जाता है। पाद्य स्वरूप आराध्य के चरण धोये जाते हैं वस्त्र पहनाये जाते हैं। नया यज्ञोपवीत धारण करवाया जाता है। अर्घ चन्दन आदि का सुगन्धित तिलक लगाया जाता हैं। पुष्प अर्पण किये जाते हैं। धूप आदि की सुगन्ध ज्वलन्त की जाती है। दीप प्रज्वलन किया जाता है तथा दीप से आराध्य की आरती उतारी जाती है। नैवैद्यम प्रसाद अर्जित किया जाता है और स्वर्ण आदि की भेंट दी जाती है। अन्त में आराध्य का विसर्जन किया जाता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि आराधना की यह विधि किसी भी विशिष्ठ व्यक्ति के सामाजिक सत्कार का ही एक प्रतीक मात्र है। पूजा घर, मन्दिर, अथवा अन्य किसी भी स्थान पर की या करवाई जा सकती है।

सामाजिक रीति रिवाज

सामाजिक रीति रिवाज किसी विशेष घटना के घटित होने पर किये जाते हैं। अतः उन को करने का समय निश्चित नहीं है। वह घटना के घटित होने के परिणाम स्वरूप समाज में प्रसारण के लिये किये जाते हैं। सैंकडों वर्ष पूर्ण मानव जीवन में घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं को आधार मान कर सोलह संस्कारों का उल्लेख सर्व प्रथम मनुसमृति में किया गया था और विश्व भर में वही सोलह संस्कार स्थानीय फेर बदलों के साथ आज भी अपनाये जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव के कारण कुछ हिन्दू इन राति रिवाजों का मज़ाक उड़ा कर उन की उपेक्षा भी करते हैं किन्तु वास्तव में यह उन की अपने पूर्वजों के प्रति अज्ञानता तथा कर्तघनता का ही प्रमाण है।

मानव अपने शरीर अथवा मनोवृत्तियों से जितने भी कर्म करता है उस के सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रिया, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशायें,जल, पृथ्वी, काल और धर्म साक्षी रहते हैं। हिन्दू रीति रिवाजों की विशेषता है कि उन को क्रियावन्त करते समय देवताओं तथा गृहों का आवाहन साक्षी बनाने के लिये किया जाता है। विशेष रूप से श्री गणेश तथा अग्नि को साक्षी बनाया जाता है। मानव साक्षियों के बदले प्राकृतिक गृहों तथा शक्तियों को घटना का साक्षी बनाया जाता है। इस का कारण यह है कि मानव कई कारणों की वजह से बदल सकते हैं तथा स्थायी नहीं हैं किन्तु प्राकृतिक साक्षी शाशवत, सर्व-व्यापक तथा भेद भाव रहित होते हैं। उदाहरण स्वरूप जिस अग्नि ने हमारे पूर्वजों के विवाह की घटनाओं का साक्ष्य किया था वही अग्नि आज हमारे जीवन में भी साक्ष्य दे रही हैं। इस प्रकार की अनुभूती मानव साक्ष्य नहीं करवा सकते। 

हिन्दू मतानुसार ईश्वर किसी विशेष परिधान अथवा भाषा, भोजन, प्रसाद स्थल पर किये गये रीति रिवाज से प्रसन्न नहीं होता। लोग जिस प्रकार से संतुष्ट हों वही रिवाज अच्छा है। लोग अपनी इच्छा, सामर्थ, तथा विशवासों के आधार पर रीति रिवाज करते हैं। यदि किसी को मिठाई अच्छी लगती है तो वह ईश्वर को मिठाई अर्पण कर के अपने आप को संतुष्ट करता है तथा दूसरों को भी वैसा करने की सलाह देता है। रीति रिवाज तभी तक प्रसन्नता प्रदान करते हैं जब तक वह व्यक्ति के निजि समय और साधनों की समर्थ में हों तथा स्वेच्छा से किये जायें। थोपे गये रीति रिवाज अभिशाप बन जाते हैं। 

चाँद शर्मा

 

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Comments on: "27 – पूजा और रीति रिवाज" (1)

  1. sanjaytyagi said:

    hindu dharm ka bareme itna vistear say jankery he kuch kah nahey ja sakta

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