हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


पाश्चात्य सभ्यता में रंगे लोग आजकल केक काट कर और तालियाँ बजवा कर अपना जन्मदिन स्वयं ही मना लेते हैं – लेकिन यह उस तरह है जैसे कोई अपना चुटकला सुना कर अपने आप ही हँस ले और दूसरे उस का मूहँ देखते रहैं। अपने जन्मदिन पर खुशी दूसरे दिखायें तो वह बात और होती है। वास्तव में जन्म दिन तथा विवाह की वर्षगाँठ मनाने की प्रथा भारतीयों ने योरूप वासियों से नहीं सीखी। भारत में ही महापुरुषों के जन्म मना कर अन्य लोगो को महा पुरुषों की तरह पुण्य कर्म करने के लिये प्रोत्साहित करने का प्रथा रही है। प्रेरणा नायकों की संख्या अधिक होने के कारण कुछ मुख्य महानायकों से जुडे पर्वों का संक्षिप्त वर्णन ही यहाँ दिया गया है जो समस्त भारत में मनाये जाते हैं और भारत की साँस्कृतिक विविधता में ऐकता के बोधक हैं। 

महाशिवरात्री – महा-शिवरात्री त्रिदेव भगवान शिव का पर्व है। यह पर्व फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) के कृष्ण पक्ष में आता है। इस दिन शिव-पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। आराधक पूरा दिन उपवास करते हैं और कुछ तो जल भी नहीं ग्रहण करते। समस्त रात्री लोग शिव मन्दिरों में पूजा करते हैं। शिव लिंग को दूध, दही, शहद और गुलाब जल अथवा गंगा जल से स्नान कराया जाता है। इसी दिन से शिव के प्रतीक विषधर सर्प भी निद्रा (हाईबरनेशन) से जाग कर खुले वातावरण में निकलने लगते हैं। 

महावीरजयन्ती – भगवान महावीर के जन्म के उपलक्ष में महावीर-जयन्ती विशेषतः गुजरात तथा राजस्थान में जैन समुदाय दूारा उल्लास के साथ मनायी जाती है। भगवान महावीर ने अहिंसा तथा सरल जीवन मार्ग से मोक्ष मार्ग का ज्ञान दिया था। इस दिन भगवान महावीर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकाली जाती है।

रामनवमी राम-नवमी भगवान विष्णु के सप्तम अवतार भगवान राम का जन्म दिवस है और चैत्र मास (मार्च अप्रैल) के शुकल पक्ष की नवमी तिथि के दिन आता है। मन्दिरों को सजाया जाता है तथा लोक नायक मर्यादा पुरुषोत्तम राम की मूर्तियों को सजाया जाता है। रामायण महाकाव्य का निरन्तर उच्चारण होता रहता है। कथा वाचक रामायण की कथा को गा कर, नाटकीय ढंग से दिखा कर पर्दर्शन करते हैं। ऱाम तथा सीता की भव्य झाँकियाँ निकाली जाती हैं तथा मूर्तियों की भव्य तरीके से पूजा अर्चना की जाती है। समस्त भारत में यह त्यौहार विशेष उल्लास से मनाया जाता है। 

बैसाखीः बैसाखी विक्रमी सम्वत का प्रथम दिवस है। यही एकमात्र हिन्दू पर्व है जो रोमन केलेन्डर के साथ अकसर 13 अप्रैल को ही आता है परन्तु प्रत्येक 36 वर्ष के पश्चात 14 अप्रैल को आता है। इस दिन सूर्य मेष राशि (ऐरीस) में प्रवेश करता है जो ज़ोडिक अनुसार प्रथम राशि है। लोग बैसाखी के दिन प्रातः नदी स्नान से आरम्भ करते हैं। इसी दिन से कृषि की कटाई का काम भी आरम्भ होता है तथा किसानों को अपने परिश्रम का पुरस्कार मिलता है। इस के अतिरिक्त बैसाखी के साथ भारतीय जन जीवन की अन्य कई घटनायें जुडी हुई हैं जो संक्षिप्त में इस प्रकार हैं-

  • मुग़ल बादशाह जहाँगीर के हुक्म से सिख गुरु अर्जुन देव तथा उन के अनुयाईयों को अमानुषीय तरीके से उबलते तेल के कडाहे में फेंक कर उन पर कई तरह के असाहनीय अत्याचार किये गये थे जिस कारण बैसाखी के दिन गुरु अर्जुन देव ने लाहौर शहर के पास रावी नदी में जल स्माधि ले ली थी।
  • बैसाखी के दिन आनन्दपुर साहिब में गुरु गोबिन्द सिहं नें हिन्दू युवाओं को ‘संत-सिपाही’ की पहचान प्रदान करी थी। उन्हें मुस्लिम अत्याचार सहने के बजाय  अत्याचारों के विरुद्ध लडने के लिये भक्ति मार्ग के साथ साथ कर्मयोग का मार्ग भी अपनाने का आदेश दिया था। इसी पर्व से ‘खालसा-पंथ’ की नींव पड़ी थी।
  • इसी दिन स्वामी दया नन्द सरस्वती ने बम्बई शहर में आर्य समाज की औपचारिक स्थापना की थी। मध्य काल से हिन्दू समाज में बहुत सी कुरीतियाँ आ चुकीं थीं जिन के उनमूलन के लिये आर्य समाज संस्था ने हिन्दू समाज में सुधार कार्य किया और वैदिक संस्कृति को पुनर्स्थापित किया।

बुद्धपूर्णिमा – भगवान बुद्ध को विष्णु का नवम अवतार माना गया है। इस के उपलक्ष में वैशाख मास (अप्रैल- मई) की बुद्ध-पूर्णिमा का बहुत महत्व है क्यों कि इसी दिन भगवान बुद्ध के जीवन की तीन अति महत्वशाला घटनायें घटी थीं। बुद्ध का जन्म, उन को ज्ञान प्रकाश, तथा उन का निर्वाण (शरीर त्याग) बुद्ध-पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। यह पर्व समस्त भारत में और विशेषतः बौध समुदाय में उल्लास के साथ मनाया जाता है। 

गुरुपूर्णिंमा – अषाढ मास की पूर्णमासी (जुलाई – अगस्त) के दिन गुरुपूर्णिमा का पर्व महाऋषि वेद व्यास की समृति में माया जाता है। उन्हों ने चारों वेदों और अठ्ठारह पुराणों का संकलन तथा महाकाव्य महाभारत की रचना की थी। हमें केवल भावनात्मिक अध्यापक दिवस (टीचर्स डे) मनाने के बजाय गुरु-पूर्णिमा को ही सरकारी तौर पर मनाना चाहिये।

रक्षाबन्धन रक्षा-बन्धन का त्यौहार मुख्यतः भाई बहन के पवित्र रिशतो का त्यौहार है। इस को समाज का संकलप-दिवस भी कह सकते हैं। यह पर्व श्रावण मास (अगस्त – सितम्बर) में मनाया जाता है। इस दिन भाई अपनी बहनों की सभी समस्याओं, आपदाओं, तथा परिस्थितियों में रक्षा करने का संकलप लेते हैं। प्रतीक स्वरुप बहने भाईयों की कलाई पर राखी बाँध कर उन्हे धर्म के बन्धन की सम़ृति दिलाती हैं कि वह अपने धर्म की भी रक्षा करें। भाई बहनों को रक्षा की प्रतिज्ञा के साथ कुछ उपहार भी देते हैं। इसी  प्रकार ब्राह्मण भी समाज के क्षत्रिय तथा वैश्य वर्णों की कलाई पर राखी बाँध कर उन से धर्म पालन तथा धर्म की रक्षा का संकलप कराते हैं। प्रति वर्ष यह त्यौहार प्रतिज्ञा दिवस के तौर पर सभी को ऐक दूसरे के प्रति कर्तव्यों का पालन करने के लिये प्रोत्साहित करता है।

जन्माष्टमी जन्माष्टमी का त्यौहार भगवान कृष्ण के जन्म दिन के उपलक्ष में भाद्रपद मास (अगस्त – सितम्बर) में मनाया जाता है। मन्दिरों को सजाया जाता है। अध्यात्मिक प्रवचन होते हैं। दूर दूर से यात्री इन स्थलों पर पहुँचते हैं। आटे को गीला कर के लोग घरों में दूार से अन्दर तक फर्श पर बच्चे के पैरों के निशान छापते है जिस का अभिप्राय भगवान कृष्ण की बाल लीला की स्मृति कराना है। कृष्ण जन्म मध्य रात्रि को हुआ था अतः उस समय इस उत्सव की प्रकाष्ठा होता है।

गणेशचतुर्थी – गणेश-चतुर्थी भाद्रपद मास (अगस्त – सितम्बर) में गणेश जी के जन्मदिन के उपलक्ष में मनायी जाती है। गणपति की बडी बडी भव्य मूर्तियों को स्थापित किया जाता है। दस दिन तक नित्य उन को सजा कर पूजा अर्चना की जाता है। उस के पश्चात उन मूर्तियों की शोभा यात्रा निकली जाती है तथा उन्हें जल में विसर्जित कर दिया जाता है। पहले यह पर्व महाराष्ट्र तथा पडोसी प्रदेशो में विशेष तौर पर मानया जाता था परन्तु आज कल समस्त देश में गणेश-चतुर्थी का पर्व धूम धाम से मनाया जाता है। इस पर्व का नैतिक तथा भावनात्मिक महत्व भी है। ऐक पौराणिक कथानुसार ऐक बार चन्द्र ने चोरी छिपे गणेश जी के डील डौल का उपहास किया था तो गणेश जी ने चन्द्र को शापित कर दिया कि जो कोई तुम्हें गणेश-चतुर्थी के दिन निहारे गा वह चोरी के आरोप से लाँच्छित होगा। इस लिये इस दिन लोग चन्द्रमाँ की ओर नहीं देखते। इस का अभिप्राय है कि व्यक्ति को बुरी संगति से भी दूर रहना चाहिये।

दीपावली – इस पर्व को दीपमाला भी कहते हैं तथा इसे कार्तिक मास (अकतूबर – नवम्बर) के कृष्ण पक्ष के अन्तिम दो दिनों तक मनाया जाता है। इस पर्व के कई कारण हैं जिन में से धन सम्पति की देवी लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु का विवाह, महाकाली दुर्गा दूारा महिषासुर का वध, तथा भगवान ऱाम की रावण पर विजय के पश्चात अयोध्या में वापसी की समृति मुख्य हैं। इसी दिन कृष्ण ने भी नरकासुर का वध किया था। युद्ध तथा युद्धाभ्यास पर प्रस्थान करने से पूर्व व्यापारी वर्ग भी सैना के साथ जाता था ताकि वह सैनिकों के लिये अवश्यक सामिग्री जुटाते रहैं। प्रत्येक वर्ष प्रस्थान करने से पूर्व व्यापारी नये लेखे खातों में खोलते थे और समृद्धि के लिये गणेष और लक्ष्मी का पूजन भी करते थे। इस अवसर पर घरों को सजाया जाता है, रत्रि को दीप माला की जाती है। पटाखे और मिठाईयों से जीवन उल्लास मय हो जाता है। दीपावली भारत में धन सम्पति की खुशियों की चरम सीमा का अवसर होता है।

गुरु नानक जयन्ती – गुरु नानक सिख समुदाय के प्रथम गुरु थे। उन की जयन्ती का समारोह कार्तिक मास (नवम्बर) की पूर्णिमा से  लगभग तीन दिन तक मनाया जाता है। निशान साहिब (ध्वज) तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी में शोभा यात्रा निकाली जाती है। गुरुदूारों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब का अखण्ड पाठ किया जाता है तथा स्मापन के समय गुरु के लंगर के माध्यम से सभी को प्रसाद के रूप में भोजन करवाया जाता है। गतका (तलवारबाजी) का प्रदर्शन किया जाता है। यह पर्व विशेषत्या पंजाब और हरियाणा में तो मनाया जाता है परन्तु विश्व भर में जहाँ जहाँ सिख साम्प्रदाय है, वहाँ भी पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है।

इन के अतिरिक्त जिन अन्य जन नायकों से जुडे पर्व उत्साह और उल्लास के साथ मनाये जाते हैं उन में संत रविदास, महाराज उग्रसेन, ऋषि वाल्मिकि, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी मुख्य हैं।

भारत में किसी नायक या घटना का शोक दिवस मना कर सार्वजनिक तौर पर रोने पीटने का कोई त्यौहार नहीं मनाया जाता। मृतकों की बरसियाँ भी नहीं मनाई जातीं यह रिवाज कोई पिछले दो तीन सौ वर्षों से ही जुडे हैं और आजकल तो हर छोटे बडे नेता की बरसी मनाने का रिवाज सा चल पडा है। इस का धर्म या हिन्दू संस्कृति से कोई वास्ता नहीं।

त्यौहारों तथा पर्वों ने भारतीय समाज की साँस्कृतिक, आर्थिक, तथा अध्यात्मिक प्रगति में महत्वशाली योग दान दिया है। पर्व हमारी साँस्कृतिक आखण्डता के प्रतीक हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समय और साधनों के आभाव तथा विदेशी दुष्प्रभाव के कारण कुछ पर्व अपनी मूल दिशा और दशा से विक़ृत हो गये हैं। कुछ असामाजिक तत्वों ने उन का रूप भी बिगाड दिया है। इस वजह से उन पर्वों से सम्बन्धित उल्लास और योगदान कुछ फीके पड गये हैं। हिन्दू समाज सुधारकों तथा सजग नागरिकों को चाहिये कि वह कुरीतियों को दूर करें और इन पर्वों का गौरव पुनर्स्थापित कर के उन्हे विदेशी गन्दगी के प्रभाव से स्वच्छ रखें।

देखा जाय तो ईद, मुहर्रम, ईस्टर, गुड फ्राईडे, क्रिसमिस आदि त्यौहारों का भारत की संस्कृति या घटनाओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह त्यौहार हमारे लिये आर्थिक उपनेषवाद का ऐक हिस्सा हैं। कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पादकों को बढावा देने के लिये कई विदेशी त्यौहारों की भारत के जन जीवन में घुस पैठ करवा रही हैं जिस से यह आभास होता है कि भारत की अपनी कोई संस्कृति ही नहीं थी। वर्ष में ऐक दिन फादर्स डे या मदर्स डे मना लेने से माता पिता की सेवा नही होती जिन्हें बाकी वर्ष वृद्धाश्रमों में छोड दिया जाता है। यही हाल टीचरों का है। वेलन्टाईन डे केवल नाचने और सार्वजनिक स्थानों पर चुम्बन-आलिंगन करने का बहाना मात्र है।  जब हमारी अपनी संस्कृति इतनी समृद्ध है तो हमें योरूप वासियों से पर्व उधार लेने की कोई आवश्यक्ता नहीं है। यह केवल हमारे मन में हीन भावना भरने तथा विदेशी कम्पनियों के सामान को बेचने का निमित मात्र है।  हमें अपनी साँस्कृतिक विरासत की रक्षा स्वयं करनी है और बाहर से त्यौहार आयात करने की जरूरत नहीं। 

भारत में क्रिसमिस पर्व के साथ साथ पहली जनवरी को नब वर्ष दिवस को भी व्यापारिक क्षेत्र की वजह से बहुत बढावा मिल रहा है क्यों कि इस के बहाने से ग्रीटिंग कार्ड, साँटा क्लाज के छोटे बडे पुतले, क्रिसमिस ट्री, क्रास आदि बेचे जाते हैं, तथा होटलों में खानपान के लिये लाखों की संख्या में टरकियाँ (ऐक विशेष प्रकार की मुर्ग़ी) खाने के लिये काटी जातीं है। शराब पीकर वाहन चालक दूर्घटनाओं के साथ इसाईयों के नव वर्ष की शुरूात करते हैं। इन सभी बातों का भारतीय परम्पराओं और भावनाओं के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है और विदेशी कम्पनियाँ तथा उन के भारतीय ऐजेन्ट केवल भारतीय मूल्यों के हानि के लिये कर रहै हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई रंगी पुती स्त्री को देख कर चकाचौंध हो जाये और अपनी सुशिक्षित ऐवम सभ्य माता को कोसने लगे। पर्व आयात वही देश करते हैं जिन की अपनी कोई सभ्यता या परम्परा ना हो किन्तु भारत के लोगों को इस प्रकार के त्यौहारों को मनाने के बदले भारतीय मूल के त्यौहारों के मनाने की शैली में और अधिक सुधार तथा उल्लास लाना चाहिये।  

चाँद शर्मा

 

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