हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


आज कल सर संघचालक मोहन भागवत जी के कथन पर मीडिया और सेक्यूलरिस्टों नें वबाल मचा रखा है कि भारत क्या है और इण्डिया क्या है। अंग्रेजी भाषा में भी प्रापर नाऊन का ट्रांसलेशन तो नहीं किया जाता लेकिन गुलामी की मानसिक्ता वाले कुछ  देसी अंग्रेजों को शौक है कि वह भारत को ‘इण्डिया’ कहें और पवित्र गंगा नदी को ‘रिवर गैंजिज़’ कहैं। मुख्य फर्क यह है कि भारत अपनी प्राचीन हिन्दू संस्कृति पर गर्व करता है। सभी सैक्यूलर अपने आप को इण्डियन कहलाना पसंद करते हैं और उन्हें पाश्चात्य संस्कृति ही प्रगतिशील दिखाई पडती है।

ऐक अन्य विवाद चल रहा है कि मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर महिलाओं को कष्ट तो झेलना ही पडे गा। अब इस में गल्त कुछ नहीं कहा गया था। चाहे स्त्री हो या पुरुष, स्थानीय सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर कष्ट तो झेलना ही पडता है।

भारतीय समाज में कीर्तिमान के तौर पर ऐक आदर्श गृहणी को ही दर्शाया जाता है। उस की छवि गृह लक्ष्मी, आदर्श सहायिका तथा आदर्श संरक्षिता की है। भारतीय स्त्रियों के आदर्श ‘लैला ’ और ‘ज्यूलियट’ के बजाय सीता, सावित्री, गाँधारी, दमयन्ती के चरित्र रखे जाते है। भारतीय समाज में जहाँ प्राचीन काल से ही कन्याओं को रीति रिवाज रहित गाँधर्व विवाह तक करने की अनुमति रही है लेकिन साथ ही निर्लज्जता अक्ष्म्य है। निर्लज औरत को शूर्पणखा का प्रतीक माना जाता है फिर चाहे वह परम सुन्दरी ही क्यों ना हो। सामाजिक सीमाओं का उल्लंघन करने वाली स्त्री का जीवन सरल नहीं है। रामायण की नायिका सीता को आदर्श पत्नी होते हुये भी केवल एक अपरिचित सन्यासी रूपी रावण को भिक्षा देने के कारण परिवार की मर्यादा का उल्लंधन करने की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और परिवार में पुनः वापिस आने के लिये अग्नि परीक्षा से उत्तीर्ण होना पड़ा था।

अपने आप को इण्डियन कहने में गर्व महसूस करने वाले यह भी देखें कि भारतीय समाज की तुलना में अन्य देशों में स्थिति क्या थी। वहाँ स्त्रियों को केवल मनोरंजन और विलास का साधन मान कर हरम के पर्दे के पीछे ही रखा जाता रहा है। अन्य समाजों में प्रेमिका से विवाह करने का प्राविधान केवल शारीरिक सम्बन्धों का अभिप्राय प्रगट करता है किन्तु हिन्दू समाज में ‘जिस से विवाह करो-उसी से प्रेम करो’ का सिद्धान्त कर्तव्यों तथा अध्यात्मिक सम्बन्धों का बोध कराता है।

आजकल पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण कुछ लोग स्त्री-पुरुषों में लैंगिक समान्ता का विवाद खडा कर के विषमता पैदा कर रहै हैं। वह इसलिये भ्रम पैदा कर रहै हैं ताकि भारतीय महिलायें पाश्चात्य संस्कृति को अपना लें। स्त्रियाँ पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करें और प्रतिदून्दी की तरह अपना अधिकार माँगें। स्त्रियाँ सहयोगिनी बनने के बजाय उन की प्रतिदून्दी बन जायें और हिन्दू समाज में परिवार की आधार शिला ही कमजोर हो जाये।

समझने की बात यह है कि जो अल्ट्रा-माडर्न स्त्रियाँ दूसरों को भड़काती हैं वह भी जब अपने लिये वर चुनती हैं तो अपनी निजि क्षमता से उच्च पति ही अपने लिये खोजती हैं। कोई भी कन्या अपने से कम योग्यता या क्षमता वाले व्यक्ति को अपना पति नहीं चुनती। उन की यही आकांक्षा ही उन की ‘फ्रीडम ’ के खोखलेपन को प्रमाणित करती है।

परम्पराओं के लिहाज से हमारे गाँव आज भी भारतीय संस्कृति से संलगित हैं और शहरों में पाश्चात्य इण्डियन संस्कृति अपनी घुस पैठ बनाने में लगी है ताकि भारत के घरेलू जीवन को तनावपूर्ण बना कर तहस नहस कर दिया जाये। यह देश अपनी सभ्यता को छोड कर फिर से असभ्यता को तरफ मुड जाये जहाँ समलैंगिक रिश्ते वैवाहिक बन्धनों पर हावी हो जाये।

भारत और इण्डिया के फर्क को श्री वेदप्रिय वेदानुरागी ने अपनी निम्नलिखित पंक्तियों में बहुत सक्ष्मता से समझाया हैः-

भारत में गाँव है, गली है, चौबारा है, इंडिया में सिटी है, मॉल है, पंचतारा है।
       भारत में घर है, चबूतरा है, दालान है, इंडिया में बस फ्लैट और मकान है।
       भारत में काका है, बाबा है, दादा है, दादी है, इंडिया में अंकल आंटी की आबादी है।
       भारत में खजूर है, जामुन है, आम है, इंडिया में मैगी, पिज्जा, माजा का नकली आम है।
       भारत में मटके है, दोने है, पत्तल है, इंडिया में पोलिथिन, वाटर और वाईन की बोटल है।
       भारत में गाय है, गोबर है, कंडे है, इंडिया में चिकन-बिरयानी और अंडे है।
       भारत में दूध है, दही है, लस्सी है, इंडिया में पेप्सी, कोक, और विस्की है।
       भारत में रसोई है, आँगन है, तुलसी है, इंडिया में रूम है, कमोड की कुर्सी है।
       भारत में कथडी है, खटिया है, खर्राटे हैं, इंडिया में बेड है, डनलप है और करवटें है।
       भारत में मंदिर है, मंडप है, पंडाल है, इंडिया में पब है, डिस्को है, हॉल है।
       भारत में गीत है, संगीत है, रिदम है, इंडिया में डान्स है, पॉप है, आईटम है।
       भारत में बुआ है, मौसी है, बहन है, इंडिया में सब के सब ‘कजन’ हैं।

       भारत में पीपल है, बरगद है, नीम है, इंडिया में वाल पर नंगे सीन हैं।
       भारत में आदर है, प्रेम है, सत्कार है, इंडिया में स्वार्थ, नफरत और दुत्कार है।
       भारत में हजारों भाषा हैं, बोली है, इंडिया में एक अंग्रेजी ही बडबोली है।
       भारत सीधा है, सहज है, सरल है, इंडिया धूर्त है, चालाक है, कुटिल है।
       भारत में संतोष है, सुख है, चैन है, इंडिया बदहवास, दुखी, और बेचैन है।

क्योंकि …
       भारत को देवों ने, वीरों ने रचाया है, इंडिया को अंग्रेजी चमचों ने बसाया है।

(- साभार श्री विश्वप्रिय वेदानुरागी)

 आजकल मीडिया रेप, कत्ल, नेताओं की बयानबाजी, तथा अपराध की खबरों से भरा रहता है। सोचना पडता है कि क्या यही हमारी दैनिक दिन चर्या बन चुकी है या फिर यह सब सोच समझ कर देश वासियों का ध्यान साकारात्मिक कामों से हटाने के लिये किया जा रहा है ताकि घोटाले और देश बेचने का सिलसिला ओट के पीछे चलता रहै? क्या हम सदाचारी अध्यात्मिक देश वासी अब केवल बलात्कारी, घोटाले बाज और ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों पर जीने वाले बन चुके हैं। ‘इण्डिया शाईनिंग’ से ‘इण्डिया डिकलाईनिंग’ की तरफ क्यों जा रहै हैं?

रेप के अपराध में पीडिता महिलायें ही होती हैं और अधिकतर मामलों में पीडित और अपराधी ऐक दूसरे के परिचित ही होते हैं। क्या महिलाओं तथा उन के परिजनों की कोई जिम्मेदारी नहीं होती कि वह किसी के साथ ऐकान्त स्थान पर जाने से पहले उस व्यक्ति के बारे में जानकारी रखें? क्या माता पिता अपने बच्चों के इन्टरनेट, मोबाईल तथा पाकेट खर्च पर कोई नियन्त्रण रखना जरूरी समझते? क्या दुर्घटना होने से पूर्व सावधान रहना और दूसरे को सचेत करना व्यक्ति की स्वतन्त्रता छीनना होता है? क्या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता असीमित हो सभी पुरुष रेपिस्ट नहीं होते, सभी स्त्रियाँ चरित्रवान नहीं होतीं। राम और रावण दोनों पुरुष थे, सीता और शूर्पनखा दोनों स्त्रियाँ थीं।

स्त्री और पुरुष, सभी को अपने ऊपर मर्यादाओं का अंकुश अपने आप लगाना होगा। यही भारत की संस्कृति और पहचान है। अति सभी तरह की बुरी होती है फिर वह चाहे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता हो या सामाजिक अनुशासन।

चाँद शर्मा

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