हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


16 वर्ष की आयु के लडके-लडकियाँ कच्ची उमर में होते है और लगभग दसवीं कक्षा तक ही पढे होते हैं। इस उम्र में युवाओं को सम्भलने के लिये निगरानी की जरूरत रहती है मगर मामूली छूट मिलने से भी भटकने के अवसर अधिक होते हैं। हमारी धर्म निर्पेक्ष सरकार और देश द्रोही मीडिया अब भारत की नैतिकता को मिटाने के लिये कटिबद्ध हैं। वह इस देश में रोमियो-ज्यूलिट की फसल तैय्यार करना चाहते हैं ताकि भारत का मानव संसाधन ही तबाह हो जाये। व्यकतिगत स्वतन्त्रता और महिला प्रोत्साहन के नाम पर अब स्वार्थी राजनेता, मल्टीनेशनल कम्पनियाँ, लव-जिहादी और देश द्रोही गुट घरों की शान्ति को बरबाद करने के लिये कमर कस चुके हैं।

धर्म निर्पेक्ष पाशचात्य वादी सरकार खुद रेप-तन्त्र को बढावा दे रही हैः-

  • देर रात तक बीयर पीने की छूट है और गाँधी वाद का ढोंग करने बाली सरकार के शासन में बीयर बार खुले रहते हैँ।
  • वैलेंटाईन डे मनाने के लिये सरकारी संरक्षण मिलता है।
  • प्रेमी जोडों को पार्कों और समुद्र तट पर ऐकान्त की आजादी है।
  • सहमति से सैक्स की आजादी भी है क्यों कि अब 16 वर्ष की आयु तक यह रेप के अन्तर्गत नहीं माना जाये गा।
  • गर्भ निरोधक उपाय और परामर्ष खुले आम मिलते हैं।
  • रेप पीडितों को बरबादी के ऐवज में मिलने वाला भारी भरकम मुआवजा भी उन्हें प्रोत्साहन देने लगे गा।
  • सूधारवाद के नाम पर जुवनाईल अपराधियों के प्रति अनचाही संवेदनशीलता उन्हें बिगडने क् लिये ही प्रोतसाहित  करे गी ।

अपने पाँव पर कुल्हाडी मारने के लिये और क्या चाहिये?

परिवारिक परम्पराओं और मर्यादाओं की रक्षा महिलायें सक्ष्मता से कर सकती हैँ। यदि वह स्वयं अनुशासन में हैं तो पुरुषों पर प्रतिबन्ध भी लगा सकती हैं। लेकिन आज कल कम से कम बरबादी के इस मार्ग पर तो लडकियाँ भी पुरुषों के साथ ही प्रतिस्पर्धा कर रही हैं।

इस कुचक्र से बाहर निकलना है तो कहीं ना कहीं से पहल तो करनी होगी। शुरूआत पुरुष करें या महिलायें इस में कम्पीटीशन नहीं करना है। मेरे विचार से सब से पहले युवाओं को चाहिये कि वह पतित हुयी लडकियों से विवाह ना करें। जो स्वेच्छा से स्त्री – पुरुष बराबरी के नाम पर भटकना चाहती हैं उन्हें भटक कर बरबाद हो लेने दें। शायद ठोकर खाने के बाद उन्हें होश आ जाये और दूसरों के लिये वह बरबादी का उदाहरण बनाई जा सकें।

इस कडवी दवाई को “मेल-शुवनइज्म” ना समझें।

चाँद शर्मा

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