हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


रोज मर्रा के जो काम भारत के आम घरों की महिलायें करती हैं उन में से ऐक प्रतिशत काम भी संसद और विधान सभाओं में भाषण देने वाली महिलाये नहीं करतीं। जो महिला अपने नवजात बच्चे को सड़क पर अकेला सुला कर पास बन रही बिल्डिंग पर ईंटें ढोने का काम करती है या साईकिल रिकशा चलाती है उसे तो पता भी नहीं होगा कि आज ‘महिला-दिवस’ था।

महिला होने का लाभ तो प्रतिभा पाटिल को मिला जो प्रथम महिला राष्ट्रपति बनी, मीरा कुमार को मिला जो प्रथम स्पीकर बनी या और इसी तरह की महिलायों को मिलता रहता है।

राजनेता, जिन में महिलायें भी शामिल हैं अब संसद और विधान सभाओं में महिला आरक्षण की मांग कर रहै हैं ताकि उन की बची खुची रिशतेदार महिलायें भी आसानी से आरक्षित सीटों इलेक्शन जीतें और रिमोट कन्ट्रोल लालू-मुलायम जैसे नेताओं के हाथ में रहै। उन्हें ताले में बन्द कर के वह समर्थन का जोड तोड किया करें गे। यह आरक्षण ईंटे ढोने वाली महिलाओं के लिये नहीं है और ना ही काल सैन्ट्रों में काम करने वाली युवतियों के लिये है। उन्हें तो असुरक्षित वातावरण से ही अभी और जूझना है।

अब महिला पुलिस, महिला बैंक, महिला डाकघर, महिला टैक्सी सेवा, और महिला अस्पताल आदि की भरमार है। शायद जल्दी ही लिंग भेद पर महिला रेलवे, महिला फौज और महिला प्रदेश भी बनने लगें गे। कुछ समय बाद ऐक महिला निर्वाचन आयोग और महिला उच्चतम न्यायालय भी बनाना पडे गा।

साल में ऐक दिन महिला दिवस, टीचर दिवस, बाल दिवस और परयावर्ण दिवस आदि के ढोंग कर के, गरीबों के घरों में ऐक दिन खाना खा कर और सो कर हम कब तक अपने आप को और दूसरों को मूर्ख बनाते रहैं गे? नेहरू गाँधी परिवार ने नाटक बाजी बहुत करवा दी है जिस में शो ख्तम होते ही हम अपना अपना मेक-अप उतार देते हैं।

अपने दिल से ही पूछिये – क्या वास्तव में आप के घरों में महिलाओं का अपमान हो रहा है, रेप हो रही हैं या उन्हें मारा पीटा जाता है? अपने मूहँ पर कालिख मलने का ऐसा शौक  हम पर क्यों चढ़ गया है?

इसी देश की महिलायें बिना आरक्षण के विश्व सुन्दरियाँ, अभिनेत्रियाँ, डाक्टर और इंजीनियर भी अपने आप बन चुकी हैं, अन्तरीक्ष में भी जा चुकी हैं – क्या वह सब महिला दिवस के कारण उन्हें प्राप्त हुआ था?

जब कहीं पर विदेशी बीन सुनाई पड जाती है तो हम साँप की तरह नाचने लग जाते हैं और अपनी संस्कृति को भूल जाते हैं कि इसी देश में महिलाओं के सम्मान की खातिर ही रामायण और महाभारत काल में महायुद्ध हुये थे। गार्गी, शकुन्तला देवी, हेमा मालिनी, लता मंगेशकर, अनुशका शंकर ने महिला दिवस या आरक्षण के कारण ख्याति नहीं पाई। यह सभी महिलायें घरती की गरीबी से ही उपजीं थीं। भारत की महिलाओं का अपमान कर के हम केवल ढिंडोरा पीट रहै हैं।

जश्न मनाने के शौक के साथ अगर कुछ करना भी है तो मनु समृति के अनुसार महिला दिवस हर रोज मनाओ और याद रखो किः

 यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।। (मनु स्मृति 3-56)

जिस कुल में स्त्रीयाँ पूजित होती हैं, उस कुल से देवता प्रसन्न होते हैं। जहाँ स्त्रीयों का अपमान होता है, वहाँ सभी ज्ञानदि कर्म निष्फल होते हैं।

हर साल केवल आठ मार्च को ही महिला दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा।

चाँद शर्मा

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