हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिये वरूण गांधी की दावेदारी घोषित कर के मेनका गांधी ने अपना उतावलापन ही दिखाया है। हर मां का सपना होता है कि उसी का पुत्र राजसिहांसन की सब से बडी पदवी पर बैठे। कौशल्लया से लेकर कैकेयी, सत्यवती, कुन्ती, जीजाबाई, इन्दिरा गांधी, और सोनियां गांधी वही करती रही हैं जो अब मेनका गांधी ने चाहा है लेकिन मेनका गांधी ने यह कह कर वरुण की सहायता नहीं करी बल्कि उस के रास्ते में कांटे बो दिये हैं।

वरुण युवा हैं, पढे लिखे हैं, लेकिन वह कितने सक्षम हैं यह प्रमाणित करने का उन के पास अभी तक कोई महत्वपूर्ण अवसर नहीं आया है। अभी तक वरूण गांधी अपनी मां के संरक्षण में अपना पब्लिक मेकअप ही करते रहै हैं। संजय मेनका और गांधी परिवार के सदस्य की पहचान के साथ ही जुडे हुये हैं और उसी के आधार पर संसद के सदस्य बने हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के साधारण कार्यकर्ता भी नहीं रहै। नेहरू गांधी परिवार का सदस्य होना भारत में राजनैजिक ऊचाई की पादान पर चढने का सफल परमिट माना जाता था लेकिन आज कल यही स्टिकर अभिशाप बन कर वरूण को आगे नहीं बढने देगा। उत्तर प्रदेश में बाप-बेटे मुलायम-अखिलेश सरकार की विफलता के तुरन्त बाद मां-बेटे वरुण-मेनका की सरकार को लोग पसन्द नहीं करें गे। अभी तक तो वरुण की पहचान ‘म्माज ब्वाय’ ही है। उस को अपनी स्वतन्त्र पहचान लोगों के दिलों में बैठानी होगी।

राहुल गांधी ने अपनी कथनी और करनी से साबित कर दिया है कि वह किसी पदवी के लायक नहीं। काँग्रेस में ही अब उसे प्रियंका गांधी से बदली करने की बातों पर विचार हो रहा है क्योंकि काँग्रसियों के नेतृत्व के लिये नेहरू गांधी परिवार का वारिस होना ही ऐकमात्र अनिवार्य योग्यता मानी जाती है – भारतीय जनता पार्टी में यह नहीं। काँग्रेस पार्टी में कोई भी नवजात नेहरू गांधी परिवार का पट्टा गले में डाल कर घर से बाहर निकले तो काँग्रेसी हाथ जोड कर मुख्य मंत्री से प्रधान मंत्री तक की कुर्सियां उस के स्वागत में खाली कर के खडे हो जाते हैं परन्तु भारतीय जनता पार्टी में ऊपर उठने के लिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा और हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीयता की सोच के साथ सक्षमता का होना भी जरूरी है।

वरूण को स्पष्ट करना हो गा कि उन के विचार स्वयं सेवक संघ की विचार धारा और हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीयता के कितने समीप हैं। धारा 370, समान आचार संहिता, और नेहरू गांधी की धर्म निर्पेक्षता और इसी प्रकार के अन्य विषयों के बारे में उन के स्पष्ट विचार क्या हैं।

वरूण का प्रशासनिक अनुभव ना होने के बराबर है क्यों कि आज तक उस ने किसी महत्वपूर्ण पद पर काम नहीं किया। यूनिवर्स्टी की डिग्री के साथ अनुभव लेने में जो समय लगता है उसे टेलीस्कोप नहीं किया जा सकता। वरूण को पहले पार्टी के अन्दर अपनी संगठन योग्यता दिखानी होगी फिर किसी दूसरे मुख्य मंत्री के मन्त्री मंडल में किसी पद पर प्रशासनिक अनुभव लेना होगा तब जा कर वह स्वतंत्र तौर पर मुख्यमंत्री के सपने साकार करने की सोच सकते हैं।

मां का सपना और आशीर्वाद अपनी जगह है लेकिन उस के साथ पार्टी के कार्यकर्ताओं का सहयोग और समर्थन होना भी जरूरी है जिस के लिये वरूण को पहले जमीन से जुडना होगा और जमीन पर ही बैठना होगा। अगर वरूण यह सभी कुछ कर चुके हैं या करने पर कटिबद्ध हैं तो उन के लिये मुख्य मंत्री तथा उस से भी ऊपर सभी रास्ते खुले हैं। अभी से वरुण का नाम उछाल देने से कटुता या प्रतिस्पर्धा के वरूण के सिवाये वरुण हाथ कुछ नहीं लगे गा। यह सभी जानते हैं कि आज अगर वरूण और मेनका गांधी भारतीय जनता पार्टी के साथ जुडे हुये हैं तो इस में राष्ट्रीयता की भावना के साथ पदवी की चाहत भी जुडी हुयी है। मां के सपने को साकार करने के लिये उन को पहले इस आक्षेप से मन कर्म और वचन के साथ बाहर आना होगा।

चाँद शर्मा

 

 

 

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