हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


आधुनिक वैज्ञानिक अब कहते हैं कि हमारी सृष्टि में अनगिनत ग्रह प्रति दिन पैदा हो रहे है और कई ग्रह अपना समय पूरा कर के विलीन हो रहै हैं – लेकिन हिन्दूग्रंथ तो आधुनिक वैज्ञानिकों से हजारों वर्षों पहले से ही कहते आ रहै हैं कि सृष्टि अनादि है – उस का कोई आरम्भ नहीं, सष्टि अनन्त है – उस का कोई अन्त भी नहीं। भारत के अंग्रेजी-प्रेमी शायद आज भी नहीं जानते कि केवल हिन्दू शास्त्रों के समय सम्बन्धी आँकडे ही आधुनिक वैज्ञानिक खगोल शास्त्रियों के आँकडों से मेल खाते हैं।

समय की गणना

आधुनिक वैज्ञानिक यह भी मानने लगे हैं कि सृष्टि के कालचक्र में ब्रह्मा का (यूनिवर्स) ऐक दिवस और रात्रि, पृथ्वी के एक दिवस और रात्रि के समय से 8.64 कोटि वर्षों बडी होती है। मनु स्मृति के प्रथम अध्याय में इस धरती के समय का विस्तरित उल्लेख किया गया है। आँख झपकने में जो समय लगता है उसे ऐक निमिष कहा गया है। निमिष के आधार पर समय तालिका इस प्रकार हैः-

  • 18 निमिष = ऐक कास्था
  • 30 कास्था = 1 कला
  • 30 कला = 1 महू्र्त
  • 30 महूर्त = अहोरात्र
  • 30 अहोरात्र = 1 मास

ऐक अहोरात्र को सूर्य कार्य करने के लिये दिन, तथा विश्राम करने के लिये रात्रि में विभाजित करता है। प्रत्येक मास के दो ‘पक्ष’ होते हैं जिन्हें ‘शुकल-पक्ष’ और ‘कृष्ण-पक्ष’ कहते हैं। पँद्रह दिन के शुकल पक्ष में चाँदनी रातें होती हैं तथा उतनी ही अवधि के कृष्ण पक्ष में अन्धेरी रातें होती हैं। सभी माप दण्डों का सरल आधार ‘30’ की संख्या है। यह समय विभाजन प्रत्यक्ष, वैज्ञानिक, और प्रकृति के अनुकूल है।

दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है जब सभी जीव अपने आप जाग जाते है। नदियों के जल में स्वच्छता और प्रवाह होता है, कमल खिलते है, ताज़ा हवा चल रही होती है तथा प्रकृति सभी को नये, शुद्ध वातावरण का आभास दे देती है। उसी प्रकार जब सूर्यास्त के साथ रात होती है, पशु पक्षी अपने आवास की ओर अपने आप लौट पडते हैं, नदियों का जल धीमी गति से बहने लगता है, फूल मुर्झा जाते है तथा प्रकृति सभी गति विधियां स्थागित करने का संकेत दे देती है। इन प्रत्यक्ष तथ्यों की तुलना में रोमन कैलेण्डर के अनुसार चाहे दिन हो या रात, 12 बजे जब तिथि बदलती है तो प्रकृति में कोई फेर बदल प्रत्यक्ष नहीं होता। सभी कुछ बनावटी और बासी होता है।

पाश्चात्य केलैण्डर

रोमन कैलेण्डर को जूलियस सीज़र ने रोम विजय के पश्चात ग्रैगेरियन कैलेण्डर के नाम से लागू करवाया था। इस कैलेण्डर का आज भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

वैसे तो ईसाई ऐक ईश्वर को मानने का दावा करते हैं और अधिक देवी देवताओं में विशवास करने के लिये हिन्दूओं का उपहास उडाते हैं। किन्तु उन के पास कोई जवाब नहीं कि उन्हों ने अपने दिनों तथा महीनों को देवी देवताओं के नामों से क्यों जोडा हुआ हैं। उन के सप्ताह में सन गाड का दिन – ‘सनडे’’ मून गाडेस का दिन – ‘मनडे, ट्यूज देवता का दिन – ‘ट्यूजडे, वुडन देवता का दिन – ‘वेडनेसडे, थोर देवता का दिन – ‘थर्सडे, फ्रिग्गा गाडेस का दिन – ‘फ्राईडे, तथा सैटर्न देवता का दिन – ‘सैटरडे होता है। वास्तव में सप्ताह के दिनों के नाम भी रोमन वासियों नें भारत से ही चुराये हैं क्यों कि हमारे पूर्वजों ने दिनों के नाम सौर मण्डल के ग्रहों पर रखे गये थे जैसे कि रविवार (सूर्य), सोमवार (चन्द्र), मंगलवार (मंगल), बुद्धवार (बुद्ध), बृहस्पतिवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र), और शनिवार (शनि)। क्योंकि बडी वस्तु को ‘गुरु’ कहा जाता है और छोटी को ‘लधु ’ – इसलिये बृहस्पतिवार को गुरुवार भी कहा जाता है। हमारे पूर्वजों को आधुनिक वैज्ञानिकों से बहुत पहले ही ज्ञात था कि बृहस्पति सौर मण्डल का सब से बडा ग्रह है।

पोर्तगीज भाषा में कैलैण्डर शब्द को ‘कालन्दर’ बोलते हैं जो संस्कृत के शब्द ‘कालन्तर’ (काल+अन्तर) का अपभृंश है। संस्कृत में कालन्तर उसी श्रेणी का शब्द है जैसे युगान्तर, मनवन्तर, कल्पान्तर आदि हैं। इन मापदण्डों का प्रयोग सौर मण्डल की काल गणना के लिये किया जाता है। रोमन कैलैण्डर के महीने सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर का स्त्रोत्र भी संस्कृत के क्रमशः सप्तमबर (सप्त+अम्बर), अष्टाम्बर, नवम्बर, तथा दशम्बर से है जिनका शब्दिक अर्थ सातवें, आठवें, नवमें और दसवें अम्बर (आसमान) से है।

अंग्रेजों का अपना कोई कैलैण्डर नहीं था और वह जूलियन कैलैण्डर  को इस्तेमाल करते थे जिस में या साल ‘मार्च’ के महीने से शुरु होता था। साल में केवल दस महीने ही होते थे। मार्च से गिनें तो सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें महीने ही बनते हैं। जैसे जैसे अंग्रेजों में वैज्ञानिक जागृति आई तो उन्हों ने 1750 में ग्रीगेरियन कैलैण्डर (रोमन कैलैण्डर) को सरकारी कैलैण्डर बनाया और समय गणना को नयी सीख अनुसार पूरा करने के लिये दो महीने ‘जनवरी’ और ‘फरवरी’ भी जोड दिये। परम्परागत जनवरी 31 दिन का था और फरवरी में कभी 28 और कभी 29 दिन होते थे जिस का वैज्ञानिक आधार कुछ नहीं था। पश्चात ब्रिटिश संसद ने अपना वर्ष को मार्च के बदले जनवरी 1772 से प्रारम्भ करना शुरू किया क्यों कि क्रिस्मस के बाद पहला महीना जनवरी आता था।

राशी चक्र की वैज्ञानिक्ता

पाश्चात्य कैलेण्डर की तुलना में भारत का विक्रमी कैलेण्डर पृथ्वी के सौर मण्डल पर आधारित और वैज्ञानिक है। हमारी पृथ्वी सू्र्य की परिक्रमा लगभग सवा तीन सौ पैंसठ दिन में करती है। ऋगवेद में अनगिनित ताराग्रहों का वर्णन है, जिन को विभाजित कर के पृथ्वी दूारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा के मार्ग का मानचित्र बनाया गया है। मार्ग की पहचान के लिये सितारों के दर्श्नीय फैलाव के अनुरूप, उन के काल्पनिक रेखा चित्र बना कर उन्हें आकृतियों से मिलाया गया है। प्रत्येक विभाग को किसी जन्तु या वस्तु की आकृति के आधार पर ऐक राशि का नाम दिया गया है। राशियों के भारतीय रेखा चित्र आज विश्व भर में ज़ोडियक साईन के नाम से जाने जाते है। केवल ज़ोडियक नामों को ही स्थानीय देशों की भाषा में परिवर्तित किया गया है चित्र भारतीय चित्रों की तरह ही हैं।

360 दिनों को 12 राशियों में बाँट कर वर्ष के अन्दर 30 दिनों के बारह मास बनाये गये हैं। यह वह समय है जब पृथ्वी सूर्य परिक्रमा करते समय एक राशि भाग में लगाती है। दूसरे शब्दों में सूर्य पृथ्वी के उस राशि भाग में रहता है। उसी अवधि को ऐक मास कहा गया है। भारतीय कैलेन्डर के अनुसार स्दैव मास के प्रथम दिन पर ही सूर्य ऐक से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। यह सब कुछ वैज्ञानिक है और प्रत्यक्ष है। बारह राशियों के इसी वैज्ञानिक तथ्य को सूर्य के रथ के पहिये की बारह कडियाँ के रूप में चित्रों के माध्यम से भी दर्शाया गया है। राशियों की आकृतियों के आधार पर ही नाविक उन्हें ऐक से बारह अम्बरों (आसमान के टुकडों) की भान्ति भी पहचानने लगे थे।

महीनों के नामों की बैज्ञानिकता

हमारे समस्त वैदिक मास (महीने) का नाम 28 में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं l जिस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर होता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नाम हुआ l 1. चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास l 2. विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास l 3. ज्येष्ठा नक्षत्र से ज्येष्ठ मास l 4. पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा से आषाढ़ l 5. श्रावण नक्षत्र से श्रावण मास l 6. पूर्वाभाद्रपद या उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद l 7. अश्विनी नक्षत्र से अश्विन मास l 8. कृत्तिका नक्षत्र से कार्तिक मास l 9,. मृगशिरा नक्षत्र से मार्गशीर्ष मास l 10. पुष्य नक्षत्र से पौष मास l 11. माघा मास से माघ मास l 12. पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास l

भारतीय खगोल वैज्ञानिकों ने पाश्चात्य वैज्ञानिकों से पूर्व इस तथ्य पर भी विचार किया था कि सूर्य की परिकर्मा में पृथ्वी को सवा 365 दिन लगते हैं। अतः हिन्दू कैलेण्डरों के अन्दर प्रत्येक बारह वर्ष के पश्चात ऐक वर्ष तेरह महीनों का आता है जो दिनों की कमी को पूरा कर देता है। इसी बारह वर्ष की अवधि का सम्बन्ध भारत के कुम्भ आयोजनों से भी है जो हरिदूआर, प्रयाग, काशी तथा नाशिक में हजारों वर्षों से आयोजित किये जा रहै हैं। इस की तुलना में रोमन कौलेण्डर में यह काल लगभग मास के दूसरे या तीसरे सप्ताह में आता है, जो वैज्ञानिक ना हो कर केवल परम्परागत है। रोमन कैलेण्डर के 30 दिनों या 31 दिनों के महीनों तथा फरवरी में 28 या 29 दिनों के होने का कारण वैज्ञानिक नहीं, बल्कि काम चलाऊ है।

अप्राकृतिक रोमन कैलेण्डर हमारे ऊपर उस समय थोपा गया था जब अंग्रेज़ विश्व में अपना उपनेष्वाद फैला रहे थे। ब्रिटेन का अपना कोई कैलेण्डर नहीं था। इसाई देश होने के कारण उन्हों ने रोमन कैलेण्डर को अपना रखा था। ब्रिटेन का समय भारत से लग भग साढे पाँच घन्टे पीछे चलता है। जब भारत में प्रातः साढे पाँच बजे सूर्योदय होता है तो उस समय इंग्लैण्ड में मध्य रात्रि का समय होता है। भारत के ‘प्रत्यक्ष सूर्योदय’ के समय नया दिन आरम्भ करने की प्रथानुसार अंग्रेजों ने अपने देश में मध्य रात्रि के समय नया दिन घोषित कर लिया और उसी प्रथा को अपनी सभी कालोनियों पर थोप दिया। भारत के अतिरिक्त किसी कालोनी का निजि कैलेण्डर नहीं था, अतः किसी देश ने कोई आपत्ति भी नहीं जतायी। ग़ुलाम की भान्ति उन्हों ने अंग्रेजी मालिक का हुक्म स्वीकार कर लिया। किन्तु भारत में स्थानीय पाँचांग चलता रहा है जिस की अनदेखी भारत के सरकारी तन्त्र ने धर्म निर्पेक्षता की आड में करी है।

युग-काल का विधान

हमारे पूर्वजों ने केवल पृथ्वी की समय गणना का विधान ही नहीं बनाया था, बल्कि उन्हों ने सृष्टि की युग गणना का विधान भी बनाया था जिस के आँकडों को आज विज्ञान भी स्वीकारनें पर मजबूर हो रहा है।

भारतीय गणना के अनुसार चार युगों का ऐक चतुर्युग होता है। यह वह समय है जो ‘हमारा सूर्यमण्डल’ अपने से बडे महासूर्य मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। यह गणना मन-घडन्त नहीं अपितु ऋगवेद के 10800 पद्धो तथा 432000 स्वरों में दी गयी है।

सतयुग, त्रेता, दूापर, और कलियुग चार युग माने जाते हैं। चार युगों से ऐक चतुर्युग बनता है। चतुर्युग के अन्दर युगों के अर्न्तकाल का अनुपात 4:3:2:1 होता है। अतः प्रत्येक युग की अवधि इस प्रकार हैः-

  • सतयुग – 17 लाख 28 हज़ार वर्ष
  • त्रेता युग – 12 लाख 96 हज़ार वर्ष
  • दूापर युग – 8 लाख 64 हज़ार वर्ष
  • कलियुग – 4 लाख 32 हज़ार वर्ष  (कुल जोड – 432000 वर्ष)

71 चतुर्युगों से ऐक मनवन्तर बनता है (30 करोड 67 लाख 20 हज़ार वर्ष) यह वह समय है जो महासूर्य मण्डल अपने से भी अधिक विस्तरित सौर मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। इस से आगे भी बडे सूर्य मण्डल हैं जिन की परिकर्मा हो रही है तथा वह अनगिनित हैं।

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन 

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन का चक्र निरन्तर निर्विघ्न चलता रहता है। सर्जन 4.32 करोड वर्ष (ऐक चतुर्युग) तक चलता है जिस के पश्चात उतने ही वर्ष विसर्जन होता है। सृष्टि-कल्प वह समय है जब ब्रह्मा सृष्ठि की रचना करते हैं । इसी के बराबर समय का प्रलय-कल्प भी होता है। प्रलय-कल्प में सृष्ठि का विसर्जन होता है । सृष्ठि और प्रलय ऐक दूसरे के पीछे चक्र की तरह चलते रहते हैं जैसे हमारे दिनों के पीछे रातें आती है।  सर्जन-विसर्जन के समय का जोड 8.64 करोड वर्ष होता है जिसे ब्रह्मा का ऐक दिवस (अहरोत्रा) माना गया है। ऐसे 360 अहरोत्रों से ब्रह्मा का ऐक वर्ष बनता है जो हमारे 3110.4 केटि वर्षों के बराबर है।

हिन्दू शास्त्रों ने ऐक कल्प को 14 मनुवन्तरों में विभाजित किया है। प्रत्येक मनुवन्तर में 30844800 वर्ष होते हैं अथवा 308.448 लाख वर्ष होते हैं।

हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार वर्तमान सृष्टि की रचना श्वेतावराह कल्प में 1.972 करोड वर्ष पूर्व हुई थी। उस के पश्चात छः मनुवन्तर बीत चुके हैं और सातवाँ वैभास्वत मनुवन्तर अभी चल रहा है। पिछले मनुवन्तर जो बीत चुके हैं उन के नाम स्वयंभर, स्वारोचिश, ओत्तमी, तमस, रविवत तथा चक्षाक्ष थे।

सातवें मनुवन्तर के 28 चतुर्युग भी बीत चुके हैं और हम 29वें चतुर्युग के कलियुग में इस समय (2012 ईसवी) जी रहे हैं । वर्तमान कलियुग के भी 5004 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं

भागवत पुराण के अनुसार भक्त ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद स्वयंभर मनु के युग में हुये थे जो आज (2012 ईसवी) से 1.99 करोड वर्ष पूर्व है। पाश्चात्य वैज्ञानिक इन गणाओं की अनदेखी करते रहे लेकिन जब अमेरिकन शोधकर्ता माईकल ए क्रामो ने कहा कि मानव आज से 2 करोड वर्ष पूर्व धरती पर आये तो भागवत पूराण के कथन की पुष्टि हो गयी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यह काल गणना खगौलिक है। इस गणना के अनुसार आज की मानवी घटनाओं को जोडना उचित नहीं होगा। जैसे हाथी तोलने वाले माप दण्डों से स्वर्ण को नहीं तोला जाता उसी प्रकार किसी व्यक्ति की आयु का आंकलन ‘लाईट-यीर्स’ या ‘नैनो-सैकिण्डस में नहीं किया जाता।

भारतीय कैलैण्डर की उपेक्षा 

अंग्रेज़ी पद्धति अनुसार प्रशिक्षित भारतीय युवा अपने गौरवशाली पूर्वजों की उपलब्धियों को भूल कर अपने आप में ही गर्वित रहते हैं। जो कुछ अंग्रेज़ थूकते रहै मैकाले प्रशिक्षित भारतीय उसे खुशी से चाटते रहै हैं। आज से केवल पचास वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज घटनाओं को भारत के देसी महीनों के माध्यम से याद रखते थे किन्तु वह प्रथा अब लुप्त होती जा रही है। भारत के अंगेजी प्रशक्षित आधुनिक युवा देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते। कदाचित वह समझते हैं कि भारत का अपना कोई कैलेण्डर ही नहीं था और रोमन कैलेण्डर के बिना हम प्रगति ही नहीं कर सकते। अपनी मनोविकृति के कारण हम आदि हो चुके हैं कि सत्य वही होता है जिसे पाश्चात्य वैज्ञानिक माने। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व पश्चिम के वैज्ञानिक ऐक स्वर में बोल रहे थे कि चन्द्रमां पर जल नहीं है। परन्तु जब भारत के चन्द्रयान ने चाँद की धरती पर जल के प्रमाण दिये तो अमेरिकी नासा ने भी पुनः खोज कर के भारत के कथन की पुष्टि कर दी।

अंतरीक्ष की भारतीय समय सारणी को भी आज के विज्ञान के माध्यम से परखा जा सकता है। यदि यह काम विदेशी ना करें तो भारत के वैज्ञानिकों को स्वयं करना चाहिये। हमारी उपलब्धियों को स्वीकृति ना देना पाश्चात्य देशों के स्वार्थ हित में है क्यों कि उन्हों ने भारत की उपलब्धियों को हडप कर अपना बनाया हुआ है। लेकिन हम किस कारण अपने पूर्वजों की धरोहर उन्हें हथियाने दें ? हम अपनी उपलब्दधियों की प्रमाणिक्ता पाने के लिये पाश्चात्य देशों के आगे हाथ क्यों फैलाते रहते हैं ?

आजकल कुछ देश भक्त अंग्रेजी नव-वर्ष पर अपने मन की भड़ास निकालते हैं जो कि ऐक शुभ संकेत है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। अपनी उप्लब्द्धी की जानकारी भी रहनी चाहिये और उसे यथा सम्भव अंग्रेज़ी कैलेण्डर का साथ मिलाते रहना चाहिये। दुर्भाग्यवश अंग्रेजी कैलेण्डर ही अन्तरराष्ट्रीय मान्यता रखता है उसे बदलने के लिये पहले अपने घर में भारतीय कैलेण्डर की जानकारी तो होनी चाहिये। आज के युवा अपने देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते जो पिछली पीढी तक सभी गाँवों में प्रचिल्लत थे। क्या हम अपने प्राईमरी स्कूलों में यह जानकारी फिर से पढा सकें गे?

चाँद शर्मा

 

Advertisements

Comments on: "33 – सृष्टि का काल चक्र" (6)

  1. Dr Vimla Singh said:

    Wonderful sharing

  2. Chand K Sharma said:

    Do you agree with the factual or do we need to get the same certified? The orbits of all the planets were checked by me with Panchang, and you may not believe in a book sold in Delhi footpaths for Rs 1.25 ‘Horachakram’ and Nasa (Life-series) records! Some tallied in ditto while a few within 2-3 digits that can be a mere conversion error.

    • Chand K Sharma said:

      रोमन कैलेण्डर और घडियां हम लोग आसानी से इस्तेमाल करते रहते हैं। विदेशी कम्पनियां ग्लोसी पेपर पर अधनंगी तसवीरों वाले अंग्रेज़ी कैलेण्डर बांटती हैं जिन्हें हम अपने घरों में गर्व से लगाते हैं। उन में गुड फ्राई-डे, वेलेनटाइन-डे या थैंक्सगिविंग-डे वगैरा लाल रंग में लिखे रहते हैं मगर हिन्दू त्यौहारों का कहीं नामो-निशान भी नहीं होता। यही हाल रहा तो हमारी परम्परायें ऐकदिन लुप्त हो जायें गी। क्या कोई भारतीय वैज्ञानिक, बिजनेस हाऊस, या कम्पयूटर विशेषज्ञ भारतीय कैलेण्डर, या भारतीय समय गणना पर आधारित घडी डिज़ाईन कर सकता है जिसे हाथ पर, मोबाईल में, या टाईम पीस की तरह इस्तेमाल किया जा सके?
      जब विदेशी इसी तरह के काम ‘हमारे ज्ञान को चोरी कर के’ कर सकते हैं तो हम ‘अपने ही ज्ञान का प्रयोग’ अपने दैनिक जीवन की सुविधाओं के लिये क्यों नहीं करते? सिर्फ इच्छा शक्ति और स्वाभिमान चाहियें।

  3. Dr Vimal Singh said:

    Sir I would like to see and know more practically when you are back to India. This post is superb.
    Indian scientists should come out of their inferiority complex and challenge the West.

  4. Sunita Sharma said:

    Very informative post. Today science congress claim that first plane is being made in India on the concept on Akash science Granth. Thanks for sharing .

    • Chand K Sharma said:

      Thanks for your comments. Please see the posts 50 – प्राचीन वायुयानों के तथ्य and 51 – अवशेषों से प्रत्यक्ष प्रमाण for details on the subject.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

टैग का बादल