हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


यह हमारे मीडिया का कमाल है कि अपने देश की छवि को इस तरह से पैश करना कि लोगों में नकारात्मिक भावनायें, भय और निराश जगाई जाये। सनसनी फैलाई जाये। फिर सारा दिन घिसे हुये ग्रोमोफोन रेकार्ड को दिन भर बार बार बजाया जाये।

रंग भेद का सरकारी नजरिया

अब कम से कम सरकारी रुख से तो ऐसा लगता है कि आतंकवाद से हमारा वास्ता पिछले छ दशकों में शायद पहली बार पडा है। इस लिये सब से पहले तो आतंकवाद का रंग पहचानना चाहिये। क्या आतंकवाद का रंग भगवा, सफेद, लाल या हरा था? हमारी धर्म निर्पेक्षता को सब से ज्यादा खतरा भगवा आतंकवाद से है, क्योंकि इस रंग के ट्रेनिंग केन्द्रों की जानकारी का दावा गृहमन्त्री और अन्य कई केन्द्रीय मन्त्री बार बार कर चुके हैं। भगवा आतंकियों के पास लाठियाँ होती हैं जो ‘आर डी ऐक्स’ से अधिक घातक होती हैं।

धर्म से वास्ता – हमारा देश तो धर्म निर्पेक्ष है – इस लिये सरकार का मानना है कि आतंकवाद भी धर्म निर्पेक्ष होता है। अगर किसी धार्मिक किताब में लिखा है कि ‘जो तुम्हारे धर्म का नहीं उसे कत्ल कर दो, उस के पूजा स्थल को तोड दो’ तो सरकारी धर्म-निर्पेक्ष लोग ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ की ऱाष्ट्रीय धुन ही सुनते सुनाते हैं। अगर आतंकवाद का वास्ता धर्म से नहीं तो फिर किस से है? देश का बटवारा किस आधार पर हुआ था? मरने वाले किस धर्म के लोग थे?

आतंकवाद के रास्ते – सरकारी विचार से हमारे देश के चारों तरफ हमारे ‘मित्र देश’ हैं जिन के साथ आवा जावी की औपचारिकायें जितनी सरल हो सकें उतनी कर देनी चाहियें। अच्छा तो यह होगा कि सीमायें केवल कागजी नक्शों पर ही रहैं बाकी सभी जगह ‘अमन-सेतु’ बनाने चाहियें या ‘समझोता-ऐक्सप्रेस’ चलानी चाहियें। क्रिकेटरो, गजल गायकों और नाच तमाशा करने वालों पर कोई रोक नहीं होनी चाहिये। बजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को सीमा के अन्दर घुस आने के बाद वीजा प्रदान करना चाहिये। ऐसा करने से ‘अमन की आशा’ और आतंकवाद ऐक दूसरे का सहारा बन सकें गे।

रटा-रटाया – हमारे नेताओं के मुख से आज पहली बार सुनने को मिला –

  •  “हमें आतंकी गतिविधियों की जानकारी दो दिन पहले से थी।”
  •  प्रधान मन्त्री ने आतंकी हमले की निन्दा की (वैसे किसी की निन्दा-चुगली करना अच्छी बात नहीं)।
  •  प्रधान मन्त्री ने शान्ति बनाये रखने की अपील भी की।
  • “सुरक्षा बढा दी गयी है” ( पहले कम क्यों थी?) ताकि आतंकी उसी जगह दोबारा ना आयें।
  •  मृतकों को लाखों का मुआवजा और घायलों का उपचार मुफ्त (कितना बडा अहसान है)
  •  “घटना की जांच के आदेश दे दिये गये हैं।”
  •  “देश और आतंकवाद सहन नहीं करे गा।”
  • “दोषियों को बख्शा नहीं जाये गा” – (चोरी छिपे फाँसी भी दी जाये गी)
  •  कैण्डल मार्च निकाले जायें गे।
  •  “पाकिस्तान के साथ शान्ति परिक्रिया पर कोई असर नहीं पडे गा।”
  • शायद राहुल गाँधी अमेठी को दौरा करें गे।
  •  “पाकिस्तान हमारा छोटा भाई है”।(मुलायम सिहँ) और
  • बला बला बला….
  • पार्लियामेंन्ट को चलने दिया जाये – देश को पिटने दिया जाये।

गाँधीवादी सहनशीलता – हम ऐक गाल पर थप्पड खा कर दूसरा गाल आगे बढा देते हैं। दूसरे पर थप्पड खा कर भूल जाते हैं कि पहले किस पर थप्पड पडा था इस लिये मुस्किराते हुये दोनों गाल आगे कर देते हैं। यही परमपरा चलती आ रही है।

अब तक बीस धर्म निर्पेक्ष नागरिक मरे और 119 घायल हुये इस लिये आतंकवाद का धर्म से कोई वास्ता नहीं। राजनैता कोई नहीं मरा। अब हम खुशी से गा सकते हैं –

अपनी आजादी को हम अब तो बचा सकते नहीं

सर कटा सकते हैं लेकिन सर उठा सकते नहीं, सर उठा सकते नहीं ।

हम तो पाकिस्तान से रिश्ते निभाते जायें गे, रिश्ते निभाते जायें गे

वोह पीट कर चल दें तो फिर भी हम नहीं शर्मायें गे, हम नहीं शर्मायें गे

जो कोई घुसपैठिया सीमा के अन्दर आये गा, सीमा के अन्दर आये गा

वोह यहाँ का नागरिक ईक दिन में ही बन जाये गा, ईक दिन में ही बन जाये गा

बिरयानियाँ इस देश में उन को खिलाते जायें गे, उन को हँसाते जायें गे

जो सबक बापू ने सिखलाया वोह भुला सकते नहीं

सिर कटा सकते हैं, लेकिन सिर उठा सकते नहीं, सिर उठा सकते नहीं

अपनी आजादी को अब हम तो बचा सकते नहीं।

टा – टटाँ…..

चुनाव नजदीक आ रहै हैं – नेताओं पर फूल बरसने चाहियें या पत्थर – अब किसी ऐक को ही चुनिये।

चाँद शर्मा

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