हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


15 अगस्त 1947 के मनहूस दिन अंग्रेजों ने भारत हिन्दूओं तथा मुस्लमानों के बीच में बाँट दिया। जिन मुठ्ठी भर मुस्लिम आक्रान्ताओं ने तलवार के साये में स्थानीय लोगों का धर्म परिवर्तन करवा कर अपनी संख्या बढायी थी, उन्हीं के लिये भारत का ऐक तिहाई भाग मूल वासियों से छीन कर मुस्लमानों को दे दिया गया। आक्रान्ताओं ने शताब्दियों पुराने हिन्दुस्तानी मूल वासियों को उन के रहवासों से भी खदेड दिया। भारत की सीमायें ऐक ही रात में अन्दर की ओर सिमिट गयीं और हिन्दूओं की इण्डियन नेशनेलिटीके बावजूद उन्हें पाकिस्तान से  हिन्दू धर्म के कारण स्दैव के लिये निकालना पडा। कितने ही स्त्री-पुरुषों और बच्चों को उन के परिवार जनों के सामने ही कत्ल कर दिया गया और कितनी ही अबलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किये गये लेकिन उस समय और उस के बाद भी मानव अधिकारों पर भाषण देने वाले आज भी चुप्पी साधे हुये हैं। अतः यह प्रमाणित है कि व्यक्तिगत धर्म की पहचान ‘राष्ट्रीयता’ की खोखली पहचान पर हमैशा भारी पडती है।

धर्म राष्ट्रीयता से ऊपर 

य़ह दोहराना प्रासंगिक होगा कि “राष्ट्रीयता” जीवन में कई बार बदली जा सकती है किन्तु पूर्वजों का “धर्म” जीवन पर्यन्त और जीवन के बाद भी पहचान स्वरूप रहता है। धर्म के कारण ही हिन्दूओं को भारत के ऐक भाग से अपने बसे बसाये घरों को छोड कर दूसरे भाग में जा कर बे घर होना पडा था क्यों कि बटवारे के बाद वह भाग ‘पाकिस्तानी राष्ट्र’ बन गया था। हमारे हिन्दू पूर्वजों ने धर्म की खातिर अपने घर-बार और जीवन के सुखों को त्याग कर गर्व से कहा था कि ‘हम जन्म से अन्त तक केवल हिन्दू हैं और हिन्दू ही रहें गे ’। लेकिन बदले में हिन्दूओं के साथ काँग्रेसी नेताओं ने फिर छल ही किया।

हिन्दूओं के लिये स्वतन्त्रता भ्रम मात्र

15 अगस्त 1947 को केवल ‘सत्ता का बदालाव’ हुआ था जो अंग्रेजों के हाथों से उन्हीं के ‘पिठ्ठुओं’ के हाथ में चली गयी थी। गाँधी और नेहरू जैसे नेताओं के साथ विचार विमर्श करने में अंग्रेजी प्रशासन को ‘अपनापन’ प्रतीत होता था। उन्हें अंग्रेजी पत्रकारों ने विश्व पटल पर ‘प्रगतिशील’ और ‘उदारवादी’ प्रसारित कर रखा था। साधारण भारतीयों के सामने वह अंग्रेजी शासकों की तरह के ही ‘विदूान’ तथा ‘कलचर्ड लगते थे। जब वह भारत के नये शासक बन गये तो उन्हों ने अंग्रेजी परम्पराओं को ज्यों का त्यों ही बना रहने दिया। अंग्रेजों के साथ तोल-मोल करते रहने के फलस्वरूप शहीदों के खून से सींची तथाकथित ‘आजादी’ की बागडोर काँग्रेसी नेताओं के हाथ लग गयी। 

काँग्रेसी नेताओं ने दिखावटी तौर पर बटवारे को ‘स्वीकार नहीं किया’ और ‘हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे’ की दुहाई देते रहे। उन्हों ने बटवारे की जिम्मेदारी का ठीकरा मुहमम्द अली जिन्हा तथा हिन्दूवादी नेताओं के सिर पर फोडना शुरु कर दिया और उन्हें ‘फिरकापरस्त’ कह कर स्वयं ‘हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई’  के राग अलापते रहे। उसी प्रकार वह आज तक अपने दिखावटी आदर्शवाद से यथार्थ को छिपाने का असफल प्रयत्न करते रहे हैं। भारत वासियों को भ्रम में डालने के लिये काँग्रेस ने भारत को ऐक ‘धर्म-निर्पेक्ष’ देश घोषित कर दिया और हिन्दुस्तान में रहने वाले आक्रान्ताओं को बचे खुचे हिन्दू भाग का फिर से हिस्सेदार बना दिया।

भारत का बटवारा किसी ‘नस्ल’ अथवा ‘रंग-भेद’ के आधार पर नहीं हुआ था। बटवारे का कारण मुस्लमानों की हिन्दू परम्पराओं के प्रति घृणा और परस्परिक अविशवास था। चतुराई से पाकिस्तान ने हिन्दूओं को अपने देश से निकाल कर, या फिर उन्हें जबरदस्ती मुस्लमान बना कर हिन्दू-मुस्लिम समस्या का हमेशा के लिये समाधान कर लिया किन्तु भारत के काँग्रेसी नेताओं ने समस्या को कृत्रिम ढंग से छुपा कर उसे फिर से जटिल बनने दिया। सरकार धर्म-निर्पेक्ष होने का ढोंग तो करती रही किन्तु निजि जीवन में हिन्दू और मुस्लमान अपने अपने धर्म तथा उन से जुडी आस्थाओं, परम्पराओं से विमुख नहीं हुए थे। गाँधी जी नित्य “ईश्वर आल्लाह तेरो नाम” का राग अपनी प्रार्थना सभाओं में आलापते थे। हिन्दूओं ने तो इस गीत को मन्दिरों में गाना शुरू कर दिया था परन्तु किसी मुस्लमान को आज तक मस्जिद में “ईश्वर आल्लाह तेरो नाम” का गीत गाते कभी नहीं देखा गया। यथार्थ में स्वतन्त्रता के बदले हिन्दूओं की भारत में बसे हुए मुस्लमानों को संतुष्ट रखने की ऐक ज़िम्मेदारी और बढ गयी थी।

बटवारे पश्चात दूरगामी भूलें

हिन्दूओं ने स्वतन्त्रता के लिये कुर्बानियाँ दीं थी ताकि ऐक हजार वर्ष की गुलामी से मुक्ति होने के पश्चात वह अपनी आस्थाओं और अपने ज्ञान-विज्ञान को अपने ही देश में पुनः स्थापित कर के अपनी परम्पराओॆ के अनुसार जीवन व्यतीत करें। किन्तु आज बटवारे के सात दशक पश्चात भी हिन्दूओं को अपने ही देश में सिमिट कर रहना पड रहा है ताकि यहाँ बसने वाले अल्प-संख्यक नाराज ना हो जायें। हिन्दू धर्म और हिन्दूओं का प्राचीन ज्ञान आज भी भारत में उपेक्षित तथा संरक्षण-रहित है जैसा मुस्लिम और अंग्रेजों के शासन में था। हिन्दूओं की वर्तमान समस्यायें उन राजनैतिक कारणों से उपजी हैं जो बटवारे के पश्चात भारत के काँग्रेसी शासकों ने अपने निजि स्वार्थ के कारण पैदा किये।

पूर्वजों की उपेक्षा

इस्लामी शासकों के समय भी हमारे देश को ‘हिन्दुस्तान’ के नाम से जाना जाता था।  बटवारे के पश्चात नव जात पाकिस्तान नें अपने ‘जन्म-दाता’ मुहमम्द अली जिन्नाह को “कायदे आजिम” की पदवी दी तो उस की नकल कर के जवाहरलाल नेहरू ने भी मोहनदास कर्मचन्द गाँधी को भारत के “राष्ट्रपिता” की उपाधि दे डाली। भारत बीसवी शताब्दी के पाकिस्तान की तरह का कोई नव निर्मित देश नहीं था। हमारी राष्ट्रीयता तो हिमालय से भी प्राचीन थी। किन्तु नेहरू की उस ओछी और असंवैधानिक हरकत के कारण भारत वासियों के प्राचीन काल के सभी सम्बन्ध मानसिक तौर पर टूट गये और हम विश्व के सामने नवजात शिशु की तरह नये राष्ट्रपिता का परिचय ले कर घुटनों के बल चलने लगे। पूर्वजों के ज्ञान क्षेत्र की उपलब्द्धियों को नेहरू ने “गोबरयुग” (काऊडंग ऐज) की उपाधि दे डाली। वह ऐक सोची समझी साजिश थी जिस से अब पर्दा उठ चुका है।

मैकाले की शिक्षा नीति के क्रम को आगे बढाते हुये, नेहरू ने मौलाना अबुअल कलाम आज़ाद को देश का शिक्षा मन्त्री नियुक्त दिया। हिन्दू ग्रन्थ तो इस्लामी मौलानाओं की दृष्टी में पहले ही ‘कुफर’ की श्रेणी में आते थे इस लिये धर्म निर्पेक्षता का बहाना बना कर काँग्रेसी सरकार ने भारत के प्राचीन ग्रन्थों को शैक्षशिक प्रतिष्ठानों से ‘निष्कासित’ कर दिया। नेहरू की दृष्टि में नेहरू परिवार के अतिरिक्त कोई शिक्षशित और प्रगतिशील कहलाने के लायक नहीं था इसी लिये मौलाना आज़ाद के पश्चात हुमायूँ कबीर और नूरुल हसन जैसे शिक्षा मन्त्रियों की नियुक्ति से हमारे अपने ज्ञान-विज्ञान के प्राचीन ग्रन्थ केवल ‘साम्प्रदायक हिन्दू साहित्य’ बन कर शिक्षा के क्षेत्र में उपेक्षित हो गये।

इतिहास से छेड़ छाड़

मुस्लमानों ने भारत के ऐतिहासिक पुरातत्वों को नष्ट किया था। उन से ऐक कदम आगे चल कर अँग्रेजों ने अपने राजनैतिक स्वार्थ के कारण हमारे इतिहास का भ्रमात्मिक सम्पादन भी किया था – किन्तु बटवारे के पश्चात काँग्रेसी शासकों ने इतिहास को ‘धर्म-निर्पेक्ष बनाने के लिये’  ऐतिहासिक तथ्यों से छेड छाड करनी भी शुरू कर दी। प्राचीन ज्ञान विज्ञान के ग्रन्थों, वेदों, उपनिष्दों, दर्शन शास्त्रों और पौराणिक साहित्य को हिन्दूओं का अन्धविशवास बता कर शिक्षा के क्षेत्र से निष्कासित कर के पुजारियों के हवाले कर दिया गया। देश भक्त हिन्दू वीरों तथा महानायकों के आख्यानों को साम्प्रदायक साहित्य की श्रेणी में रख दिया गया और उन के स्थान पर मुस्लिम आक्रान्ताओं को उदारवादी, धर्म निर्पोक्ष और राष्ट्रवादी की छवि में रंगना पोतना शुरु कर दिया ताकि धर्म निर्पेक्षता का सरकारी ढोंग चलता रहे। इतना ही नहीं गाँधी-नेहरू परिवार को छोडकर सभी शहीदों के योगदान की इतिहास में अनदेखी होने लगी। जहाँ तहाँ नेहरू-गाँधी परिवारों के समारक ही उभरने लगे। उन्ही के नाम से बस्तियों, नगरों, मार्गों, और सरकारी योजनाओं का नामाकरण होने लग गया और वही क्रम आज भी चलता जा रहा है।

मुस्लिमों के साधारण योगदान को ‘महान’ दिखाने की होड में तथ्यों को भी तोडा मरोडा गया ताकि वह राष्ट्रवादी और देश भक्त दिखें। आखिरी मुगल बहादुरशाह ज़फ़र को 1857 का ‘महानायक’ घोषित कर दिया गया जब कि वास्तविकता इस के उलट थी। जब सैनिक दिल्ली की रक्षा करते हुये अपना बलिदान दे रहे थे तो बहादुरशाह जफर अपने मुन्शी रज्जब अली को मध्यस्थ बना कर अपने निजि बचाव की याचना करने के लिये गुप्त मार्ग से हुमायूँ के मकबरे जा पहुँचा था और अंग्रेजों ने उसे गिरफ्तार कर लिया था।

बौद्धिक सम्पदा की उपेक्षा

अंग्रेजी तथा धर्म निर्पेक्ष शिक्षा नीति के कारण आज हिन्दू नव युवकों की नयी पीढी अपने पूर्वजों की कुर्बानियों और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र की उपलब्द्धियों से बिलकुल अनजान बन चुकी है। दुष्प्रचार के कारण हिन्दू युवा पीढी अपने पूर्वजों को अन्धविशवासी और दकियानूस ही समझती है। सरकारी धर्म निर्पेक्ष बुद्धिजीवियों का शैक्षिक संस्थानों पर ऐकाधिकार है किन्तु उन का भारतीय संस्कृति के प्रति कोई लगाव नहीं। उन के मतानुसार अंग्रेजी शिक्षा से पहले भारत में कोई शिक्षा प्रणाली ही नहीं थी। कानवेन्टों तथा अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों से प्रशिक्षित स्भ्रान्त वर्ग, भारतीय जीवन शैली तथा प्रम्पराओं की अवहेलना और आलोचना करनें को ही अपनी ‘प्रगतिशीलता’ मानता है और हिन्दू धारणाओं का उपहास करना अपनी शान समझता है। 

ऐसी तुच्छ मानसिक्ता के कारण विश्व में आज भारत के सिवाय अन्य कोई देश नहीं जहाँ के नागरिकों की दिनचर्या अपने देश की संस्कृति तथा पूर्वजों की उपलब्द्धियों का उपहास उडाना मात्र रह गयी हो। उन के पास स्वदेश प्रेम और स्वदेश गौरव की कोई भी समृति नहीं है। यदि कोई किसी प्राचीन भारतीय उप्लब्द्धि का ज़िक्र भी करे तो उस का वर्गीकरण फिरकापरस्ती, दकियानूसी, भगवावाद या हिन्दू शावनिज़म की परिभाषा में किया जाता है। 

हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी भारतीय ग्रन्थों को बिना पढे और देखे ही नकार देना अपनी योग्यता समझते हैं जो वास्तव में उन की अनिभिज्ञ्यता और आत्महीनता का प्रमाण है। यह नितान्त दुःख की बात है कि जो भारतीय ग्रन्थ विश्वविद्यालयों की शोभा बनने लायक हैं वह बोरियों में बन्द कर के किसी ना किसी निर्धन पुजारी के घर या किसी धनी के भवन की बेसमेन्ट में रखे हों गे। कुछ ग्रन्थों को विदेशी सैलानी एनटीक बना कर जब भारत से बाहर ले जाते हैं तो कभी कभार उन में संचित ज्ञान भी विश्व पटल पर विदेशी मुहर के साथ प्रमाणित हो जाता है।

यदि धर्म निर्पेक्षता का कैंसर इसी प्रकार चलता रहा तो थोडे ही समय पश्चात भारतीय ग्रन्थों को पढने तथा संस्कृत सीखने के लिये जिज्ञासुओं को आक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज आदि विश्वविद्यालयों में ही जाना पडे गा। धर्म निर्पेक्षता के बहाने विद्यालयों में हिन्दू जीवन की नैतिकता तथा दार्शनिक्ता का आज कोई महत्व नहीं रह गया है। इस की तुलना में कट्टरपंथी अल्पसंख्यकों की धार्मिक शिक्षा भारत में सरकारी खर्चों पर मदरस्सों तथा अल्प संख्यक विश्वविद्यालयों में उपलब्द्ध है जिस का बोझ हिन्दू कर दाताओं पर पडता है। 

आत्म-घाती धर्म निर्पेक्षता का ढोंग

भूगोलिक दृष्टि से भारत के चारों ओर कट्टरवादी मुस्लिम देश हैं जिन की सीमायें भारत के साथ लगती हैं। उन देशों में इस्लामी सरकारें हैं जहाँ धर्म निर्पेक्षता का कोई महत्व नहीं। इस्लामी सरकार का रुप-स्वरुप स्दैव हिन्दू विरोधी होता है। उन्हों ने अपने देश के दरवाजों को गैर मुस्लिमों के लिये बन्द कर रखा है। उन के सामाजिक रीति-रीवाजों तथा परम्पराओं का हिन्दू संस्कृति से कोई सम्पर्क नहीं। उन की स्दैव कोशिश रहती है कि प्रत्येक गैर मुस्लिम देश को इस्लामी देश बनाया जाये य़ा नष्ट कर दिया जाय। ऐसी स्थिति की तुलना में हिन्दूओं ने अपने इतिहास तथा अनुभवों से कुछ नहीं सीखा और पुरानी गलतियों को बार बार दोहराते जा रहे हैं।

आज भी हिन्दू धर्म निर्पेक्षता की आड लेकर पलायनवाद में लिप्त हैं। हम ने अपनी सीमायें सभी के लिये खोल रखी हैं। भारत के काँग्रेसी नेताओं ने ‘वोट-बेंक’ बनाने के लिये ना केवल पाकिस्तान जाने वाले मुस्लमानों को रोक लिया था बल्कि जो मुस्लमान उधर जा चुके थे उन को भी वापिस बुला कर भारत में ही बसा दिया था। वही स्वार्थी नेता आज भी अल्पसंख्यकों को प्रलोभनों से उकसा रहै हैं कि भारत के साधनों पर हिन्दूओं से पहले उन का ‘प्रथम अधिकार’ है।

सभी नागरिकों में देश के प्रति प्रेम और एकता की भावना समान नहीं होती। कुछ नियमों की पूर्ति करने के पश्चात कोई भी व्यक्ति किसी भी देश की ‘नागरिक्ता’ तो प्राप्त कर सकता है किन्तु व्यक्ति की निजी अनुभूतियाँ, आस्थायें, परम्परायें, और नैतिक मूल्य ही उसे भावनात्मिक तौर पर उस देश की संस्कृति से जोडते हैं। हम ने कभी भी यह आंकने की कोशिश नहीं की कि अल्पसंख्यकों ने किस सीमा तक धर्म-निर्पेक्षता को अपने जीवन में अपनाया है। हमारी धर्म निर्पेक्षता इकतरफा हिन्दूओं पर ही लादी जाती रही है।

हिन्दूओं का शोषण

अतः बलिदानों के बावजूद हिन्दूओं को केवल बटवारा ही हाथ लगा, और वह अपने ही देश में राजकीय संरक्षण तथा सहयोग से वंचित हो कर परायों की तरह जी रहै हैं। ऐक तरफ उन्हें अपने ही दम पर समृद्ध इसाई धर्म के ईसाईकरण अभियान का सामना करना है तो दूसरी ओर उन्हें क्रूर इस्लामी उग्रवाद का मुकाबला करना पड रहा है जिन को पडौसी सरकारों के अतिरिक्त कुछ स्थानीय तत्व भी सहयोग देते हैं। इन का सामना करने में जहाँ धर्म निर्पेक्षता का ढोंग करने वाली भारतीय सरकार निरन्तर कतराती रही है, वहीं अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिये हिन्दूओं की मान मर्यादाओं की बलि सरकार तत्परता से देती रहती है।

यह तो ऐक कठोर सत्य है कि हिन्दू तो स्वयं ही अपनी दयानीय स्थिति के लिये ज़िम्मेदार हैं, परन्तु इस के अतिरिक्त वह हिन्दू विरोधी तत्वों की गुटबन्दी का सामना करने में भी पूर्णत्या असमर्थ हैं जिन्हें देश के स्वार्थी राजनेताओं से ही प्रोत्साहन मिल रहा है।

चाँद शर्मा

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