हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


कल तक आडवाणी जी बीमार थे इस लिये वह गोवा नहीं जा सके थे। उन की अनुपस्थिति में बी जे पी की संसदीय कार्यकारिणी ने विधिवत नरेन्द्र मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया। अधिवेशन से गैरहाजिर रहै अधिकांश नेताओं ने अपनी गैरहाजिरी के कारण भी सार्वजनिक कर दिये जिस से सभी का मन-मुटाव भी शान्त हो गया। राजनाथ सिहँ तथा नरेन्द्र मोदी ने आडवाणी जी से आशीर्वाद भी प्राप्त कर लिया और शुभ संकेतों के साथ बी जे पी का सम्मेलन सम्पूर्ण होगया – देश में जोश, आत्म विशवास और आशा की नयी किरण चमक उठी।

आज आडवाणी जी के स्वास्थ में अचानक सुधार होगया तो उन्हों ने अपना त्यागपत्र भी दे दिया। हैरानी इस बात की है कि कल तक बी जे पी के सभी अध्यक्ष निरन्तर आडवाणी जी के परामर्ष और आशीर्वाद से ही पार्टी को चला रहै थे तो फिर ऐक ही रात में भारतीय जनता पार्टी अपने ‘आदर्शों’ से कैसे गिर गयी और ‘पार्टी के नेता’ देश की चिन्ता छोड कर ‘स्वार्थी’ कैसे बन गये? ऐसी विकट स्थिति अचानक कैसे पैदा हो गयी जब कि आडवाणी जी अध्यक्ष से भी ऊपर पार्टी के सर्वे-सर्वा की तरह सम्मानित थे। उन का नेतृत्व ऐकदम विफल क्यों हो गया?

फेलैशबेक में देखें तो कुछ समय पहले आडवाणी जी ने अपने ब्लाग लेख में ऐक भविष्यवाणी की थी कि ‘2014 में ना तो काँग्रेस का और ना ही बी जे पी का नेता प्रधान मंत्री बने गा बल्कि कोई गैर NDA और काँग्रेस का नेता प्रधान मंत्री बन कर सरकार बनाये गा’। आडवाणी जी के त्यागपत्र के तुरन्त बाद आज ममता बैनर्जी ने भी न्योता दिया है कि गैर NDA और काँग्रेसी दल ऐक जुट हो कर 2014 में चुनाव के लिये फ्रंट बनायें। आडवाणी जी ने कहीं वह भविष्यवाणी अपने लिये ही तो नहीं करी थी? BJP से त्यागपत्र के बाद आडवाणी जी अपने आप को पूर्णत्या ‘ग़ैर बी जे पी’ और ‘गैर काँग्रेसी’ साबित कर सकते हैं। आडवाणी जी सीधी बात करने के बजाये इशारों में बातें करना ज्यादा पसंद करते हैं जिस की रिहर्सल उन्हों ने अपने महाभारत लेख में अभी अभी करी है।

साफ और स्पष्ट बात तो यह लग रही है कि चाहै संघ ने बी जे पी के अध्यक्षों को मनोनीत किया था लेकिन आडवाणी जी बी जे पी को अपने स्वार्थ के लिये परोक्ष रूप से स्वयं चलाना चाहते हैं ताकि वह NDA का मनवाँछित विस्तार कर के प्रधान मंत्री बन सकें, या फिर गैर NDA और गैर काँग्रेसी बन के अपनी ही भविष्यवाणी को सार्थक कर सकें। इस मानवी इच्छा में आदर्शवाद का कोई स्थान नहीं है। कल तक आडवाणी समर्थक भाजपाई नेता चुप हो कर नरेन्द्र मोदी के पीछे खडे हो गये थे परन्तु आडवाणी जी से शह पा कर वही NDA ब्रांड ‘सैक्यूलर पंथी’ ऐक बार फिर मोदी के रास्ते में कांटे बिछा सकते हैं। उन के नाम और कारनामें सर्व विदित हैं। आजतक वह आडवाणी की मेहरबानी से वह संसद में पिछले दरवाजे से बैठे आराम कर रहै थे लेकिन नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व से उन्हें कुछ जलन होना भी स्वाभाविक है।

आडवाणी जी अपने अहं और निजि आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये बी जे पी के सांवैधानिक निर्णय को बदलने के लिये गाँधी जी की तरह का भावात्मिक दबाव बना रहै हैं और देश के युवाओं के मनोबल को तबाह करने में जुटे हैं। लेकिन आज देश में प्रत्येक हिन्दू युवा अपनी पहचान पाने के लिये नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की ओर आशापूर्वक देख रहा है। आडवाणी जी और उन के समर्थकों का युग हिन्दू युवाओं को अन्धकार में छोड कर समाप्त हो चुका है और नयी सुबह की किरणें फूट रही हैं। अगर आडवाणी आज बी जे पी छोड भी दें गे तो उन की हालत उस सूखे पत्ते की तरह हो गी जो पेड से गिर जाता है और केवल खाद बन जाता है।

देश को अब बीमार नेतृत्व नहीं चाहिये। गुजरात में हुए लोकसभा तथा विधानसभा के चुनाव में ‘विकास’ कोई मुद्दा नहीं था। काँग्रेस नरेन्द्र मोदी के सामने ‘विकास’ पर तो मूहँ ही नहीं खोल सकती। इस बार मुद्दा था गुजरात की असमिता, भारत की संस्कृति की पहचान और सुरक्षा का। काँग्रेस और मीडिया ने ‘गुजरात-दंगों’ का ढोल तो पीटा मगर मतदाताओं ने अपना फैसला स्पष्ट दे दिया है। वहाँ कोई ‘दंगे’ नहीं थे वह ‘जुल्म’ के खिलाफ ‘हिन्दू प्रतिकार’ था। 2014 के चुनाव में अगर बी जे पी विकास, घोटाले, तुष्टिकरण, आतंकवाद, गठबन्धन राजनीती की दल दल से अब बाहर निकल कर पहले भारत की हिन्दू पहचान को मुद्दा रख कर अकेली ही आगे बढे गी तो निश्चय ही जीत मिलेगी। देश के लोग विशेष कर युवा अब यही चाहते हैं।

आडवाणी जी जिस ऐन डी ऐ के कीचड में दोबारा बी जे पी को धकेलना चाहते हैं उस से बचने के लिये नरेन्द्र मोदी को दो तिहाई मत के साथ अपने दम पर ही सरकार बनाने दो। NDA में घटक दलों के स्वार्थी नेता किस तरह से अटल जी की सरकार को शिथल बनाते रहै थे यह किसी से छुपा नहीं है। वह अब फिर नये प्रधान मंत्री के साथ भी वही करें गे इस लिये बी जे पी को अपने दम पर ही आगे बढना होगा जिस के लिये कार्य कर्ताओं में जोश और आत्म विशवास है। इस आत्म विशवास के साथ आडवाणी जी अपनी निजि आकाक्षाओं की पूर्ति के लिये खिलवाड मत करें।

आडवाणी जी ने त्याग पत्र दे कर अन्य वृद्ध नेताओं के लिये ऐक अच्छी मिसाल तो कायम की है लेकिन अपनी और पार्टी को ऐक मजाक भी बना दिया है। उन से यह उमीद नहीं थी। अब भले ही आडवाणी जी अपनी बातें मनवा कर त्यागपत्र वापिस भी ले लें तो भी जो हुआ वह वापिस नहीं लाया जा सकता। देश हित में अच्छा यही होगा कि उन की आयु के सभी नेताओं को अब राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिये। यही भारतीय संस्कृति की मर्यादा है।

चाँद शर्मा

Advertisements

Comments on: "दुहाई आदर्शवाद की" (1)

  1. देश हित में अच्छा यही होगा कि उन की आयु के सभी नेताओं को अब राजनीति से सन्यास ले लेना चाहिये। यही भारतीय संस्कृति की मर्यादा है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

टैग का बादल