हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


बटवारे के पश्चात हिन्दू समाज की सब से अधिक हानि काँग्रेसी सरकार की आरक्षण नीति से हुई है। वैसे तो संविधान में सभी नागरिकों को ‘बराबरी’ का दर्जा दिया गया था किन्तु कुछ वर्गों ने आरक्षण की मांग इस लिये उठाई थी कि जब तक वह ‘अपने यत्न से’ अन्य वर्गों के साथ कम्पीटीशन करने में सक्षम ना हो जायें उन्हें कुछ समय के लिये सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया जाये। हिन्दू विरोधी गुटों के दुष्प्रचार के कारण वह अपने आप को हिन्दू समाज में वर्ण व्यवस्था के कारण ‘शोषित’ या ‘दलित’ समझ बैठे थे। अब हिन्दू समाज का विघटन करने के लिये आरक्षण को ऐक राजनैतिक अस्त्र की तरह प्रयोग किया जा रहा है।  

विशिष्ट वर्ग

वैधानिक तौर पर अब कोई भी वर्ग भारत में ‘शोषित’, ‘दलित,’ या ‘उपेक्षित’ नहीं है। पहले भी नहीं था। सभी को अपनी प्रगति के लिये परिश्रम तो स्वयं करना ही होगा किन्तु जाति के आधार पर अब आरक्षित वर्ग दूसरे वर्गों की अपेक्षा ‘विशिष्ट वर्ग’ बनते चले जा रहै हैं। अधिक से अधिक वर्ग अपने आप को शोषित तथा उपेक्षित साबित करने में जुट रहै हैं और आरक्षित बन कर विशिष्ट व्यवहार की मांग करने लग पडे हैं।

आरम्भ में शिक्षालयों तथा निम्न श्रेणी के पदों में जन्म जाति के आधार पर कुछ प्रतिशत स्थान आरक्षित किये गये थे। उस के लिये समय सीमा 1950 से आगे दस वर्ष (1960) तक थी। राजनेताओं ने अपने लिये ‘वोट बैंक’ बनाने के लिये समय सीमा समाप्त होने के पश्चात ना केवल समय सीमा आगे बढा दी बल्कि संख्या तथा आरक्षण पाने वाले वर्गों में वृद्धि की मांग भी निरन्तर करनी आरम्भ कर दी।

इस के अतिरिक्त पदोन्नति के क्षेत्र में भी जिन पदों के लिये निशचित कार्य क्षमता के आधार पर पदोन्नति की व्यव्स्था होनी चाहिये, उन्हें भी आरक्षण के आधार से भरा जाने लगा। इस का सीधा तात्पर्य योग्यता के माप दण्डों को गिरा कर कुछ विशेष लोगों को जाति के आधार पर पुरस्किरत करना मात्र रह गया है। समय के के साथ साथ भारत में ऐक ऐसा वर्ग पैर पसारने लगा है जो अपने आप को शोषित, उपेक्षित तथा पिछडा हुआ बता कर योग्यता के बिना ही विश्ष्टता की श्रेणी में घुसने लगा है। 

अब तो मुस्लिम तथा इसाई भी अपने लिये आरक्षण की मांग करने लगे हैं। वह भूल गये हैं कि बीते कल तक वह हिन्दू धर्म को जातिवादी वर्गीकरण के कारण बदनाम कर रहै थे तथा हिन्दूओं को अपने धर्म परिवर्तन का प्रलोभन इसी आधार पर दे रहे थे कि उन के धर्म में सभी बराबर हैं। यह दोगली चाल आरक्षण नीति की उपज है जिस के कारण हिन्दू समाज को अकसर बलैकमेल किया जाता रहा है। 

आधार हीन दुष्प्रचार    

अहिन्दू धर्म धडल्ले से प्रचार करते रहै हैं कि उन के धर्म में जाति के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जाता। यदि उन के इसी प्रचार को ‘सत्य’ माने तो जो कोई भी अहिन्दू धर्म को मानता है या जो हिन्दू अपना धर्म छोड कर इसाई या मुस्लिम परिवर्तित हों जाते हैं उन को आरक्षण का लाभ बन्द हो जाना चाहिये क्यों कि उन्हें तथाकथित ‘हिन्दू शोषण’ से मुक्ति मिल जाती है और नये धर्म में जाने के पश्चात उन की प्रगति ‘अपने आप ही बिना परिश्रम किये’ होती जाये गी। इस से दुष्प्रचार की वास्तविक्ता अपने आप उजागर हो जाये गी।

इसाई तथा इस्लामी देशों के पास जमीन तथा संसाधन बहुत हैं। यदि वास्तव में वह हिन्दू शोषितों के लिये ‘चिन्तित’ हैं तो उन्हें शोषितों का धर्म परिवर्तन करवाने के बाद अपने देशों में बसा लेना चाहिये। इस प्रकार के धर्म परिवर्तन से किसी हिन्दू को कोई आपत्ति नहीं हो गी। अमेरिका, योरुप, आस्ट्रेलिया, मध्य ऐशिया आदि देशों में उन लोगों को बसाने की व्यव्स्था करी जा सकती है जहाँ पर इसाई तथा इस्लाम धर्मों ने जन्म लिया था। परन्तु धर्मान्तरण करने वाले वैसा नहीं करते। वह तो भारत से हिन्दू वर्ग को कम करके यहां इसाई और इस्लामी संख्या बढा कर भारत की धरती पर अपना अधिकार करना चाहते हैं।

भेद-भाव रहित वातावरण

 वैधानिक दृष्टि से भारत में सभी नागरिक अपनी योग्यता तथा क्षमता के आधार पर किसी भी शैक्षिक संस्थान में प्रवेश पा सकते हैं। यदि आरक्षण पूर्णत्या समाप्त कर दिये जायें तो सभी शिक्षार्थी समान शुल्क दे कर समान परिक्रिया से उच्च शिक्षा पा सकें गे। यदि संस्थानों की संख्या बढा दी जाये तो कोई भी वर्ग उच्च शिक्षा से वंचित नहीं रहे गा। अगर पिछडे इलाकों में संस्थानों की संख्या में वृद्धि करी जाये तो प्रत्येक नागरिक बिना भेदभाव के अपनी योग्यता के आधार पर प्रगति कर सकता है। आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है।

प्राकृतिक असमान्तायें

विकसित सभ्यताओं में ज्ञान, शिक्षा, सामाजिक योग्दान, समर्थ तथा क्षमता के आधार पर सामाजिक वर्गीकरण का होना प्रगतिशीलता की निशानी है। सामाजिक प्रधानतायें प्रत्येक समाज में उत्तराधिकार स्वरुप अगली पीढियों को हस्तान्तरित भी करी जाती है। सामाजिक वर्गीकरण प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति करने के लिये उत्साहित करता है ताकि वह मेहनत कर के अपने स्तर से और ऊपर उठने का प्रयत्न करें। य़दि मेहनती के बराबर ही अयोग्य, आलसी तथा नकारे व्यक्ति को भी योग्य के जैसा ही सम्मान दे दिया जाय गा तो मेहनत कोई भी नहीं करेगा। प्रतिस्पर्धा के वातावरण में सक्षम ही आगे निकल सकता है। केवल पशु जगत में ही कुछ सीमा तक समानताये होती हैं क्योंकि देखने में सभी पशु ऐक जैसे ही दिखते हैं परन्तु विषमताये भी प्राकृतिक हैं। ऐक ही माता पिता की संतानों में भी समानता नहीं होती।

स्वास्थ्य समबन्धी व्यक्तिगत कारण

यदि कुछ वर्ग स्वास्थ की दृष्टि से ‘दूषित’ वातावरण में काम करते हैं तो उन के साथ सम्पर्क के लिये स्वास्थ की दृष्टि से प्रतिबन्ध लगाना भी उचित है। इस प्रतिबन्ध का आधार उन की जाति नहीं बल्कि कर्म क्षेत्र का वातावरण है। इस प्रकार का प्रावधान भी सभी विकसित देशों और जातियों में है। आत्मिक दृष्टि से सभी मानव और पशु ऐक जैसे हैं परन्तु शारीरिक दृष्टि से वह ऐक जैसे नहीं हैं। स्त्री-पुरुष, भाई-भाई में भी शारीरिक, तथा भावात्मिक भेद प्रकृति ने बनाये हैं। ऐक ही माता-पिता की संतान होते हुये भी उन का रक्तवर्ग समान नहीं होता। ऐक का रक्त दूसरे को नहीं चढाया जा सकता। यह मानवी विषमताओं का वैज्ञानिक कारण है जिस के कारण उन के सोचविचार और व्यवहार में भी परिवर्तन स्वाभाविक हैं। विषमताओं का धर्म अथवा जाति से कोई सम्बन्ध नहीं। 

निजि पहचान का महत्व

परिचय तथा व्यव्हार के लिये व्यक्ति का चेहरा, उस का चरित्र, निजि स्वच्छता, सरलता, सभ्यता और व्यवहार आदि ही प्रयाप्त होते हैं। जाति प्रत्येक व्यक्ति की पहचान को ‘विस्तरित’ करने के लिये आवश्यक हैं। जाति प्रत्येक व्यक्ति के माता पिता से पिछली पीढी के सम्बन्धों को जोडती है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति के लिये अपनी जाति को नाम के साथ जोडना अनिवार्य नहीं है। यदि किसी को अपनी जाति बताने में कोई मानसिक असुविधा लगती है तो वह किसी भी अन्य जाति नाम को अपने साथ जोड सकता है या छोड सकता है।

उच्च शिक्षा की सुविधायें

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिबन्ध केवल भारत में ही नहीं बल्कि सभी देशों में किसी ना किसी ढंग से आज भी लगे हुये हैं। ‘रुचि-परीक्षण’(ऐप्टीच्यूड टेस्ट) भी ऐक प्रतिबन्ध है जिस के आधार पर सम्बन्धित विषय की शिक्षा से प्रत्याशी को वंचित होना पडता है या स्वीकृति मिल जाती है। उच्च शिक्षा के साधनों के सीमित होने के कारण इस प्रकार के प्रतिबन्ध आवश्यक हो जाते हैं। जिन के पास उच्च शिक्षा को समझ सकने के बेसिक माप दण्ड नही होते उन पर साधन और समय बरबाद करने का समाज को कोई लाभ नहीं। सभी देशों में उन को उस विशेष शिक्षा से वंचित रहना पडता है। आज कितने ही मेधावी छात्रों को आरक्षण की वजह से निराश हो कर अन्य देशों की तरफ पलायन करना पड रहा है या उच्च शिक्षा से वंचित रहना पडता है क्यों कि स्थान अयोग्य प्रत्याशियों से भरे रहते हैं जो केवल आरक्षण का आर्थिक लाभ उठाते रहते हैं। 

भारत में कोई भी व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को उस का जाति बताने के लिये बाध्य नहीं करता। यदि कोई किसी विशिष्ट विषय के बारे में ज्ञान पाना चाहे तो वह निजि साधनो से उस विषय के ग्रंथ खरीद कर पढ सकता है। इसी प्रकार हर कोई किसी भी देवी-देवता की आराधना भी कर सकता है, मनोरंजन स्थल पर सामान्य शुल्क दे कर जा सकता है उस के मार्ग में कोई भी सरकारी, धार्मिक अथवा सामाजिक बाधा कोई नहीं है। वास्तव में कुछ व्यक्ति आरक्षण लाभ पाने कि लिये अपना जाति का प्रमाण पत्र स्वयं ही दूसरों को दिखाते हैं।

वोट बेंक की राजनीति

कुछ नेता पिछडे वर्गों की नुमायन्दगी करने के लिये अपने आप को दलित, शोषित और पता नहीं क्या क्या कहने लगे हैं। स्वार्थी नेताओं को अपनी प्रगति और समृद्धि के लिये वोट बेंक बनाने के लिये दलित अथवा उसी श्रेणी के अनुयायी भी चाहियें । इसलिये वह उकसा कर हिन्दू समाज को बलैकमेल करने में स्दैव जुटे रहते हैं। वही उन को धर्म परिवर्तन के लिये भी भडकाते रहते हैं। किसी भी नेता ने पिछडे वर्गों को शिक्षशित करने में, या परिश्रम कर के आगे बढने के बारे में कोई योग्दान नहीं दिया है। ऐसे नेता देश, धर्म और पिछडे लोगों के साथ अपने स्वार्थों के लिये सरासर गद्दारी कर रहै हैं।

आरक्षण निति के दुष्परिणाम

आरक्षण नीति पूर्णत्या असफल तथा हानिकारक सिद्ध हुई है। आरक्षण के लाभों ने उत्तराधिकार का रूप ले लिया है। आरक्षण के आरम्भ से आज तक ऐक भी उदाहरण सामने नहीं आया जब किसी आरक्षित ने यह कहा हो कि आरक्षण के कारण उस की सामाजिक ऐवं मानसिक प्रगति हो चुकी है जिस के फलस्वरूप उसे और उस की संतान को अब आगे आरक्षण के माध्यम से कोई लाभ नहीं चाहिये। किसी ऐक ने भी नहीं कहा कि उस का परिवार आरक्षण की बैसाखियों के बिना प्रगति के मार्ग पर चलने के लिये अब सक्षम हो चुका है अतः उस के वापिस किये आरक्षण लाभांश अब किसी अन्य जरूरतमन्द को दे दिये जायें।

आरक्षण पाने वालों की सूची में कई केन्द्रीय मन्त्री, भूतपूर्व राष्ट्रपति, उच्च अधिकारी तथा उद्योगपति भी शामिल हैं किन्तु उन में से भी किसी के परिवार ने उन्नति कर के आरक्षण के लाभांश को किसी दूसरे के लिये नही छोडा है। इसी से प्रमाणित होता है कि आरक्षण नीति असफल रही है। इस के विपरीत कई उच्च जाति के लोग भी अब आरक्षण की कतार में खडे हो कर लाभांश की मांग करने लगे हैं। वह तो यहाँ तक धमकी देते हैं कि उन्हें आरक्षण नहीं दिया गया तो वह हिन्दू धर्म छोड कर कुछ और बन जायें गे। इसी से पता चलता है कि आरक्षण नीति कितनी बेकार और घातक सिद्ध हुई है।

और तो और अब भारत की पढी लिखी और अशिक्षशित स्त्रियों ने अपने लिये संसद तथा प्रान्तीय विधान सभाओं में आरक्षण की मांग करने लगीं हैं। उन्हें यह भी दिखाई नहीं देता कि अगर इटली से ऐक साधरण अंग्रेजी जानने वाली महिला भारत के शासन तन्त्र में सर्वोच्च पद पर आसीन हो सकती है तो भारत की महिलाओं को अपने ही देश में निर्वाचित होने के लिये क्यों आरक्षण चाहिये? निस्संदेह आरक्षणवादी मानसिक्ता ने उन का स्वाभिमान और गौरव ध्वस्त कर दिया हैं।

आरक्षण का आर्थिक आधार

आज कल कुछ धर्म-निर्पेक्ष लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की भी वकालत करने लगे हैं। किन्तु उस के परिणाम भी हिन्दूओं के लिये घातक ही हों गेः-

  • योग्यता, सक्ष्मता तथा कार्य कुशलता की पहचान मिट जाये गी।
  • आर्थिक आधार से आरक्षण के सभी लाभ अल्पसंख्यकों की झोली में जा पडें गे जिस से सारा सरकारी तन्त्र केवल अल्संख्यकों से ही भर जाये गा। शासन तन्त्र में अयोग्यता के अतिरिक्त निष्ठा को भी हानि होगी।
  • दारिद्रता को कसौटी मान कर उसे लाभप्रद नहीं बनाया जा सकता। केवल दारिद्र होने के कारण किसी को परिश्रम के बिना उन्नत नहीं किया जा सकता। यदि वैसा किया गया तो कोई परिश्रम कर के धन नहीं कमाये गा।

सर्वत्र आत्म विशवास का विनाश

आरक्षण के कारण परिश्रम करने वालों और योग्य व्यक्तियों का मनोबल क्षीण हुआ है। शैक्षशिक संस्थानों में रिक्त स्थान उपयुक्त शिक्षार्थी ना मिलने के कारण या तो रिक्त पडे रहते हैं या अयोग्य लोगों से भरे जाते हैं। उन पर किया गया खर्च बेकार हो जाता है। इस प्रकार के स्वार्थवादी ढाँचे को तोडना मुशकिल हो चला है किन्तु इस का लाभ इसाई और मुस्लिम समुदाय उठा रहै हैं और हानि हिन्दू कर दाता।

आरक्षण नीति के विकल्प

यदि हम चाहते तो बटवारे के तुरन्त पश्चात ही आरक्षण के विकल्प ढूंड सकते थे। हमें शिक्षा को पूर्णत्या निशुल्क बनाना चाहिये था। शिक्षा सम्बन्धी खर्चों को भी सस्ता करना चाहिये था जिस में पुस्तकें, होस्टल का किराया और शिक्षार्थियों के लिये भोजन आदि शामिल था। शिक्षा के साथ साथ उन्हें व्यवसायक पर्शिक्षशण देना चाहिये था जिस से विद्यार्थियों में आरक्षण की हीनता के स्थान पर स्वालम्बन की भावना उत्पन्न होती। उच्च शिक्षा के लिये विद्यार्थियों को आसान शर्तों पर कर्ज दिये जा सकते थे जो लम्बे काल में लौटाये जा सकें। इस प्रकार के विकल्प विकसित देशों में सफलता पूर्वक अपनाये गये हैं।

पिछडे वर्गों के लिये सस्ते दरों पर भोजन, पुस्तकों, आदि का प्रावधान कर देना उचित है। उन को अपने परिश्रम से आगे बढने के अवसर देने चाहियें शिक्षण तथा व्यवसायिक परिशिक्षण के संस्थान अधिकतर अविकसित क्षेत्रों में खोलने चाहियें परन्तु वह केवल बेकवर्ड लोगों के लिये ही नहीं होने चाहियें।

धर्म निर्पोक्षता की डींग मारने वाली सरकार के लिये निशुल्क या सस्ती हज यात्रा के प्रावधान के बदले छात्रों को निशुल्क पुस्तकें, वस्त्र, भोजन, तथा होस्टल आदि प्रदान करवाना देश हित में होता। सरकार इसाईयों तथा मुस्लमानों को आरक्षण दे कर हिन्दूओं को धर्म परिवर्तन के लिये उकसा रही है और हिन्दूओं में विघटन करवा रही है। 

चाँद शर्मा

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Comments on: "66 – आरक्षण की राजनीति" (1)

  1. Divya wrote: “मौकापरस्त हैं ये आरक्षण का लाभ लेने वाले !”

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