हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


जो बात समझ में ना आये उसे अंग्रेजी भाषा में मिथ कहा जाता है। स्नातन धर्म के वैदिक गूढ ज्ञान तथा उसी ज्ञान का कलात्मिक चित्रण जब पाश्चात्य विचारकों की समझ में नहीं आया तो उन्हों ने उसे ‘मिथ या ‘माईथोलोजी कह कर अपना पल्ला झाड लिया। उन्हीं के प्रभाव तले प्रशिक्षित कुछ बन्दरछापी भारतीयों नें भी स्नातन धर्म को ‘माईथोलोजीकह कर भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को विश्वविद्यालयों के क्षेत्र से निष्कासित कर दिया। कमी ज्ञान में नहीं थी – परन्तु उन की गुलामी भरी सोच और समझ में थी।

हिन्दू धर्म का अध्यात्मवाद पूर्णत्या आस्थाओं और विज्ञान का मिश्रण है। उदाहरण के लिये श्रीमद भाग्वद गीता के इस कथन की वैज्ञानिक्ता परख लीजिये –

‘जैसे घडे के फूट जाने के बाद घडे की मिट्टी पुनः मिट्टी में मिल जाती है, समुद्र में उठी लहरों का जल पुनः समुद्र में समा जाता है, स्वर्ण आभूषणों को गलाने के बाद स्वर्ण पुनः अपने मौलिक रूप में परिवर्तित हो जाता है – उसी प्रकार शरीर में बन्धी आत्मा शरीर छोड देने के पश्चात पुनः परमात्मा में विलीन हो जाती है। अन्ततः सृष्टी में सभी अपने अपने मौलिक स्वरुप में जा मिलते हैं’।

गीता के इस अध्यात्मवाद में छुपी भौतिक विज्ञान की सत्यता को क्या कोई वैज्ञानिक नकार सकता है?

पूर्णत्या वैज्ञानिक मानवीय आस्थायें

विश्व में इसाई तथा इस्लाम दो अन्य मुख्य धर्म हैं। इन दोनों धर्मों के जनकों के कर्म क्षेत्रों की भूमि मध्य ऐशिया में थी। दोनो धर्म स्नातन धर्म से कई शताब्दियों पश्चात आये। उन का आपसी अन्तर काल लगभग सात सौ वर्षों का है। उन दोनों धर्मों की अधिकाँश आस्थायें स्नातन धर्म और पुराणों में थोडा बहुत फेर बदल कर के विकसित हुयी हैँ, किन्तु दोनों धर्म भूगौलिक क्षेत्र तथा समय की सीमा में बन्धे हुये हैं।

उन की तुलना में स्नातन धर्म की विशेषता है कि उस के देवी देवता, पूर्वज किसी विशेष भूगौलिक क्षेत्र में सीमित नहीं रहै बल्कि उन्हों ने समस्त ब्रह्माण्ड में अपने पद चिन्ह छोडे हैं। धार्मिक आस्थायें समय और स्थान की सीमा से आज़ाद हैं। स्नातन धर्म के देवी देवता जहां चाहें प्रगट हो सकते हैं और जब चाहे अन्तर्ध्यान हो सकते हैं। इतना ही नहीं, स्नातन धर्म ने आस्थाओं और मानस चित्रण के साथ वैज्ञानिक तथ्यों को भी कलात्मिक ढंग से जोड़ा है। उसी चित्रण को हम अपना अध्यात्मिक साहित्य मानते हैं जिसे पौराणिक साहित्य या पाश्चात्य विचारकों की भाषा में ‘माईथोलोजी’कहा जाता है।

ज्ञान का आँकलन 

स्नातन धर्म की विचारधारा हर प्रकार के वैचारिक आँकलन के लिये खुली पुस्तक की तरह है। आस्थाओं की नींव रखने के लिये भी प्रमाणिता के धरातल की आवशक्ता होती है। जब तर्क के बाद तर्क ऐक ही निर्णय का आभास प्रगट कते हैं तभी आस्था जन्म लेती है। गर्व की बात है कि हिन्दू धर्म की आस्थाओं को चुनौती कभी भी दी जा सकती है और उन की शाशवता को कोई खतरा नहीं है। इसी लिये वैज्ञिानिक तथ्यों के साथ हिन्दू आस्थाओं पर पुनर्विचार और आँकलन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। स्नातन धर्म में आस्थाओं को चुनौती देने वालों को मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता। 

हिन्दू धर्म के अनुयायी स्दैव धार्मिक विषयों को औपचारिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलत करने का अनुगृह करते रहे हैं क्यों कि उन्हें पूर्ण विशवास है कि यदि हिन्दू आस्थाओं को विज्ञान और आधुनिक उपक्रमों के साथ तर्क की कसौटी पर परखा जाये गा तो तथ्य आस्थाओं के पक्ष में प्रमाणित हो जायें गे और भ्रामिकता मिट जाये गी। हिन्दू धर्म को दोनों परिस्थितियाँ स्वीकार है । यही हिन्दू धर्म की प्रबल शक्ति है। हिन्दू धर्म की आस्थायें तथा मान्यतायें इतनी सुदृढ हैं कि उन्हें आलोचना का कोई भय नहीं है। 

हिन्दू धर्म को धर्मान्धता या नास्तिकता से भी कोई खतरा नहीं है। धार्मिक आस्थाओं को खुले आम नकारने वाले को भी ना केवल बोलने दिया जाता है और सुना जाता है, बल्कि उसे अपनी नकारात्मिक अनास्तिक्ता का प्रचार भी करने दिया जाता है। यह सिद्ध करता है कि हिन्दू धर्म में विज्ञान तथा आस्थायें ऐक दूसरे के विपरीत ना हो कर ऐक दूसरे की पूरक हैं।

सृष्टि सर्जन

स्नातन मत के माध्यम से वैज्ञायानिक विचारों का उदय ऋगवेद से प्रारम्भ हुआ। वेदों के विचार से सृष्टि की रचना से पूर्व कुछ नहीं था। यह अवस्था उस रेखा को उजागर करती है जो शून्य तथा गुण-सम्पन्न भौतिक्ता के मध्य में रहती है। इसी समय को पाश्चात्य विचारकों की ‘बिग-बैंग थ्यिोरी के साथ जोडा है। यह विचार उस सत्य की ओर ईशारा करता है जो पूर्णतया वैज्ञायानक विचार है ना कि अन्ध-विशवास। जिस ‘बोसोनो अणु या ‘गाड-पार्टिकल के बारें में विश्व के वैज्ञानिक आज खोज में जुटे हैं उसी परिस्थिति का बखान भारतीय ग्रंथ हजारों वर्षों से करते चले आ रहै हैं। यहाँ पर केवल दो ही तथ्यों को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। 

मनु स्मृति के प्रथम अध्याय में ही सृष्टि की रचना, पृथ्वी पर जीवों के जन्म तथा उन की प्रकृति के बारे में विस्तरित जानकारी इस प्रकार उप्लब्द्ध हैः-

       आसीदितं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।

       अप्रतक्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ।।

       ततः स्वयंभूभर्गवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।

       महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः।। (मनु स्मृति 1 – 5-6)

अर्थात – पहले यह संसार तम (अन्धकार) प्रकृति से घिरा था, जिस से कुछ भी ज्ञात नहीं होता था। अनुमान करने योग्य कोई रूप नहीं था जिस से तर्क दूारा लक्षण स्थिर कर सके। सभी ओर अज्ञान और शून्य की अवस्था थी। इस के बाद प्रलयावस्था के नाश करने वाले लक्षण सृष्टि के सामर्थ्य से युक्त, स्वयंभु भगवान महाभूतादि (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) पंच तत्वों का प्रकाश करते हुए प्रकट हुए। (यहाँ यह स्पष्टीकरण भी जरूरी है कि ‘तम’ का अपना कोई अस्तीत्व नहीं होता। ‘रौशनी का अभाव’ ही तम की अवस्था है।)

पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का प्रगट होना आधुनिक भौतिक विज्ञान का जन्म है क्यों कि उन्हीं महाभूतों के मिश्रण से ही सृष्टी के अन्य पदार्थ विकसित हुये या मानव दूारा विकसित किये गये हैं। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार प्रथम जीवन जल और गर्मी से उत्पन्न हुआ। जल सूर्याग्नि की तपश और वायु के कारण आकाश में उडता है तथा फिर वर्षा के रूप में पुनः पृथ्वी पर आता है जिस से पैड-पौधे जन्म लेते हैं, जीव उत्पन्न होते हैं और पश्चात मानव का जन्म होता है। यही आस्थायें मानवी विज्ञान का आधार हैं जिन्हें सरलता के साथ समझाने के लिये हम देवी देवता का रूप में चित्रण भी कर सकते हैं और उन्हीं तथ्यों को आधार बना कर रौचक कथायें भी लिख सकते हैं। समस्त वेदों, उपनिष्दों, पुराणों में मनुस्मृति की तरह ही सृष्टि की उत्पत्ति का बखान किया गया है और कहीं भी विरोधाभास नहीं है।

जीव-विज्ञान

हमारे पूर्वजों को सभी प्रकार के जीवों से ले कर मानव के जन्म तक का पूर्ण ज्ञान था। बृहत विष्णु पुराण के अनुसार सब से पहले जल में सृष्टि हुई फिर वानर जो कि मानवों के अग्रज हैं। यही विचारधारा कालान्तर डारविन नें अपने नाम से पंजीकृत करवा कर ‘एवोलुशन थियोरी के नाम से प्रचारित कर ली। आदिकाल से पशु-पक्षी अपने जैसे जीवों को ही उत्पन्न करते चले आ रहै हैं। पशु पक्षियों ने अपनी संतानों को परिशिक्षण देने के लिये कोई विद्यालय नहीं बनाये। फिर भी उन के नवजात अपनी जाति के रहन-सहन को अपने आप ही सीख जाते हैं। डिस्कवरी तथा नेशनल ज्योग्राफिक टी वी चैनलों पर इन सभी तथ्यों को अब प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। प्राणी-विज्ञान के इसी तथ्य को डारविन से सैंकडों वर्ष पूर्व मनुसमृति में इस प्रकार उजागर किया गया थाः-  

       यं तु कर्मणि यस्मिन्स न्ययुड्क्त प्रथमं प्रभुः।

       स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः ।। (मनु स्मृति1- 28)

       अर्थात- पहले ब्रह्मा ने जिस जीव को जिस कार्य में नियुक्त किया, वह बारम्बार उत्पन्न हो कर भी अपने पूर्व-कर्म को करने लगा।

विष्णु के दस अवतार भी सृष्ठि सर्जन की कहानी को कलात्मिक ढंग से उजागर करते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति से ही समस्त जीवों में आत्मा बार बार उसी परमात्मा की ही पुनर्वृति करती है। इसी विचार को छन्दोग्य उपनिष्द ने भी व्यक्त किया है। पौराणिक कथाओं तथा लोक कथाओं में पशु-पक्षियों और पैड-पौधों का मानवी भाषा में बात करना इस वैज्ञानिक तथ्य को प्रमाणित करता है कि ना केवल पशु-पक्षियों में बल्कि पैड-पौधों में भी जीवन के साथ साथ संवेदनायें भी विद्यमान है। इसी तथ्य की पुनर्वृति करने के लिये विश्व के आधुनिक वैज्ञिानिकों और तर्क शास्त्रियों ने सर जगदीशचन्द्र बोस को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया था। 

कर्म विधान

श्रीमद्भागवद गीता मेंकर्म विधान की व्याख्या की गयी है। मानव कर्म करता है तो प्रतिक्रिया ईश्वर करता है। जो बोया जाये गा वही काटा जाये गा का विधान सर्व-सम्मत है। 

कर्म विधान में फल के अनुसार चार प्रकार के कर्म हैं-

  • निष्काम-कर्म – जो कर्म निजि मोक्ष प्राप्ति के लिये करे जाते है। इन से अपने कर्तव्यों के पालन के प्रति पूर्णत्या संतुष्टि मिलती है जैसे मानव सेवा तथा ज्ञान का वितरण आदि।
  • पुण्य-कर्म – जव क्रम तथा उस को करने का उद्देष्य पवित्र हों तो उन्हें पुण्य-कर्म कहा जाता है जैसे किसी की जान बचाना।
  • पाप-कर्म – जिस कर्म का उद्देष्य तथा कर्म दोनो ही किसी का अनिष्ट करने के लिये किये जायें वह पाप-कर्म होते हैं।
  • मिश्रित-कर्म – जब कर्म तो अच्छा हो किन्तु उस के पीछे उद्देष्य अच्छा ना हो या उद्देष्य तो अच्छा हो परन्तु कर्म अच्छा ना हो।जैसे कोई अच्छी फसल पाने के लिये अन्य जीवों का नाश कर देना।

कर्मों का ही ऐक अन्य वर्गीकरण इस प्रकार हैः-

  • क्रियामान-कर्म – जो कर्म वर्तमान में किये जाते हैं तथा उन कर्मों से अन्य कर्म उत्पन्न होते हैं।
  • संचित-कर्म – जो कर्म भूत काल में किये गये थे परन्तु उन का फल अभी आना बाकी है।
  • प्रारब्ध – जो कर्म भूत काल में किये गये थे परिपक्व होने के पश्चात उन के फल वर्तमान में प्रगट हो रहे हों उन्हें प्रारब्ध अथवा भाग्य कहा जाता है। हमारा जन्म मरण सभी कुछ प्रारब्ध का परिणाम है।

यह प्रारब्ध का परिणाम है कि कोई राजा के महल में पैदा हो जाता है तो कोई निर्धन की कुटिया में जन्म लेता है। कुछ पूर्ण्त्या स्वस्थ, सुन्दर, गोरे, काले, लम्बे, छोटे पैदा होते हैं तो कुछ कमज़ोर, बीमार, विकृत पैदा होते हैं। मानव स्वयं अपनी प्रारब्ध का निर्माण करता है। जो हम इस जन्म में कर रहे होते हैं परिपक्व हो कर वही हमें अगले जन्म में प्राप्त हो गा। कर्म ही सृष्टि का मूल कारण है। मानव पर केवल उस के निजि कर्मों का ही असर नहीं पडता अपितु वह दूसरों के, अपने सम्वन्धियों, तथा जाति वालों के संयुक्त कर्मों से भी प्रभावित होता है। वैचारिक वैज्ञानिक्ता इस के विपरीत नहीं हो सकती।

कारण तथा प्रभाव का रहस्य  

आस्था है कि पुण्य कर्मों से पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसी बात को वैज्ञानिक आधार से समझने के लिये यदि कोई कडवी या तीखी मिर्च युक्त वस्तु खाये गा तो स्वाद भी कडुआ या जलाने वाला हो जायेगा। इस के उपरान्त वही व्यक्ति यदि कुछ मीठा खा लेगा तो भले ही प्रथम कर्म का प्रभाव पूर्णत्या नष्ट नहीं होगा किन्तु वर्तमान स्वाद कुछ सुखमय अवश्य हो जाये गा। कडुवे और मीठे कर्मों के परस्पर अनुपात के आधार पर ही व्यक्ति के जीवन में सुख और दुःख निर्भर करते हैं। 

कर्म के प्रभाव की व्याख्या को आज विश्व के वैज्ञिानिक तथा दार्शनिक भीकारण तथा प्रभाव(ऐक्शन ऐण्ड रीऐकशन थियोरी)के नाम सेप्रमाणित मानते हैं। कर्म का अर्थ क्रिया से है। प्रमाणित तथ्य है कि प्रत्येक क्रिया के समान उस की प्रतिक्रिया भी होती है। जो कोई भी कर्म करता है ईश्वर उस का फल कर्म करने वाले को अवश्य देता है।

हिन्दू धर्म की आस्थाये तथा विचारधारायें बारबार प्रमाणित होकर हिन्दू साहित्य के माध्यम मे हमें प्राप्त हुयी हैं। इस लिये स्नातन धर्म यथार्थ में ज्ञान और आस्था का मिश्रण है।

चाँद शर्मा

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