हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


योरूपीय देशों के लोग तुर्कों तथा पश्चिम ऐशिया के सम्पर्क में तो थे ही। योरूप के बुद्धिजीवियों ने ‘प्रथम-जागृति’ के समय लैटिन और ग्रीक पुस्तकों को अपनाया। उस के पश्चात उन्हों ने अरबी तथा फारसी के ग्रंथों को अनुवादित किया जो संस्कृत ग्रंथों से पहले ही प्रभावित हो चुके थे। प्रारम्भ में योरूप वासियों की गति विधियाँ ग्रंथों को अनुवादित करने और उन की प्रतिलिपियाँ बनाने तक ही सीमित रहीं। धीरे धीरे उन्हें अरबी-फारसी के ग्रन्थों में उन्हें भारतीय मौलिकता का ज्ञान हुआ। उस के पश्चात ही कई अरबी फारसी में अनुवादित संस्कृत गर्न्थों का अनुवाद योरुपियन भाषाओं में किया गया और योरूप में ज्ञान की नयी रौशनी फैलने लगी जिसे ‘रिनेसाँ’ का युग कहा जाता है।

विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान

गणित –  1100 ईस्वी में रोबर्ट चेस्टर नामक अंग्रेज़ ने स्पेन की यात्रा की। उस ने वहाँ अलख्वारिस्मी की पुस्तक का लेटिन में अनुवाद किया। जिस के फलस्वरुप नये गणित के रुप में दशमलव पद्धति और अंकों के ‘स्थान’ (पोजीश्नल नोटेशन) से योरुपीय वासी परिचित हुये जो प्रारम्भ में योरुप वासियों को समझ नही पडे थे। नयी भारतीय पद्धति तथा अंकों को समझने में उन्हें देर लगी थी। वह दशमलव को क्रियात्मक ढंग से प्रयोग नहीं कर सके थे। बाद में जब डच गणितिज्ञ्य साईमन स्टेवन (1548-1620) ने दशामलव पद्धति को विस्तार से अपना पुस्तक लाथिन्डे में सझाया तो योरुपवासी भी दशमलव का प्रयोग करने लगे। साईमन स्टेवन के पश्चात मागिनी और क्रिस्टोफर क्लाडिस ने दशमलव पद्धति को अपनी कृतियों में प्रयोग किया। तत्पश्चात 1621 ईस्वी में बैकेट ने अरबी भाषा से अर्थमैटिका का अनुवाद लेटिन भाषा में किया।   

अंक गणित – अल मामोन ने 820 ईस्वी में अबू जफर मुहम्मद मूसा अलख्वारिस्मी (780-850) को बग़दाद में निमन्त्रित किया था। वह बग़दादी प्रतिनिधि मण्डलों की अगुवायी कर के दो बार भारत गया तथा वहाँ के विदूानों को मिल कर उन से कई ग्रन्थों की हस्तलिपियाँ ले कर वापिस आया। उन्हीं के आधार पर उस नें अरबी भाषा में ‘किताब अलजबर वा मुकाबला’ लिखी जिस का सारांशिक अर्थ जमा और घटाने की परिक्रिया से गिनती करना था। अलजबरा इसी परिक्रिया का संक्षिप्त लेटिन नाम है। कालान्तर इसी ग्रन्थ का लेटिन अनुवाद योरुप के विश्व विद्यालयों में गणित शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया।   

लोगरिद्म तथा पोज़ीश्नल नोटेशन पद्धति – 825 ईस्वी में अबू जफर अलख्वारिस्मी ने लोगरिद्म शून्य पद्धति तथा पोज़ीश्नल नोटेशन पद्धतिपर ऐक पुस्तक लिखी जो ब्रह्मगुप्त के ग्रन्थ पर आधारित थी। इस का लेटिन अनुवाद ‘अलगोरिदमी डि न्यूमरो इन्डोरम के नाम से छपा था। जिस समय स्पेन पर अरबों का अधिकार था उस समय इस पुस्तक का अरबी संस्करण स्पेन भी ले जाया गया था।

खगोल विज्ञान

अल बत्तानी (850-929) को योरुप में अलबत्तगिनस कहा जाता है। उस ने भारतीय खगोल शास्त्र, दर्शन शास्त्र, पतंजली योग सूत्रों तथा गणित का अध्यन किया था। उस ने श्रीमद् भागवद् गीता, सांख्य करिका, सृष्टि की उत्पत्ति तथा विनाश, हिन्दू पुनर्जन्म चक्र आदि का आलोचनात्मिक विशलेशण भी किया था। उस ने ट्रिग्नोमैट्री पद्धति का विस्तार कर के भारतीय विचारों की पुष्टि की तथा स्वीकारा कि पृथ्वी और सूर्य का अन्तर वर्ष में घटता बढता रहता है। किन्तु इस्लामी कट्टर पंथियों के डर से उस ने अपने स्वीकृत तथ्यों को परिभाषित कर दिया था कि “वैसा हिन्दू सोचते हैं ”। उदाहरणत्या उस ने कहा कि “हिन्दू मानते हैं कि सृष्टि की आयु 5 खरब वर्ष है जो कि उस के निजी ईस्लामी विचारों में ग़लत है”। अमेरिका के विषय में हिन्दूओं की भूगौलिक जानकारी के संदर्भ में भी उस ने कहा कि हिन्दू मानते हैं कि ऐक महादूीप रोम शहर से डायगनली विपरीत दिशा में है। यही विचार बाद में लेटिन में अनुवाद किये गये जिन से प्रभावित हो कर कोलम्बस आदि भारत की खोज के लिये पश्चिम जाने के लिये प्ररेरित हो गये थे और उस ने अमेरिका को ढूंड निकाला।

असेट्रोलेब्स 

आर्य भट्ट का जीवनकाल 475-550 ईस्वी का है। सर्वप्रथम उन्हों ने ही खोज निकाला था कि चन्द्र तथा अन्य ग्रह सूर्य की रौशनी से ही चमकते हैं, पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के फलस्वरुप दिन और रात बनते हैं तथा पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है जिस से वर्ष का अन्तरकाल बनता है। उन्हों ने ही गृहण के कारणों का विशलेशण किया और यह निष्कर्ष भी निकाला कि ग्रहों की सूर्य परिक्रमा गोल ना हो कर अण्डाकार होती है। आर्य भट्ट की गणना अनुसार पृथ्वी का व्यास 8316 मील बताया और इसी गणना से पाश्चात्य खगोल शास्त्री भी उत्साहित हुये। उस के पश्चातः-

  • 1050 ईस्वी में असेट्रोलेब्स ऐशिया से योरुप में प्रविष्ट हुये जहाँ उन का प्रयोग अक्षाँश तथा देशान्तर रेखाओं के निर्माण में किया गया। बाद में उन का प्रयोग समुद्र पर अपनी स्थिति और समय जानने कि लिये भी किया जाने लगा जिस से नाविकों के कार्य में गति आ गयी।   
  • बाथ निवासी अदिलार्ड (1075-1160) ने समुद्री जहाज़ के दूारा नये पूर्वी मार्ग से इसाई अधिकृत सीरिया तट तक की यात्रा की। उस ने अरबी भाषा में अनुवादित मूल यूक्लिड का लेटिन भाषा में अनुवाद भी किया।
  • ईटली वासी गेरार्ड ग्रीमोना ग्रीक तथा अरबी दोनो भाषायें जानता था। 1175 ईस्वी में उस ने पटोल्मी की खगौलिक कृति ‘दि अलमागेस्ट का लेटिन में अनुवाद किया। इस उनुवाद के फलस्वरूप पटोल्मी की भ्रमात्मिक जानकारी का प्रसार भी हुआ। इस के अतिरिक्त गेरार्ड ग्रीमोना ने गालेन, अरस्तु, यूक्लिड तथा अलख्वारिस्मी की कृतियों को भी अरबी भाषा से लेटिन में अनुवाद किया।
  • 1190 ईस्वी में यहूदी दार्शनिक मोज़ेज माइमोनिडस ने अरस्तु की दार्शनिक विचारों से प्रेरित हो कर दि गाईड फार दि परपलेक्सड.’ की रचना की।

नक्षत्रों के मान चित्र तथा तालिकायें

भारतीय ज्ञान पर आधिरित खगोल शास्त्र सम्बन्धी प्राचीनत् आँकडे तथा मानचित्र बग़दाद में कनक नामक भारतीय के दूारा लाये गये थे। बग़दाद से वह स्पेन के रास्ते से योरुप पहुँचे। 1126 ईस्वी में स्पेन में उन का लेटिन  अनुवाद किया गया था। उन आँकडों तथा मानचित्रों को योरुपीय देशों में खगोल जानकारी के क्षेत्र की अमूल्य प्राप्ति  माना गया। उन के फलस्वरुपः

  • 1272 ईस्वी में अलफोंसाईन टेबल्स (नक्षत्रों की तालिकायें) टोलेडो स्पेन में बनाये गये जिन से ग्रहों की चाल तथा स्थिति की जानकारी मिलती थी।
  • उन्हीं मानचित्रों को प्रकाशित करने में 200 वर्ष का समय लगा तथा 1483 में प्रकाशित होने के पश्चात उन की जानकारी का विस्तरित प्रयोग होने लगा। प्रकाशन की क्रिया को समपन्न करने के लिये उस समय के चोटी के खगोलशास्त्रियों को सहायतार्थ केस्टाईल के अलफैंन्सो दशम ने ऐकत्रित किया था। 

पृथ्वी की गति 

आर्य भट्ट की पृथ्वी सम्बन्धी खोज से सभी सहमत थे कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के फलस्वरुप दिन और रात बनते हैं तथा पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है जिस से वर्ष का अन्तरकाल बनता है तथा पृथ्वी का व्यास 8316 मील है। 1224 ईस्वी में अबदुल्लाउर रऊमी ने ‘मुजामुल बुलदान’ नामक भूगौलिक बृहदकोष (ज्योग्राफिकल ऐनसाइक्लोपीडिया) तैयार किया। उस क् पश्चात 1440 में कासानस ने पृथ्वी के निरन्तर गतिमान रहने के सिद्धान्त की व्याख्या की और कहा कि अंतरीक्ष अति विस्तरित है। इन्हीं विचारों को ऐडविन हब्बल नें बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में दोहराया और कहा कि ग्रह पृथ्वी से बाहर की ओर फैल कर सृष्टि को विस्तरित करते जा रहे हैं । यह वही बात थी जो भारत के प्राचीनतम ग्रन्थ शताब्दियों पूर्व से ही कहते चले आ रहे थे।

न्यूटन का अग्रज

सर्वप्रथम गति के विभिन्न आँकलन विशेषका दर्शन शास्त्र में किये गये थे परन्तु प्रस्थापदा ने इस विज्ञान का छटी शताब्दी में विस्तार से विशलेषण किया। उस के अनुसंघानों का आधार ग्रहों की गति, ध्रुवीकरण और आकर्षण था। उस की व्याख्या का आधार गति की तीव्रता तथा लचीलापन भी था जिस का प्रभाव विपरीत दिशा में पडता था। यह सिद्धान्त न्यूटन के ‘ला आफ मोशन का अग्रज था।

चिकित्सा विज्ञान

औषधि तथा शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत तथा चरक के समय से ही महत्वशील प्रगति हो चुकी थी। ईसा से छटी शताब्दी पूर्व भारतीय चिकित्सकों ने स्नायु तन्त्र, हृदय की धमनियों तथा अन्य शरीरिक द्रव्यों के बारे में विस्तरित उल्लेख कर दिये थे। उन्हें पाचन क्रिया, तथा उस में सहायक द्रव्यों और भोजन को रक्त में परिवर्तित होने की पूर्ण जानकारी थी। पाशचात्य जानकारी तो इन विषयों पर उजागर ही नहीं हुयी थी। उन को इस विषय पर बहुत समय पश्चात ज्ञान हुआ।

  • औषधि शास्त्र ईटली केऔषध शास्त्री पीयट्रो डी अबानो (1200-1300) ने कोंसिलेटर डिफरेंशिया रम् नामक पुस्तक लिखी जो यूनानी और अरब वासियों की चिकित्सा जानकारी का मिश्रण मात्र थी। उस ने मस्तिष्क को स्नायु तन्त्र का केन्द्र तथा हृदय को रक्त शिराओं का स्त्रोत्र बताया। ईसाई कट्टरपंथियों ने उसे ‘जादूगर’ घोषित कर दिया तथा उसे चर्च विचारधारा के विरुद्ध जानकारी प्रसारित करने के अपराध में स्पेनिश कोर्ट ने मृत्यु दण्ड दे दिया।
  • मानव शरीर ऐन्ड्रियाज विसालिया ने 1543 में मानव शरीर के सम्बन्ध में ऐक पुस्तक लिखी जिसका नाम – औन दि स्टरक्चर आफ ह्यूमन बाडीथा। उस ने समस्त जानकारी चोरी छिपे मृत शीरीरों को काट काट कर प्राप्त की थी जो उस समय अपराध मानी जाती थी। परन्तु कालान्तर उस की कृति ने मानव शरीर सम्बन्धी कई योरुपीय भ्रानतियों को दूर करने में सहायता की।
  • रक्त प्रवाह विलियम हार्वे ने1628 ईस्वी में मानव शरीर में रक्त संचालन क्रिया की जानकारी दी जिस से य़ोरूप के आधुनिक ज्ञान का जन्म हुआ। हार्वे से पूर्व रक्त संचलन क्रिया के बारे में पाश्चात्य देशों में कई भ्रानतियाँ थीं। उदाहरणत्या अरस्तु के मतानुसार “रक्त लिवर में उत्पन्न होता था ”। अन्य लोगों के मतानुसार शरीर में रक्त हल्के झटकों के साथ गतिमान होता है। हार्वे ने पहली बार रक्त तथा हृदय का यथार्थ उल्लेख किया। उस ने यह जानकारी भी दि कि स्तनधारी जीव अण्डों से पैदा होते हैं। परन्तु उस के सिद्धान्त को स्वीकारने में लोगों को 150 वर्ष लगे।

ललित कलायें

ओपेरा का जन्म कालीदास के समय में भारत मे ही हुआ था। फ्रैड्रिक दूतीय ने भारतीय तथा अरबी भाषा के ग्रन्थों के अनुवाद को प्रोत्साहन दिया। फ्रैड्रिक को 1220 में पवित्र रोमन शासक बनाया गया था । उस के समीप दार्शनिकों, विदूानों तथा बगदाद और सीरिया से आये साधू संतों का जमावडा लगा रहता था। इस के अतिरिक्त भारत और ईरान से नर्तकियों का भी जमावडा रहता था। इस कारण कई भारतीय नृत्यों का समावेश पाश्चात्य नृत्य कला में भी हुआ। भारतीय परमपराओं ने ईटली के ओपेरा को भी प्रभावित किया।

जब हमारे पूर्वज उन्नति के शिखर पर रह चुके थे तो उस की तुलना में उन्नीसवीं शताब्दी तक अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन रात को ‘भालू की खाल’ ओढ कर सोते थे और उन के सम्बन्धी मृग चर्म से अपने शरीर ढकते थे। य़ोरुपीय देश अपनी कालोनियों के स्थानीय निवासियों को लूटने, उन का धर्मान्तरण करवाने और उन्हें गुलाम बना कर बेचने के कारोबार में ही लगे हुये थे।   

चाँद शर्मा

 

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

टैग का बादल