हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


जनता और विशेषत्या युवाओं के जोश भरे संघर्ष के कारण  शायद दामिनी को ‘मरणोपरान्त’ न्याय मिल सके जिस के लिये  देश के युवा बधाई के पात्र हैं जिन्हों ने सरकार की बरबर्ता और मौसम की कठिनाई झेल कर सम्भावना पैदा करी। लेकिन अभी तो इस देश में बहुत सी दामनियां दूर दराज इलाकों में सिसक रही हैं जहाँ तक न्याय पहुँचाने के ‘साधन’ और ‘जागरुक्ता’ ही नहीं है। लोग अन्याय झेलने के आदी हो चुके हैं। दिल्ली की ऐक दामिनी के केस से ध्यान हटा कर नेता तो पुराने रास्तों पर जाने का इन्तिजार ही कर रहै हैं।

नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना सरकार का परम कर्तव्य है और सरकार से सुरक्षा पाना हर नागरिक का अधिकार है। जरा सोचिये कि ऐक दामिनी का केस कोर्ट में शुरू होजाने से क्या भारत के नागरिकों का जीवन सुरक्षित होजाये गा जहाँ इस प्रकार की घटनायें ऐक आम बात बन चुकी हैः –

  • वरिष्ठ नागरिकों की घरों बैठे बिठाये में हत्यायें।
  • महिलाओं से चेन और पर्स छीनना।
  • किसी वरिष्ठ नागरिक के जीवन की कमाई ही छीन लेना।
  • बच्चों का अपहरण कर के उन्हें जीवित ही उन के परिजनों के लिये मृतक बना देना।
  • फिरोती मांगना।
  • नशीली या नकली दवायें खिला कर किसी की जान ले लेना।
  • जहरीली शराब बेचना।
  • आतंकवाद के कारण असुरक्षित जन जीवन।
  • और इस प्रकार के कई अन्य अपराध।

क्या इन सब के लिये कोई हैल्प लाईन, फास्ट ट्रैक कोर्ट, और कानून में सख्त सजा नहीं बननी चाहिये? यह सब किस की जिम्मेदारी के अन्तर्गत आते है? नागरिक तो बराबर टैक्स देते आ रहै हैं लेकिन सरकार इन सब बातों के लिये “साधनों की कमी” का बहाना कर के पिछले सात दशकों से आज तक बचती आई है।

सच्चाई यह है कि “नेता” अधिकांश साधनों को अपनी और अपने परिवारों की निजि सुरक्षा में लगाये बैठे हैं। उन्हें बडे बडे सुरक्षित बंगले, पुलिस की बुलैटप्रूफ गाडियां, कमाणडो दस्ते और सड़कों पर उन की आवाजावी का बन्दोबस्त करने के लिये सैंकडों पुलिस कर्मी रोज चाहियें ताकि वह मन मरजी से जनता को हाथ हिला हिला कर दर्शन देते रहैं।

अगर साधनों की कमी है तो वह नेताओं को भी महसूस होनी जरूरी है। नेताओं से वापिस लेकर वही साधन नगरों की गलियों और चौराहों को सुरक्षित करने में लगाने चाहियें। हर नेता को अपने साथ इतनी सिक्यूरिटी रखते हुये शर्म आनी चाहिये परन्तु  इस के लिये उन्हें अपनी सोच को भी बदलना होगा।

नागरिक और युवा याचना छोड कर अपना अधिकार प्राप्त करें ताकि लोक तन्त्र में नागरिकों की “दशा भी बदले और दिशा भी बदले”।

चाँद शर्मा

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