हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


(केवल व्यस्कों के लिये)

काँग्रेस डायन मर चुकी है। लेकिन चुनाव के समय से पहले मरने को अकाल-मृत्यु कहते हैं और मृतक की गति नहीं होती। सत्ता प्राप्ति की अंतिम इच्छा अधूरी रह जाने के कारण काँग्रेसियों की आत्मा प्रेत-योनियों में भटकती रहै गी। उन की संतप्त आत्मायें या तो वर्तमान प्रेत योनि में या जो कोई भी सड़ा गला शरीर हाथ लगे गा उसी में प्रवेश कर जायेंगी और उसी शरीर के माध्यम से अपनी अतृप्त इच्छाओं को संदेश भी देती रहैं गी। वह शरीर किसी का भी हो सकता है चाहे मुलायम सिहं की समाजवादी पार्टी, या मायावती की बहुजन समाज पार्टी, या ममता की तृणमुल काँग्रेस या कोई और पार्टी हो सकती है।

काँग्रेसी अपनी लाश को पुनर्जीवित करने के प्रयास अभी भी लगातार कर रहै हैं लेकिन उम्मीद टूट चुकी है। भ्रष्टाचार के पापों की वजह से काँग्रेस को पहले से ही अपनी अकाल मृत्यु का आभास था। इस लिये सत्ता प्राप्ति के लिये काँग्रेसियों ने अन्ना हजारे नाम के मदारी से सम्पर्क कर के केजरीवाल नाम का ऐक जिन्न पैदा किया था। बोतल से बाहर आने के बाद वह जिन्न इतना बडा हो गया कि उस ने दिल्ली में काँग्रेस को ही खा लिया और वह डायन अकाल मृत्यु को सिधार गयी। जिन्न की अपनी सत्ता लालसा भी अधूरी ही रही इस लिये वह भी प्रेत योनि में पडी काँग्रेस के सम्पर्क में है। दोनों वेम्पायर बन चुके हैं। अब काँग्रेसी अपना मूल-शरीर त्याग कर आम-आदमी के शरीर में निवास तलाशने की भरसक कोशिश करें गे ताकि सत्ता की अतृप्त लालसा को पूरा कर सकें।

डायन ने पिछले साठ वर्षों में देश का इतना खून पिया कि सारा वातावरण ही दुर्गन्ध से भर चुका है। उस के सम्पर्क के कारण कई छोटे मोटे प्रेत विभिन्न क्षेत्रों में पैदा हो चुके हैं और जनमानस को त्रास्दी दे रहै हैं।

क्षेत्रीय तथा परिवारिक राज नेता

जिस तरह साँप केंचुली बदल कर भी जहरीले रहते हैं उसी तरह क्षेत्रीय तथा परिवारिक राज नेता भी पार्टियों के नाम बदल कर भी कूयें के मैँडक बने रहते हैं। उन की संकुचित विचारधारा और स्वार्थिक कार्य शैली हर नये दिन के साथ देश को पीछे ही धकेल रही है। जब चुनाव नहीं होते तो यह लोग भ्रष्ट तरीकों से धन कमाने में लगे रहते हैं, विदेशों में घूमने चले जाते हैं, अपने आप को बेच कर पार्टी बदलने की कीमत वसूलते हैं, परिवारिक बिजनेस देखते हैं, अपने ऊपर चलने वाले मुकदमों की पैरवी करते रहते हैं। और कुछ नहीं तो बस आराम करते हैं। आम जनता को भी उन की कोई परवाह नहीं होती कि वह जिन्दा हैं या मर चुके। चुनावी बादलों की गर्जना सुनते ही गटर के काकरोचों की तरह वह बाहर निकल आते हैं, नये गठ जोड तलाशते हैं। अपने जिन्दा होने के सबूत के तौर पर नये लोक-लुभावन नारे सुना देते हैं। कई तो सडकों पर त्योहारों का बहाना ले कर जनता के लिये ‘ शुभकामनायें ’ चिपका देते हैं। वास्तव में यही नेता हमारे राज तन्त्र का अभिशाप हैं और देश की समस्याओं की ऐसी जड हैं जहाँ से समस्याओं के अंकुर फूटते ही रहते हैं। यह नेता अंग्रेजी शब्द सैकूलर की परिभाषा पर खरे उतरते हैं क्योंकि वह किसी भी आस्था, धर्म, परम्परा में विशवास नहीं रखते और आत्म सन्तुष्टि ही इन का चिरन्तर निरन्तर लक्ष्य होता है।

घिसे-पिटे नेता

इस श्रेणी में दो तरह के नेता हैं। पहली श्रेणी के नेता छोटे चूहों की तरह हैं। जैसे छोटे चूहे अनाज के भण्डारों से छोटी मात्रा में चोरी करते हैं लेकिन जब उस का हिसाब लगाया जाये तो बरबादी हजारों टन की हो जाती है। संसद या विधान सभाओं में इन के पास तीन चार सीटें ही होती हैं। लेकिन देश में सभी को मिला कर यह 90 -100 सीटें खराब कर देते हैं।

दूसरे मोटे चूहे हैं जिन के पास 15 -20 तक की सीटें होती हैं जिस के आधार पर वह मोल भाव करते हैं। वह अपने आप को ‘ किंग-मेकर ’ समझते हैं। यह लोग चुनाव से पहले या उस के बाद की तरह के गठ बंधन बना लेते हैं और फिर सत्ता में अपना भविष्य सूधारते रहते हैं।

उन का योग्दान

लगभग इन घिसे पिटे नेताओं में ना तो कोई शैक्षिक योग्यता है ना ही उन की कोई सोच समझ या कार्य शैली है। यह सिर्फ देश को प्रदेशों, जातियों, वर्गों या  परिवारों के आधार पर बाँटे रखते हैं और कोई भी महत्व पूर्ण काम इन के नाम से नहीं जुडा हुआ इस देश में है।  अगर चुनाव के वक्त वह सत्ता में हैं तो अपने घर के आसपास तक रेलवे लाईन बिछवा दें गे, हवाई अड्डा बनवा दें गे, अपनी जाति के लोगों को आरक्षण दिलवा दें गे, दूसरी जाति के सरकारी कर्मचारियों के मनमाने तरीके से तबादले करवा दें गे, सरकार खजाने से लेपटाप और इसी तरह की दूसरी वस्तुयें बटवायें गे और भ्रष्टाचारी गोलमाल भी करें गे। कुछ ऐक बडे बडे वादे जनता से करें गे कि अगर वह सत्ता में आ गये तो बिजली, पानी, अनाज, प्लाट आदि मुफ्त में दे दें गे। बदले में इन नेताओं को भारी भरकम वेतन, भत्ते, बंगले, सुरक्षा कर्मियों के दस्ते, लाल बत्ती की गाडियां और आजीवन पेनशन मिल जाती हैं।

आम आदमी पार्टी

काँग्रेस की अवैध संतान होने के कारण आम आदमी पार्टी में भी पैशाचिक लक्षण ही हैं। वह माओवाद, नकसलवाद, राष्ट्रद्रोह तथा बाहरी पैशाचिक शक्तियों से ही प्रेरित हैं। लेकिन भारतीय युवाओं को बरगला कर उन का रक्त पी लेने के कारण कुछ समय बाद उन में कुछ सद्गुण प्रगट होने की आशा करी जा सकती है। अभी बहुत से बुद्धिजीवी और परिस्थितियों से असंतुष्ट बुद्धिजीवी उन्हें आश्रय देने को तत्पर हैं जिस कारण अगर उन्हों ने केजरीवाल के तिलसिम से छुटकारा पा लिया तो आनेवाले समय में वह कुछ सत्कर्म भी कर सकें गे। इस की सम्भावनायें निकट भविष्य में बिलकुल ही नहीं हैं क्यों कि उन का शद्धिकरण नहीं हुआ।

जरा सोचिये

जो नेता या पार्टीयां लोक सभा या विधान सभा के लिये 60 प्रतिशत से कम प्रत्याशी खडे करती हैं वह कभी भी सरकार नहीं बना सकतीं और उन का चुनाव में आना सिर्फ मोल भाव कर के अपना जुगाड बैठाना मात्र है। उन पर अपना वोट और देश के संसाधन क्यों बरबाद करने चाहियें? बटवारे के बाद आज तक हम इसी तरह के लोगों का शिकार होते रहै हैं। क्या हमारा आर्थिक ढांचा इन लोगों की अनाप शनाप बातों को सहन करते रहै गा। अब वक्त आ गया है कि 2014 के चुनाव में इन नेताओं को हमेशा के लिये देश की राजनीति से बाहर कर दिया जाये। यह सभी चेहरे जाने पहचाने हैं।

चाँद शर्मा

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