हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


मैं संत आसाराम या किसी भी धर्मगुरू का औपचारिक शिष्य नहीं हूँ। आसाराम आज कल अपने अभिमान और छिछोरेपन की वजह से अपमानित हो रहै हैं तथा घृणा और उपहास के पात्र बन गये हैं। उन का सब से बडा अपराध है कि उन्हों ने गुरू परम्परा को कलंकित किया है। उन के लिये अब ऐक ही रास्ता है कि चरित्र-हीनता के जो कुछ दोष उन पर लगे हैं उन सभी से अपने आप को कोर्ट में निरापराधी साबित करें या फिर कडी सजा भुगतने के लिये तैय्यार रहैं।

लेकिन आसाराम के गुनाहों से कहीं अधिक हमारा मीडिया गुनाहगार है जो केवल आरोपों की सूची के आधार पर कम से कम अब तक के ऐक जन-मान्य संत का चरित्र हनन करने में गैर कानूनी ढंग से मनमानी कर रहा है। जब तक आसाराम के विरुद्ध कोर्ट में कोई आरोप परमाणित नहीं हो जाता तब तक हमारे देश के कानून अनुसार आसाराम और उन का परिवार निरापराध ही माना जाये गा। मीडिया को कोई हक नहीं कि वह दिन रात उस व्यक्ति के चरित्र पर कीचड उछालता रहै जिस को देश के हजारों लोग संत मानते रहै हैं और कई आज भी मानते हैं।

अगर मीडिया को पीडित महिलाओं की सहायता करनी है तो उन्हें आर्थिक सहायता दे दें ताकि वह अपने लिये वकील कर सकें, उन महिलाओं को आश्रय दे दें जिन की सुरक्षा को खतरा है या जिन का पास साधन नहीं हैं – ताकि वह कोर्ट में जा कर अपराधी के विरूद्ध सबूत पेश कर सके। उन पीडितों के चेहरे ढक कर टी वी चैनलों पर अपनी वर्षों पुरानी व्यथा सुनाना नाटकबाजी के सिवाय और कुछ नहीं।

आज कल दो तीन आर्थिक तौर से बीमार किसम के टी वी सुबह से शाम तक आसाराम और उस के परिवार के विरुद्ध जो आनाप शनाप बकवास करते रहते हैं उन पर अंकुश लगना चाहिये और उन के खिलाफ कडी कारवाई होनी चाहिये। अगर ऐसा नहीं होता तो यह साफ है कुछ धर्मान्त्रण करवाने वाले हिन्दू विरोधी तत्व ऐक हिन्दू संत को अपमानित करने का यत्न कर रहै हैं और हमारा समाज तथा सरकारी तन्त्र यह सब कुछ खामोशी का आवरण ओढ कर देख रहा है। पहले स्वामी नित्या नन्द को, और फिर निर्मल बाबा को टीवी चैनलों के माध्यम मे दुष्प्रचार से बदनाम किया जा चुका है। अब आसाराम इस का शिकार हो रहा है । फिर स्वामी रामदेव का नम्बर लगेगा। शर्म की बात है कि ईर्षालु किस्म के कुछ बिकाऊ संत भी आसाराम के विरुद्ध इस घिनौने खेल में जुडे हुये हैं।

हिन्दू संत समाज अपने इतिहास से ही कुछ सीखे और आसाराम के विरुद्ध मीडिया प्रचार का विरोध करे। अगर पीडित महिलाओं को अपनी कहानी टीवी पर सुनानी है तो उन्हें चेहरा छुपाने के बजाये खुल कर बोलना चाहिये ताकि जनता उन की सच्चाई को भी परख सके। उन की व्यथा पर  तो अब निर्णय तो कोर्ट ने लेना है तो उन्हें अपनी कहानी जनता के बजाये कोर्ट को ही सुनानी चाहिये। ढके हुये चेहरे के पीछे जनता के सामने तो कोई भी किसी के खिलाफ कुछ भी बोल सकता है।

चांद शर्मा

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Comments on: "मीडिया की माफ़ियागिरी" (1)

  1. ashok gupta said:

    i am 1000 % agree with you.
    in a country where courts are already sold, what you can expect frrom poor media.
    what they can do except dancing on the rythem of money giver.

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