हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


हिन्दू शास्त्रों में विश्वकर्मा को समस्त सर्जन कलाओं का अग्रज माना जाता है। भारत के इंजिनियर तथा कारीगर आज भी प्रत्येक शुभ कार्य को आरम्भ करने से पूर्व सर्व प्रथम विश्वकर्मा की पूजा करते हैं। देवी देवताओं के अस्त्र शस्त्रों के निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही प्राप्त है। विश्व के अन्य देशों में तकनीक और आविष्कार का उदय आकस्माक हुआ। उस के विपरीत भारत में तकनीक और अविष्कार लगातार कोशिशों और अनुभवों के आधार पर हुये हैं।

विश्वकर्मा ने विष्णु का सुदर्शन चक्र, रामायण का शिव-धनुष, तथा अर्जुन का गाँडीव धनुष बनाया था। विश्वकर्मा ने ही इन्द्रप्रस्थ के आश्चर्य जनक भवन, इन्द्र की राजधानी अमरावती, तथा कुबेर का पुष्पक-विमान बनाया था, जिसे रावण ने कुबेर से छीन लिया था। पुष्पक विमान सात मंजिला पाँच सितारा होटल जैसा था और मन की गति से चलता था। वह अमेरिका के ऐयर फोर्स वन विमान से कहीं अधिक आधुनिक था। आज कल टच-स्क्रीन तकनीक की सहायता से हम मन वाँच्छित आँकडे प्राप्त कर सकते हैं, सटैल्थ बम-वर्षक विमान भी बन चुके हैं तीन मंजिला जुम्बो जेट भी उडान भरते हैं, परन्तु पुष्पक विमान जैसी तकनीक अभी तक विकसित नहीं हुई है। यह हमारी इच्छा पर निर्भर है कि हम चाहें तो इन्हें आस्था माने या खोया हुआ इतिहास, लेकिन इस में कोई शक नहीं कि उन सम्भव होने वाले सभी आविष्कारों की कल्पना तो हम भारत वासियों ने ही करी थी।

पहिये का अविष्कार

पहिये का अविष्कार मानव विज्ञान के इतिहास में अभूतपूर्व उपलब्द्धी थी जिस के बल पर मानव ने गति को दिशा परिवर्तन और तीव्रता प्रदान की है। पता नहीं क्यों पहिये के अविष्कार का श्रेय इराक को दिया जाता है जहाँ रेतीले मैदान हैं, जबकि सर्वप्रथम हम पौराणिक चित्रों में सुदर्शन चक्र के माध्यम से ही पहिये का साक्षाताकार करते हैं। रामायण महाभारत काल से पहले ही पहिये का चमत्कारी आविष्कार भारत में हो चुका था और रथों में पहियों का प्रयोग किया जाता था। जब कि इराक के लोग उन्नीसवीं सदी तक रेगिस्तान में ऊँटों की सवारी करते हैं और योरूपीय साँटाकलाज़ को भी बिना पहिये की गाडी सलैज पर ही आता जाता दिखाया जाता है।

पहिये की तकनीक के सहारे याँत्रिक मशीनों और उपकरणों में शक्ति को निरन्तरता, गति तथा दिशा प्रदान करी जाती है। आधुनिक विज्ञान की प्रगति में  पहिये का महत्व सर्वाधिक है। विश्व की सब से प्राचीन सभ्यता सिन्धु घाटी के अवशेषों से प्राप्त (ईसा से 3000-1500 वर्ष पूर्व की बनी) खिलोना हाथ गाडी भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रमाणित करती है कि विश्व में पहिये का निर्माण इराक में नहीं बल्कि भारत में ही हुआ था।  

चरखा चक्र

चरखा चक्र निस्संदेह भारत की अन्य देन है। इस के आविष्कार से वस्त्रों के उत्पादन का खर्चा कम हुआ तथा कालान्तर चरखा चक्र के साथ पेटी जोड कर शक्ति वितरण की तकनीक भी आई। यह अविष्कार अत्यन्त महत्वशाली था क्यों कि इस प्रयोग से भारत ने योरूप को निरन्तर चाल का विचार दिया जिस के कारण आज के युग में याँत्रिक (मेकेनिकल) प्रगति सम्भव हुयी है। इस खोज का श्रेय भास्कराचार्य को जाता है। भारत से यह तकनीक अरबों के माध्यम से योरूप पहुँची थी और आज समस्त विश्व में वैज्ञिानिक प्रगति का माध्यम बनी है।

राजाभोज के समय की ‘समरांगणा सूत्रधारा’ (1100 ईस्वी) में कई याँत्रिक खोजो का वर्णन है जैसे कि चक्री (पुल्ली), लिवर, ब्रिज, छज्जे (केन्टीलिवर) आदि। कालान्तर अरब वासियों ने उन्हें सीखा और अरबी फारसी भाषाओं के माध्यम से डा विंसी के मैकेनिक आलेखों दूारा योरुपवासियों में उन्हीं तकनीकों को प्रचारित किया। कदाचित योरुप वासियों ने यह अनुमान भी लगा लिया कि यह सभी अविष्कार अरबों ने किये।

धातु तथा खनिज

धातुओं तथा खनिजों के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुयी थी। ईसा से तीन हज़ार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी क्षेत्र में स्वर्ण, चाँदी, तथा ताँबे की खदाने थीं। वैदिक काल में ताँबे, काँसे, तथा पीतल का प्रयोग घरेलू बर्तन बनाने, अस्त्र – शस्त्र तथा मूर्तियों के निर्माण में होता था। जहाँ अन्य देशों के माईथोलोजिकल देवी देवता पशुओं के सींगों वाले मुकट पहने चित्रित किये जाते हैं वहीं भारत के देवी देवता स्दैव सुवर्ण-रत्न जटित मुकट पहने होते हैं। 

पातञ्जली ऋषि ने लोहशास्त्र ग्रन्थ में धातुओं के प्रयोग से कई प्रकार के रसायन, लवण, और लेप बनाने के निर्देश दिये हैं। धातुओं के निरीक्षण, सफाई तथा निकालने के बारे में भी निर्देश हैं। स्वर्ण तथा पलेटिनिम को पिघलाने के लिये अकुआ रेगिना तरह का घोल नाइटरिक एसिड तथा हाइड्रोक्लोरिक एसिड के मिश्रण से तैय्यार किया जाता था। तथा इस का श्रेय भी पातञ्जली ऋषि को जाता है।

मनु समृति में भी धातुओं को शुद्ध करने के बारे में उल्लेख मिलता हैः-

       अपामग्नेश्च संयोगाद्धेमं रौप्यं च निर्वभो।

                 तत्मात्तयोः स्वयोन्यैव निर्णेको गुणवत्तरः ।।

                         ताम्रायः कांस्यरैत्यानां त्रपुणः सीसकस्य च।

                                 शौचं यथार्हं कर्तव्यं क्षारोम्लोदकवारिभिः ।। (मनु स्मृति5- 113-114)

अग्नि और जल के संयोग से सोना और चाँदी उत्पन्न होते हैं, इसलिये दोनो की शुद्धि अपने उत्पादक जल और अग्नि से ही श्रेष्ठ होती है। ताँबा, लोहा, काँसा, पीतल, राँगा और शीशा, इन की यथायोग्य क्षार, खटाई और जल से शुद्धि करनी चाहिए।

रसायन शास्त्र तथा धातु शास्त्र

भारत में रसायन शास्त्र की उपलब्द्धियाँ चिकित्सा, धातुविज्ञान तथा निर्माण के क्षेत्र से प्राप्त हुयीं। कौटिल्लय रचित अर्थशास्त्र में बाँधों तथा पुलों का वर्णन है जिन में झूलापुल (सस्पैन्शन ब्रिज) का भी वर्णन है। कृषि का विकास भी ईसा से 4500 वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी में हुआ था। सिंचाई तथा जल संग्रह की उत्तम व्यवस्था के अवशेष गिरनार (ईसा से 3000 वर्ष पूर्व) में देखे जा सकते हैं। भूतल पर बने स्नानागार, जिन में भट्टियों में सेंके गये पक्की मिट्टी के पाईप नलियों के तौर पर प्रयोग किये गये थे तथा 7-10 फुट चौडी और धरती से दो फुट अन्दर नालियाँ बनी थीं। हडप्पा के लोग तांम्बे, पीतल, काँसे की धातुओं का प्रयोग करना जानते थे। वहाँ से प्राप्त तलवारें ताँम्बे की बनी हुयी थीं। 

गुप्त काल से ही रोम वासी भारत को उद्यौगिक तथा सैनिक महाशक्ति के रूप में देखते थे। रसायनों का प्रयोग रंगाई, टेनिंग, साबुन निर्माण, सीमेन्ट निर्माण, तथा दर्पण निर्माण आदि के क्षेत्रों में अधिक होता था। दूसरी शताब्दी में नागार्जुन नें पारा धातु के बारे में मौलिक ग्रन्थ लिखा था। छटी शताब्दी से ही भारतीय रसायन प्रयाग से केलसीनेशन, डिस्टिलेशन, स्बलीमेशन, स्टीमिंग, फिक्सेशन, तथा बिना गर्मी के हल्के इस्पात निर्माण के क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धी योरूपवासियों से कहीं अधिक थी। भारत में कई प्रकार के खनिज लवण, चूर्ण और रसायन तैय्यार किये जाते थे।  

ईसा से लगभग 150 वर्ष पूर्व भारतीयों को लोहा तथा मिश्र धातुओं के प्रयोग से इस्पात बनाने में सर्वाधिक निपुणता प्राप्त की थी जिस के प्रमाण ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई के उपरान्त मिले हैं। इस के अतिरिक्त भारतियों को जिस्त मिश्रण तथा पीतल आदि धातुओं का भी ज्ञान था।जिस्त की तकनीक भारत से चीन तथा योरूप गयी। 1735 ईस्वी तक योरूप के रसायन शास्त्री यही समझते थे कि जिस्त को धातु के रूप में ताँबे के बिना नहीं बदला जा सकता।

धातु उत्पादन

धातुओं का प्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में भी होता था। कई तरह के रसायन, सोने चाँदी की भस्म, तथा वर्क प्रयोग किये जाते थे। दक्षिण भारत धातु उद्योग के लिये प्रसिद्ध था तथा वहाँ के उत्पादन विश्व विख्यात थे, विशेष तौर परः-

  • कर्नाटक –कर्नाटक पतले और महीन तारों के उत्पादन में प्रसिद्ध था जो संगीत वाद्यों में इस्तेमाल किये जाते थे। उस समय पाश्चात्य तथा अन्य देशों के वाद्य यन्त्रों में तारों के स्थान पर जानवरों की अन्तडियों का प्रयोग किया जाता था।
  • केरल केरल लोहे को भट्टियों में ढालने के लिये प्रसिद्ध था। इस के अतिरिक्त केरल के धातु विशेषज्ञ्य धातु को विशेष प्रकार की तकनीक से दर्पण बनाने में भी प्रयोग करते थे जैसा कि अरनमला में किया गया है।
  • तामिल नाडु – तामिल नाडु से उत्तम प्रकार का इस्पात रोम के अतिरिक्त समस्त विश्व को निर्यात किया जाता था।
  • आन्ध्र आन्ध्र प्रदेश का कोनास्मुद्रम विश्व प्रसिद्ध वूटस – स्टील उत्पादन के लिये जाना जाता था। यह इस्पात अस्त्र-शस्त्र बनाने में प्रयोग होता था। सुलतान सलाहुद्दीन की दमस्कस तलवार इसी धातु से निर्मित हुई थी। भारत में लोहे से इस्पात बनाने की कला का प्रति स्पर्धी अन्य कोई देश नहीं था।
  • राजस्थान – ईसा से  400 वर्ष पूर्व उदयपुर के समीप झावर में जिंक की खाने थीं 

झेलम के राजा पोरस ने विश्व-विजेता सिकंदर को उपहार स्वरूप स्वर्ण या रजत नहीं भेजे थे अपितु उसे 30 पाऊड उच्च कोटि का भारत निर्मित इस्पात उपहार में दिया था। कालान्तर मुसलिम कारीगर भारत के धातु ज्ञान को पूर्व ऐशिया, मध्य ऐशिया तथा योरूप में ले गये और उसी प्रणाली से दमस्कस तलवारों का निर्माण किया। यह तकनीक भारत से ईरान तथा ईरान से अन्य मुसलिम देशों के माध्यम से योरूप गयी।

नटराज की प्रतिमा पाँच धातुओं के मिश्रण से बनी है। यूनानी इतिहासकार फिलोत्रस ने भी अपने उल्लेखों में दो से अधिक धातुओं के मिश्रण की भारतीय तकनीक का वर्णन किया है। हिन्दू मन्दिरों के कलश स्दैव स्वर्ण, पीतल तथा अन्य धातुओं के मिश्रण से तैय्यार होते थे। 

तकनीकी मापदण्डों का निर्माण

  • छटी शताब्दी में यतिव्रासाभा ने अपनी कृति तिलोयापन्नति में समय तथा दूरी मापने के लिये तालिकायें बनाईं तथा अनिश्चित समय के मापने के परिमाणों का निर्माण किया।
  • यकास्पति मिश्र ने डेस्कारटेस (AD 1644). से आठ सौ वर्ष पूर्व (840 ईस्वी) में अपनी कृति न्यायसुचिनिबन्ध में सोलिड कोर्डिनेट ज्योमैट्री का उल्लेख किया।  उस ने यह भी बताया कि किसी भी अंतरीक्ष में ऐक कण की स्थिति अन्य स्थित चिन्ह से तीन काल्पलिक रेखाओं के मिलान और माप से आँकलन की जा सकती है।
  • न्याय विशेषिका के खगोल शास्त्रियों ने सूर्य दिवस की अवधि 1,944,000 क्षण मापी। ऐक क्षण आधुनिक सैकिण्ड के दशमलव 044 भाग के बराबर होता है। ऐक ‘त्रुटि’ को समय के लिये सब से छोटा मापदण्ड माना गया है।
  • शिल्पशास्त्र में लम्बाई मापने कि लिये सब से छोटा मापदण्ड ‘पारामणु’ था जो आधुनिक इंच के 1/349525 भाग के बराबर है। यह मापदण्ड न्याय विशेषिका के ‘त्रास्रेणु’ (अन्धेरे कमरे में आने वाली सूर्य किरण की रौशनी में दिखने वाला अति सूक्षम कण) के बराबर था।  वराहमिहिर के अनुसार 86 त्रास्रेणु ऐक उंगली के बराबर (ऐक इंच का तीन चौथाई भाग) होते हैं। 64 त्रास्रेणु ऐक बाल के बराबर मोटे होते हैं।

दिल्ली का लोह स्तम्भ

भारत के लोहे तथा इस्पात की कई विशेषतायें थी। वह पू्र्णतया ज़ंग मुक्त थे। इस का प्रत्यक्ष प्रमाण पच्चीस फुट ऊंचा कुतुब मीनार के स्मीप दिल्ली स्थित लोह स्तम्भ है जो लग भग 1600 वर्ष पूर्व गुप्त वँश के सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के काल का है और धातु ज्ञान का आश्चर्य जनक कीर्तिमान है। इस लोह स्तम्भ का व्यास 16.4 इन्च है तथा वज़न साढे छः टन है। 16 शताब्दियों तक मौसम के उतार चढाव झेलने के पश्चात भी इसे आज तक ज़ंग नहीं लगा। कुछ प्रमाणों के अनुसार यह स्तम्भ  पहले विष्णु मन्दिर का गरूड़ स्तम्भ था। मुस्लिम शासकों ने मन्दिर को लूट कर ध्वस्त कर दिया था और स्तम्भ को उखाड कर उसे विजय चिन्ह स्वरूप ‘कुव्वतुल-इसलाम मसजिद’ के समीप दिल्ली में गाड़ दिया था।

हाल ही में ईन्डियन इन्टीच्यूट आफ टेकनोलोजी कानपुर के विशेषज्ञ्यों नें स्तम्भ का निरीक्षण कर के अपना मत प्रगट किया है कि स्तम्भ को जंग से सुरक्षित रखने के लिये उस पर मिसाविट नाम के रसायन की  ऐक पतली सी परत चढाई गयी थी जो लोह, आक्सीजन तथा हाईड्रोजन के मिश्रण से तैय्यार की गयी थी। यही परिक्रिया आजकल अणुशक्ति के प्रयाग में लाये जाने वाले पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिये डिब्बे बनाने में प्रयोग की जाती है। सुरक्षा परत को बनाने में उच्च कोटि का पदार्थ प्रयोग किया गया था जिस में फासफोरस की मात्रा लोहे की तुलना में एक प्रतिशत के लगभग थी। आज कल यह अनुपात आधे प्रतिशत तक भी नहीं होता। फासफोरस का अधिक प्रयोग प्राचीन भारतीय धातु ज्ञान तथा तकनीक का प्रमाण है जो धातु वैज्ञ्यिानिकों को आश्चर्य चकित कर रही है।

आजकल विकसित देश टेक्नोलोजी ट्राँसफर को हथियार बना कर अविकसित देशों पर आर्थिक दबाव बढाते हैं। जो लोग पाश्चात्य तकनीक की नकल करने की वकालत करते हैं उन्हें स्वदेशी तकनीक पर शोध करना चाहिये ताकि हम आत्म निर्भर हो सकें।

चाँद शर्मा

 

 

 

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