हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


आजकल हम लोग सफाई-अभियान में जुटे हैं। मन्त्रियों ने हाथ में झाडू पकडे तो सफाई के प्रति जागृति आ गयी। लेकिन मन्त्रियों का हर रोज सडक पर झाडू से सफाई में लगे रहना समस्या का समाधान नहीं। कुछ दिनों के बाद यह परिक्रिया केवल ऐक खेल-तमाशा बन कर रह जाये गी। सफाई का काम वास्तव में उन्हीं लोगों को करना चाहिये जो इस के लिये नियुक्त हैं। विभागों में उन का अन्य स्थानों पर दुर्प्योग नहीं किया जाना चाहिये और वह अपना काम ठीक तरह से करते हैं इस की कडी जवाबदारी रहनी जरूरी है।

आस्थाओं के बहाने गन्दगी

नागरिकों की निजि जिम्मेदारी है कि वह जगह जगह गन्दगी ना फैलायें। हमारी नदियां और जल स्त्रोत्र इस लिये गन्दे है कि हम हर रोज आस्था के नाम से नदियों की आरती कर के फूलों से भरी टोकरियां नदियों में बहा देते हैं। इस के इलावा और कई तरहों से हम स्वयं ही जल को गन्दा करने के काम अन्धविशवास से करते चले आ रहै हैं। हमारे अन-पढ पुजारी लोगों को फूल अनाज और दूध वगैरा पानी में बहा देने की सलाह देते रहते हैं ताकि मृतकों की आत्मा को शान्ति मिल सके चाहे जीवित लोग गन्दगी पीते रहैं। अगर आस्थायें गन्दगी फैलाने का कारण बन जायें तो उन का कोई महत्व नहीं रहता। हर रोज आरती के बहाने नदियों में फूल बहा कर नदियों को गन्दगी भेन्ट करते हैं, नदियों को साफ नहीं करते। नदी के प्रति श्रद्धा दिखाने के अन्य साफं रास्ते भी अपनाये जा सकते हैं।

फूल-चोरी

जब कभी आप सुबह सैर के लिये निकलते हैं तो देखा होगा कि कुछ लोग दूसरों के आंगन से या सार्वजनिक पार्कों से फूल चोरी करते हैं। दुसरे लोगों की आहट से ही चौंक जाते हैं और इधर उघर देख कर, और सम्भल कर फिर फूल-चोरी में लग जाते हैं। वह सफेदपोश चोर ताजा हवा के बजाये, अपना दिन ऐक कमीनी हरकत से शुरु करते हैं। अपने घर में लौट कर या रास्ते में ही किसी मन्दिर में जा कर चोरी किये फूलों को भगवान की मूर्ति पर चढा देते हैं और बदले में अपने लिये भगवान से कुछ ना कुछ मांगते रहते हैं।

सोचने की बात है जो महा शक्ति इतनी तरह के फूलों को पैदा कर सकती है क्या वह उन फूलचोरों की हरकत से संतुष्ट हो जाये गी ? वास्तव में यह फूलचोर सिर्फ चोरी ही नहीं करते बल्कि फूलों की भ्रूण हत्या भी करते हैं। वह फूलों को खिलने और खुशबू देने से पहले ही तोड लेते हैं। समय से पहले तोडे गये फूलों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं। अगर भगवान को फूल अर्पण ही करने हैं तो अपने घरों में फूल उगायें और उन्हें पौधे पर ही खिलने दें। भगवान जहाँ कहीं भी हों गे उन तक फूलों की खुशबू और आप की मेहनत की रिपोर्ट पहुँच ही जाये गी।

आप ने यह भी देखा होगा कि कई लोग भगवान पर चढाये गये फूलों, फलों और कई तरह के अनाजों को नदियों, नहरों और तालाबों आदि पानी में बहा देते हैं जो साफ कर के पीने के लिये इस्तेमाल होता है। इस में हवन तथा अस्थियों की राख और कई तरह की बेकार चीजें भी डाली जाती है।

विदेशों में जल स्त्रोत्रों को गन्दा करना कानूनी अपराध है लेकिन भारतवासी यही काम लोग पण्डितों के बहकावे में आ कर स्वेछा से करते हैं। अगर सुखे और इस्तेमाल किये गये फूलों को  फैला दिया जाये जहाँ उन के बीज फिर से उग जायें या कम से कम खाद ही बन जायें तो क्या यह उत्तम विकल्प नहीं होगा ? यही बात फैंके गये अनाजों के बारे में भी लागू होती है।

आस्था का प्रदूष्ण

कई सडकों पर चाय आदि बेचनेवाले कई दुकानदार ऐक कप में थोडा दूध या चाय बनाकर सडक पर बिखेर देते हैं और मन में सोचते हैं कि उन्हों ने वह भगवान को अर्पित कर दी। वास्तव में उस घटिया स्तर की वस्तु को कोई जानवर भी नहीं पिये गा। निश्चय जानिये हृदय, आदर और स्वछता से अरपित करी गई चाय को भगवान किसी जानवर के रूप में आ कर जरूर स्वीकार कर लें गे। क्या यह अच्छा नहीं कि उस के बदले आप हर रोज जानवरों के पीने के लिये पानी की व्यवस्था कर दें। सिवाय पालतु जानवरों के आज कल दूसरे जानवरों को गर्मी में नहाना तो दूर पीने तक का पानी भी नहीं मिलता।

खुशी की गुण्डागर्दी

अपने बच्चों को खुश रखने के लिये माता पिता उन्हें दिवाली पर पटाखे और होली पर रंग खरीद कर देते हैं। बच्चे गुबारों में पानी और रंग भर कर और पटाखों को चला कर सडकों पर आते जाते लोगों पर फैंकते है। किसी की आँख में लगे या सिर पर, किसी का ऐक्सीडेन्ट होजाये तोभी माता पिता को कोई परवाह नहीं रहती क्यो कि उस वक्त बच्चों पर किसी का कोई नियन्त्रण नहीं होता। वह अपने माता पिता की तहजीब का प्रदर्शन ही सडक पर कर रहै होते हैं। क्या यह न्याय संगत नहीं होगा कि जो माता पिता अपने बच्चों स् इस प्रकार के घातक कुकर्म करवाते हैं वह समाज के दुशमन हैं। बच्चों के बदले उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डालना चाहिये।

अभियान नहीं पहचान

इन छोटी छोटी मगर दूरगामी बातों को आदत में डाल लें गे तो दिखावटी सफाई – अभियानों की जरूरत कम हो जाये गी। विदेशों में नाटक बाजी के बजाये यह बातें नागरिकों की आदत में शामिल हो चुकी हैं। सफाई का जितना महत्व हिन्दू-धर्म में है उतना और किसी दूसरे धर्म में नहीं है। हमारा हर त्यौहार घर और शरीर की सफाई से शुरु होता था, लेकिन आजकल गन्दगी फैला कर खत्म होता है। हमारी बातें विदेशियों ने अपना ली और हम केवल विश्व-गुरु का स्वांग कर के उन लोगों की गन्दगी को अब गर्व से चख रहै हैं।

विदेशों की नकल ही करनी है तो सफाई को नौटंकी के बजाये आदत बनाना चाहिये। यह विदेशी नकल नहीं हमारी अपनी संस्कृति है जिस पर अब विदेशी लेबल चढा हुआ है।

चाँद शर्मा

 

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