हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


किसी वक्त ग़ुलाम भारत के स्वाभिमानी युवाओं से नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था – “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूं गा”। यह भारत का दुर्भाग्य था कि उस वक्त गांधी जी की जिद के कारण ही नेता जी को भारत से बाहर ‘अज्ञातवास’ में जाना पडा जहां से फिर वह लौट के ना आ सके। सुभाष चन्द्र बोस का साथ देने के बजाये गांधी ने भारत के युवाओं को अंग्रेजी साम्राज्य के हितों की रक्षा करने विश्व-युद्ध में भाडे के सैनिक बनवा कर झोंक दिया। विश्व युद्ध के बाद जब अंग्रेजी सैन्य शक्ति और आर्थिक शक्ति समाप्त होने के कगार पर आ गयी तो अंग्रेज़ों ने कांग्रेसी नेताओं से तोल-मोल कर के ‘हमें बिना खडग बिना ढाल आजादी’ दे दी और तब से हर 15 अगस्त के ‘बटवारा-दिवस’ पर हम ‘साबरमती के संत’ का गुण गान करने लग गये हैं।

सरकारी तंत्र का प्रचार

प्रधान मंत्री मनमोहन सिहं का आखिरी भाषण होने के कारण शायद 15 अगस्त 2013 भारत के इतिहास में याद रखा जाये गा क्यों कि वह ऐक कांग्रेसी प्रधानमंत्री का भाषण था जो आने वाले चुनावों को ध्यान में रख कर लिखा गया था। इस में देश की किसी भी तत्कालिक घटना को महत्व नहीं दिया गया और सिर्फ नेहरू गांधी परिवार के प्रधान मंत्रियों की उपलब्धियां ही गिनवाई गयीं और ‘फूड बिल’ का बखान अधिक किया गया था जिस को कांग्रेस चुनावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करे गी। ‘फूड बिल’ पास करवाने का क्रेडिट कांग्रेस ले गी और उस के असफल होने का ठीकरा राज्य सरकारों पर फोडा जाये गा। दूसरे अर्थों में – ‘हैडस आई विन, टेल्स यू लूज़’।

कांग्रेसी सरकार का ही ऐलान है कि फूड बिल आने से भारत के 67 प्रतिशत लोगों को ‘अब भरपेट खाना मिले गा’ और ‘कोई भूखा नहीं मरे गा’। इस का सरल अर्थ यह है कि आज तक  67 प्रतिशत भारतियों को ‘भरपेट खाना’ नहीं मिल रहा था और वह भूख के कारण मर रहै थे। यह भी याद रखिये कि ‘अब भरपेट खाना मिले गा’ और ‘भर पेट खाना मिल रहा है’ में भी बहुत अन्तर है क्योंकि दोनों के बीच में भ्रष्टाचार की गहरी नदी बहती रहती है जिस में अनाज और सुविधाये डूब जाती हैं और निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुँतीं। भ्रष्टाचार का जिक्र प्रधानमंत्री ने नहीं किया – क्यों कि वह कोई नयी बात नहीं रही।

अब जरा सरकार के अधिकृत आंकडों पर भी नजर डालिये।1947 में भारत का ऐक रुपया अमेरिका के ऐक डालर के बराबर था। आज अमेरिका का ऐक डालर भारत के 61 रुपयों से भी उपर है। भारत के योजना आयोग के अनुसार जो व्यक्ति 32 रुपये रोज कमाता है वह गरीब नहीं है। इस का सीधा अर्थ यह है कि भारत की 67 प्रतिशत जनता 32 रुपये ( 50 सैंट ) भी रोजाना नहीं कमा सकती और उन्हें पेट भरने के लिये 66 वर्षों बाद अब सस्ता अनाज फूड बिल के माध्यम से अगर नहीं दिया गया तो वह भूख से मरते रहैं गे। अब वह भुखमरी से बच कर भिखारी बन कर जिन्दा तो रहैं गे।

फूट की आधारशिला पर वोट बैंक

इस समय प्रश्न उठता है कि देश की ऐकता के लिये भारत सरकार ने बाकी 33 प्रतिशत लोगों के लिये सस्ते अनाज की ‘सुविधा’ प्रदान क्यों नहीं करी? टैक्स देने का बावजूद क्या उन्हें भारत की नागरिकता के अधिकार प्राप्त नहीं? भारत के नागरिकों को किस आधार पर भेदभाव कर के बांट दिया जाता है? इस देश के समर्द्ध वर्ग, और मिडिल क्लास को सरकारी दुकानों से सीमित मात्रा में सस्ता अनाज क्यों नहीं खरीदने दिया जाता? सरकार कानून बना सकती थी कि जिस किसी को भी राशन में सामित सस्ता अनाज लेना हो वह बिना भेद-भाव के ऐक ही पंक्ति में स्वयं खडे हो कर अपने परिवार का राशन स्वयं ले जायें। आप को लगता है कि हमारे क्रिकेटर, फिल्म स्टार या मध्यम वर्ग के लोग लाईन में लगते ? परन्तु सरकार ने देश की जनता का बटवारा क्यों किया? क्या यह फूट डाल कर वोट बैंक बनाने का खेल नहीं है? ‘तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें भर पेट खाना दूं गा’। क्या यही हमारा स्वाभिमान है जिस के दम पर हम विश्व में महा शक्ति बनने का दावा करते हैं?

काँग्रेस के अधिकृत सांसद प्रवक्ता राज बब्बर का कहना है कि 12 रुपये में भर पेट खाना खाया जा सकता है। इस का निषकर्श यह निकलता है कि ‘आजादी’ के बाद भी ‘सुपर पावर भारत के नागरिक’ अपना पेट भरने के लिये 20 अमेरिकी सैंट नहीं जुटा पाते कि वह भर पेट खाना खा सकें। इस लिये उन भूख से बिलखते हुये नागरिकों को जिन्दा रखने के लिये फूड बिल पास करना जरूरी था।

क्या किसी ने यह भी सोचा कि जो लोग अपना पेट भरने के लिये 20 पैसे भी नहीं जुटा सकते थे तो उन को मुफ्त में 20-25 हजार के लैपटाप मुफ्त में क्यों बांटे गये? क्यों उन्हें सबसिडी दे कर हवाई जहाज़ से हज और वैटिकन की यात्राओं पर भेजा जाता है जब कि वह अपने देश में 20 पैसे का खाना भी नहीं जुटा सकते? अच्छा ता यह होता कि फूड बिल के राशन के साथ सरकार उन्हें तन ढकने के लिये 30 सैन्टीमीटर कपडा भी दे देती ताकि पूरा देश लंगोटी बांध कर ही ऐक सूत्र में तो बंध जाता और भोजन-वस्त्र की ऐकता से गांधी का सपना साकार कर देता। लेकिन फिर फूट डाल कर वोट बैंक नहीं बनाया जा सकता था जो कि लक्ष्य था।

आज 66 वर्षों की ‘तथाकथित आजादी’ के बाद हमारे भ्रष्ट नेता चाहे अपनी पीठ थपथपाने के लिये अपने-आप को ‘महाशक्ति’ कहैं या ‘परमाणु सुपर-पावर’, लेकिन वास्तव में हम भिखारियों का समुदाय बन कर रह गये हैं। कडवी सच्चाई यह है कि हमारा देश ही अब हमारा नहीं रहा। भारत विश्व के सभी देशों की ‘सांझी धरती’ बनता जा रहा है जहां पाकिस्तानी, चीनी, बंगलादेशी, नेपाली, अफगानी, मयंमारी, श्रीलंका या कोई और भी कहीं से अपने भूखे नंगे नागरिकों, शस्त्रधारी आतंकियों को खुलेआम ला कर बसा सकता है और भारत का मूल वासियों को यहाँ से पलायन करने के लिये विवश कर सकता है। चुनावी मौसम के कारण इन सब बातों पर प्रधान मंत्री ने अपना समय नष्ट नहीं किया।

नेताओं का कोरस

वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं के लिये अब यही कोरस गीत उपयुक्त हैः-

अपनी आजादी को अब हम तो बचा सकते नहीं,

सिर कटा सकते हैं, लेकिन सिर उठा सकते नहीं

जो कोई घुसपैठिया सीमा के अन्दर आये गा,

वोह यहाँ का नागरिक ईक दिन में ही बन जाये गा,

बिरयानियाँ इस देश में उन को खिलाते जा रहै,

अपने घरों को तोड कर हम वोट उन के पा रहै।

करते रहै हैं हौसले जनता के देखो पस्त हम,

देश जाये भाड में अब तो रहैं गे मस्त हम,

अपनी यह नेतागिरी हरगिज गँवा सकते नहीं

सिर कटा सकते हैं, लेकिन सिर उठा सकते नहीं।

जय सोनियां – जय मन मोहन, जय – सोनियां जय मन मोहन…

चाँद शर्मा

Advertisements

Comments on: "भुखमरी से भिखारियों तक" (1)

  1. mukesh singhal said:

    देश हित में हमें जो करना है वह करना चाहिये।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

टैग का बादल