हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में

Archive for the ‘राष्ट्रीयता’ Category

मिलावटी इतिहास क्यों


आजकल  टी वी पर कुछ नाम-मात्र ‘ऐतिहासिक’ सीरयल दिखाये जा रहै हैं जिन का मुख्य अभिप्राय अपने देश के लोक प्रिय नायकों की जीवनियों से छेड़ छाड़ कर के पैसा कमाना है। हालांकि अफवाहें फैलाना जुर्म है, मगर इन सीरियलों को निर्माता देश की नयी पीढी को गुमराह कर के देश द्रोह कर रहै हैं और हम अपने नायकों का अपमान देख देख कर अपना टाईम-पास कर रहै हैं।

अपनी बनावटी ‘इमानदारी’ दिखा कर कानूनी शिकंजे से बचने के लिये, निर्माता टेलीकास्ट के आरम्भ में ऐक छोटा सा ‘नोटिस’ लिख देते हैं कि – ‘यह सीरियल ऐतिहासिक होने का दावा नहीं करता और मनोरंजन के लिये इस में नाटकीय बदलाव किये गये हैं।’ जितनी देर में ऐक सामान्य आदमी किसी नोटिस को आराम से पढ सकता है उस से डेढ गुणा समय ज्यादा वह नोटिस टेलिकास्ट होना चाहिये, लेकिन जानबूझ कर यह औपचारिक नोटिस सक्रीन पर छोटी सी लिखावट में कुछ ही सैकिंड दिखाया जाता है ताकि उसे कोई पढ़ ही ना सके।

कलात्मिक दृष्टिकोण से इन सीरियलों का स्तर बहुत ही घटिया है। वास्तव में सभी सीरियल आजकल भडकीले कास्टयूम की माडलिंग ही करवा रहै हैं जिन का उस समय की वेष भूषा से कोई सम्बन्ध नहीं। वर्षों बीत जाने के बाद भी किसी पात्र में ‘बढती उमर’ का कोई प्रभाव ही दिखाई नहीं देता।

पाशर्व-संगीत का शौर इतना ज्यादा होता है कि संवाद सुनाई ही नहीं पडते क्योंकि लगातार कुछ ना कुछ ‘बजता’ ही रहता है। सब से सस्ता काम होता है किसी ‘सनैर-डर्म’ वाले को बैठा दिया जाता है और वह मतलब बेमतलब हर संवाद के अन्त में अपने डर्म पर चोट मारता रहता है। बीच बीच में अगर ज्यादा प्रभाव देना हो तो ‘सनैर-डर्म’ पर ही ऐक ‘रोल’ बजा देता है। थोडी बहुत चीं-पौं के स्वर कभी कभी दूसरे इन्स्ट्रूमेनट से भी सुना दिये जाये। दिन हो या रात, अन्दर हों या बाहर, सीन और भाव चाहे कैसे भी हों – सरकस की तरह लगातार ऐक ही तरह का शौरमयी ‘संगीत’ गूंजता रहता है। इन निकम्मे संगीत निर्देशकों को चाहिये कि कभी मुगले आजम (नौशाद) और आम्रपाली (शंकर जयकिशन) जैसी फिल्मों से सीखें कि ऐतिहासिक वातावरण का पार्शव संगीत कैसा होता है।

इन सभी सीरियलों में ऐक समानता देखने को मिले गी। ऐतिहासिक नायक (या नायका) को बचपन से ही उछल-कूद तरह की बाजीगिरी में दक्षता हासिल होती है। घोडे पर तलवार बाजी करना, ऊंची इमारतों से छलांगे लगाना, और अकेले ही दरजनों विरोधियों को परास्त करना आदि तो उन के लिये मामूली बातें हैं मगर अपने साथ होने वाले षटयंत्रों के विषय में वह नितान्त मूर्ख बने रहते हैं। उन में साधारण सूझ बूझ भी नहीं होती। उन के परिवार में पिता आम तौर पर ऊपर से अडियल और कडक, परन्तु अन्दर से ‘लाचार’ होता है और सौतेली मातायें या प्रेमिकायें नायक-नायका के खिलाफ हर तरह के षटयंत्र रचती रहती हैं जिन में से नायक नायका हर ऐपीसोड में किस्मत के भरोसे बाल बाल बचते रहते हैं।

इस तरह के ‘ऐतिहासिक’ सीरयल आजकल सालों साल चलते रहते हैं। जिस मुख्य ऐतिहासिक घटना के साथ नायक नायका की पहचान होती है उसे दिखाये जाने से पहले ही अचानक सीरियल समाप्त हो जाते है क्यों कि तब तक सिक्रिपट काफी दिशा हीन हो चुका होता है और दर्शकों को उस नायक नायका की जीवनी में कोई दिलचस्पी ही नहीं रहती। ऐतिहासिक तौर पर जो पात्र कभी आपस सें मिले ही नहीं थे, जिन्हों ने कभी अपने विरोधी को प्रत्यक्ष रूप में कभी देखा ही नहीं था उन के बीच में चटपटे कटाक्षी वार्तालाप इन सीरियलों का मुख्य आकर्षण बना दिये जाते है – क्योंकि दर्शकों को पहले ही बताया जा चुका है कि जिसे वह अपना इतिहास समझ रहै हैं उस के साथ तो मनोरंजन के लिये खिलवाड किया जा रहा है।

अगर आप के दिल में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान है तो ज़रा सोचिये, ऐसा जान बूझ कर क्यों किया जा रहा है? क्या जानबूझ कर हमारी आगामी पीढियों को देश के इतिहास से विमुख करने की चेष्टा हो रही है? हमारे मानव संसाधन-विकास मन्त्री क्या सो रही हैं या उन्हें इतिहास की जानकारी ही नहीं? दिखाई गयी पटकथा के बारे में निर्माताओं से ऐतिहासिक प्रमाण क्यों नहीं मांगे जाते? क्या हम हिन्दुस्तानियों में मनोरंजन की भूख आजकल इतनी ज्यादा बढ चुकी है कि हम घटिया से घटिया कुछ भी बकवास सहने के लिये तैयार हैं?

चांद शर्मा

Advertisements

ऐक अनार सौ बीमार


 

कुछ लोगों को हमैशा शिकायत करते रहने की आदत बन चुकी है। उसी आदत के कारण वह सभी जगह मीडिया पर अपने उतावले-पन और ‘राजनैतिक सूझ-बूझ’ का परिचय भी देते रहते हैं। हर बात में सरकार को कोसते रहते हैं। ‘मोदी जी ने यह नहीं किया, वह नहीं किया’ – ‘वह सैकूलर बन गये हैं’, ‘विदेशों में सैर करते फिरते हैं’। ‘काला धन वापिस ला कर अभी तक ग़रीबों में बांटा क्यों नहीं गया’? ‘गऊ हत्या बन्द क्यों नहीं करी गयी’ – आदि। अगर यह शिकायतें ‘AAP’ वाले करें तो हैरानी की कोई बात नहीं क्योंकि उन्हें और कुछ करना आता ही नहीं। मगर जब वह लोग करते हैं जो आज से 6-7 महीने पहले ‘मोदी-समर्थक’ बनने का दावा करते थे तो उन की सूझ बूझ और उतावले-पन पर हैरानी होती है। 

निराशा का वातावरण

उन उतावले मोदी समर्थकों को इतना पता होना चाहिये कि अगले पाँच वर्ष में अगर नरेन्द्र मोदी देश का कुछ भी ‘चमत्कारी’ भला ना भी करें, और जितना बुरा आजतक हो चुका है उसे आगे फैलने से ही रोक सकें तो वही उन की बहुत बडी कामयाबी हो गी। हमारे हर तन्त्र में गद्दार, भ्रष्ट और स्वार्थी लोग जम चुके हैं। उन को उखाड कर इमानदार लोगों को बैठाना है। उन को अपनी-अपनी जिम्मेदारी सम्भालने और समझने के लिये भी वक्त देना हो गा।

क्या हम मनमोहन सिहं और उन की किचन-सरकार को भूल चुके हैं जिस ने पिछले दस वर्षों में देश को अमेरिका का गुलाम ही नहीं, सोनिया परिवार का ही गुलाम बना दिया था। जिन के काल में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। जो अपने स्वाभिमान को ताक पर रख कर कहते थे कि “मैं मजबूर था, ” जिन के मन्त्री मण्डल के आदेश को ऐक मूर्ख छोकरे ने टी वी पर फाड कर रद्दी की टोकरी में फैंक दिया था। जिन के शासन में पाकिस्तानी हमारे देश के जवानों के सिर काट कर ले गये थे और सरकार ने सैनाध्यक्ष को वर्दी पहना कर उस की विधवा को सांत्वना देने के लिये भेज दिया था – बस। वह सरकार जो नकसलियों के खिलाफ बल प्रयोग करने में हिचकती थी। जिस सरकार का प्रधान मन्त्री किसी के साथ भी सोनिया-राहुल के आदेशानुसार कोई भी समझोता कर सकता था जो मालकिन और छोटे मालिक को पसन्द हो। जिन्हें अपनी इज्जत का कोई ख्याल नहीं था वह देश की इज्जत क्या खाक बचायें गे।

सकारात्मिक सोच

हमारे देश के चारों तरफ छोटे छोटे देश भी मनमोहन सरकार ने भारत के दुशमन बना दिये थे जिन्हें सम्भालने का काम नरेन्द्र मोदी ने अपना पद सम्भालते ही कामयाबी के साथ करना शुरु कर दिया है। देश के आर्थिक और तकनीकी विकास के लिये बाहर से साधन जुटाने मे सफ़लता हासिल करी है। दिशाहीन मन्त्रालयों को दिशा निर्देश और ‘लक्ष्य ’दिये हैं जिन की रिपोर्ट बराबर मांगी जा रही है। राज्यों से ‘परिवारवादी सरकारों’ को उखाड फैंका है और यह काम अभी दो साल तक और चले गा। राज्यसभा में मोदी जी के पास बहुमत नहीं है। विपक्षी लोग ‘रिशतेदारियां बना कर’, ऐकजुट हो कर सरकार के लिये आये दिन अडचने खडी कर सकते हैं, कर रहै हैं, और करते रहैं गे। कई विपक्षी राज्य सरकारें मोदी जी के साथ नहीं हैं। वह तभी बदलें गी जब वहां इलेक्शन हों गे। वह मोदी जी की नीतियों को आसानी से स्वीकार नहीं करें गे। कुछ बातों के लिये कानूनों और शायद संविधान में भी संशोधन करने पडें गे। इन सब कामों में समय लगे गा।

राष्ट्र-निर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं होती, नागरिकों की भी होती है। सरकार तो सिर्फ दिशा-निर्देश देती है। क्या हम ने कभी अपने आप से पूछा कि पिछले 6-7 महीनों में हम ने कौन कौन से सकारात्मिक काम निजि तौर पर करे हैं? क्या पुरानी खराब आदतों को छोड कर अच्छी नयी बातें अपने रोज़ मर्रा के जीवन में पनाई हैं? क्या हम ने स्वच्छता, स्वदेशी, राष्ट्र भाषा, समय की पाबन्दी, ट्रेफ़िक नियमों का पालन, कामकाज में इमानदारी को अपनाया है? क्या अपने कार्य क्षेत्र में जहां तक हमारा अधिकार है, वहां लागू किया है? क्या अपने उच्च अधिकारी को उन बातों में सहयोग दिया है? अधिकांश लोग अपने मन में जानते हैं कि उन्हों ने वैसा कुछ भी नहीं किया।

हमारी खुशनसीबी

काँग्रेस की मनहूस ज़माने के उलट आज हमारी खुशनसीबी है कि वर्षों के बाद हमारे पास ऐसा इमानदार, कर्मठ, देश सेवक प्रधान मन्त्री है जिस का निजि स्वार्थ कुछ भी नहीं है। जो दिन में 18 घन्टे काम करता है, देश के प्रति समर्पित है, देश की मिट्टी में पढा और बडा हुआ है। भारतीय-संस्कृति से जुडा हुआ है। जो दिखावे की गरीबी नहीं करता, जिस को कोई व्यसन नहीं है। जिस के परिवार का कोई व्यकति सरकारी तन्त्र में झांक भी नहीं सकता। जिस का दिमाग़ 16 वीं सदी का नहीं बल्कि भविष्य की 21 वीं सदी की सोच रखता है।

उतावले मोदी समर्थकों ने ऐक वोट मोदी जी को दे कर जो ‘अहसान’ किया है उस के ऐवज़ में मोदी जी कोई जादुई-चमत्कार नहीं कर सकते। अगर उन्हें अपने किये पर अफसोस हो रहा है तो फिर से सोनिया-मनमोहन, मायावती-मुलायम या केजरीवाल में से किसी को भी बुला लें। मगर याद रहै। मोदी सरकार से अच्छी देश को समर्पित सरकार अगले भविष्य में दोबारा नहीं आये गी।

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है।

बडी मुद्दत से होता है चमन में दीदावर पैदा।

थोडा संयम और धैर्य रखो – अपनी और देश की किस्मत को लात मत मारो। सरकार को हर वक्त कोसते रहने से कोई देश प्रगति नहीं कर सकता। प्रगति सरकार के साथ सहयोग करने से होती है।

अगर आप इन विचारों से सहमत हैं तो केवल लाईक करने या ‘सही लिखा है’ कहने के बजाये इसे शेयर करें और फैलायें। अगर असहमत हैं तो अपने सुझाव और कारण अवश्य लिखें ताकि मुझे भी अपनी सोच को सुधारने का अवसर मिले।

चांद शर्मा

भारतीय नागरिक्ता सस्ती क्यों


डालर और रुपये की कीमत के अनुपात से अमेरिका भारत से 60 गुणा अमीर देश है। मगर अमेरिका अपने देश की नागरिक्ता उन्हीं लोगों को प्रदान करता है जो आर्थिक तौर पर अपना खर्चा उठा सकें या कोई दूसरा समृद्ध अमेरिकन नागरिक उन का खर्च उठाने की जिम्मेदारी ले। इस के अतिरिक्त जन्म से लेकर प्रार्थना पत्र देने की तारीख तक आवेदक का पूरा रेकार्ड प्रमाणित रूप में चैक किया जाता है। आवेदक के लिये जरूरी है कि वह अंग्रेज़ी लिखने पढने में कुशल हो। लिखित टेस्ट से निश्चित किया जाता है कि आवेदक को अमेरिका की जंगे-आजादी का इतिहास, संविधान, प्रशासनिक ढांचे तथा अमेरिका की आस्थाओं की पूरी जानकारी है। सब से छान बीन हो जाने के बाद आवेदक को अमेरिका के प्रति पूर्णत्या समर्पित होने की शप्थ और अपने पिछले देश से सभी भावनात्मिक और संवैधानिक सम्बन्धों का त्याग करना अनिवार्य होता है। तब जा कर वह नागरिक बनता है लेकिन उसे अपने जीने के लिये सभी सुविधायें अपनी आय से खरीदनी पडती हैं। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता।

अमेरिका की तुलना में आज भारत में चारों तरफ से मुफ्तखोर बंगलादेशी, पाकिस्तानी आतंकी, माओवादी, क्रिकेट या ग़जल-प्रेमी, ड्रगपैडलर-विदेशी नेताओं के भ्रष्टाचार के कारण घुसे चले आ रहै हैं। चेकिंग तो दूर, मूर्खता-वश हमारी सरकारें बाहरी लोगों को देश में आने के बाद अनुमति (विजा) प्रदान कर अपनी पीठ थपथपाने लगती हैं। विज़ा अवद्धि समाप्त हो जाने के बाद भी बहुत सारे विदेशी वापिस ही नहीं जाते और इधर-उघर छिप जाते हैं। अगर घुस-पैठिये पकडे भी जायें तो उन को प्रशासनिक अधिकारी वापिस नहीं भेज सकते क्यों कि कई धर्म-निर्पेक्ष और देश-द्रोही भारतीय नेता और मीडिया उन के समर्थन में खडे हो जाते हैं और मामला ठंडे बस्ते में पहुंच जाता है। यही देश द्रोही नेता अपने लिये वोट बैंक खडा करने के लिये उन भिखमंगों को पहचान-पत्र, राशन-कार्ड और कई तरह की सरकारी सुविधाओं के योग्य बनवा देते हैं जिस का आर्थिक बोझ आम नागरिकों पर सदा के लिये पड जाता है। देश को दीमक खाने लग जाती है।

बाहर से लाये गये यह अनपढ, बीमार और निकम्मे लोग और उन के परिवार बडे बडे शहरों में झोंपडिया बना कर सरकारी जमीन पर कबजा कर लेते हैं। हमारी नदियों के जल को दूषित करते हैं। जहां चाहें सडकों, बस्तियों और सार्वजनिक स्थलों को शौचालय बना डालते हैं। हमारे सरकारी अस्पताल इन्हीं लोगों से भरे रहते हैं। ऊपर से यही लोग हमारे देश में वोटर बन कर हमारे मूल-नागरिकों के लिये भ्रष्ट सरकारों को चुनते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है। क्या इन कीडों से भारत कभी छुटकारा पा सके गा? निराशजनक तो कहैं गे ‘नहीं’ – लेकिन अगर आप में कछ आत्म विशवास और स्वाभिमान है तो ‘अवश्य।’

अब जरा सोचियेः-

  • अगर जम्मु-कशमीर की कोई लडकी भारत के किसी व्यक्ति से शादी कर ले तो क्यों वह जम्मू-कशमीर में भी अपनी सम्पति तथा वोट देने का अधिकार खो बैठती है जबकि वही लडकी अगर किसी पाकिस्तानी कशमीरी से शादी कर ले तो अपने साथ उस ‘भारत-शत्रु’ को भी भारत की नागरिकता दिलवा सकती है। इस तरह की घातक धारा 370 क्यों समाप्त नहीं होनी चाहिये?
  • आम तौर पर भारत से मुस्लिम लडकियां पाकिस्तानी युवकों से विवाह कर के अपने ससुराल पाकिस्तान नहीं जातीं। उल्टे विवाह के बाद उस का पाकिस्तानी पति भारत का नागरिक क्यों बन जाता है और हमारी बढी हुय़ी जनसंख्या को 10 -12 बच्चों का योग्दान कर देता है। कई पाकिस्तानी-पति तो बच्चों के साथ अपनी पत्नी को तलाक दे कर वापिस पाकिस्तान चले जाते हैं और वहां और निकाह कर लेते हैं। भारतीय मुस्लिम युवा निकाह कर के अपनी ऐक से ज्यादा पत्नियों को को भारत में ही बसा देते हैं ताकि यहां की जनसंख्या बराबर बढती रहै। ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या हमारे पास जन-संख्या की कमी है?
  • हम चारों तरफ से आतंकी मुस्लिम देशों से घिरे हुये हैं। फिर किन कारणों से हमारे देश के सभी सीमावर्ती राज्यों में बार्डर के साथ लगने वाली लगभग सारी जमीन मुस्लिमों के हाथ बिक चुकी है? देश की लग भग सभी तटीय क्षेत्रों की जमीन भी मुस्लिमों की मलकीयत क्यों बनती जा रही है? क्या यह देश के सुरक्षा के लिये आने वाला खतरा नहीं है? सीमा और तटों के 10 किलोमीटर अन्तर्गत आने वाली जमीन को हम रक्षा-मंत्रालय को क्यों नहीं सौंप देते ताकि हमारी सीमायें सुरक्षित रहैं और वहां आने जाने पर पूरा नियन्त्रण रक्षा बलों का ही रहै? यह भी जानना चाहिये कि इस बिक्री में विदेशी धन तो नहीं लग रहा।
  • अनजान बन कर हम इस तरह से अपने देश को क्यों बर्बाद करते जा रहै हैं? क्या देश से ज्यादा हम अपनी झूठी धर्म-निर्पेक्षता और मानवाधिकारों को प्रेम करने लग चुके हैं? क्यों हमारे युवाओं के पास देश के बारे में सोचने की आदत ही नहीं रही? जिन लोगों ने हम से नफरत कर के देश का बटवारा करवाया उन्हीं को संतुष्ट रखने के लिये आज फिर से भारत के नागरिक अपने देश के ज्ञान-ग्रंथों और परम्पराओं को त्यागते क्यों चले जा रहै हैं ?
  • किसी को कोई शक नहीं रहना चाहिये कि पाकिस्तान का जन्म भारत की शत्रुता के कारण ही हुआ है और रिशता हमें निभाना ही पडे गा। क्या हम अपने देश के नागरिकों पर यह पाबन्दी नहीं लगा सकते कि अगर वह किसी विदेशी से खास तौर पर अपने निकटतम शत्रु-देश पाकिस्तान से विवाह करें गे तो उन की भारतीय नागरिक्ता समाप्त कर दी जाये गी और विवाहित-विदेशी को भारत में अस्थाई तौर पर भी नहीं आने दिया जाये गा ?
  • किसी को भी भारत की नागरिकता प्रदान करने से पहले क्यों हम आवेदक से कुछ शर्तें नहीं मनवाते कि वह भारत की राष्ट्र भाषा सीखे, भारत की संस्क़ृति के साथ समान आचार संहिता को अपनाये, भारत का मूल निवासी होने के नाते अपने आप को हिन्दूओं का वंशज कहै और वन्देमात्रम कहने से परहेज ना करे। अगर उसे यह सब पसंद नहीं तो कहीं और जा कर रहै। क्या हमारे पास जन-संख्या की कमी है? क्यों हम अपने देश के हितों की रक्षा अमेरिका की तरह से नहीं कर सकते?

हमें अपने मन, वचन और कर्म से पूरे विश्व को संदेश देना होगा कि भारत कोई सार्वजनिक अन्तर्राष्ट्रीय सराय स्थल नहीं कि कोई भी यहां आकर अपना बिस्तर लगाले और हम उस की चाकरी में जुट जायें। हमें सडी गली काँग्रेसी धर्म-निर्पेक्षता को त्याग कर स्वाभिमान से कट्टर हिन्दूराष्ट्र वाद को अपनाना होगा नहीं तो हम सभी बेघर हो जायें गे और हमारे लिये विश्व में कोई दरवाजा नहीं खोले गा। हम सभी हिन्दू हैं, भारत हमारा घर और हमारी पहचान है। हम इसे मिटने नहीं दें गे।

चाँद शर्मा

 

सम्मान और पहचान


बच्चे पैदा करना, खाना, पीना, सुरक्षित और आराम से रहना – यह सभी काम जानवर भी करते हैं। इन सब ‘सहूलतों’ को हम ‘विकास’ या ‘सुशासन’ भी कह सकते हैं। इन के अतिरिक्त मानवों को जो बातें जानवरों से अलग करती है वह है अपना ‘सम्मान’ और अपनी ‘पहचान’।

निजि पहचान’ धर्म से होती है जो जन्म से पहले ही माता-पिता की निजि पहचान से जुडा रहता है। धर्म के अनुसार ही मानवों का नाम रखा जाता है जो जीवन पर्यन्त चलता है। रीति रिवाज, खान पान निर्धारित होता है, जीवन की मर्यादायें, कर्तव्य और अधिकार, अच्छे – बुरे का अन्तर विरासत में प्राप्त होता है। धार्मिक पहचान मृत्यु के पश्चात भी अचल रहती है क्यों कि दाह संस्कार और मरणोपरान्त की सभी रस्में अगली पीढियां धर्मानुसार ही निभाती हैं।

‘सम्मान’ नागरिकता के साथ जुडा होता है। सरकार तथा दूसरे नागरिकों की तुलना में किसी को क्या अधिकार या कर्तव्यों का पालन करना है यह नागरिक्ता के साथ जुडा विषय है। किसी अन्य देश की नागरिक्ता प्रप्त होने पर धर्म की पहचान तो वही रहती है परन्तु अधिकार और कर्तव्य नये देश के नियमों के अनुसार बदल जाते हैं।

जहाँ तक हिन्दूओं के सम्मान की बात है तो विभाजन के बाद कांग्रेस और सैकूलर पंथियों ने हमें तीसरे या चौथे दर्जे का नागरिक बना डाला है। हिन्दूओं की तुलना में दूसरे धर्म वालों को  सर्वोच्च अधिकार और सुविधायें प्राप्त हैं। अगर ऐक मुस्लिम दुर्घटना में मर जाये तो मुआवजा 15 से पचास लाख तक मिलता है लेकिन अगर कोई हिन्दू ड्यूटी पर भी मर जाये तो मुआवजा सिर्फ पांच लाख तक सीमित हो जाता है। यह केवल ऐक उदाहरण है। भारत में अब हिन्दूओं की सब से बडी जिम्मेदारी अल्पसंख्यकों को खुश रखने की है।

हिन्दूओं की पहचान के सभी चिन्ह ऐक के बाद ऐक तेजी से मिटाये जा रहै हैं। हिन्दू कानूनों में सरकारी दखलअन्दाजी, मन्दिरों की सम्पति पर सरकारी या अल्प संख्यकों के कबजे, हिन्दू मर्यादाओं का सरकारी बहिष्कार तथा उपहास, हिन्दू साधू-संतों का तिरस्कार आदि इसी के कुछ जवलन्त उदाहरण हैं।

अब देश की हिन्दू जनता को 2014 के चुनाव में फैसला करना है कि ‘विकास’ और ‘सुशासन’ का खोखला धर्म निर्पेक्ष ‘कांग्रेसी जीवन’ जानवरों की तरह से जीना है या सम्मान और अपनी पहचान के अनुसार ‘मानवी हिन्दू जीवन’ जीना है।

अब वक्त है अपने और अपने पूर्वजों के सम्मान और पहचान की खातिर हाथ में मतपत्र लेकर ऐकजुट हो जाओ वर्ना तुम्हारी दास्तां भी ना होगी दास्तानों में।

चाँद शर्मा

इशरतजहाँ या भारतवासी


इशरत जहाँ का ऐनकाऊंटर ‘असली’ था या ‘नकली’, यह तो अदालतें स्पष्ट करें गी। लेकिन अभी ऐक बात पूर्णत्या स्पष्ट है कि काँग्रेस और उस के धर्म निर्पेक्ष सहयोगियों को भारत के नागरिकों के जीवन की सुरक्षा की कोई चिन्ता नहीं। उन्हें पुलिस कर्मियों की निजि सुरक्षा और अधिकारों की तुलना में आतंकवादियों के ‘मानवाधिकारों’ की चिन्ता ज्यादा है। वह आतंकवादियों को पूरा ‘मौका’ देना चाहते हैं कि पहले आतंकवादी अपना ‘लक्ष्य पूरा करें’ ताकि पुलिस कर्मियों के हाथ ‘सबूत’ आ जाये कि भारतीय नागरिकों पर गोली चलाने वाले या बम फैंकने वाले वास्तव में ‘अपराधी थे’, ताकि हम उन पर बरसों मुकदमें चला सकें, कई तरह के कमिशन बैठा सकें, अपीलें सुन सकें और उन्हें रहम की फरियाद करने की बार बार छूट भी दें – और अगर उन आतंकियों की किसी तरह से ‘सहायता’ ना करी जा सके तो चोरी छिपे उन्हें मजबूर हो कर फाँसी पर लटका देँ। इस सारी परिक्रिया में अगर हमारे पुलिस कर्मी अगर जरा सी भी चूक करें तो पहले उन्हें जेलों में बन्द करें ताकि फिर कोई पुलिस कर्मी ‘हिम्मत दिखाने से पहले’ सरकार को दिखाने के लिये ‘सबूत दिखाये’।

तीसरा बडा स्पष्ट और सर्व-विदित तथ्य यह है कि काँग्रेस और उस के सहयोगियों को किसी के मानव अधिकारों की भी कोई चिन्ता नहीं जैसे कि साध्वी प्रज्ञा और उस के साथी बरसों से जेलों में पडे हैं। उन्हें चिन्ता है तो सिर्फ अपने वोट बैंक की जिस के सहारे वह वोटों का ध्रुवीकरण कर के चुनाव जीतें गे और फिर अगले पाँच साल तक ‘ऐशो-ईशरत’ करें। अदालती फैसले तो पहले भी होते रहै हैं और आगे भी होते रहैं गे। कितने आतंकियो और नक्सलियों को फाँसी दी गयी और उन की तुलना में कितने ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी मरे?

चौथा फैसला अब जनता को करना है। जनता निर्णय ले कि उन्हें इस तरह के ‘विधान’ और इस तरह की ‘कानूनी कारवाई’ के सहारे अपनी जान और आत्मसम्मान की रक्षा करनी है, अपने देश को आतंकियों से बचाना है या सिर्फ खोखले मानवाधिकारों के लिये देश और जनता को कुर्बान कर देना है। जहाँ देश और जनता का जनजीवन सुरक्षित नहीं वहाँ आतंकियों के मानवाधिकार, अदालतों के घिसे पिटे तरीके और नेता भी सुरक्षित नहीं। उन व्यवस्थाओं को भी बदलना होगा क्यों कि हर स्थिति में जनता के फैसले के खिलाफ विधान और वैधानिक सदन कोई अस्तीत्व नहीं रखते।

इशरत जहाँ का केस जरूर चुनावी मुद्दा बने गा और जनता का फैसला ही अन्तिम फैसला होगा।

इशरत जहाँ और उस के साथियों जैसे लोगों के आतंकवाद की वजह से जो भारतीय अपने शरीर के अंग, मां बाप, भाई बहन खो बैठते हैं उन के मानव अधिकारों की रक्षा कौन करे गा? हमारा संविधान? हमारी यू पी ऐ सरकार? हमारा दोगला मीडिया?हमारे भ्रष्टाचारी नेता?नाचनेवाले फिल्म स्टार? सबूतों के अभाव में जाने पहचाने अलगाव वादियों को बरी करने वाली न्यायपालिका? मानव अधिकारों की दुहाई देने वाले कुछ छिपे गद्दार? या फिर टीवी चैनलों पर आँसू दिखाने वाले मृत आतंकियों के रिश्ते दार?

इन सब में से कोई भी नहीं।

इशरत जहाँ और उन के साथियों के मारे जाने से करोडों भारतियों के दिल को स्कून मिला है, उन के शहीद हुये रिशतेदारों की आत्मा को शान्ति मिली है और वह सभी वनजारा आदि पुलिस कर्मियों के आभारी हैं।

अब वोटों की राजनीति करने वाली काँग्रेस उन के खिलाफ जो करना चाहे कर ले लेकिन यह पुलिस अधिकारी तो देश की जनता के हीरो बन चुके हैं।

अब सब से पहले तो आतंकवाद समर्थक काँग्रेसीयों और धर्म निर्पेक्षों को चुनावी मैदान में हरा कर व्यवस्थाओं को बदलने की कसम उठा लो।  हमारा लक्ष्य ऐक है – काँग्रेस मुक्त भारत निर्माण हिन्दुस्तान की पहचान और पुनरोत्थान।

चाँद शर्मा

टैग का बादल