हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


आज का हिन्दू दिशाहीनता के असमंजस में उदासीन, असुरक्षित और ऐकाकी जीवन जी रहा है। अपने आप को अकेला और लाचार समझ कर या तो देश से भाग जाना चाहता है या मानसिक पलायनवाद की शरण में खोखला आदर्शवादी और धर्म-निर्पेक्ष बना बैठा है। “हम क्या कर सकते हैं” हिन्दूओं के निराश जीवन का सारंश बन चुका है।

कोई भी व्यक्ति या समाज अपने पर्यावरण और घटनाओं के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। सुरक्षित रहने के लिये सभी को आने वाले खतरों से सजग रहना जरूरी है। विभाजन के पश्चात हिन्दू या तो पाकिस्तान में मार डाले गये थे या उन्हें इस्लाम कबूल करना पडा था। जिन्हें धर्म त्यागना मंज़ूर नहीं था उन्हें अपना घर बार छोड कर हिन्दुस्तान की ओर पलायन करना पडा था। पहचान के लिये प्रधानता धर्म की थी राष्ट्रीयता की नहीं थी। यदि आगे भी देश की राजनीति को कुछ स्वार्थी धर्म-निर्पेक्ष नेताओं के सहारे छोड दें गे और अपने धर्म को सुरक्षित नहीं करें गे तो भविष्य में भी हिन्दू डर कर पलायन ही करते रहैं गे।

इतिहास की अवहेलना

इतिहास अपने आप को स्दैव क्रूर ढंग से दोहराता है। आज से लगभग 450 वर्ष पहले मुस्लमानों के ज़ुल्मों से पीड़ित कशमीरी हिन्दू गुरू तेग़ बहादुर की शरण में गये थे। उन के लिये गुरू महाराज ने दिल्ली में अपने शीश की कुर्बानी दी। सदियां बीत जाने के बाद भी कशमीरी हिन्दू आज भी कशमीर से पलायन कर के शरणार्थी बन कर अपने ही देश में इधर उधर दिन काट रहे हैं कि शायद कोई अन्य गुरू उन के लिये कुर्बानी देने के लिये आगे आ जाये। उन्हों ने ऐकता और कर्मयोग के मार्ग को नहीं अपनाया।

मुन्शी प्रेम चन्द ने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ कहानी में नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने का जो चित्रण किया है वही दशा आज हिन्दूओं की भी है। उस समय लखनऊ के सामंत बटेर बाजी और शतरंज में अपना समय बिता रहे थे कि अंग्रेज़ों ने बिना ऐक गोली चलाये अवध की रियासत पर अधिकार कर लिया था। आज हम क्रिकेट मैच, रोने धोने वाले घरेलू सीरयल और फिल्मी खबरें देखने में अपना समय नष्ट कर रहे हैं और अपने देश-धर्म की सुरक्षा की फिकर करने की फुर्सत किसी हिन्दू को नहीं। इटली मूल की ऐक महिला ने तो साफ कह दिया है कि “भारत हिन्दू देश नहीं है”। हम ने चुप-चाप सुन लिया है और सह भी लिया है। हिन्दूओं का हिन्दूस्तान अल्पसंख्यकों के अधिकार में जा रहा है और देश के प्रधानमन्त्री ने भी कहा है कि देश के साधनों पर उन्हीं का ही “पहला अधिकार” है।

हिन्दूओं की भारत में अल्पसंख्या

हिन्दूओं की जैसी दशा कशमीर में हो चुकी है वैसी ही शीघ्र केरल, कर्नाटक, आन्ध्र, बंगाल, बिहार तथा उत्तरपूर्वी क्षेत्रों में भी होने वाली है। यदि वह समय रहते जागृत और संगठित नहीं हुये तो उन्हें वहाँ से भी पलायन करना पडे गा। वहाँ मुस्लिम और इसाई जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ रही है। शीघ्र ही वह हिन्दू जनगणना से कहीं आगे निकल जाये गे। इन विदेशी घर्मों ने धर्म-निर्पेक्षता को हृदय से नहीं स्वीकारा है और धर्म-र्निर्पेक्षता का सरकारी लाभ केवल अपने धर्म के प्रचार और प्रसार के लिये उठा रहै हैं। वह अपनी राजनैतिक जडें कुछ स्वार्थी हिन्दू राजनेताओं के सहयोग से भारत में मजबूत कर रहै हैं। उन के सक्ष्म होते ही भारत फिर से मुस्लमानों और इसाईयों के बीच बट कर उन के आधीन हो जाये गा। हिन्दूओं के पास अब समय और विकल्प थोडे ही बचे हैं।  

प्राकृतिक विकल्प

सृष्टि में यदि पर्यावरण अनुकूल ना हो तो सभी प्राणियों की पास निम्नलिखित तीन विकल्प होते हैं- 

  • प्रथम – किसी अन्य अनुकूल स्थान की ओर प्रस्थान कर देना।
  • दूतीय – वातावरण के अनुसार अपने आप को बदल देना।
  • तीसरा – वातावरण के अपने अनुकूल बदल देना।

प्रथम विकल्प हिन्दू किसी अन्य स्थान की ओर प्रस्थान कर देना

विश्व में अब कोई भी हिन्दू देश नहीं रहा जो पलायन करते हिन्दूओं की जनसंख्या को आसरा दे सके गा। ऐक ऐक कर के सभी हिन्दू देश संसार से मिट चुके हैं। इस कडी का अन्तिम हिन्दू देश नेपाल था। आने वाली पीढियों को यह विशवास दिलाना असम्भव होगा कि कभी इरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, लंका, म्यनमार, थाईलैण्ड, इण्डोनेशिया, जावा, मैक्सिको, पेरू और बाँग्लादेश आदि ‘हिन्दू देश’ थे जहाँ मन्दिर और शिवालयों में आरती हुआ करती थी। अब अगर हिन्दूस्तान भी हिन्दूओं उन से छिन गया तो कहाँ जायें गे?

सिवाय मूर्ख हिन्दूओं के कोई भी देश दूसरे देश के शर्णार्थियों को स्दैव के लिये अपनी धरती पर स्थापित नहीं कर सकता। शर्णार्थियों को स्दैव स्थानीय लोगों का शोशण और विरोध झेलना पडता है। इस लिये प्रथम विकल्प में हिन्दूओं के लिये भारत से पलायन कर के अपने लिये नया सम्मान जनक घर तलाशना असम्भव है।

दूसरा विकल्प वातावरण अनुसार अपने आप को बदल देना

भारत में कई ‘धर्म-निर्पेक्ष बुद्धिजीवी’ हैं जो रात दिन प्रचार करते रहते हैं कि हमें समय के साथ चलना चाहिये। बाहर से आने वालों के लिये अपने दरवाजे खोल कर भारत को पर्यटकों, घुसपैठियों, और समलैंगिकों का धर्म-निर्पेक्ष देश बना देना चाहिये जहाँ सभी साम्प्रदायों को अपने अपने ढंग की जीवन शैली जीने का अधिकार हो। यदि उन की सलाह मान ली जाय तो हिन्दूओं को “अरब और ऊँट” वाली कथा अपने घर में दोहरानी होगी। देश के कई विभाजन भी करने पडें गे ताकि आने वाले सभी पर्यटकों को उन की इच्छानुसार जीने दिया जाये। मुस्लिम और हिन्दू, मुस्लिम और इसाई, इसाई और हिन्दू ऐक ही शैली में नहीं जीते। सभी में प्रस्पर हिंसात्मिक विरोधाभास हैं। शान्ति तभी हो सकती थी यदि सभी ऐक ही आचार संहिता के तले रहते परन्तु भारत में ‘धर्म-निर्पेक्षों’ वैसा नहीं होने दिया।

यह सोचना भी असम्भव होगा कि लाखों वर्ष की प्राचीन हिन्दू सभ्यता इस परिस्थिति से समझोता कर सकें गी और उन समुदायों के रीति रिवाजों को अपना ले गी जो अज्ञानता के दौर से आज भी पूर्णत्या निकल नहीं पाये हैं। अन्य धर्मों में पादरियों और मौलवियों के कथन पर यकीन करना लाज़मी है नहीं तो उस की सजा मृत्युदण्ड है, किन्तु स्वतन्त्र विचार के हिन्दू उन आस्थाओं पर कभी भी विशवास नहीं कर सकें गे। हिन्दूओं की संख्या भले ही शून्य की ओर जाने लगे फिर भी हिन्दू अकेले ही विश्व के किसी कोने में भी जीवित रहै गा क्यों कि यही मानवता का प्राकृतिक धर्म है। मानवता प्रलयकाल से पहले समाप्त नहीं हो सकती यह भी प्रकृति का नियम है। अतः हिन्दू पहचान मिटाने का दूसरा विकल्प भी असम्भव है।

तीसरा विकल्प वातावरण के अपने अनुकूल बदल देना

हिन्दूओं के पास अब केवल यही ऐक प्रभावशाली, स्थायी, तर्क संगत तथा सम्मान जनक विकल्प है कि वह अपने प्रतिकूल धर्म-निर्पेक्ष वातावरण को बदल कर उसे अपने अनुकूल हिन्दूवादी बनाये।   

समय समय पर हिन्दू समाज के ध्वस्त मनोबल को पुनर्स्थापित करने के लिये श्री कृष्ण, चाण्क्य, शिवाजी, तथा गुरू गोबिन्द सिहं जैसे महा जन नायकों ने भी यही विकल्प अपनाया था। हमारा वर्तमान संविधान और सरकार केवल धर्म-निर्पेक्षता का छलावा मात्र हैं। वास्तव में वह केवल अल्पसंख्यक तुष्टिकारक और हिन्दू विरोधी हैं। हमारे संवैधानिक प्रतिष्ठान भी अल्पसंख्यक संरक्षण और तुष्टिकरण का कार्य करते हैं। यदि इस संविधान को नहीं बदला गया तो निश्चय ही भारत का विघटन होता चला जाये गा। इस को रोकना है तो हिन्दूओं को संगठित हो कर पूर्ण बहुमत से चुनाव जीत कर भारत में हिन्दू रक्षक सरकार की स्थापना करनी होगी जो संविधान में परिवर्तन करने में सक्षम हो। भारत को “हिन्दू-राष्ट्र” घोषित करना होगा और मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को कानूनी तरीके से दूर करना होगा। हिन्दू सरकार ही भारत की परम्पराओं और गौरव को पुनर्जीवित कर सकती है और यह हमारा अधिकार तथा कर्तव्य दोनों हैं।

हिन्दू राष्ट्र की स्थापना

आज हिन्दूओं को अपने ही घर हिन्दूस्तान में अल्पसंख्यकों के सामने विनती करनी पडती है। इस शर्मनाक स्थिति से उबरने के लिये हिन्दूओं को वैधानिक तरीके से सरकार तथा संविधान बदलने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं है। अतः हिन्दूओं को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिये राजनैतिक तौर पर संगठित हो के ऐक सशक्त वोट बैंक बनाना होगा।

  • उन्हें किसी ऐक राजनैतिक दल को सम्पूर्ण सहयोग देना पडे गा या फिर नया हिन्दू राजनैतिक दल बना कर चुनाव में उतरना हो गा। समय और वर्तमान परिस्थितियों में नया राजनैतिक दल संगठित करना ऐक कठिन और तर्कहीन विचार होगा। अतः किसी शक्तिशाली दल को समर्थन देना ही क्रियात्मक उपाय है।
  • हिन्दूओं को अपने मतों का विभाजन रोकना होगा। खोखले आदर्शवाद की चमक में हिन्दू इस खेल को समझ नहीं पा रहै अल्पसंख्यक संगठित रह कर राजनैतिक संतुलन को बिगाडते हैं ताकि हिन्दूओं को सत्ता से वंचित रखा जाय। 
  • हिन्दूओं को नियन्त्रण करना होगा कि अल्पसंख्यक और हिन्दू विरोधी तत्व अनाधिकृत ढंग से मताधिकार तो प्राप्त नहीं कर रहै। घुसपैठिये भारत में कोई कर नहीं देते किन्तु सभी प्रकार की आर्थिक सुविधायें उठाते हैं जो भारत के वैधिनिक नागरिकों पर ऐक बोझ हैं। हिन्दू नागरिकों को पुलिस से सहयोग करना चाहिये ताकि वह अतिक्रमण को हटाये।
  • हमें भारत का निर्माण उन भारतीयों के लिये ही करना होगा जिन्हें विदेशियों के बदले भारतीय संस्कृति, भारतीय भाषा, तथा भारतीय महानायकों से प्रेम हो।

हमें अपनी धर्म निर्पेक्षता के लिये किसी विदेशी सरकार से प्रमाणपत्र लेने की आवश्यक्ता नहीं। किसी अन्य देश को भारत में साम्प्रदायक दंगों सम्बन्धित तथ्य खोजने के लिये मिशन भेजने का कोई अधिकार नहीं है। धर्म-निर्पेक्षता स्वतन्त्र भारत का आन्तरिक मामला है। बांग्ला देश का उदाहरण हमारे सम्मुख है जो विश्व पटल पर अपनी इच्छानुसार कई बार धर्म-निर्पेक्ष से इस्लामी देश बना है। हमें बिना किसी झिझक के भारत को ऐक हिन्दू राष्ट्र घोषित करना चाहिये। हिन्दू और भारत ऐक दूसरे के पूरक हैं। यह नहीं भूलना चाहिये कि मुस्लिम शासकों के समय भी भारत को ‘हिन्दुस्तान’ ही कहा जाता था।

हिन्दू समाज का संगठन

हिन्दू विचारकों तथा धर्म गुरूओं को हर प्रकार से विक्षिप्त हिन्दूओं को कम से कम राजनैतिक तौर पर किसी ऐक हिन्दू संस्था के अन्तरगत ऐकत्रित करना होगा। यदि अल्पसंख्यक धर्मान्तरण और जिहादी आतंकवाद को त्याग कर अपने आप को भारतीय संस्कृति के साथ जोडें और मुख्य धारा से संयुक्त हो कर अपने आप को राष्ट्र के प्रति समर्पित करें तो वह भी इस प्रकार की राष्ट्रवादी संस्था से सम्मानपूर्वक जुड सकते हैं। 

घर वापसी आन्दोलन

जिन्हों ने पहले किसी भय या प्रलोभन के कारण धर्म परिवर्तन किया था और अब स्वेच्छा से हिन्दू धर्म में पुनः लौट आना चाहें तो उन का स्वाग्त करना चाहिये।

जो कोई भी ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धान्तानुसार जीवन शैली जीता हो, अपने भारतीय पूर्वजों का सम्मान करता हो वह चाहे किसी भी निजि पूजा पद्धति में विशवास रखता हो उसे हिन्दू मान लेना चाहिये। परन्तु उसे समान आचार संहिता, समान राष्ट्रभाषा, समान संस्कृति तथा भारत की मुख्य धारा को अपना कर अल्पसंख्यक वर्ण को त्यागना होगा।

भारत को गौरवमय बनाने का विकल्प हमारे पास अगले निर्वाचन के समय तक ही है जिस के लिये समस्त हिन्दूओं को संगठित होना पडे गा । यदि हम इस लक्ष्य के प्रति कृतसंकल्प हो जाये तो अगले चुनाव में ही भारत अपने प्राचीन गौरव के मार्ग पर दोबारा अग्रेसर हो सकता है। यदि हम प्रयत्न करें तो सर्वत्र अन्धेरा नहीं हुआ अभी उम्मीद की किरणें बाकी है – परन्तु अगर अभी नहीं तो फिर कभी नहीं होगा।

चाँद शर्मा

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Comments on: "69 – हिन्दूओं की दिशाहीनता" (1)

  1. आपका विचार सत्य है

    मैं आपका समर्थन करता हूँ

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