हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


राम लीला पर हिन्दूओं के चीखने चिल्लाने के बाद अस्थाई प्रति बन्ध लगा और खत्म हो गया। हिन्दूओं की भावनाओं पर ज़ख्म लगा, उस पर नमक छिडका कर घाव को वैसे ही छोड दिया गया क्योंकि हमारा देश धर्म-निर्पेक्षता की चादर ओढे रहता है और हिन्दूओं की आस्थाओं का अपमान करना कट्टर धर्म-निर्पेक्षता का ही प्रमाण पत्र माना जाता है। सभी को पता है कि हिन्दू अपमान सहने और पिटने के इतने आदी हो चुके हैं कि वह खिसायने हो कर अपमान को धर्म-निर्पेक्षता का प्रसाद समझ लेते हैं। अपने आप को ‘ब्राडमाईडिड’ दिखाने की कोशिश करते रहते हैं।

फिल्म ‘बिल्लू-बारबर’ में शारुख खां को व्यक्तिगत रूप में ऐक ‘महान व्यक्ति’ दिखाया गया था। उस फिल्म में नाई व्यवसाय का अपमान नहीं किया गया था लेकिन नाईयों के विरोध जताने पर, फिल्म के नाम को नाई समुदाय की भावनाओं पर आघात मान कर फिल्म का नाम बदल दिया गया था। अतः नाम का महत्व है।

हिन्दू समाज में ‘रामलीला देखने’ देखने मात्र के साथ ही रामायण से जुडी सभी बातें अपने आप उजागर हो आती हैं, अतः फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली का यह कथन कि ‘उस की फिल्म का भगवान राम के साथ कुछ लेना देना नहीं’, ऐक कोरी बकवास है। क्या कोई अपने पालतू जानवर का नाम किसी अन्य़ धर्म के जन्मदाता या किसी पार्टी के राजनैता के नाम पर रख सकता है?

इस का मतलब यह है कि फिल्म का नाम रामलीला रखो या कृष्णलीला, और फिल्म में कुछ भी दिखा कर पैसा कमाओ। किसी को आपत्ति हो तो कह दो कि इस का आप के इष्ट राम या कृष्ण से कोई लेना देना नहीं है। क्या हमारी न्यायपालिका, फिल्म निर्माता और मीडिया यह नहीं जानते कि जैसे मुहम्मद, नानक और जीसस के नाम मुस्लमानो, सिक्खों तथा इसाईयों के लिये पवित्र हैं उसी तरह राम और कृष्ण के नाम ही हिन्दूओं के लिये पवित्र हैं? क्या फिल्म निर्माता भंसाली साहस कर दिखायें गे कि मुहम्मद, नानक या जीसस का नाम रख कर पैसै कमाने के लिये बकवास फिल्म बनायें और फिल्म राम-लीला जैसी प्बलिसिटी करें ?

संविधान के अनुसार देश की न्यायपालिका को संसद में पास किये गये कानूनों के पालन करने और करवाने का अधिकार है, कानून बनाने का अधिकार नहीं। उच्च न्यायपालिका (हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) संसद में बनाये गये कानूनों की व्याख्या कर सकती हैं लेकिन अपनी किसी नयी परिभाषा को देश वासियों पर थोप नहीं सकती। फिर कैसे फिल्म ‘बिल्लू-बारबर’ केवल ‘बारबर’ शब्द जोडने से ही नाई समुदाय की भावनाओं को आघात पहुँच गया और हिन्दू समुदाय को ‘रामलीला’ की आड में अशलील बकवास दिखाने से आघात नहीं पहुँचा?

देश की कानून व्यवस्था में अच्छे बुरे में पहचान उस देश की जनता की आस्थाओं के आधार पर होती है। संसद वही कानून बना सकती है जिस का देश की जनता बहुमत से समर्थन करे। इस में न्याय संगत होने या ना होने का कोई अर्थ नहीं। कोई न्याय संगत विचार भी ऐक देश की जनता की भावनाओं के अनुसार बुरे कहै जा सकते हैं और दूसरे देश में न्याय के विरुद्ध भी अगर कोई विचार हैं तो स्थानीय जनता उन्हें समर्थन दे कर लागू करवा सकती है।  अवैध यौन सम्बन्धों की सजा कई इस्लामी देशों में ‘संगसार’ (सार्वजनिक तथा सामूहिक मृत्यु दण्ड) है और उन देशों में स्वीकृत है । योरुपीय देशों में अवैध यौन सम्बन्धो का होना केवल ऐक सामाजिक बुराई मात्र है। अतः न्यायपालिका को यह अधिकार नहीं कि वह हिन्दूओं पर ही धर्म निर्पेक्षता की आड में इकतरफा सैकूलरिजम थोपे और अन्य लोगों के प्रहार पर आँखें मूंद कर केवल हिन्दूओं को उदारता की सलाह देती रहै।

यह देश का दुर्भाग्य है कि हमारे राजनैतिक दल हिन्दूओं के अपमान पर मूहँ नहीं खोलते। उन्हें वोटों की चिन्ता ने अपंग बना दिया है। हिन्दू समाज का कोई ‘वोट-बैंक’  नहीं है जो उन के सम्मान की रक्षा करने का साहस करे और नेताओं को कान से पकड कर अपनी बात मनवा सके। इसलिये आज के परिपेक्ष में हिन्दूओं के लिये यह अनिवार्य होता जा रहा है कि वह अपने हितों की रक्षा करने के लिये राजनैतिक ऐकता जुटायें और ऐक संगठित वोट बैंक कायम करें। अन्य समुदाय फतवा, सरमन, हुक्मनामा आदि से अपने समुदाय को संगठित रखते हैं लेकिन हिन्दू समुदाय ने ‘सामाजिक बहिष्कार’  के परावधान को ठंडे बस्ते में डाल छोडा है जिस के कारण वह अपनी ही जन्मभूमि में आये दिन अपमानित होते रहते हैं, पिटते रहते हैं और मरते रहते हैं। ऐम ऐफ हुसैन जैसा सिरफिरा पेंटर हिन्दू आस्थाओं का उपहास करता रहा और भारत सरकार इस बात को व्यक्तिगत अधिकार मान कर उसे सम्मानित करती रही। अगर हिन्दू संगठित होते तो किसी संस्थान की यह जुर्रत ना होती कि वह हमारे ही देश में हमारे सम्मान की दुर्गति करने का साहस कर सके। क्या कोई सोच सकता है कि मुहम्मद का अपमान किसी मुस्लिम देश में करे और वहाँ की सरकार और न्यायपालिका चुप रहै?

फिल्म रामलीला पर रोक हटाने के फैसले पर हिन्दू संगठनो को ऊपरी अदालतों में अपील करनी चाहिये। यह काम कोई व्यक्तिगत तौर पर करना कठिन है अतः विश्व हिन्दू परिष्द या सामर्थवान धर्मगुरूओं को पहल करनी चाहिये। अपने मान-सम्मान की रक्षा करने का हिन्दू समाज को पूरा अधिकार है। हिन्दू समाज को संविधान के अनुसार कडा विरोध भी करना चाहिये। प्रश्न सिर्फ फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने तक ही सीमित नहीं बल्कि जानबूझ कर फिल्म निर्माता ने ऐसा नाम क्यों चुना इस के लिये उसे कानून अनुसार कडी सजा भी मिलनी चाहिये।

व्यकतिगत तौर पर यह प्रत्येक हिन्दू का फर्ज है कि वह इस फिल्म को ना देखें और संजय लीला भंसाली तथा उस के अभिनेताओं की फिल्मों का स्वेछा से और कानून के अनुसार बहिष्कार करें। याद रखो –

जिन्दा है जो इज्जत से वह इज्जत से मरे गा।

चाँद शर्मा

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