हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


गृहस्थ आश्रम हिन्दू समाज की आधारशिला है जिस के सहारे ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, सन्यास आश्रम तथा पर्यावरण के सभी अंग निर्वाह करते हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ऐकान्त स्वार्थी जीवन जीने के बजाये मानवों को अपने कर्मों दूारा प्राणी मात्र के कल्याण के लिये पाँच दैनिक यज्ञ करने चाहियें। हिन्दू समाज की इस प्राचीन परम्परा को विदेशों में भी अब औपचारिक तौर पर वर्ष में एक दिन निभाया जाता है। अफसोस की बात है कि हम अपनी परम्पराओं को पहचानने के बजाय समझते हैं कि यह प्रथायें विदेशों से आई हैं।

वर्तमान पीढ़ी के पास आज जो भी सुविधायें हैं वह सब पूर्वजों ने प्रदान की हैं। इसलिये वर्तमान पीढ़ी का दाईत्व है कि वह अपने पूर्वजों की देख भाल और सहायता करे। इसी धन्यवाद की परम्परा को विदेशों में ‘थैंक्स गिविंग डे ’ कहा जाता है। गुरु विद्यार्थियों को विद्या दान देते थे। उसे आज की तरह बेचते नहीं थे। उसी विद्या के सहारे गृहस्थी जीविका कमाते हैं यदि गुरुजन भी अपनी जीविका कमाने में लगे रहें गे तो नये अविष्कारों के लिये समय कौन निकाले गा? उस दान को भिक्षा नहीं कहा जाता था बल्कि दक्षिणा (पर्सनल ऐक्सपर्टाईज फीस) कहा जाता था। नरि यज्ञ का उद्देष्य समाज तथा मानव कल्याण है। विदेशों में इसे ‘सोशल सर्विस डे ’ कहा जाता है। हम प्रकृति से कुछ ना कुछ लेते हैं। हमारा कर्तव्य है कि जो कुछ लिया है उस की भरपाई करें, और प्राकृतिक संसाधनों में विकास करें। पेड़-पौधों को जल, खाद देना तथा नये पेड़ लगाना और इसी प्रकार के अन्य कार्य  इस क्षेत्र में आते हैं। वर्ष में एक अन्तर्राष्टीय पर्यावरण दिवस (इन्टरनेशनल एनवायर्मेन्ट डे) मनाने का आडम्बर करने के बजाये पर्यावर्ण संरक्षण के लिय प्रत्येक गृहस्थी को नित्य स्वेच्छा से अपने आसपास योगदान देना चाहिये।

इसी श्रंखला में पशु पक्षियों के लिये भूत यज्ञ का उद्देष्य पशु-पक्षियों तथा अन्य जीवों के प्रति संवेदनशीलता रखना है। भारत में  कुछ समृद्ध लोग पशु-पक्षियों के पीने के लिये पानी की व्यवस्था करते थे  परन्तु आज कल कई पशु पक्षी प्यासे ही मर जाते हैं। बीमार तथा घायल जीवों के लिये चिकित्सालय बनवाना भी मानवों की जिम्मेदारी है क्यों कि हम ने पशुपक्षियों के आवास उन से छीन लिये हैं। विदेशियों ने तो पालतु जानवरों को छोड़ कर अन्य जानवरों का सफाया ही कर दिया है किन्तु गर्व की बात है कि भारत में अब भी कुछ लोग चींटियों और पक्षियों के लिये आनाज के दाने बिखेरते देखे जा सकते हैं, लेकिन मानवों ने पक्षियों के घर उजाड दिये हैं।

बडे नगरों में आजकल हमारे आस पास के वातावरण से कई पक्षी लुप्त हो चुके हैं। गिद्धों की संख्या कम हो जाने से सरकारें भी चिंतित हैं। घरेलू चिडिया जो कई तरह के कीडों को खा कर हमारे घरों का वातावरण साफ रखती थीं अब दिखाई ही नहीं देतीं। घरेलू मैना भी नहीं रही। कबूतरों आदि को रहने के लिये कोई स्थान नहीं मिलता। अगर वह घर का आस पास कहीं अण्डे देते हैं तो लोग उन्हें फैंक देते हैं। ऐसा ही चलता रहा तो ऐक दिन वह पक्षी भी हमारे पर्यावरण से गायब हो जायें गे। हम सिर्फ कंकरीट के जंगलों में निवास करें गे।

लेकिन ऐक उपाय है – हमें अपने घरों के आस पास पक्षियों के लिये ना सिर्फ दाना – पानी रखना चाहिये बल्कि उन के आवास के बारे में भी सोचना चाहिये। अगर आप पुराऩी हवेलियों को देखें तो घरों की बाहरी दीवारों पर आले बनाये जाते थे जिन में कई तरह के पक्षी अपना घोंसला स्वयं बनाते थे। आज कल लोग घरों के बाहर आले बनवाते ही नहीं। फलैट कलचर में तो यह बातें अनजानी सी लगती हैं। फिर भी अगर इच्छा हो तो हम बहुत कुछ पक्षी आवास के लिये कर सकते हैं।

अपने घरों के आस पास जहाँ भी पैड हैं हमें वहाँ लकडी, मिट्टी या किसी अन्य वस्तु के घौंसले बन्धवाने चाहियें जो पक्षियों को धूप, बारिश, आँधी, बिल्ली और कुत्तों से सुरक्षा प्रदान करें। उन में घास फूस पक्षी अपने आप लगा लें गे। किसी आर्किटैक्ट या डिज़ाईनर की भी ज़रूरत नहीं। घौंसले पेड की मोटी टहनियों के साथ  जमीन से 12-15 फीट ऊँचे बन्धे या कीलों से जुडे होने चाहियें जिन में पक्षी आसानी से आ जा सकें और उन के बच्चे नीचे नहीं गिरें।

इस काम के लिये ऐन जी ओ बना कर उसे रजिस्टर करवाने के चक्कर में नहीं पडें क्योंकि जब ऐन जी ओ आती हैं तो उस के साथ ही कई औपचारिक्ताये भी आ जाती हैं। इनकम टैक्स, आडिट, घोटाले, मतभेद सभी कुछ जुडने लगते हैं। बस स्वयं अपने धन से निस्वार्थ ही लग जाईये। कोई आप के साथ जुडे या नहीं जुडे यह देखने वालों पर छोड दीजिये। युवाओं को प्रोत्साहित कीजिये और किसी सरकारी मदद का इन्तिजार मत कीजिये।

इस के ऐवज में ना तो आप को कोई भारत रत्न दे गा और ना ही आप का नाम गिनीज बुक में दर्ज होगा। बस – आप के आस पास का पर्यावरण सुधरे गा – पक्षियों को चहकते और उडते देखें गे तो आप को अमूल्य प्रसन्नता मिले गी। अगर आप को सुझाव पसन्द है तो लाईक नहीं करें – काम शुरू करें। जब आप के पक्षी आवास में कोई पक्षी रहने लग जाये और अपने अण्डे दे दे तो अपने प्रयास को सफल समझें और सभी के साथ शेयर करें। निश्चय मानियें वह आनन्द आलौकिक होगा।

चाँद शर्मा

इस लेख के पश्चात श्री जयप्रकाश डंगवाल रचित मन को छूने वाली की ऐक कविता आभार सहित जोडी गयी है।

(चाँद शर्मा)
एक खूबसूरत चिड़िया अक्सर चहचहाते हुए दिख जाती थी,
मुझे देखते ही, फुर्र से न जाने क्यों वह झट से उड़ जाती थी।

मैं, उस प्यारी चिड़िया से पूछता था: मुझसे क्या खता हुई थी,
लेकिन, कुछ बताने के बजाय, वह और भी दूर चली जाती थी।

मैं, उसे कहता रहा, मैं खुदा का नेक बंदा हूँ, कोई सय्याद नहीं,
मुझे तेरा चहचहाना, बहुत अच्छा लगता है, और कुछ भी नहीं।

उसने, मेरे आँगन में आना छोड़ दिया, कहीं और चहचहाने लगी,
थोडा सकूं था उसकी खैरियत मुझे इस तरह से अब मिलने लगी।

यकायक वह गायब हो गई और उसकी बेइंतहा फ़िक्र मुझे हो गई,
बहुत तलाशा पर कोई खबर नहीं मिली, न जाने वह कहाँ खो गई।

मुझे उससे कोई शिकायत नहीं,अगर शिकायत है तो वह खुद से है,
पंछी का कोई ठिकाना नहीं होता उसका खैरख्वाह तो खुदा होता है।

–  जयप्रकाश डंगवाल

 

 

 

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Comments on: "पक्षी आवास" (4)

  1. Thapliyal Virendra said:

    bhaut khoob

  2. Jaiprakash dangwal said:

    Bahut sahi kaha Sharma ji aapne.

    • चाँद शर्मा said:

      लेख की प्रशंसा के लिये धन्यवाद। मुझे आप की कविता इतनी अच्छी लगी कि मैं ने उसे लेख के साथ जोड दिया है आशा है आप अनुमति दे कर मुझे कृतार्थ करें गे।

  3. Sharma ji aapki is sahridayta ke liye dhanyvaad.

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