हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में


हरियाणा की मर्दानी लडकियों ने ऐक बार तो सभी पुरुषों की रीढ़ की हड्डी तक को झिंझोड के रख दिया है। हरियाणा सरकार ने छानबीन और प्रशासनिक सुधार करने से पहले उन्हें पुरस्करित कर के युवतियों को अपने आर्थिक पैरों पर खडे होने के लिये ऐक नयी दिशा भी प्रदान कर दी है। जनता का पुलिस प्रशासन और न्यायलयों की क्षमता पर से विशवास गुरुत्व आकर्ष्ण से भी ज्यादा तेजी के साथ नीचे गिरता जा रहा था लेकिन अब उस विशवास की पुनर्स्थापित करने की जरूरत ही नहीं रही।

नारी स्शक्तिकरण

जंगल न्याय रोज मर्रा की बात हो गयी है। कहीं भी दो चार युवतियां ऐक जुट हो कर किसी भी राहचलते मनचलों को ना सिर्फ घेर कर पीट सकती हैं बल्कि उन से वसूली कर सकती हैं। सभी पुरुष रेप और यौन शोशष्ण के आरोपी हो सकते हैं क्योंकि महिलाओं की तरफ झुकी हुयी कानून की शक्ति अब महिलाओं के पास है । बस ऐफ़ आई आर ही काफ़ी है। किसी छान बीन की ज़रूरत नहीं। महिलायें 5 वर्ष से 95 वर्ष तक के किसी भी पुरुष को आरोपित कर के आजीवन कारावास दिलवा सकती हैं। मुकदमें का फैसला आरोपित पुरुष के अगले जन्म से पहले नहीं आये गा और अपीलों में उन के भी दो तीन जन्म और निकल जायें गे।

अभी तो महिला आरक्षण बाकी है। अगर यही क्रम चलता रहा तो मृत पुरुष का दाह संस्कार करवाने से पहले पुलिस से प्रमाण पत्र लेना भी अनिवार्य हो जाये गा कि मृत के खिलाफ मृत्यु से ऐक घन्टा पूर्व तक यौन शोशण की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुयी। प्रमाण पत्र प्रस्तुत ना कर सकने की अवस्था में मृत के शरीर की फोरंसिक जांच होनी ज़रूरी हो जाये गी कि यौन अपराध के कोई सबूत उस के शरीर पर नहीं मिले – तभी दाह संस्कार हो सके गा। इस लिये पुरुषो को चाहिये कि अपनी सुरक्षा के लिये आम-आदमी सुरक्षा दल बनायें। 

कानूनी वर्गीकरण

समान आचार संहिता तो दूर, जिस तेजी से हमारे राजनेता समाज में लिंग-भेद पर भी समाज में कानूनी वर्गीकरण कर के आये दिन नये नये कानून बनाते जा रहै हैं और हमारी अदालतें आंखें मूंदे उन की वैधता को मंजूरी देती जा रही हैं उस अवस्था में अब जरूरी हो गया है कि पुरुषों के बारें में भी कुछ विशेष कानून और व्यवस्थायें होनी चाहियें।

पुरुषों को चाहिये कि अपने इलाके के राजनेता से पुरुष रक्षा कानून, दलित पुरुष रक्षा कानून तथा केन्द्र और हर राज्य में पुरुष आयोग, पुरुष बस सेवा, पुरुष थाने आदि की नयीं मांगे करनी शुरु कर दें।

हरियाणा की महिलायों से प्रेरणा पा कर अब युवतियां जीन्स पर कोई रोक स्वीकार नहीं करें गी क्यों कि बेल्ट कारगर साबित हुयी है। ‘घर की चार दिवारी में कैद पुराने जमाने की महिलायें’ सोने चाँदी या किसी अन्य धातु की जंजीरों में बंधी रहती थीं। हाथ पाँव में मोटे मोटे कडे पहनती थीं ताकि बिना आवाज किये कहीं भाग ना सकें लेकिन अब यवतियां चाव के साथ उन्हीं भारी कडों और जंजीरों को अपनी रक्षा के लिये और पुरुषों के दांत तोडने के लिये अपने आप पहनने लगें गी।

पुरुष-रक्षा के उपाय

जबतक पुरुषों की रक्षा के लिये विशेष उपाय कार्यरत नहीं हो जाते, पुरुषों को अपनी रक्षा के लिये नीचे लिखे उपाय अपने आप ही अपना लेने चाहियेः-

  • अपने अपने इलाकों में राहुल सुरक्षा ब्रिगेड या केजरीवाल सुरक्षा केन्द्र गठित करें।
  • अगर कहीं भी 4-5 समार्ट लडकियों के संदिग्ध हालत में घूमते देखें तो पुलिस, आम आदमी सुरक्षा दल को तुरन्त सम्पर्क करें।
  • अकेले निर्जन पार्कों, सडकों, लाईबरेरियों, होटलों आदि स्थानों पर ना जायें।
  • शाम को अन्धेरा होने से पहले घर वापिस आ जायें।
  • रात को भोजन के बाद घर से अकेले बाहर नहीं निकलें। अपनी सुरक्षा के लिये जूडो-कराटे आदि सीखें, और नित्य व्यायाम करें।
  • अपने कपडों में गुप्त तरीके से छुपा कर ऐक फुट लम्बी सुरक्षा-झाडू हमेशा अपने साथ रखें।
  • दफ्तर के बाद कभी भी ओवर-टाईम नहीं करें।
  • अकेले किसी टायलेट वगैरा में भी नहीं जायेँ।
  • भीड वाले इलाकों में सुरक्षित जाने आने के लिये हमेशा अपने शरीर को पूरा ढक कर रखें और स्त्रियों के से हाव भाव भी अपनायें।
  • जहाँ कहीं भी 3-4 महिलायें दिखाई पडें तो तुरन्त किसी सुरक्षित स्थान पर तेज़ी से चले जायें।

याद रखिये

पुरुषों को विरोध करना है तो हरियाणा की पूजा और आरती के बजाये पहले उन कानूनों का करो जो इन्दिरा गांधी से ले कर सोनियां तक कांग्रेसी सरकारों ने अपने वोट बैंक के लिये दलितों, महिलाओ और अल्प-संख्यकों आदि का संरक्षण करने के बहाने से बनाये और अभी भी लागू हो रहै हैं। किसी भी देश में इस तरह के वाहियात कानून नहीं हैं कि खाली रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को हवालात में बन्द कर दो और उस की जमानत भी ना हो। कानून के सामने महिला हो या परुष, दोनों के लिये अगर बराबरी है तो कानून भी ऐक जैसे होने चाहियें।

अब तो महिलाओं, दलितों और अल्प-संख्यकों को नौकरी या किसी भी तरह की मदद देने से पहले लोग दस बार सोच कर इनकार ही करें गे। बुद्धिमानी भी इसी में है कि सिर दर्द क्यों लिया जाये।

महिला, दलित या अल्प-संख्यक आयोगों का भी कोई काम नहीं जो अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार दखल देते हैं। केवल पुलिस प्रशामन और कोर्ट सक्षम होने चाहियें।

मीडिया का काम केवल खबर देने तक का होना चाहिये उस पर बहस या राय देने का नहीं। अगर खबर तथ्यों पर नहीं तो मीडिया की भी कानून के सामने अपराधी जैसी जवाबदारी होनी चाहिये।

हमारे मीडिया को सनसनीखेज़ भाषा में बहस करने और ढोल पीटने के लिये ऐक मुद्दा और मिल चुका है – “ सावधानी हटी तो पिटाई घटी – ऐफ आई आर हुयी तो… सोच लीजिये…बस सोचते ही रह जाओ गे। बिना पिटे जीना है तो जाग जाईये – चैन से रहना है तो कहीं भाग जाईये। ”

चांद शर्मा

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