हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


इस्लाम को भारत में सफलता मिलने का ऐक कारण यहाँ के शासकों में परस्पर कलह, जातीय अहंकार, और राजपूतों में कूटनीति का आभाव था। वह वीरता के साथ युद्ध में मरना तो जानते थे किन्तु देश के लिये संगठित हो कर जीना नहीं जानते थे। युद्ध जीतने की चालों में पराजित हो जाते थे तथा भीतर छिपे गद्दारों को पहचानने में चूकते रहै। पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी को पराजित कर के क्षमादान दिया तो अगले ही वर्ष गौरी ने कूटनीति से पृथ्वीराज चौहान को हरा कर उसे यात्नामयी मृत्यु प्रदान कर दी। इस प्रकार की घटनायें भारत के इतिहास में बार बार होती रही हैं। आज तक हिन्दूओं ने अपने इतिहास से कुछ नहीं सीखा। 

इस्लाम ने हिन्दू धर्म की किसी भी आस्था और विशवास का आदर नहीं किया और इसी कारण दोनो ऐक दूसरे के विरोधी ही रहे हैं। भारत हिन्दूओं का जन्म स्थान था अतः जब भी सम्भव हुआ हिन्दूओं ने मुस्लिम शासन को भारत से उखाड देने के प्रयत्न भी कियेः-

  • राणा संग्राम सिहं कन्हुआ के युद्ध में मुग़ल आक्रान्ता बाबर को पराजित करने के निकट थे। बाबर ने सुलह का समय माँगा और मध्यस्थ बने राजा शिलादित्य को प्रलोभन दे कर उसी से राणा संग्राम सिहँ के विरुद्ध गद्दारी करवाई जिस के कारण राणा संग्राम सिहँ की जीत पराजय में बदल गयी। भारत में मुग़ल शासन स्थापित हो गया।
  • हेम चन्द्र विक्रमादितीय ने शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारी से दिल्ली का शासन छीन कर भारत में हिन्दू साम्राज्य स्थापित कर दिया था। अकबर की सैना को दिल्ली पर अधिकार करने से रोकने के लिये उस ने राजपूतों से जब सहायता माँगी तो राजपूतों ने उस के आधीन रहकर लडने से इनकार कर दिया था। पानीपत के दूसरे युद्ध में जब वह विजय के समीप था तो दुर्भाग्य से ऐक तीर उस की आँख में जा लगा। पकडे जाने के पश्चात घायल अवस्था में ही हेम चन्द्र विक्रमादितीय का सिर काट कर काबुल भेज दिया गया था और दिल्ली पर मुगल शासन दोबारा स्थापित हो गया।
  • महाराणा प्रताप ने अकेले दम से स्वतन्त्रता की मशाल जवलन्त रखी किन्तु राजपूतों में ऐकता ना होने के कारण वह सफल ना हो सके। अकबर और उस के पश्चात दूसरे मुगल बादशाहों ने भी राजपूतों को राजपूतों के विरुद्ध लडवाया और युद्ध जीते। अपने ही अपनों को मारते रहै।
  • महाराज कृष्ण देव राय ने दक्षिण भारत के विजयनगर में ऐक सशक्त हिन्दू साम्राज्य स्थापित किया था किन्तु बाहम्नी के छोटे छोटे सुलतानों ने ऐकता कर के विजयनगर पर आक्रमण किया। महाराज कृष्ण देव राय अपने ही निकट सम्बन्धी की गद्दारी के कारण पराजित हो गये और विजयनगर के सम्रद्ध साम्राज्य का अन्त हो गया। 
  • छत्रपति शिवाजी ने दक्षिण भारत में हिन्दू साम्राज्य स्थापित किया। औरंगज़ेब ने मिर्जा राजा जयसिहँ की सहायता से शिवा जी को सन्धि के बहाने दिल्ली बुलवा कर कैद कर लिया था। सौभागय से शिवाजी कैदखाने से निकल गये और फिर उन्हों ने औरंगजेब को चैन से जीने नहीं दिया। शिवाजी की मृत्यु पश्चात औरंगजेब ने शिवाजी के पुत्र शम्भा जी को भी धोखे से परास्त किया और अपमान जनक ढंग से यातनायें दे कर मरवा दिया।
  • गुरु गोबिन्द सिहं नेसवा लाख से ऐक लडाऊँ” के मनोबल के साथ अकेले ही मुगलों के अत्याचारों का सशस्त्र विरोध किया किन्तु उन्हें भी स्थानीय हिन्दू राजाओं का सहयोग प्राप्त नही हुआ था। दक्षिण जाते समय ऐक पठान ने उन के ऊपर घातक प्रहार किया जिस के ऊपर उन्हों ने पूर्व काल में दया की थी। उत्तरी भारत में सोये हुये क्षत्रित्व को झकझोर कर जगानें और सभी वर्गों को वीरता के ऐक सूत्र में बाँधने की दिशा में गुरु गोबिन्द सिहं का योगदान अदिूतीय था।

अपने ही देश में आपसी असहयोग और अदूरदर्शता के कारण हिन्दू बेघर और गुलाम होते रहै हैं। विश्व गुरु कहलाने वाले देश के लिये यह शर्म की बात है कि समस्त विश्व में अकेला भारत ही ऐक देश है जो हजार वर्ष तक निरन्तर गुलाम रहा था। गुलामी भरी मानसिक्ता आज भी हमारे खून मे समाई हुयी है जिस कारण हम अपने पूर्व-गौरव को अब भी पहचान नहीं सकते। 

खालसा का जन्म

मुगल बादशाह औरंगजेब ने भारत के इस्लामी करण की गतिविधियाँ तीव्र कर दीं थी। औरंगजेब को उस के सलाहकारों ने आभास करवा दिया गया था कि यदि ब्राह्मण धर्म परिवर्तन कर के मुस्लमान हो जायें गे तो बाकी हिन्दू समाज भी उन का अनुसरण करे गा। अतः औरंगजेब के अत्याचारों का मुख्य लक्ष्य हिन्दू समाज के अग्रज ब्राह्मण थे।

कशमीर के विक्षिप्त ब्राह्मणों ने गुरु तेग़ बहादुर से संरक्षण की प्रार्थना की। गुरु तेग़ बहादुर अपने स्पुत्र गोविन्द राय को उत्तराधिकारी नियुक्त कर के औरंगजेब से मिलने दिल्ली पहुँचे किन्तु औरंगजेब ने उन्हे उन के शिष्यों समेत बन्दी बना कर उन्हें अमानवी यातनायें दीं और  गुरु तेग़बहादुर का शीश दिल्ली के चाँदनी चौक में कटवा दिया था। 

पिता की शहादत का समाचार युवा गुरु गोविन्द राय के पास पहुँचा। उन्हों ने 30 मार्च 1699 को आनन्दपुर साहिब में ऐक सम्मेलन किया और अपने शिष्यों की आत्मा को झंझोड कर धर्म रक्षा के लिये प्ररेरित किया। जन सभा में अपनी तलवार निकाल कर उन्हों ने धर्म-रक्षार्थ बलि देने के लिये ऐक शीश की माँग की। थोडे कौहतूल के पश्चात ऐक वीर उठा जिसे गुरु जी बलि देने के लिये ऐक तम्बू के भीतर ले गये। थोडे समय पश्चात खून से सनी तलवार हाथ में ले कर गुरु जी वापिस आये और संगत से ऐक और सिर बलि के लिये माँगा। उसी प्रकार बलि देने के लिये गुरु जी पाँच युवाओं को ऐक के बाद ऐक तम्बू के भीतर ले गये और हर बार रक्त से सनी हुई नंगी तलवार ले कर वापिस लौटे। संगत में भय, हडकम्प और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गय़ी और लोग डर के इधर उधर खिसकने लगे। तब अचानक श्वेत वस्त्र पहने पाँचों युवाओं के साथ गुरु जी तम्बू से बाहर निकल आये।

जनसभा में गुरू जी ने पाँचो वीरों को ‘अमृत छका कर’ अपना शिष्य घोषित किया और उन्हे ‘खालसा’ (पवित्र) की उपाधि प्रदान कर के कहा कि प्रतीक स्वरूप पाँचों शिष्य उन के विशेष अग्रज प्रियजन हों गे। तब उन नव खालसों को कहा कि वह अपने गुरु को भी ‘अमृत छका कर’ खालसा समुदाय में सम्मिलित कर लें। इस प्रकार ‘खालसा-पँथ’ का जन्म हुआ था। आज भी प्रतीक स्वरूप सिखों के धार्मिक जलूसों की अगुवाई ‘पाँच-प्यारे’ ही करते हैं।

व्यवसाय की श्रेणी से उऩ पाँच युवकों में ऐक क्षत्रिय जाति का दुकानदार था, ऐक जाट कृष्क, ऐक छिम्बा धोबी, ऐक कुम्हार, तथा ऐक नाई था किन्तु गुरु जी ने व्यवसायिक जाति की सीमाओं को तोड कर उन्हें ‘धार्मिक ऐकता’ के सूत्र में बाँध दिया और आदेश दिया कि वह अपने नाम के साथ ‘सिहँ’ (सिंघ) जोडें। उन्हें किसी का ‘दास’ कहलाने की जरूरत नहीं। गुरु गोविन्द राय ने भी अपना नाम गोबिन्द सिंहँ रख लिया। महिलाओं के योगदान को महत्व देते हुये उन्हों ने आदेश दिया कि सभी स्त्रियाँ अपने नाम के पीछे राजकीय सम्मान का सूचक ‘कौर’ (कुँवर) शब्द लगायें। दीनता और दासता की अवस्था में गिरे पडे हिन्दू समाज को इस प्रकार के मनोबल की अत्यन्त आवशयक्ता थी जो गुरु जी ने अपने मार्ग दर्शन से प्रदान की। 

दूरदर्शता और प्रेरणा के प्रतीक गुरु गोबिन्द सिहँ ने अपने नव निर्मित शिष्यों को ऐक विशिष्ट ‘पहचान’ भी प्रदान की ताकि उन का कोई भी खालसा शिष्य जोखिम के सामने कायर बन कर धर्म और शरणागत की रक्षा के कर्तव्य से अपने आप को छिपा ना सके और अपने आप चुनौती स्वीकार करे। अतः खालसा की पहचान के लिये उन्हें पाँच प्रतीक ‘चिन्ह’ धारण करने का आदेश भी दिया था। सभी चिन्ह ‘क’ अक्षर से आरम्भ होते हैं जैसे कि केश, कँघा, कछहरा, कृपाण, और कडा। इन सब का महत्व था। वैरागियों की भान्ति मुण्डे सिरों के बदले अपने शिष्यों को राजसी वीरों की तरह केश रखने का आदेश दिया, स्वच्छता के लिये कँघा, घोडों पर आसानी से सवारी कर के युद्ध करने के लिये कछहरा (ब्रीचिस), कृपाण (तलवार) और अपने साथियों की पहचान करने के लिये दाहिने हाथ में फौलाद का मोटा कडा पहनने का आदेश दिया।

हिन्दू समुदाय को जुझारू वीरता से जीने की प्ररेणा का श्रेय दसवें गुरु गोबिन्द सिहँ को जाता है। केवल भक्ति मार्ग अपना कर पलायनवाद की जगह उन्हें ‘संत-सिपाही’ की छवि में परिवर्तित कर के कर्मयोग का मार्ग अपनाने को लिये प्रोत्साहित किया। अतः उत्तरी भारत में सिख समुदाय धर्म रक्षकों के रूप में उभर कर मुस्लिम जुल्म के सामने चुनौती बन कर खडा हो गया।

इस्लामी शासन का अंत

औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात भारत में  कोई शक्तिशाली केन्द्रीय शासक नही रहा था। मुगलों में उत्तराधिकार का युद्ध लगभग 150 वर्ष तक चलता रहा। थोडे थोडे समय के लिये कई निकम्मे बादशाह आये और आपसी षटयन्त्रों के कारण चलते बने। दक्षिण तथा पूर्वी भारत योरुपीय उपनेष्वादी सशक्त व्यापारिक कम्पनियों के आधीन होता चला गया। कई मुगलिया सामन्त और सैनानायक स्वयं सुलतान बन बैठे और उपनेष्वादी योरुपियन कम्पनियों के हाथों कठपुतलियों की तरह ऐक दूसरे को समाप्त करते रहै। ऐकता, वीरता तथा देश भक्ति का सर्वत्र अभाव था। मकबरों, हरमों, तथा वैशियाओं के कोठों के साये मे बैठ कर तीतर बटेर लडवाना और फिर उन्हें भून कर खा जाना शासकों की की दिनचर्या बन चुकी थी। असुरक्षा, अशिक्षता, गरीबी, अज्ञान, अकाल, महामारियों की भरमार हो गयी और ‘सोने की चिडिया’ कहलाने वाला भारत मुस्लिम शासन के फलस्वरूप सपेरों और लुटेरो के देश की छवि ग्रहण करता गया।

इसी बीच ईरान से नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे लुटेरों ने भारत आकर बची खुची धन सम्पदा लूटी और हिन्दूओं का कत्लेआम करवाया। हिन्दुस्तान का संरक्षक कोई नहीं था। मुगल शासन केवल लालकिले की चार दिवारी में ही सिमट चुका था अन्य सर्वत्र जगह अन्धकार था। भारत जिस की लाठी उस की भैंस के सिद्धान्त पर चलने लग पडा था। 

हिन्दू मुस्लिम साँझी संस्कृति का भ्रम 

इस्लाम से पूर्व जो कोई भी मानव समुदाय बाहर से आये थे, भारत वासियों ने उन सभी का सत्कार किया था, और उन के साथ ज्ञान, विज्ञान, कला दार्शनिकता का आदान प्रदान भी किया। कालान्तर वह सभी भारतीय संस्कृति से घुल मिल गये। उन सभी ने भारत को अपना देश माना। मुसलमानों की दशा इस से भिन्न थी। प्रथम तो वह स्थानीय लोगों के साथ मिल जुल कर रहने के लिये नहीं आये थे बल्कि वह भारत में आक्रान्ताओं और लुटेरों की तरह आये। उन का स्पष्ट और पूर्व घोषित मुख्य उद्देश काफिरों को समाप्त कर के इस्लामी राज्य कायम करना था जिस के चारमुख्य आधार स्तम्भ थे ‘जिहाद’, ‘तलवार’, ‘गुलामी’ और ‘जज़िया’। उन का लक्ष्य था ‘स्वयं जियो मगर दूसरों को मत जीने दो’।

भारत की स्वतन्त्र, ज्ञानवर्ती विचारधारा, तथा सत्य अहिंसा की सोचविचार के सामने इस्लामी कट्टरवाद, वैचारिक प्रतिबन्ध, तथा क्रूरतम हिंसा भारत के निवासियों के लिये पूर्णत्या नकारात्मिक थी। उन के साथ सम्बन्धों का होना अपने विध्वंस को न्योता देने के बराबर था। हिन्दू समाज का कोई भी कण मुस्लिम विचारधारा और जीवन शैली के अनुकूल नहीं था। अतः हिन्दू मुस्लिम विलय की प्रतिक्रिया का सम्पूर्ण अभाव दोनो तरफ निशचित था। वह भारत में सहयोग अथवा प्रयोग वश नहीं आये थे केवल उसे हथियाने लूटने और हिन्दू सभ्यता को बरबाद करने आये थे। लक्ष्य हिन्दूओं को मित्र बनाना नहीं था बल्कि उन्हें गुलाम, या मुस्लमान बनाना था या फिर उन्हें कत्ल करना था।

जब तक मुस्लमान अपनी विचारधारा और जीवन शैली का प्रचार विस्तार अपने जन्म स्थान अरब देशों तक सीमित रखते रहे हिन्दूओं को उन के साथ कोई आपत्ति या अवरोध नहीं था। किन्तु जब उन्हों ने अपना विधान भारत वासियों पर जबरन थोपना चाहा तो संघर्ष लाज़मी था। वह जियो और जीने दो में विशवास ही नहीं करते थे जो भारतीय परम्परा का मूल आधार है। इन कारणों से इस्लाम भारत में अस्वीकारनीय हो गया।हिन्दू मुस्लिम साँझी संस्कृति ऐक राजनैतिक छलावा या भ्रम से अधिक कुछ नहीं है जिस की तुलना आग और पैट्रोल से ही करी जा सकती है।

चाँद शर्मा

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