हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


दामिनी रेप केस में जब महिलाओं की सुरक्षा की बात चली थी तो कई नेता तपाक से बोले थे कि “हमारी भी तीन तीन बेटियाँ हैं”। अब दो सैनिकों की निर्मम हत्या पर नेता गण अपनी कुर्बानियाँ जनता को क्यों नहीं बताते? क्या हमारे नेताओं में से कोई ऐसा नेता है जो यह बताये कि उन्हों ने अपने बेटे बेटियों को देश सेवा करने के लिये सैना में क्यों नहीं भेजा?

बेशर्म नेता सिर्फ बयान बाजी करके अपनी कुर्सियां पक्की रखते हैं। क्या देश की सेवा सिर्फ सांसद या विधायक बन कर ही करी जाती है? क्या देश सेवा सुरक्षा घेरों में छुप कर करी जाती है या घोटाले कर के? नेताओं को तो सबसिडाईजड खाना हराम में मिलता है, महंगे से महंगा स्वदेशी और विदेशी इलाज भी मिलता है, अनगिनित सहूलियतें मिलती हैं वह क्या जाने कि सियाचिन की सर्दी क्या होती है? जब गोलियाँ सिर के ऊपर से निकलती हैं तो कैसा लगता है?

विदेशों में नेताओं के लिये भी कुछ वर्ष के लिये सैनिक ट्रेनिंग और सैनिक सेवा अनिवार्य होती है लेकिन गाँधीवादी देश में तो सैना को ही फिजूल का खर्च समझा जाता है और रक्षा बजट में सैनिक खर्चों पर कट लगते रहते हैं। सैनिकों के मान-अपमान से नेताओं को कोई सरोकार नहीं। उन्हों ने सैनिक पदों को भी करंसी कर तरह इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है।

नेताओं की बेशर्मी की कोई सीमा ही नहीं। सैनिकों की पैन्शन का मामला सुप्रीमकोर्ट के आदेशों के बावजूद सरकार के पास कई वर्षों से अटका हुआ है और सरकार उसे नकारने के बहाने तराशती रहती है। हथियारों की खरीद हो या अन्य सैनिक साजोसामान की, नेताओं को तो दलाली खानी ही है। सैनिकों को मिलने वाली सहूलियतों में से भी उन्हें आदर्श सोसाईटी तरह के काण्ड करने ही हैं।

यह मत भूलें कि किसी भी नेता का बेटा या बेटी बाप कि सिफारिश से पार्टी का टिकट पा कर सांसद या विधायक तो बिना किसी योग्यता के ही बन सकता है, और केवल पाँच वर्ष ऐयर कण्डिशन्ड संसद या विधान सभा में बैठ कर आजीवन पैन्शन के साथ कई तरह की सहूलियतें पा सकता है। लेकिन उसी बेटे बेटी को अगर सैनिक अधिकारी बनना हो तो योग्यता के साथ साथ उसे दूसरा जन्म भी लेना पडे गा और अपनी जान हथेली पर ऱखनी होगी।

आज कल सैना के रैंक भी नेताओं ने क्रिकेटरों और अध-कच्चे नेताओं को मुफ्त में बाँटने शुरु कर दिये हैं। क्या इस तरह का कोई भी ‘सेरिमोनियल-पदाधिकारी’ ऐक वर्ष तक सैना की किसी टुकडी के साथ नौकरी करने का साहस कर सकता है। नेताओं ने शायद सियाचन ग्लेशियर केवल नक्शे पर ही देखा होगा क्यों कि वह तो दो दिन भी वहाँ जा कर जवानों के साथ रह नहीं सकते।

नेताओं – अब मगरमच्छ की तरह आँसू बहाने के बजाये पाकिस्तान के साथ अमन की आशा छोडो। देश वासियों में सुरक्षा और सम्मान का विशवास पैदा कर के दिखाओ।

चाँद शर्मा

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