हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


कैलाश सत्यार्थी को बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिये नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो अचानक सभी भारतीयों का दिल गर्व से भर गया। मुझे भी यह मानने में कोई झिझक नहीं कि मेरा दिल शर्म से भर गया। मैं ने इस महा पुरुष का नाम ही पहली बार सुना है। शायद मेरे जैसे अज्ञानी भारत में ऐक दो तो और भी मिल जाये गे।

बचपन से आज तक मैं तो यही सुनता रहा हूँ कि भारत में बच्चों से प्यार करने वाले का नाम जाहरलाल नेहरू था जिन का जन्मदिन बाल-दिवस के तौर पर बच्चों से हम लोग मनवाते रहते हैं।

  • बच्चों से प्यार करने वाले अन्य महा पुरुष का नाम स्वामी अग्निवेश है जो बन्धुआ मजदूरी करते हुये बच्चों की नौकरी लड-झगड कर छुडवा तो देते हैं लेकिन फोटो खिचने और अखबार में खबर छपने के बाद फिर उन बच्चों के खाने-पीने और शिक्षा-दीक्षा का क्या होता है और वह आगे जीवन में क्या करते हैं यह कोई नहीं जानता।
  • ऐक और ग्रौन-अप बच्चे का नाम भी बाल-संरक्षण जुडा हुआ है वह मास्टर पप्पू उर्फ राहुल गाँधी का है। उन्हों ने बच्चों को भोजन के साथ शिक्षा का अधिकार भी दिलवा दिया था। वह अधिकार क्या हैं, और किधर से प्राप्त हो सकता है यह आप सडक पर किसी भी भीख मांगते बच्चे को बुला कर पूछ सकते हैं।
  • मीडिया में आये दिन पढने को मिलता है कि अमुक स्थान पर ऐक बच्चा खुले बोर वेल में गिर गया था जिसे निकालने के लिये दूर दराज से मिलिट्री के उपकरण मंगाये जाते हैं, ऐम्बुलेंस खडी करी जाती हैं, मुख्यमंत्री या कोई अन्य मन्त्री बच्चे की शिक्षा और इलाज के लिये लाखों रुपये के अनुदान की घोषणा भी तुरन्त ही कर देते हैं। लगे हाथों यह भी पता चलता है कि बच्चे की मां बच्चे को राम-भरोसे छोड कर किसी खेत में मजदूरी कर रही थी जब बच्चा बोर-वेल में गिर गया था। दिन भर इस शो का लाईव-टेलीकास्ट चलता रहता है। बच्चा कभी-कभार बच जाता है और कभी नहीं भी। लेकिन उस के बाद आगे इस तरह की घटना को रोकने के लिये, लापरवाई से अन-ढके बोर-वेल के कारण बच्चे की मुत्यु के लिये किसे और कब सजा दी गयी यह शायद कैलाश सत्यार्थी को भी पता नहीं होगा।
  • कितने ही जीते-जागते बच्चे अपहरण हो कर अपने माता पिता से हमेशा के लिये बिछुड जाते हैं। उन्हे ना तो मृत समझा जाता है और ना ही जीवत। बहुत कुछ हाथ पाँव मारने के बाद पुलिस में रिपोर्ट तो दर्ज हो जाती है लेकिन कितने बच्चे उन ऐफ-आई-आर के रजिस्ट्रों से बाहर निकल कर घर वापिस लौटते हैं यह भी शायद कैलाश सत्यार्थी को पता नहीं होगा।

हमारे देश के माननीय सांसद बच्चों के प्रति अपराध करने वालों को मृत्युदण्ड की सजा क्यो नहीं देते – शायद इस का उत्तर भी कैलाश सत्यार्थी को पता नहीं होगा। अगर किसी सुरेन्द्र कोली जैसे अपराधी को फांसी की सजा हो भी जाये तो वह फांस पर लटकने के बजाये सजा को ही वर्षों तक अपीलों के रास्ते लटकाता रहता है। यह बालाधिकार से ऊपर मानवाधिकार के पेड का फल है जिस को जरूरत से ज्यादा ही सींचा जा रहा है।

वैसे कैलाश सत्यार्थी की बात पर वापिस लौटने पर मझे पता चला कि सत्यार्थी जी को कई विशव-व्यापी संस्थाओं से पुरस्कार और सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं। वह ऐक मशहूर आदमी हैं। फिर हमारे देश ने आज तक उन्हें कोई भारत रत्न, या कम से कम पद्मश्री जैसा कोई छोटा-मोटा सम्मान ही क्यों महीं दिया। क्या वह आज तक इस के काबिल भी नहीं थे जो हम सचिन तेन्दूलकर, सैफअली खां, और महेन्द्र सिहं धोनी वगैरा के हाथों में फौरन थमा देते हैं।

पता चला कि तो कैलाश सत्यार्थी मध्य प्रदेश में विदिशा के रहनेवाले हैं मगर वहां से तो पिछले दस वर्षों से सुषमा स्वराज का नाम या दिग्विजय सिहं का नाम ही सुनने को मिला है। क्या विदिशा के लोगों को भी यह विचार कभी नहीं आया कि विदिशा में ही इस विश्व-ख्याति चेहरे को सासंद या विधायक ही बना दें ताकि वह देश की और मानवता की सेवा करता रहै?

खैर अब तो कैलाश सत्यार्थी पर पुरस्कारों और दूसरी सुविधाओं की झडी जरूर लग जाये गी। मीडिया – जो आज तक उन के बारे में उदासीन रहा अब दिन रात उन के नाम के ढोल पीटने में लग चुका है। ऐसे कितने ही अनजान चेहरे और भी भारत में जरूर हों गे अगर मीडिया उन को ढूडने की कोशिश करे। हमें भी केवल यह जानने की इच्छा रहती है संसद के पहले दिन रेखा और सचिन के दाहिने और बायें कौन कौन संसद में बैठा था या संजय दत्त ने जेल में क्या-क्या खाया था और शारूख खां की नयी पिकचर ने पहले ही दिन कितने करोड कमाये ।

चाँद शर्मा

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