हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


इशरत जहाँ का ऐनकाऊंटर ‘असली’ था या ‘नकली’, यह तो अदालतें स्पष्ट करें गी। लेकिन अभी ऐक बात पूर्णत्या स्पष्ट है कि काँग्रेस और उस के धर्म निर्पेक्ष सहयोगियों को भारत के नागरिकों के जीवन की सुरक्षा की कोई चिन्ता नहीं। उन्हें पुलिस कर्मियों की निजि सुरक्षा और अधिकारों की तुलना में आतंकवादियों के ‘मानवाधिकारों’ की चिन्ता ज्यादा है। वह आतंकवादियों को पूरा ‘मौका’ देना चाहते हैं कि पहले आतंकवादी अपना ‘लक्ष्य पूरा करें’ ताकि पुलिस कर्मियों के हाथ ‘सबूत’ आ जाये कि भारतीय नागरिकों पर गोली चलाने वाले या बम फैंकने वाले वास्तव में ‘अपराधी थे’, ताकि हम उन पर बरसों मुकदमें चला सकें, कई तरह के कमिशन बैठा सकें, अपीलें सुन सकें और उन्हें रहम की फरियाद करने की बार बार छूट भी दें – और अगर उन आतंकियों की किसी तरह से ‘सहायता’ ना करी जा सके तो चोरी छिपे उन्हें मजबूर हो कर फाँसी पर लटका देँ। इस सारी परिक्रिया में अगर हमारे पुलिस कर्मी अगर जरा सी भी चूक करें तो पहले उन्हें जेलों में बन्द करें ताकि फिर कोई पुलिस कर्मी ‘हिम्मत दिखाने से पहले’ सरकार को दिखाने के लिये ‘सबूत दिखाये’।

तीसरा बडा स्पष्ट और सर्व-विदित तथ्य यह है कि काँग्रेस और उस के सहयोगियों को किसी के मानव अधिकारों की भी कोई चिन्ता नहीं जैसे कि साध्वी प्रज्ञा और उस के साथी बरसों से जेलों में पडे हैं। उन्हें चिन्ता है तो सिर्फ अपने वोट बैंक की जिस के सहारे वह वोटों का ध्रुवीकरण कर के चुनाव जीतें गे और फिर अगले पाँच साल तक ‘ऐशो-ईशरत’ करें। अदालती फैसले तो पहले भी होते रहै हैं और आगे भी होते रहैं गे। कितने आतंकियो और नक्सलियों को फाँसी दी गयी और उन की तुलना में कितने ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी मरे?

चौथा फैसला अब जनता को करना है। जनता निर्णय ले कि उन्हें इस तरह के ‘विधान’ और इस तरह की ‘कानूनी कारवाई’ के सहारे अपनी जान और आत्मसम्मान की रक्षा करनी है, अपने देश को आतंकियों से बचाना है या सिर्फ खोखले मानवाधिकारों के लिये देश और जनता को कुर्बान कर देना है। जहाँ देश और जनता का जनजीवन सुरक्षित नहीं वहाँ आतंकियों के मानवाधिकार, अदालतों के घिसे पिटे तरीके और नेता भी सुरक्षित नहीं। उन व्यवस्थाओं को भी बदलना होगा क्यों कि हर स्थिति में जनता के फैसले के खिलाफ विधान और वैधानिक सदन कोई अस्तीत्व नहीं रखते।

इशरत जहाँ का केस जरूर चुनावी मुद्दा बने गा और जनता का फैसला ही अन्तिम फैसला होगा।

इशरत जहाँ और उस के साथियों जैसे लोगों के आतंकवाद की वजह से जो भारतीय अपने शरीर के अंग, मां बाप, भाई बहन खो बैठते हैं उन के मानव अधिकारों की रक्षा कौन करे गा? हमारा संविधान? हमारी यू पी ऐ सरकार? हमारा दोगला मीडिया?हमारे भ्रष्टाचारी नेता?नाचनेवाले फिल्म स्टार? सबूतों के अभाव में जाने पहचाने अलगाव वादियों को बरी करने वाली न्यायपालिका? मानव अधिकारों की दुहाई देने वाले कुछ छिपे गद्दार? या फिर टीवी चैनलों पर आँसू दिखाने वाले मृत आतंकियों के रिश्ते दार?

इन सब में से कोई भी नहीं।

इशरत जहाँ और उन के साथियों के मारे जाने से करोडों भारतियों के दिल को स्कून मिला है, उन के शहीद हुये रिशतेदारों की आत्मा को शान्ति मिली है और वह सभी वनजारा आदि पुलिस कर्मियों के आभारी हैं।

अब वोटों की राजनीति करने वाली काँग्रेस उन के खिलाफ जो करना चाहे कर ले लेकिन यह पुलिस अधिकारी तो देश की जनता के हीरो बन चुके हैं।

अब सब से पहले तो आतंकवाद समर्थक काँग्रेसीयों और धर्म निर्पेक्षों को चुनावी मैदान में हरा कर व्यवस्थाओं को बदलने की कसम उठा लो।  हमारा लक्ष्य ऐक है – काँग्रेस मुक्त भारत निर्माण हिन्दुस्तान की पहचान और पुनरोत्थान।

चाँद शर्मा

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Comments on: "इशरतजहाँ या भारतवासी" (1)

  1. कांग्रेस के नापाक इरादों को सफल नहीं होने दिया जाएगा

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