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50 – प्राचीन वायुयानों के तथ्य


भारत के प्राचीन ग्रन्थों में आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व विमानों तथा उन के युद्धों का विस्तरित वर्णन है। सैनिक क्षमताओं वाले विमानों के प्रयोग, विमानों की भिडन्त, तथा ऐक दूसरे विमान का अदृष्य होना और पीछा करना किसी आधुनिक वैज्ञिानिक उपन्यास का आभास देते हैं लेकिन वह कोरी कलपना नहीं यथार्थ है।

प्राचीन वामानों के प्रकार

प्राचीन विमानों की दो श्रेणिया इस प्रकार थीः-

  • मानव निर्मित विमान, जो आधुनिक विमानों की तरह पंखों के सहायता से उडान भरते थे।
  • आश्चर्य जनक विमान, जो मानव निर्मित नहीं थे किन्तु उन का आकार प्रकार आधुनिक ‘उडन तशतरियों’ के अनुरूप है।

विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ

भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या में उपलब्द्ध हैं, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया। प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्हों ने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उन में से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है। विमान विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

1.     ऋगवेद– इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हे अश्विनों (वैज्ञिानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणत्या तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उन के दोनो ओर पंख होते थे। वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था। इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे। इस में कोई सन्देह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी। याता-यात के लिये ऋग वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-

  • जल-यान – यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 6.58.3)
  • कारा – यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 9.14.1)
  • त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋग वेद 3.14.1)
  • त्रिचक्र रथ – यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता था। (ऋग वेद 4.36.1)
  • वायु रथ – रथ की शकल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 5.41.6)
  • विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 3.14.1).

2.     यजुर्वेद में भी ऐक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिस का निर्माण जुडवा अशविन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्हो मे राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।

3.         विमानिका शास्त्र 1875 ईसवी में भारत के ऐक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की ऐक प्रति मिली थी। इस ग्रन्थ को ईसा से 400 वर्ष पूर्व का बताया जाता है तथा ऋषि भारदूाज रचित माना जाता है। इस का अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के 97 अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा 20 ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तरित जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियाँ अब लुप्त हो चुकी हैं। इन ग्रन्थों के विषय इस प्रकार थेः-

  • विमान के संचलन के बारे में जानकारी, उडान के समय सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी, तुफान तथा बिजली के आघात से विमान की सुरक्षा के उपाय, आवश्यक्ता पडने पर साधारण ईंधन के बदले सौर ऊर्जा पर विमान को चलाना आदि। इस से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विमान में ‘एन्टी ग्रेविटी’ क्षेत्र की यात्रा की क्षमता भी थी।
  • विमानिका शास्त्र में सौर ऊर्जा के माध्यम से विमान को उडाने के अतिरिक्त ऊर्जा को संचित रखने का विधान भी बताया गया है। ऐक विशेष प्रकार के शीशे की आठ नलियों में सौर ऊर्जा को एकत्रित किया जाता था जिस के विधान की पूरी जानकारी लिखित है किन्तु इस में से कई भाग अभी ठीक तरह से समझे नहीं गये हैं। 
  • इस ग्रन्थ के आठ भाग हैं जिन में विस्तरित मानचित्रों से विमानों की बनावट के अतिरिक्त विमानों को अग्नि तथा टूटने से बचाव के तरीके भी लिखित हैं। 
  • ग्रन्थ में 31 उपकरणों का वर्तान्त है तथा 16 धातुओं का उल्लेख है जो विमान निर्माण में प्रयोग की जाती हैं जो विमानों के निर्माण के लिये उपयुक्त मानी गयीं हैं क्यों कि वह सभी धातुयें गर्मी सहन करने की क्षमता रखती हैं और भार में हल्की हैं।

4.         यन्त्र सर्वस्वः – यह ग्रन्थ भी ऋषि भारदूाजरचित है। इस के 40 भाग हैं जिन में से एक भाग ‘विमानिका प्रकरण’के आठ अध्याय, लगभग 100 विषय और 500 सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारदूाजने विमानों को तीन श्रेऩियों में विभाजित किया हैः-

  • अन्तरदेशीय – जो ऐक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
  • अन्तरराष्ट्रीय – जो ऐक देश से दूसरे देश को जाते
  • अन्तीर्क्षय – जो ऐक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते

इन में सें अति-उल्लेखलीय सैनिक विमान थे जिन की विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं। उदाहरणार्थ सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-

  • पूर्णत्या अटूट, अग्नि से पूर्णत्या सुरक्षित, तथा आवश्यक्ता पडने पर पलक झपकने मात्र समय के अन्दर ही ऐक दम से स्थिर हो जाने में सक्ष्म।
  • शत्रु से अदृष्य हो जाने की क्षमता।
  • शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्ष्म। शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृष्यों को रिकार्ड कर लेने की क्षमता।
  • शत्रु के विमान की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना।
  • शत्रु के विमान के चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता।
  • निजि रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता।
  • आवश्यक्ता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता।
  • चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता।
  • स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता।
  • हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बडा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णत्या नियन्त्रित कर सकने में सक्ष्म।

विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ फाईटर और उडन तशतरी का मिश्रण ही हो सकता है। ऋषि भारदूाजकोई आधुनिक ‘फिक्शन राईटर नहीं थे परन्तुऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित कर सकता है कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञिानक माडल का विचार कैसे किया। उन्हों ने अंतरीक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती बाडी का ज्ञान भी पूर्णत्या हासिल नहीं कर पाये थे। 

5.         समरांगनः सुत्रधारा – य़ह ग्रन्थ विमानों तथा उन से सम्बन्धित सभी विषयों के बारे में जानकारी देता है।इस के 230 पद्य विमानों के निर्माण, उडान, गति, सामान्य तथा आकस्माक उतरान एवम पक्षियों की दुर्घटनाओं के बारे में भी उल्लेख करते हैं।

लगभग सभी वैदिक ग्रन्थों में विमानों की बनावट त्रिभुज आकार की दिखायी गयी है। किन्तु इन ग्रन्थों में दिया गया आकार प्रकार पूर्णत्या स्पष्ट और सूक्ष्म है। कठिनाई केवल धातुओं को पहचानने में आती है।

समरांगनः सुत्रधारा के आनुसार सर्व प्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था।  पश्चात अतिरिक्त विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

  • रुकमा – रुकमानौकीले आकार के और स्वर्ण रंग के थे।
  • सुन्दरः –सुन्दर राकेट की शक्ल तथा रजत युक्त थे।
  • त्रिपुरः –त्रिपुर तीन तल वाले थे।
  • शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था।

दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का परिशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुरज़े, उपकरण, चालकों एवम यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये।

ग्रन्थ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबु अथवा सेब या कोई अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।

सात प्रकार के ईजनों का वर्णन किया गया है तथा उन का किस विशिष्ट उद्देष्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊचाई पर उस का प्रयोग सफल और उत्तम होगा। सारांश यह कि प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्द्ध है। विमान आधुनिक हेलीकोपटरों की तरह सीधे ऊची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे पीछ तथा तिरछा चलने में भी सक्ष्म बताये गये हैं 

6.         कथा सरित-सागर – यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वालो विमानों को बना सकते थे। यह रथ-विमान मन की गति के समान चलते थे।

कोटिल्लय के अर्थ शास्त्र में अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सोविकाओं का उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उडाते थे । कोटिल्लय  ने उन के लिये विशिष्ट शब्द आकाश युद्धिनाह का प्रयोग किया है जिस का अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलेट) आकाश रथ, चाहे वह किसी भी आकार के हों का उल्लेख सम्राट अशोक के आलेखों में भी किया गया है जो उस के काल 256-237 ईसा पूर्व में लगाये गये थे।

उपरोक्त तथ्यों को केवल कोरी कल्पना कह कर नकारा नहीं जा सकता क्यों कल्पना को भी आधार के लिये किसी ठोस धरातल की जरूरत होती है। क्या विश्व में अन्य किसी देश के साहित्य में इस विषयों पर प्राचीन ग्रंथ हैं ? आज तकनीक ने भारत की उन्हीं प्राचीन ‘कल्पनाओं’ को हमारे सामने पुनः साकार कर के दिखाया है, मगर विदेशों में या तो परियों और ‘ऐंजिलों’ को बाहों पर उगे पंखों के सहारे से उडते दिखाया जाता रहा है या किसी सिंदबाद को कोई बाज उठा कर ले जाता है, तो कोई ‘गुलफाम’ उडने वाले घोडे पर सवार हो कर किसी ‘सब्ज परी’ को किसी जिन्न के उडते हुये कालीन से नीचे उतार कर बचा लेता है और फिर ऊँट पर बैठा कर रेगिस्तान में बने महल में वापिस छोड देता है। इन्हें कल्पना नहीं, ‘फैंटेसी’ कहते हैं।

चाँद शर्मा

 

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49 – वीरता की प्रतियोग्यतायें


 स्नातन धर्म के सभी देवी देवता शस्त्र धारण करते हैं। युद्धाभ्यास केवल क्षत्रियों तक ही सीमित नहीं थे, अन्य वर्ग भी इस का प्रशिक्षण ले सकते थे। शस्त्र ज्ञान के क्षेत्र में महिलायें भी पुरुषों के समान ही निपुण थीं। ऋषि वात्सायन कृत काम-सूत्र में महिलाओं के लिये तलवार, छडी, धनुषबाण के साथ युद्धकलाभ्यास के लिये भी प्रोत्साहन दिया गया है।

युद्ध कला साहित्य

विज्ञान तथा कलाओं की भान्ति युद्ध कला तथा शस्त्राभ्यास का उद्गम भी वेद ही हैं। वेदों में अठारह ज्ञान तथा कलाओं के विषयों पर मौलिक ज्ञान अर्जित है। अग्नि पुराण का उपवेद ‘धनुर्वेद’ पूर्णत्या धनुर्विद्या को समर्पित है। अग्नि पुराण में धनुर्वेद के विषय में उल्लेख किया गया है कि उस में पाँच भाग इस प्रकार थेः-

  • यन्त्र-मुक्ता – अस्त्र-शस्त्र के उपकरण जैसे घनुष और बाण।
  • पाणि-मुक्ता – हाथ से फैंके जाने वाले अस्त्र जैसे कि भाला।
  • मुक्ता-मुक्ता – हाथ में पकड कर किन्तु अस्त्र की तरह प्रहार करने वाले शस्त्र जैसे कि  बर्छी, त्रिशूल आदि।
  • हस्त-शस्त्र – हाथ में पकड कर आघात करने वाले हथियार जैसे तलवार, गदा अदि।
  • बाहू-युद्ध – निशस्त्र हो कर युद्ध करना।

युद्ध कला परिशिक्षण

प्रथम शताब्दि में भी में युद्ध कला तथा शस्त्राभ्यास के विषयों पर संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे गये थे। आठवीं शताब्दी के उद्योत्ना कृत ग्रंथ ‘कुव्वालय-माला’ में कई कई युद्ध क्रीडाँओं का उल्लेख किया गया है जिन में धनुर्विद्या, तलवार, खंजर, छडियों, भालों तथा मुक्कों के प्रयोग से परिशिक्षण दिया जाता था।

शिक्षार्थियों की दक्षता आँकने के लिये प्रतिस्पर्धायें आयोजित करी जाती थीं। रामायण में राम दूारा शिव धनुष उठा कर अपनी शारीरिक क्षमता का प्रमाण देने का वृतान्त सर्व विदित है। महाभारत मे भी उल्लेख मिलते हैं जब गुरु द्रौणाचार्य ने  कौरव पाँडव राजकुमारों के लिये प्रतिस्पर्धायें आयोजित कीं थीं। सभी राजकुमारों को ऐक मिट्टी के बने पक्षी की आँख पर लक्ष्य साधना था जिस में केवल अर्जुन ही सफल हुआ था। इसी प्रकार उर्जुन नें द्रौप्दी के स्वयंबर के समय नीचे रखे तेल के कढाहे में देख कर ऊपर घूमती हुई मछली की आँख को बींध दिया था। ऐक अन्य महाभारत कालीन उल्लेख में निशस्त्र युद्ध कला का वर्णन है जिस में दो प्रतिदून्दी मुक्कों, लातों, उंगलियों तथा अपने शीश के आघातों से परस्पर युद्ध करते हैं।

निशस्त्र युद्धाभ्यास  – बाहु-युद्ध 

सुश्रुत लिखित सुश्रुत संहिता में मानव शरीर के 107 स्थलों का उल्लेख है जिन में से 49 अंग अति संवेदनशील बताये गये हैं। यदि उन पर घूंसे से या किसी अन्य वस्तु से आघात किया जाये तो मृत्यु हो सकती है। भारतीय शस्त्राभ्यास के समय उन स्थलों पर आघात करना तथा अपने आप को आघात से कैसे बचाना चाहिये सिखाया जाता था।  

लगभग 630 ईस्वी में पल्लवराज नरसिंह्म वर्मन ने कई पत्थर की प्रतिमायें लगवायीं थी जिन को निश्स्त्र अभ्यास करते समय अपने प्रतिदून्दी को निष्क्रय करते दर्शाया गया था।

युद्ध क्रीडा

कुश्ती को मल-युद्ध कहा जाता था। हनुमान, भीम, और कृष्ण के बडे भाई बलराम इस कला में निपुण थे। आज भी भारतीय खिलाडी उन्हीं में से किसी ऐक को अपना आराघ्य मान कर अभ्यास करते हैं।

प्रथम शताब्दी की बुद्ध धर्म की कृति ‘लोटस-सूत्र’ में भी मुक्केबाज़ी, मुष्टिका प्रहार, अंगों को जकडना तथा उठा कर फैंकने आदि के अभ्यासों का उल्लेख मिलता है।   

तीसरी शताब्दी में पतंजली योग सूत्र के कुछ अंश, तथा नट नृत्य कला की मुद्रायें भी युद्ध क्रीडाओं सें शामिल करी गयीं थीं।

प्राचीन काल से कलारिप्पयात, वज्र-मुष्ठि तथा गतका आदि कलायें युद्ध परिशिक्षण का अंग रही हैं।

कलारिप्पयात  

कलारिप्पयात विश्व का सर्व प्रथम युद्ध अभ्यास है। इस की शुरुआत केरल के चौला राजाओं के काल से हुयी। यह अति उग्र और भयानक कलाभ्यास है जिस में लात, घूंसों के आघातों से क्रमशः निरन्तर कठिन और उग्र शस्त्रों का प्रयोग भी किया जाता है। इस में खंजर, तलवार, भाले सभी कुछ प्रयोग किये जाते हैं तथा उन के अतिरिक्त ऐक अन्य भयानक शस्त्र धातु मे बना हुआ चाबुक भी प्रयोग में आता है। खंजर तीन धार वाले तथा अत्यन्त तीखे होते हैं। आघात मर्म स्थलों पर और वध करने की धारणा से किये जाते हैं।कलारिप्पयात  का मुख्य हथियार ऐक लचीली दो घारी तलवार होती है जिसे प्रतिस्पर्धी अपनी कमर पर लपेट कर रखते हैं। युद्ध के समय इसे हाथ में गोलाकार स्थिति में पकड कर रखा जाता है और फिर अचानक प्रतिदून्दी पर अघात किया जाता है। सावधान ना रहने की अवस्था में प्रतिस्पर्धी की मृत्यु निशचित है। यह विश्व भर में ऐक अनूठा शस्त्र है। इस कला का अभ्यास कडे नियमों तथा कुशल गुरू के सन्निध्य में किया जाता है। 

इस कला के शिक्षार्थी शिव और शक्ति को अपना आराध्य मानते हैं। बुद्ध धर्म के साथ साथकलारिप्पयात का प्रसार दूरगामी पूर्वी देशों में भी हुआ। बुद्ध प्रचारक दूरगामी देशों की यात्रा करते थे इस लिये दूसरे धर्म के हिंसक विरोधियों से अपनी सुरक्षा के लिये वह इस कला का प्रयोग भी सीखते थे।इस का प्रयोग केवल प्रतिरक्षा के लिये ही होता था अतः कलारिप्पयात कला बुद्ध धर्म की  अहिंसा की नीति के अनुकूल थी।

वज्र मुष्टि  

वज्रमुष्टि का अर्थ है इन्द्र के वज्र का समान मुष्टिका से प्रहार करना। क्षत्रियों को युद्ध में कई बार अपने वाहन और शस्त्रों के खो जाने के कारण निशस्त्र हो कर पैदल भी युद्ध करना पडता था। यद्धपि युद्ध के नियमानुसार निशस्त्र पर प्रहार करना नियम विरुद्ध था तथापि नियम का उल्लंघन करने वाले भी सभी जगह होते हैं। अतः कुटिल शत्रुओं से युद्ध की स्थिति में क्षत्रिय मल युद्ध तथा मुष्टिका प्रहारों से अपना बचाव करते थे। आघात तथा बचाव के विधान परम्परा गत पीढी दर पीढी सिखाये जाते थे।

वज्र मुष्टि का अभ्यास शान्ति काल में सीखा जाता था और सभी प्रकार के आक्रमण तथा बचाव के गुर सिखाये जाते थे। संस्कृत में उन्हें संस्कृत नट कहा जाता है। नट को जाग्रित करने की अध्यात्मिक  कला  कठिन परिश्रम, अनुशासन नियमों के पालन तथा ऐकाग्रता की साधना के पश्चात ही सम्भव थी। मुसलिमों के आगमन और अधिकरण के पश्चात इस कला के विशेषज्ञ मार दिये गये और यह समाप्त हो गयी। 1804 ईसवी में अँग्रेज़ों ने इस पर पूर्णत्या प्रतिबन्ध लगा दिया। 

गतका

गतका पंजाब का युद्ध कौशल है। यह दो अथवा चार टोलियों में खेला जाता है। प्रतिस्पर्धियों के पास बेंत, तलवार या खडग (खाँडा) आदि हथियार होते हैं तथा गोलाकार ढाल भी होता है। इस को योरुपीय तलवारबाज़ी की तरह ही खेला जाता है और इस कला में पँजाब के निहँग समुदाय की गतका बाजी अति लोकप्रिय प्रदर्शन है।

भारतीय युद्ध कलाओं का निर्यात

भारत के युद्ध कौशल क्रीडायें जैसे कि जूडो, सुम्मो मलयुद्ध बुद्ध प्रचारकों के साथ साथ चीन, जापान तथा अन्य पू्रवी देशों में प्रचिल्लत हुयीं। 

जापान की युद्ध कला सुमराई में भी कई विशेषतायें भारतीय संस्कृति से परिवर्तित हुईं जैसे कि तलवारों की पवित्रता, वीरगति की लालसा तथा अपने स्वामी के लिये प्राणों का बलिदान करने की भावना, मानव का प्राणायाम के माध्यम से पांच महाभूतों के साथ ऐकाकार करना आदि मानसिक्तायें भारत की उपज हैं। यदि मन और शरीर में ऐकाग्रता है तो शरार की क्षमतायें असीमित हो जाती हैं। इस सिद्धान्त को आधार मान कर बुद्ध धर्म के ऐक प्रचारक बौधिधर्म ने शाओलिन मन्दिर का निर्माण चीन में किया था जहां से युद्ध कलाओं की इस परम्परा की शुरुआत हुयी।

  • जूडो तथा कराटे खेल में ऐक शिक्षार्था तथा गुरु के सम्बन्ध भारत की गुरु शिष्य परम्परा के अनुकूल और प्रभावित हैं।
  • इसी प्रकार प्राणायाम के माध्यम से श्वास नियन्त्रण भी ताये क्वान दो कराते का प्रमुख अंश बन गया।

बोधि धर्मः

बोधिधर्म का जन्म कच्छीपुरम, तामिलनाडु के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 522 ईसवी में वह चीन के महाराज लियांग-नुति के दरबार में आया। उस ने चीन के मोंक्स को कलारिप्पयातकी कला का प्रशिक्षण दिया ताकि वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकें।  शीघ्र ही वह शिक्षार्थी इस कला के पारांगत हो गये जिसे कालान्तर शाओलिन मुष्टिका प्रतियोग्यता के नाम से पहचाना गया। बोधिधर्म ने जिस कला के साथ प्राणा पद्धति (चीं) को भी संलगित किया और उसी से आक्यूपंक्चर का समावेश भी हुआ। ईसा से 500 वर्ष पूर्व जब बुद्ध मत का प्रभाव भारत में फैला तो नटराज को  बुद्ध धर्म संरक्षक के रूप में पहचाना जाने लगा। उन का नया नामकरण नरायनादेव ( चीनी भाषा में  ना लो यन तिंय) पडा तथा उन्हें पूर्वी दिशा मण्डल के संरक्षक के तौर पर जाना जाता है।

वल्लमकली नाव स्पर्धा

केरल में वल्लमकली नाव स्पर्धा ऐक आकर्षक क्रीडा है जिस में सौ से अधिक नाविक ऐक साथ सागर में नौका दौड की प्रतियोग्यता में भाग लेते हैँ। इस के सम्बन्ध में ऐक रोचक कथा हैः 

चार सौ वर्ष पूर्व चन्दनवल्लम मुख्यता युद्ध में प्रयोग किये जाते थे। चन्दनवल्लम बनाने के लिये 20 से 30 लाख सिक्कों तक की लागत आती था और निर्माण में दो वर्ष से अधिक समय लगता था।  

चम्पाकेसरी प्रदेश के राजा ने अपने मुख्य नाव निर्माता को आदेश दिया कि वह ऐक ऐसी नाव का निर्माण करे जिस में ऐक सौ सिपाही  ऐक साथ नाव खेने का काम कर सकें। इस प्रकार की क्षमता प्राप्त कर के उस ने अपने प्रतिदून्दी कायामुखम के राजा को प्राजित किया।

प्राजित राजा ने गुप्तचर भेज कर चन्दनवल्लम के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाही। ऐक गुप्तचर नें नाविक की पुत्री को प्रेम जाल में फाँस कर उस की माता का स्नेह भी प्राप्त कर लिया। फलस्वरूप माँ-बेटी दोनो ने नाविक पर प्रभाव डाल कर उसे भेजे गये गुप्तचर को नाव निर्माण की कला सिखाने के लिये विवश कर दिया।

नाव निर्माण की कला सीखने के पश्चात अगले ही दिन गुप्तचर चुपचाप अपने प्रदेश चम्पाकेसरी चला गया। कायामुखम के राजा ने नाविक निर्माता को बन्दी बना कर कारागार में डाल दिया। परन्तु उसे शीघ्र ही रिहाई मिल गयी क्यों कि अगली लडाई में कायामुखम को पुनः प्राजय का मुहँ देखना पडा। पता चला कि नाविक ने केवल नाव बनाने की कला ही सिखाई थी परन्तु चन्दनवल्लम का वास्तविक ज्ञान नहीं दिया था।

वल्लमकली क्रीडा भिन्न भिन्न जातियों, धर्मों तथा प्रदेशों के लोगों को ऐक सूत्र में बाँधती है। नौका पर बैठे सभी शरीर ऐक साथ विजय लक्ष्य के सूत्र में बँध जाते हैं। आजकल भी यह नौका दौड पर्यटकों को आकर्षित करती है।

चाँद शर्मा

48 – भारत की सैनिक परम्परायें


सर्वत्र, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान – यह तीनों ईश्वर की विश्षतायें हैं। ईश्वर दयालु, करुणा-निधान. संवेदनशील तथा वत्सल होने के साथ साथ रौद्र रूप में ‘संहारक’ भी है। ईश्वरीय छवि के सभी गुण हिन्दू चित्रावली तथा आलेखों में स्दैव दिखते हैं।

अस्त्र शस्त्रों का महत्व

साधारणत्या ईश्वर के ऐक हाथ में ‘कृपा’ के प्रतीक पुष्प दर्शाये जाते हैं, दूसरा हाथ ‘ शुभ-आशीष’ देने की मुद्रा में होता है, तीसरे हाथ में दुष्कर्मिओं को ‘चैतावनी’ देने के लिये शंख होता है, तथा चौथे हाथ में दुष्ट का ‘संहार’ करने के लिये शस्त्र भी होता है। ईश्वर को स्दैव क्रोध-रहित, प्रसन्न-मुद्रा में युद्ध करते समय भी शान्त-भाव में ही चित्रित किया जाता है। सभी देवी-देवताओं के पास वरदान देने की क्षमता के साथ धर्म की रक्षा के लिये शस्त्र अवश्य होते हैं।

हिन्दू धर्म में केवल पिटते रहने की भावना को प्रोत्साहित नहीं किया जाता और कायरता को सब से बडा अभिशाप माना जाता है। “अहिंसा परमो धर्मः” के साथ – “धर्म हिंसा त्थैवः चः” का पाठ भी पढाया जाता है जिस का अर्थ है अहिंसा उत्तम धर्म है परन्तु धर्म रक्षार्थ की गयी हिंसा भी उतनी ही श्रेष्ठ है। युद्ध भूमि पर प्राण त्याग कर वीरगति पाना श्रेष्ठतम है और कायरता का जीवन नारकीय अधोगति समझा जाता है। स्वयं-रक्षा, शरणागत-रक्षा और धर्म-रक्षा समस्त मानवों के लिये सर्वोच्च कर्तव्य तथा मोक्ष के मार्ग हैं। शस्त्र और शास्त्र दोनो का उद्देश्य धर्म रक्षा है। हिन्दू समाज में अस्त्र शस्त्रों की पूजा अर्चना का विधान है। शस्त्रों का ज्ञान साधना तथा उपासना के माध्यम से ही गुरुजनों से प्राप्त होता है।

आत्म-रक्षा का अधिकार

प्रकृति नें सभी जीवों का अपनी आत्म-रक्षा के लिये सींग, दाँत, नख, डंक तथा शारीरिक बल आदि के साधन दिये हैं। आत्म-रक्षा के लिये ही प्रकृति ने जीवों को तेज भागने, छिपने तथा गिरगिट आदि की तरह अपना रंग बदल कर अदर्ष्य होने की कला भी सिखाई है। गाय और गिलहरी से ले कर सभी जीव अपने बचाव के लिये उपलब्द्ध साधनों और विकल्पों का उपयोग करते हैं जिस के लिये उन्हें चेतना तथा प्रेरणा अकस्माक दैविक शक्ति से ही प्राप्त होती है। वह अपनी रक्षा के लिये कोई लम्बी चौडी योजनायें नहीं बनाते। उन की सभी क्रियायें तत्कालिक होती हैं। उन के लिये जीव हत्या कर देना कोई अधर्म भी नहीं है।

‘जियो तथा जीने दो’ धर्म का सिद्धान्त मुख्यता मानवों के लिये है अतः युद्ध के लिये पूर्व अभ्यास, तैय्यारी करना इत्यादि धर्म की व्याख्या में आता है। धर्म-रक्षा और धर्म संस्थापना के लिये ईश्वर नें स्वयं कई बार शास्त्र धारण कर के कीर्तिमान भी स्थापित किये हैं तथा अवश्यक्तानुसार पुनः पुनः वैसा ही करने की संकल्प भी दोहराया है। अतः हिन्दू धर्म प्रत्येक धर्म परायण व्यक्ति को धर्म-रक्षा के लिये हिंसक युद्ध मार्ग की पूर्ण स्वीकृति प्रदान करता है ताकि वह निस्संकोच अधर्म का विनाश कर सके।

रण भूमि का वातावरण

प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों के मतानुसार धर्म-रक्षा हेतु युद्ध भी धर्म की मर्यादाओं के अनुरूप ही होना चाहिये। अतः ग्रन्थों में धर्म-युद्ध के विषय में विस्तरित उल्लेख दिये गये हैं। रामायण, महाभारत तथा पुराणों में सैनिक गति-विधियों, सैनिक व्यूहों, सैनिक संगठनों तथा सैनापतियों के उत्तरदाईत्वों और अधिकारों का ब्योरा दिया गया है। सैनापतियों के पद नगर-संरक्षक, दु्र्गाधिपति, दुर्ग-अभियन्ता, रथी, महारथी, तथा उच्च सैनापति आदि होते थे।

ग्रन्थों के अनुसार दुर्ग तथा व्यूह रचनायें आवश्यक्तानुसार होती थीं। कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन भी किया गया है। तोप को ‘शतघनी’ कहा जाता था तथा यह शस्त्र अग्नि अस्त्रों की श्रेणी में आता था। इस अस्त्र से ऐक ही बार में सौ से अधिक शत्रुओं का संहार किया जा सकता था। अग्नि अस्त्रों के अतिरिक्त रसायनास्त्र तथा कीटास्त्र (केमीकल तथा बायोलोजिकल वार हैडस) का प्रयोग भी किया जाता था। युद्ध थल, जल तथा नभ सभी तलों पर लडे जाते थे। आलोचकों की तुष्टि के लिये यदि उन उल्लेखों को हम केवल अतिश्योक्ति भी माने, तो भी उस काल के युद्धों के सिद्धान्त आज भी मान्य हैं। सैनिक चलन की गतिविधियाँ तथा परस्पारिक क्रियायें वर्तमान काल के युद्ध के चित्रण के अनुरूप ही हैं।

अन्य महाकाव्यों की तुलना में भारतीय युद्ध भूमि के उल्लेख किसी ऐक युद्ध भूमि के वृतान्त तक ही सीमित नहीं थे। ग्रीक भाषा के महाकाव्य ओडैसी में वर्णित किया गया है, कि किसी ने सैनिकों को ऐक विशाल घोडे के आकार में छिपा कर इलुम दुर्ग में प्रवेश करवा कर किला जीत लिया था। इस की तुलना में रामायण तथा महाभारत के युद्ध ‘महायुद्धों’ की तरह लडे गये थे और युद्ध में सैनायें कई युद्ध स्थलों (वार थ्यिटरों) पर अलग अलग सैनापतियों के निर्देशानुसार ऐक ही समय पर लडतीं थी, परन्तु विकेन्द्रीयकरण होते हुये भी केन्द्रीय नियन्त्रण सर्वोच्च सैनापति के आधीन ही रहता था।

युद्ध के प्राचीन मौलिक सिद्धान्त वर्तमान युग में भी युद्ध क्षेत्र को प्रभावित करते हैं जैसे कि सैनिकों तथा अस्त्र शस्त्रों की संख्या, अक्रामिक क्षमता, युद्ध संचालन नीति, सैना नायकों का व्यक्तित्व, वीरता, अनुभव तथा सक्रियता, भेद नीति, साहस एवम मनोबल आदि। सैनिक गतिविधियाँ जैसे कि शत्रु से भेद छिपाना, अथवा शत्रु का मनोबल तोडने के लिये कोई भ्रामिक प्रचार जान बूझ कर फैला देना, रात्रि युद्ध, तथा आत्मदाही दस्तों का प्रयोग आदि भी भारतीय युद्ध दक्षता के प्रमाण स्वरूप इतिहास के पन्नों पर उल्लेखित हैं। यह वर्णन किसी युद्ध संवादी या उपन्यासकार के नहीं बल्कि ऋषियों के संकलन हैं जो सत्यता पर स्दैव अडिग रहते थे।

ध्वजों का प्रयोग

युद्ध में ध्वजों का प्रयोग भी ग्रन्थों में वर्णित है। ऋगवेद संहिता के अतिरिक्त अन्य ग्रन्थों में भी ध्वज प्रयोग का उल्लेख है। इन के आकारनुसार कई नाम थे जैसे कि अक्रः. कृतध्वजः, केतु, बृहतकेतु, सहस्त्रकेतु आदि। ध्वज तथा नगाडे (वार-ड्रम्स), दुन्दभि आदि सैन्य गरिमा के चिन्ह माने जाते थे। महाभारत युद्ध के समय प्रत्येक रथी और महारथी का निजि ध्वज और शंखनाद सैना नायक की पहचान के प्रतीक थे।

अस्त्र शस्त्रों का निर्माण

अस्त्रों के क्षेत्र में राकेट (मिसाइल) का अविष्कार भी भारतीय है। योरुपीय सैनिक जब सर्व प्रथम भारत में आये तो उन्हों ने भारतीयों के पास राकेट होने को स्वीकारा है। सिकंदर महान ने यूनान में बैठे अपने गुरु अरस्तु को पत्र में सूचित किया था कि भारत के ‘सीमावर्ती क्षेत्र के स्थानीय सैनिकों’ ने यूनानी सैना पर भयानक आग के गोलों से वर्षा की थी। यह पाश्चात्य इतिहासकारों का ही स्वीकृत प्रमाण है कि विश्व विजेता सिकन्दर तथा उस की सैना मगघ देश की सैनिक क्षमता से इतनी भयभीत हो चुकी थी कि सैनिकों ने सिकन्दर को बिना युद्ध किये भारत भूमि से यूनान लौटने के लिये विवश होना पडा था।

ऐक अन्य प्राचीन ग्रंथ ‘शुक्रनीति’ में राईफल तथा तोप की तरह के अस्त्र शस्त्रों के निर्माण की विधि को उल्लेख करती है। भारतीयों को गोला बारूद (गन पाउडर) की जानकारी भी थी। इतिहासकार इलियट के कथनानुसार अरब वासियों ने गन पाउडर का प्रयोग भारतीयों से सीखा था और उस से पहले वह नेप्था में बुझे तीरों का ही प्रयोग करते थे।

युद्ध के नियम

यह हिन्दुओं के लिये गर्व की बात है कि उन की युद्ध परम्पराओं में निहत्थे, घायल, आश्रित, तथा युद्ध से विरक्त शत्रु पर प्रहार नहीं किया जाता था। प्राचीन काल में युद्ध वीरता पुर्वक लडे जाते थे। अन्य देशों की तुलना में भारतीय युद्धों में कम से कम शक्ति, हिंसा तथा क्रूरता का प्रयोग किया जाता था। ‘कत्लेआम’ की तरह प्राजित शत्रु सैनिकों का नरसंहार करने की परम्परा नहीं थी। बालकों तथा स्त्रीयों का वध या उन्हें गुलाम बनाने की प्रथा भी नहीं थी। शत्रु के बुद्धिजीवियों का अपमानित नहीं किया जाता था। रथी केवल रथियों से, घुड-सवार केवल घुडसवारों से युद्ध करते थे। सैनानायक पैदल सैनिकों पर वार नहीं करते थे। स्त्रियों, धर्माचार्यों, अनुचरों, चिकित्सकों तथा साधारण नागरिकों को आघात नहीं पहुँचाया जाता था। चिकित्साल्यों, विद्यालयों तथा रहवासी क्षेत्रों और रात्रि के समय युद्ध वर्ज्य था।

यही भारतीय सिद्धान्त वर्तमानयुग में ‘जिनेवा कनवेन्शन की आधार शिला हैं जिन की दुहाई तो दी जाती है परन्तु उन का उल्लंघन आज भी अधिकाँश देशों की सैनाये करती रहती हैं। भारतीयों ने अपने आदर्शवाद की भारी कीमत चुका कर भी नियमों का आदर्श तो निभाया जिस का विदेशी आक्रान्ताओं ने मक्कारी से हथियार के रुप में भारतीयों के विरुद्ध हमैशा प्रयोग किया।

नौका निर्माण तथा तटीय सुरक्षा

भारत उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत श्रंखला के कारण अन्य देशों से कटा हुआ है तथा पूर्व और दक्षिण की ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। इस कारण विश्व के अन्य देशों के साथ सम्पर्क रखने के लिये नौकाओं का विकास और प्रयोग भारत के लिये अनिवार्यता रही है। ग्रन्थों में ‘वरुण’ को सागर देवता माना गया है। देव तथा दानव दोनो कश्यप ऋषि तथा उन की पत्नियों दिति और अदिति की संतानें थीं। आज कल भी जब किसी नोका या जहाज को सागर में उतारा जाता है तो ‘अदिति’ को प्रार्थना समर्पित की जाती है।

ऋग वेद में नौका दूारा समुद्र पार करने के कई उल्लेख हैं तथा ऐक सौ नाविकों दूारा बडे जहाज को खेने का उल्लेख है। ‘पल्लव’ का उल्लेख भी है जो तूफान के समय भी जहाज को सीधा और स्थिर रखने में सहायक होते थे। पल्लव को आधुनिक स्टेबिलाइजरों का अग्रज कहा जा सकता है। अथर्ववेद में ऐसी नौकाओं का उल्लेख है जो सुरक्षित, विस्तरित तथा आरामदायक भी थीं।

ऋगवेद में सागर मार्ग से व्यापार के साथ साथ भारत के दोनो महासागरों (पूर्वी तथा पश्चिमी) का उल्लेख है जिन्हें आज खाडी बंगाल तथा अरब सागर कहा जाता है। वैदिक युग के जन साधारण की छवि नाविकों की है जो सरस्वती घाटी सभ्यता के ऐतिहासिक अवशेषों के साथ मेल खाती है। संस्कृत ग्रंथ ‘युक्तिकल्पत्रु’ में नौका निर्माण का ज्ञान है। इसी का चित्रण अजन्ता गुफाओं में भी विध्यमान है। इस ग्रंथ में नौका निर्माण की विस्तरित जानकारी है जैसे किस प्रकार की लकडी का प्रयोग किया जाये, उन का आकार और डिजाइन कैसा हो। उस को किस प्रकार सजाया जाये ताकि यात्रियों को अत्याधिक आराम हो। युक्तिकल्पत्रु में जलवाहनों की वर्गीकृत श्रेणियाँ भी निर्धारित की गयीं हैं।

नौ सैना का विकास

भारत में नौका यातायात का प्रारम्भ सिन्धु नदी में लग भग 6000 वर्ष पूर्व हुआ। अंग्रेजी शब्द नेवीगेशन का उदग्म संस्कृत शब्द नवगति से हुआ है। नेवी शब्द नौ से निकला है। ऋगवेद में सरस्वती नदी को ‘हिरण्यवर्तनी’ (सु्वर्ण मार्ग) तथा सिन्धु नदी को ‘हिरण्यमयी’ (स्वर्णमयी) कहा गया है। सरस्वती क्षेत्र से सुवर्ण धातु निकाला जाता था और उस का निर्यात होता था। इस के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का निर्यात भी होता था। भारत के लोग समुद्र के मार्ग से मिस्त्र के साथ इराक के माध्यम से व्यापार करते थे। तीसरी शताब्दी में भारतीय मलय देशों (मलाया) तथा हिन्द चीनी देशों को घोडों का निर्यात भी समुद्री मार्ग से करते थे।

विश्व का प्रथम ज्वार स्थल ईसा से 2300 वर्ष पूर्व हडप्पा सभ्यता के समकालीन लोथल में निर्मित हुआ था। यह स्थान आधुनिक गुजरात तट पर स्थित मंगरोल बन्दरगाह के निकट है। ऋगवेद के अनुसार वरुण देव सागर के सभी मार्गों के ज्ञाता हैं।

आर्य भट्ट तथा वराह मिहिर नें नक्षत्रों की पहचान कर सागर यात्रा के मान चित्रों का निर्माण की कला भी दर्शायी है। इस के लिये ऐक ‘मत्स्य यन्त्र’ का प्रयोग किया जाता था जो आधुनिक मैगनेटिक कम्पास का अग्रज है। इस यन्त्र में लोहे की ऐक मछली तेल जैसे द्रव्य पर तैरती रहती थी और वह स्दैव उत्तर दिशा की तरफ मुहँ रखती थी।

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य़ ने अपने नौका सैनानायक के आधीन ऐक नवसैना स्थापित की थी जिस का उत्तरदाईत्व तटीय सुरक्षा के साथ साथ झीलों और जल यातायात को सुरक्षा पहुँचाना था। भारतीय जलयान काम्बोज (कमबोडिया), यवदूीप (जावा), सुमात्रा, तथा चम्पा में भारतीय उपनिवेषों के साथ साथ हिन्दचीनी (इन्डोनेशिया) फिल्पाईन, जापान, चीन, अरब तथा मिस्त्र के जलमार्गों पर भारतीय व्यापारिक वाहनों को सुरक्षा प्रदान करना था। क्विलों से चल कर भारतीय नाविकों ने दक्षिणी चीन और अफ्रीका के सम्पूर्ण समुद्री तट का भ्रमण किया हुआ था। उन्हों ने अफरीका से ले कर मेडागास्कर तक की सभी बन्दरगाहों से सम्पर्क स्थापित किया था। प्रचीन काल से मध्यकाल तक भारत को ऐक सैनिक महाशक्ति माना जाता था।

चाँद शर्मा

47 – राष्ट्रवाद की पहचान – हिन्दुत्व


आदि काल से मानव जहाँ पैदा होता था वही जन्म भूमि जीवन भर के लिये उस की पहचान बन जाती थी तथा माता पिता का समुदाय उस का जन्मजात धर्म बन जाता था। यदि मानव समुदाय ऐक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाते थे तो उन की पहचान साथ जाती थी किन्तु नये प्रदेश में या तो ‘अक्रान्ता’ कहलाते थे या ‘शरणार्थी’। अक्रान्ता नये स्थान पर स्थानीय परमपराओं को नष्ट कर के अपनी परमपराओं को लागू करते थे। शरणार्थियों को विवश हो कर अपनी परम्परायें छोड कर नये स्थान की परम्पराओं को अपनाना पडता था। कालान्तर मानव समुदायों ने धरती पर अपना अधिकार घोषित कर के उस स्थान को अपना इलाका, खण्ड या देश कहना आरम्भ कर दिया और धर्म, स्थान, नस्लों, जातियों, तथा व्यवसाय के आधार से मानवों की पहचान होने लगी।

सभ्यताओं का संघर्ष

भारत में भी कई आक्रान्ता आये किन्तु उन्हों ने भारत के स्थानीय रीति रिवाज अपना लिये थे और भारत वासियों की पहचान को अपना कर इसी धरती से घुल मिल गये। सातवीं शताब्दी में मुस्लिम भी इस देश में अक्रान्ता बन कर आये परन्तु स्थानीय सभ्यता के साथ मिलने के बजाये उन्हों ने स्थानीय सभ्यता की सभी पहचानों को नष्ट करने का भरपूर प्रयत्न किया जिस कारण मुसलमानों का स्थानीय लोगों के साथ स्दैव वैर विरोध ही चलता रहा। इस तथ्य के कभी कभार अपवाद हुये भी तो वह आटे में नमक के बराबर ही थे। स्थानीय लोगों के अतिरिक्त, धार्मिक ऐकता होते हुये भी मुस्लिम आपस में नस्लों, परिवारों तथा खान्दानों की पहचान के आधार पर भी लडते रहेते थे। उन की आपसी प्रतिस्पर्धा में जो ऐक लक्ष्य समान था वह था धर्म के नाम पर इस्लामी भाईचारा जिस का उद्देश स्थानीय हिन्दू धर्म और परम्पराओं का विनाश करना था। उन्हों ने भारत को अधिकृत तो किया किन्तु भारत की स्थानीय सभ्यता को अपनाया नहीं। इस वजह से भारत में उन की पहचान आक्रान्ताओं जैसी ही आज तक रही है।

धर्म निर्पेक्षता का ढोंग

मुसलमानों के पश्चात योरुपवासियों ने भारत को अपना उपनिवेश बनाया। उन के मुख्य प्रतिस्पर्धी भी ईसाई थे। अतः उपनिवेश की नीति को सफल बनाने के लिये उन्हों ने मानवी पहचान के लिये ऐक नई परिभाषा का निर्माण किया जिसे आजकल ‘राष्ट्रीयता’ कहा जाता है। इसाई अपनी अपनी पहचान देश के आधार पर करते थे। अंग्रेज़ अपने आप को ईसाई कहने के बजाय अपने आप को ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ या ‘किंग आफ इंगलैण्ड का वफादार सेवक कहना अधिक पसंद करते थे। नस्ल के आधार पर वह अपने आप को ‘ऐंगलो सैख्सन’ भी नहीं कहते थे।

भारत पर अपने अतिक्रमण को ‘न्यायोचित’ करने के लिये उन्हों ने आर्य जाति के भारत पदार्पण की मनघडन्त कहानी को भी बढ चढ कर फैलाया ताकि वह स्थानीय भारत वासियों को बता सकें कि अगर आर्य जाति के लोग बाहर से आकर भारत पर अपना अधिकार जमा सकते थे तो फिर ब्रिटिश वैसा क्यों नहीं कर सकते। उन का कथन था कि सोने की चिडिया भारत किसी की मिलकीयत नहीं थी। हर कोई चिडिया के पंख नोच सकता था। सभी लुटेरों के अधिकार भी स्थानीय लोगों के समान ही थे। इसाई आक्रान्ता ऐसा ही कुछ अमेरिका आदि देशों में भी कर रहे थे। इसी मिथ्यात्मिक प्रचार का परिणाम भारत के बटवारे के रूप में निकला और 1947 के बाद अभी भी धर्म निरर्पेक्ष्ता की आड में प्रचार किया गया कि भारत कोई राष्ट्र नहीं था बल्कि जातियों और छोटी छोटी रियासतों में बटा हु्आ इलाका था जिसे केवल अंग्रेजों नें ‘इण्डिया’ की पहचान दे कर ऐक सूत्र में बाँधा और देश कहलाने लायक बनाया।

राष्ट्रीयता के माप दण्ड

पाश्चात्य जगत के आधुनिक राजनीति शास्त्री किसी देश के वासियों की राष्ट्रीयता को जिन तथ्यों के आधार से आँकते हैं अगर उन्हीं के मापदण्डों को हम भी आधार मान लें तो भी भारत की राष्ट्रीयता के प्रमाण स्पष्ट उजागर हो जाते है। उन के मापदण्डों के अनुसार मानवी राष्ट्रीयता का आंकलन इस आधार पर किया जाता है यदिः-

  1. उस देश की जन संख्या किसी स्पष्ट और निर्धारित भू खण्ड में निवास करती हो।
  2. जिन की भाषा तथा साहित्य में समानता हो।
  3. जिन के रीति रिवाजों में समानता हो । 
  4. जिन की ‘उचित–अनुचित’ के व्यवहारिक निर्णयों के बारे में समान विचारधारा हो।    

उपरोक्त मापदण्डों के आधार से भी भारत की राष्ट्रीयता के प्रमाण इस प्रकार स्पष्ट हैं-

प्रथम आधार – स्पष्ट और निर्धारित भूगोलिक आवास

आधुनिक भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश और म्यनमार को संयुक्त कर के देखें तो विश्व में केवल प्राचीन भारत ही ऐक मात्र क्षेत्र है जिस के ऐक तरफ दुर्गम पर्वत श्रंखला और तीन तरफ महासागर उसे ऐक विशाल दुर्ग की तरह सुरक्षा प्रदान कर रहै हैँ। भारत को प्रकृति ने स्पष्ट तौर से भूगौलिक सीमाओं से बाँधा है तथा इस तथ्य का कई प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख किया गया है। विष्णु पुराण में भारत की सीमाओं के साथ साथ वहाँ के निवासियों की पहचान के बारे में इस प्रकार उल्लेख किया गया हैः-  

            उतरं यत् समुद्रस्य हिमेद्रश्चैव दक्षिण्म , वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति

            (साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में समुद्र से घिरा हुआ जो देश है वहाँ के निवासी भारतीय हैं।)

‘बृहस्पति आगम’ के अनुसार भारत की पहचान इस प्रकार हैः-

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥
अर्थात – हिमालय से ले कर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक का देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।
मुस्लमानों ने ‘हिन्दुस्थान’ शब्द का अपभ्रंश ‘हिन्दुस्तान’ कर दिया था।

रामायण का कथानक समस्त पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत, उत्तरी भारत, मध्य भारत, दक्षिणी पठार से होता हुआ रामेश्वरम और लंका तक फैला हुआ है। महाभारत का कथानक भी उसी प्रकार भारत के चारों कोनो तक फैला हुआ है। इस भू खण्ड में रहने वाले सभी हिन्दू थे यहाँ तक कि लंकाधिपति रावण भी ब्राह्मण था और त्रिमूर्ति शक्ति शिव का पुजारी था। वह वेदों का ज्ञाता था और यज्ञ भी करता था।

दिूतीय आधार – भाषा और साहित्य में समानता

भारत की सभी भाषायों की जननी संस्कृत हैं जो आदि काल से ग्यारहवीं शताब्दी तक लगातार भारत की साहित्यिक तथा सभी प्रान्तों को ऐक सूत्र में बाँधे रखने के माध्यम से भारत की राष्ट्रभाषा भी रही है। आज भी संस्कृत भाषा ऐक सजीव भाषा है। कई दर्जन पत्र पत्रिकायें आज भी संस्कृत में प्रकाशित होती हैं। अखिल भारतीय रेडियो माध्यम से समाचारों का प्रसारण भी संस्कृत में होता है। चलचित्रों तथा दूरदर्शन पर संस्कृत में फिल्में भी दिखायी जाती हैं। तीन हजार से अधिक जन संख्या वाला ऐक भारतीय गाँव आज भी केवल संस्कृत भाषा में ही दैनिक आदान प्रदान करता है। भारत के कई बुद्धिजीवी परिवारों की भाषा आज भी संस्कृत है। केवल उदाहरण स्वरूप संस्कृत भाषा का प्रसिद्ध गायत्री मंत्र आज भी प्रत्येक हिन्दू से सुना जाता है जोकि संस्कृत की चिरंजीवता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वेदों, उपनिष्दों, पुराणों, धर्म शास्त्रों, रामायण तथा महाभारत का प्रभाव भारत के कोने कोने में है।   

तृतीय आधार – समान रीति रिवाज

निम्नलिखित तथ्य भारत की राष्ट्रीय ऐकता को दर्शाने के लिये प्रत्यक्ष प्रमाण हैं –

  1. समस्त भारत के हिन्दू परिवारों में जब भी कोई रीति रिवाज किये जाते हैं तो उन में पढे जाने वाले संस्कृत के मन्त्रों में गंगा यमुना, सरस्वती, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, तथा सिन्धु नदियों का नाम लिया जाता है जो भारत की विशालता और ऐकता का प्रमाण हैं।
  2. यातायात के सीमित साधनों के बावजूद भी हिन्दू भारत के चारों कोनों में स्थित तीर्थ-स्थलों की यात्रा करते रहै हैं जिन में मथुरा, अयोध्या, पुरी, सोमनाथ, कामाक्षी, इन्दौर, उज्जैन, मीनाक्षीपुरम, और रामेश्वरम के मन्दिर मुख्य हैं।
  3. विपरीत परिस्थितियों और मौसम के बावजूद भी हिन्दू अमरनाथ, बद्रीनाथ, सोमनाथ, जगन्नाथ, कैलास-मानसरोवर, वैश्णो देवी तथा राम सेतु जैसे दुर्गम  तीर्थ स्थलों की यात्रा निष्ठा पूर्वक स्वेच्छा से कर के निजि जीवन की अभिलाषा की पूर्ति करते हैं।
  4. यातायात की असुविधाओं के बावजूद, स्वेच्छा से निश्चित समय पर भारत के चारों कोनों से हिन्दूओं का यात्रा कर के प्रयाग, हरिदूार, नाशिक तथा काशी में कुम्भ स्नान के लिये ऐकत्रित हो जाना कोई जनसंख्या का त्रास्ती पलायन नहीं होता अपितु आस्था और हिन्दूओं के समान वैचारिक, सामाजिक और रीतिरीवाजों का प्रदर्शन है।
  5. देश भर में 12 ज्योतिर्लिंग हिन्दू ऐकता का अनूठा प्रमाण हैं। यह भी भारत की ऐकता का प्रतीक है जब प्रत्येक वर्ष पैदल चल कर लाखों की संख्या में आज भी काँवडिये हरिदूार से गंगा जल ला कर काशी स्थित ज्योतिर्लिंग का शिवरात्री के पर्व पर अभिषेक कराते हैं।
  6. ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति के अतिरिक्त राम, कृष्ण, गणेश, हनुमान, दुर्गा तथा लक्ष्मी समस्त भारत के सर्वमान्य देवी-देवता हैं।

विश्व के किसी भी अन्य देश में भारत के जैसी समान रीति रिवाजों की परम्परा नहीं है। मकर संक्रान्ति, शिवरात्रि, रामनवमी, बुद्ध जयन्ती, वैशाखी, महीवीर जयन्ती जन्माष्टमी तथा दीपावली के अतिरिक्त कई पर्व हैं जो भारत के पर्यावरण, इतिहास, तथा जन नायकों के जीवन की घटनाओं से जुडे हैं और विचारधारा की ऐकता के सूचक हैं। इन पर्वों की तुलना में ईद, मुहर्रम, क्रिसमिस, ईस्टर आदि पर्वों से भारत के जन साधारण का कोई सम्बन्ध नहीं।

चतुर्थ आधार – समान नैतिकता

नैतिकता की समानतायें हिन्दूओं के सभी साम्प्रदाओं में ऐक जैसी ही हैं। पाप और पुण्य की धारणायें भी समान हैं। समस्त हिन्दू राम की रावण पर विजय को धर्म की अधर्म पर विजय के अनुरूप देखते हैं। विदेशी लोग इस घटना को आर्यों की अनार्यों (द्राविडों) पर विजय का दुष्प्रचार तो करते हैं परन्तु वह यह तथ्य नहीं जानते कि दक्षिण भारत में भी कोई रावण, कुम्भकरण, या मेधनाद की मूर्ति घर में स्थापित नहीं करता।

विविधता में ऐकता स्वरूप हिन्दुत्व

व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं के बावजूद भी भारत में पनपे सभी धार्मिक साम्प्रदायों में समानतायें पाई जाती हैं – 

  • सभी हिन्दू ऐकमत हैं कि ईश्वर ऐक है, निराकार है किन्तु ईश्वर को साकारत्मक चिन्हों से दर्शाया भी जा सकता है, ईश्वर कई रूपों में प्रगट होता है तथा हर कृति में ईश्वर की ही छवि है।
  • सभी हिन्दू शिव, राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरू नानक, साईं बाबा, स्वामीमारायण तथा अन्य किसी महापुरुष में से किसी को अपना जीवन नायक मानते हैं।
  • भारत में भगवा रंग पवित्रता, वैराग्य, अध्यात्मिकता तथा ज्ञान का प्रतीक है।
  • हिन्दू पुर्नजीवन में विशवास रखते हैं।
  • सभी वर्गों के तीर्थस्थल अखणडित भारत, नेपाल और तिब्बत में ही स्थित हैं क्यों कि धर्म और सभ्यता का जन्म सर्व प्रथम यहीं हुआ था।

सामाजिक विचारधारा के आधार पर हिन्दूओं ने कभी किसी अहिन्दू के धर्म स्थल को ध्वस्त नहीं किया है। हिन्दू कभी किसी अहिन्दू के धर्म के विरुध धर्म-युद्ध या हिंसा नहीं करते। हिन्दू समस्त विश्व को ही एक विशाल परिवार मानते हैं। हिन्दूओं में विदूानो तथा सज्जन प्राणियों को ऋषि, संत या महात्मा कहा जाता है तथा वह सर्वत्र आदरनीय माने जाते हैं। हिन्दू गौ मांस खाने को वर्जित मानते है। हिन्दूओं का विवाहित जीवन एक पति-पत्नी प्रथा पर आधारित है तथा इस सम्बन्ध को जीवन पर्यन्त निभाया जाता है। हिन्दूओं के सभी वर्गों पर एक ही सामाजिक आचार संहिता लागू है। हिन्दूओं के सभी समुदाय एक दूसरे के प्रति सौहार्द भाव रखते हैं और एक दूसरे की रसमों का आदर करते हैं। धार्मिक समुदायों में स्वेच्छा से आवाजावी पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। कोई किसी को समुदाय परिवर्तन करने के लिये नहीं उकसाता। संस्कृत सभी भारतीय मूल की भाषाओं की जनक भाषा है।

पर्यावर्ण के प्रति भी वैचारिक समानतायें हैं। समस्त नदीयाँ और उन में से विशेष कर गंगा नदी अति पवित्र मानी जाती है। तुलसी के पौधे का उस की पवित्रता के कारण विशेष रुप से आदर किया जाता है। सभी वर्गों में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता है और अस्थियों का बहते हुये जल में विसर्जन किया जाता है। सभी वर्गों के पर्व और त्यौहार मौसमी बदलाव, भारतीय महापुरुषों के जीवन की या जन-जीवन सम्बन्धी घटनाओं से जुड़े हुये हैं तथा किसी भी पर्व-त्यौहार के अवसर पर सार्वजनिक या सामूहिक ढंग से रोने धोने और छाती पीटने की कोई प्रथा नहीं है। मुख्य तथ्य यह है कि सभी हिन्दूओं पर ऐक ही आचार विचार तथा संस्कार संहिता लागू है।

हिन्दू संस्कृति ही भारत वासियों की राष्ट्रीय पहचान है। मुसलिम और ईसाई धर्मों के तीर्थ स्थल, धर्म ग्रँथ, नैतिकता के नियम अकसर हिन्दूओं के विरोध में आते है क्यों कि इन धर्मों का जन्म भारत के वातावरण में ना हो कर अन्य देशों में हुआ था। इस के फलस्वरूप उन के प्रेरणा स्त्रोत्र भी भारत से बाहर ही हैं। उन के जीवन नायक भी विदेशी है तथा वह भारत के मौलिक आधार से स्दैव संघर्ष करते रहै हैं। यदि वह स्थानीय विचारधारा को ना अपनायें तो निराधार धर्म निर्पेक्षी बनावटी राष्ट्रीयता उन्हें ऐक राष्ट्र में नहीं बाँध सकती।

चाँद शर्मा

 

46 – राजनीति शास्त्र का उदय


सर्व प्रथम राजतन्त्रों की स्थापना भारत के आदि मानवों करी थी। उन्हों ने वनजारा जीवन त्याग कर जल स्त्रोत्रों के समीप रहवास बना कर आधुनिक सभ्यता की ओर पहला कदम रखा था।  उन्हों ने ही समाज में एक दूसरे के प्रति कर्तव्यों का चैयन कर के व्यवहारिक नियम बनाये जिन से आगे सामाजिक वर्गीकरण का विकास भी हुआ। अग्रजों की ज़िम्मेदारी थी कि वह समाज में एक दूसरे के मत-भेदों और झगड़ों का निपटारा कर के सभी को न्याय और सुरक्षा प्रदान करें। इसी व्यवस्था ने आगे चल कर राजा, प्रजा, राज्य, शासन तथा राजनीति को जन्म दिया। क्रमशः देशों और बहुत समय पश्चात राष्ट्रों का निर्माण हुआ।

राजा पद का दैविक आधार

सभ्यता के इन नियमों को संकलन करने वाले मनु महाराज थे तथा उन के संकलन को मनुस्मृति कहा जाता है। भारत के ऋषियों ने ना केवल मानवी समाज के संगठन को सुचारु ढंग से राजनीति का पाठ पढाया बल्कि उन्हों ने तो सृष्टि के प्रशासनिक विधान की परिकल्पना भी कर दी थी जो आज भी प्रत्यक्ष है। मानवी समाज सें राजा के पद को दैविक आधार इस प्रकार प्रदान किया गया थाः-

…इस जगत के रक्षार्थ ईश्वर ने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्रमां, और कुबेर देवताओं का सारभूत अंश (उन की प्राकृतिक शक्तियाँ या विशेषतायें) लेकर राजा को उत्पन्न किया ताकि देवताओं की तरह राजा सभी प्राणियों को अपने वश में कर सके। ऱाजा यदि बालक भी हो तो भी साधारण मनुष्य उस का अपमान ना करे क्यों कि वह देवताओं का नर रूप है। राजा अपनी शक्ति, देश काल, और कार्य को भली भान्ति  विचार कर धर्म सिद्धि के निमित्त अनेक रूप धारण करता है। जो राजा के साथ शत्रुता करता है वह निश्चय ही नष्ट हो जाता है…राजा भले लोगों के लिये जो इष्ट धर्म और बुरे लोगों के लियो जो अनिष्ट धर्म को निर्दिष्ट करे उस का अनादर नहीं करना चाहिये। दण्ड सभी प्रजाओं का शासन करता है, सोते हुये को जगाता है। इसी लिये ज्ञानी पुरुष दण्ड को ही धर्म कहते हैं। दण्ड का उचित उपयोग ना हो तो सभी वर्ण दूषित हो जायें, धर्म (कर्तव्यों) के सभी बाँध टूट जायें और सब लोगों में विद्रोह फैल जाये। जो राजा हृदय का पवित्र, सत्यनिष्ठ, शास्त्र के अनुसार चलने वाला, बुद्धिमान और अच्छे सहायकों वाला हो वह इस दण्ड धर्म को चला सकता है। राजा अपने कार्य के लिये जितने सहायकों की आवश्यक्ता हो, उतने आलस्य रहित, कार्य दक्ष, प्रवीण स्यक्तियों को रखे…

यही सिद्धान्त पाश्चात्य राजनीतिज्ञ्यों की परिभाषा में ‘डिवाईन राईट आफ किंग्स कहलाता है। कालान्तर प्रजातन्त्र का जन्म भी भारत में हुआ था।

भारत में प्रजातन्त्र

पश्चिमी देशों के लिये राजनैतिक विचारधारा के जनक यूनानी दार्शनिक थे। सभी विषयों पर उन की सोच विचार की गंगोत्री अरस्तु (एरिस्टोटल) की विचारधारा ही रही है, जबकि वेदों में प्रतिनिधि सरकार की सम्पूर्ण रूप से परिकल्पना की गयी है जिसे हिन्दूओं ने यूनानी दार्शनिकों के जन्म से एक हजार वर्ष पूर्व यथार्थ रूप भी दे दिया था। किन्तु पाश्चात्य बुद्धिजीवी और भारत के बुद्धिहीन अंग्रेजी प्रशंसक आज भी इगंलैण्ड को ‘मदर आफ डैमोक्रेसी मानते हैं।

वैधानिक राजतन्त्र 

वेदों और मनु समृति की आधारशिला पर ही मिस्त्र, ईरान, यूनान तथा रोम की राजनैतिक व्यवस्थाओं की नींव पडी थी। इस्लाम, इसाई और ज़ोरास्ट्रीयन धर्म तो बहुत काल बाद धरती पर आये। ऋगवेद, मनुसमृति से लेकर रामायण, महाभारत, विदुर नीति से कौटिल्लय के अर्थ शास्त्र तक हिन्दू विधानों की धारायें प्राकृतिक नियमों पर आधारित थीं और विकसित हो कर क्रियावन्त भी हो चुकीं थीं। यह विधान अपने आप में सम्पूर्ण तथा विस्तरित थे जिन में से सभी परिस्थितियों की परिकल्पना कर के समाधान भी सुझा दिये गये थे।

भारतीय ग्रन्थों की लेखन शैली की विशेषता है कि उन में राजाओं, मन्त्रियों, अधिकारियों तथा नागरिकों के कर्तव्यों की ही व्याख्या की गयी है। कर्तव्यों के उल्लेख से ही उन के अधिकार अपने आप ही परौक्ष रूप से उजागर होने लगते हैं। उत्तराधिकार के नियम स्पष्ट और व्याखत्मिक हैं। उन में संदेह की कोई गुजांयश नहीं रहती। यही कारण है कि भारत के प्राचीन इतिहास में किसी शासक की अकासमिक मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार के लिये कोई युद्ध वर्षों तक नहीं चलता रहा जैसा कि अन्य देशों में अकसर होता रहा है।

धर्म शासन का आधार स्तम्भ रहा है। ऐक आदर्श कल्याणकारी राजा को प्रजापति की संज्ञा दी जाती रही है तथा उस का उत्तरदाईत्व प्रजा को न्याय, सुरक्षा, विद्या, स्वस्थ जीवन तथा जन कल्याण के कार्य करवाना निर्धारित है। राजा के लिये भी निजि धर्म के साथ साथ राज धर्म का पालन करना अनिवार्यता थी। राजगुरू राजाओं पर अंकुश रखते थे और आधुनिक ‘ओम्बड्समेन या ‘जन-लोकपाल’ की भान्ति कार्य करते थे। धर्म का उल्लंधन सभी के लिये अक्षम्य था। 

राजतन्त्र का विकास

यह उल्लेखनाय है कि कई प्रावधानों का विकास प्राचीन काल में हुआ। वेदों तथा मनुसमृति के पश्चात आवशयक्तानुसार अन्य प्रावधान भी आये जिन में महाभारत काल में विदुर नीति तथा मौर्य काल में चाणक्य नीति (कौटिल्य का अर्थशास्त्र) प्रमुख हैं। इन में राजनीति, कूटनीति, गुप्तचर विभाग, सुरक्षा नीति, अर्थ व्यव्स्था, कर व्यव्स्था और व्यापार विनिमय आदि का विस्तरित विवरण है। उल्लेखनीय है कि यह सभी व्यवस्थायें ईसा से पूर्व ही विकसित हो चुकीं थीं।

महाकाव्य युग में आदर्श राज्य की परिकल्पना ‘राम-राज्य’ के रूप में साक्षात करी गयी थी। राम राज्य इंगलैण्ड के लेखक टोमस मूर की ‘यूटोपियन कानसेप्ट से कहीं बढ चढ कर है। राजा दू्ारा स्वेच्छा से अगली पीढी को शासन सत्ता सौंपने का प्रमाण भी दिया गया है। भरत भी राम के ‘वायसराय के रूप में राज्यभार सम्भालते हैं। रामायण में यह उल्लेख भी है कि युद्ध भूमि से ही राम अपने अनुज लक्ष्मण को शत्रु रावण के पास राजनीति की शिक्षा ग्रहण करने के लिये भेजते हैं।

ऐक आदर्श राजा का कीर्तिमान स्थापित करने के लिये राम ने अपनी प्रिय पत्नी को भी वनवास दे दिया था और निजि सम्बन्धों को शासन के कार्य में अडचन नहीं बनने दिया। आज केवल कहने मात्र के लिये ‘सीज़र की पत्नि’ सभी संदेहों से ऊपर होनी चाहिये किन्तु वास्तव में आजकल के सीजर, शासक, राष्ट्रपति ऐसे सिद्धान्तो पर कितना अमल करते हैं यह सर्व विदित हैं।  

प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली

भारतवासियों को गर्व होना चाहिये कि प्रजातन्त्र का जनक भारत है, रोम या इंग्लैण्ड नहीं। वास्तव में प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ऐक ‘समाजनाना’ नाम की दैवी का उल्लेख है जिसे प्रजातन्त्र की अधिठाष्त्री कहना उचित हो गा। ऋगवेद के अन्तिम छन्द में उस की स्तुति की गयी है। ईसा से लग भग 6 शताब्दी पूर्व बुद्ध काल तक भारत में प्रजातन्त्र विकसित था और बुद्ध के ऐक हजार वर्ष पश्चात तक स्थापित रहा। प्रत्येक नगर अपने आप में ऐक गणतन्त्र था। समस्त भारत इन गणतन्त्रों का ही समूह था। यद्यपि राजा के बिना शासन प्रबन्धों का उल्लेख वैदिक काल तक मिलता है किन्तु बुद्ध के समय प्रजातन्त्र प्रणाली अधिक लोकप्रिय थीं। पाली, संस्कृत, बौद्ध तथा ब्राह्मण ग्रंथों में कई प्रकार के शब्दों का उल्लेख मिलता है जो उन समूहों को लिखते हैं जो स्वयं शासित थे।

भारत ने अपना स्थानीय तन्त्र विकसित किया हुआ था जो आधुनिकता की कसौटी पर खरा उतरता है। उन के पास आश्चर्य जनक दोषमुक्त अर्थ व्यवस्था थी जो नगर तथा ग्राम प्रशासन चलाने, उस के आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिये सक्ष्म थी। सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों से नगर व्यवस्था के प्रबन्धन का अन्दाजा आज भी लगाया जा सकता है। इसी प्रशासनिक व्यवस्था ने देश की ऐकता और अखण्डता को उपद्रवों तथा आक्रमणकारियों से बचाये रखा। विश्व में अन्य कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ गणतन्त्र इतने लम्बे समय तक सफल रहै हों।

वैचारिक स्वतन्त्रता

वैचारिक स्वतन्त्रता तथा लोकताँत्रिक विचारधारा भारतीयों के जनजीवन तथा हिन्दू धर्म की आधार शिला हैं। भारत की उदारवादी सभ्यता के कारण ही दक्षिण-पूर्वी ऐशिया में स्थित भारतीय उपनेषवादों में भी पूर्ण वैचारिक स्वतन्त्रता का वातावरण रहा और स्थानीय परम्पराओं को फलने फूलने का अवसर मिलता रहा। समस्त इतिहास में भारत ने किसी अन्य देश पर आक्रमण कर के उसे अपने अधीन नहीं बनाया। रामायण काल से ही यह परम्परा रही कि विजेता ने किसी स्थानीय सभ्यता को नष्ट नहीं किया। राम ने बाली का राज्य उस के भाई सुग्रीव को, और लंका का अधिपत्य राक्षसराज विभीषण को सौंपा था और वह दोनो ही राम के अधीन नहीं थे, केवल मित्र थे।

भारत में बहुत से गणतन्त्र राज्यों का उल्लेख यूनानी लेखकों ने भी किया है। इस बात का महत्व और भी अधिक इस लिये हो जाता है कि यूनानी लेखकों की भाषा ही पाश्चात्य बुद्धिजीवियों को ‘मान्य’ है। सिकन्दर महान के साथ आये इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत में उन्हें हर मोड पर गणराज्य ही मिले। आधुनिक आफग़ानिस्तान – पाकिस्तान सीमा पर स्थित न्यास नगर का प्रशासन उस समय ऐक प्रधान ऐक्युलफिस के आधीन था जिसे परामर्श देने के लिये 300 सदस्यों की ऐक परिष्द थी।

ऐसा ही उल्लेख कौटिल्लय के अर्थ शास्त्र में भी मिलता है कि उस समय दो प्रकार के जनपद थे जिन्हें ‘आयुद्धप्राय’ तथा ‘श्रेणीप्राय’ कहा जाता था। आयुद्धप्राय के सदस्य सैनिक होते थे तथा श्रेणी-प्राय के सदस्य कारीगर, कृषक, व्यापारी आदि होते थे। इस के अतिरिक्त सत्ता का विकेन्द्रीयकरण था और उस के भागीदारों की संख्या प्रयाप्त थी.। ऐक जातक कथा के अनुसार वैशाली की राजधानी लिच्छवी में 7707 राजा, 7707 प्रतिनिधि, 7707 सैनापति तथा 7707 कोषाध्क्ष थे।

कूटनीति

भारत में कूटनीती का इतिहास ऋगवेद संहिता से आरम्भ होता है। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये गुप्तचरों का प्रयोग करने का प्रावधान था। ऋगवेद संहिता के काल से ही कूटनीति की व्यवस्था के प्रचलन का प्रमाण मिलता है। सतयुग काल में देवताओं ने बृहस्पति के पुत्र कच्च को दैत्य शत्रुओं के गुरू शुक्राचार्य के पास संजीविनी विद्या सीखने के लिये भेजा था। गुरू शुक्राचार्य की इकलौती पुत्री देवयानी को कच्च से प्रेम हो गया। दैत्य कच्च के अभिप्राय को ताड गये थे और उन्हों ने कच्च की हत्या कर दी थी किन्तु देवयानी के अनुरोध पर शुक्राचार्य को संजीवनी विद्या सिखानी पडी थी। यह कथा रोचक और लम्बी है तथा आज कल के टेकनोलोजी-एस्पायोनाज (जैसे कि अणुबम बनाने की विधि चुराना) का प्राचीनत्म उदाहरण है।

भारतीय ग्रन्थों में कूटनीति के चार मुख्य स्तम्भ इस प्रकार दर्शाये गये हैः-

  • साम – प्रतिदून्दी के साथ समानता का व्यवहार कर के उसे अपने पक्ष में कर लेना।
  • दाम –तुष्टिकरण अथवा रिश्वत आदि से प्रतिदून्दी को अपने पक्ष में कर लेना।
  • दण्ड – बल प्रयोग और त्रास्ती के माध्यम से प्रतिदून्दी को अपने वश में करना।
  • भेद –गुप्त क्रियाओं से प्रतिदून्दी के प्रयासों को विफल कर देना।

यही प्रावधान आधुनिक युग में भी अमेरिका से लेकर पाकिस्तान तक, विश्व की सभी सरकारों के गुप्तचर विभाग अपनाते हैं।

भ्रष्टाचार नियन्त्रण

ऋगवेद में भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण रखने के लिये विस्तरित निर्देश दिये गये हैं तथा गुप्तचरों को जिम्मेदारी भी दी गयी है। उन्हें ‘स्पासाह’ अथवा ‘वरुण’ कहा जाता था। उन का उत्तरदाईत्व शत्रुओं की गतिविधि के बारे में सतर्क्ता रखने के अतिरिक्त अधिकारियों के घरों की निगरानी करना भी था। इस जिम्मेदारी के लिये इमानदार तथा चरित्रवान लोगों का चैयन किया जाता था जिन्हें किसी प्रकार का लोभ लालच नहीं होना चाहिये। ऋगवेद में भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण करने के विषय में भी कई निर्देश दिये गये हैं। 

गुप्तचर विभाग

रामायण में गुप्तचरों को राजा की दृष्टी कहा गया है। यह जान कर कईयों को आशचर्य हो गा कि वाल्मीकि रामायण में जब शरूपर्नखा नकटी हो कर रावण के समक्ष पहुँचती है तो वह रावण को शत्रुओं की गति विधि से अनिभिज्ञ्य रहने और कोताही बर्तने के लिये खूब फटकार लगाती है। वह रावण से इस तरह के प्रश्न पूछती है जो आज कल विश्व के किसी भी सतर्क्ता विभाग की क्षमता को आँकने (सिक्यूरिटी आडिट) के लिये पूछे जाते हैं। मनु स्मृति में भी देश की सुरक्षा और कूटनीति विभाग के बारे में विस्तरित अध्याय लिखा गया है।  

महाभारत में उल्लेख है कि गऊओं को सुगँध से, पण्डितों को ज्ञान से, राजाओं को गुप्तचरों से तथा सामान्य जनो को अपनी आँखों से अपनी अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करना चाहिये। भीष्म पितामह ने राजदूतों की सात योग्यताओं का वर्णन किया है जो इस प्रकार हैं-

  • वह कुलीन परिवार से हों,
  • चरित्रवान हों,
  • वार्तालाप निपुण,
  • चतुर
  • लक्ष्य के प्रति कृत-संकल्प
  • तथा अच्छी स्मर्ण शक्ति वाले होने चाहियें।

महाभारत में उच्च कोटि के कूटनीतिज्ञ्यों का उल्लेख मिलता है जिन में विदुर, कृष्ण तथा शकुनि उल्लेखलीय हैं।   

प्राचीन ग्रन्थों के अतिरिक्त ईसा से चार शताब्दी पूर्व कौटिल्लय ने अर्थशास्त्र में गुप्तचरों का महत्व तथा उन की कार्य शैली के विषय में लिखा है कि मेरे शत्रु का शत्रु मेरा मित्र है। सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी राजदूत मैगेस्थनीज़ के कथनानुसार भारत ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया ना ही इस देश पर किसी बाहरी शक्ति ने आक्रमण किया था। भारत के सभी देशों के साथ मित्रता के सम्बन्ध थे। सम्राट चन्द्रगुप्त के सेल्यूकस निकाटोर के साथ और सम्राट चन्द्रगुप्त के पुत्र बिन्दूसार के एन्टोकस के साथ मित्रता पूर्वक राजनैतिक सम्बन्ध थे। इसी प्रकार सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त ने लंका, पुलास्की, ईरानियों के साथ भी मित्रता के सम्बन्ध बनाये रखे थे। सम्राट हर्ष वर्द्धन नें भी नेपाल तथा चीन के साथ मित्रता के सम्बन्ध बनाये रखे।

राजनैतिक तथा सामाजिक जागृति

‘त्रिमूर्ति’ का विधान फ्रांस के राजनीतिज्ञ्य मांटैस्क्यू के ‘शक्ति विभाजन के सिद्धान्त’ का प्रेरणा स्त्रोत्र हो सकता है जो उस ने उन्नीसवीं शताब्दी में योरूप वासियों को सिखाया था। ‘त्रिमूर्ति’ में तीन ईशवरीय शक्तियाँ सर्जन, पोषण तथा हनन का अलग अलग कार्य करती हैं किन्तु जब भी आवशयक्ता होती है तो तीनो शक्तियाँ ऐक हो जाती हैं।

प्रजातन्त्र का ढोल पीटने वाले ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों को मतदान करने का अधिकार 1932 में दिया गया था। इस्लामी देशों में स्त्रियों की दशा और निजि स्वतन्त्रता किसी से छुपी नहीं लेकिन भारत के देवी देवता भी अपने वैवाहिक जोड़े का सम्मान करते हैं। पति पत्नी के आपसी सहयोग के बिना कोई भी अनुष्ठान सम्पन्न नहीं माना जाता।

वर्ण व्यवस्था का आधार ‘श्रम सम्मान’, ‘श्रम विभाजन’ तथा सामाजिक वर्गों के बीच ‘परस्पर सहयोग’ पर टिका है। यह सभी तथ्य भारतीयों के राजनैतिक और सामाजिक जागृति के प्राचीन उदाहरण हैं। निश्चय ही हमें पोलिटिकल साईंससीखने के लिये पाश्चात्य बुद्धिजीवियों के आलेखों के साथ अपनी बुद्धि से भी काम लेना चाहिये।

चाँद शर्मा

हिन्दू महा सागर – विषय सूची


(पढने के लिये रेखांकित शीर्षक पर कल्कि करें)

हिन्दू महा सागर – ऐक परिचय

प्रथम प्रकरण – विचारधारा

(सभी प्राणियों में ऐक ही सृजनकर्ता की छवि का प्रत्यक्ष आभास होता है। विभिन्नता केवल शरीरों में ही है।यही हिन्दू धर्म की मुख्य विचारघारा है।    संसार का प्रथम मानव धर्म प्राकृतिक नियमों पर आधारित था जो कालान्तर आर्य धर्म, स्नातन धर्म तथा हिन्दू धर्म के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ।)           

  1. सृष्टि और सृष्टिकर्ता
  2. स्नातन धर्म के जन्मदाता
  3. सम्बन्ध तथा प्रतिबन्ध
  4. धर्म का विकास और महत्व
  5. स्नातन धर्म – विविधता में ऐकता 

दूसरा प्रकरण – देवी देवता

(हिन्दू ऐक ही ईश्वर को निराकार मानते हुये उसे कई रूपों में साकार भी मानते हैं तथा जन साधारण को व्याख्या करने के लिये चिन्हों का प्रयोग भी करते हैं जो ईश्वरीय शक्ति के वैज्ञियानिक रूप को दर्शाते हैं। संसार की गति विधियों का जो विधान प्राचीन ऋषियों ने कल्पना तथा अनुभूतित तथ्यों के आधार पर किया उसी के अनुसार आज भी विश्व की सरकारें चलती हैं। सृष्टि के विधान में जब भी कोई कर्तव्य विमुख होता है और अधर्म बढने लगता है तो सृष्टिकर्ता सृष्टि के संचालन धर्म की पुनः स्थापना कर देते हैं।)

  1. निराकार की साकार प्रस्तुति 
  2. प्राकृति का व्यक्तिकरण
  3. संसार का प्रशासनिक विधान
  4. विष्णु के दस अवतार

तीसरा प्रकरण – हिन्दू साहित्य

तीसरा प्रकरण – मानव ज्ञान के मौलिक ग्रंथ

(कई धर्मों में आस्थाओं पर टिप्पणी करना अपराध माना जाता है किन्तु हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति वैचारिक रूप से स्वतन्त्र है। हिन्दू धर्म में बाईबल या कुरान की तरह कोई एक पुस्तक नहीं जिस का निर्धारित पाठ अनिवार्य हो। हिन्दू ग्रंथों की सूची बहुत विस्तरित है लेकिन हिन्दू चाहे तो की किसी ऐक पुस्तक को, अथवा सभी को, और चाहे तो किसी को भी ना पढे़। हिन्दू ग्रंथों के कारण ही विश्व में भारत को विश्व गुरू माना जाता था। वेद, उपनिष्द, दर्शनशास्त्र, रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं किन्तु धर्म निर्पेक्षता के ढोंग के कारण भारत सरकार ने ही उन्हें केवल हिन्दू साहित्य समझ कर शिक्षा के क्षेत्रों में अछूता छोड़ दिया है।)                       

  1. हिन्दूओं के प्राचीन ग्रंथ
  2. उपनिष्द – वेदों की व्याख्या
  3. दर्शनशास्त्र – तर्क विज्ञान
  4. समाजिक आधार – मनु समृति
  5. रामायण – प्रथम महाकाव्य
  6. विशाल महाभारत
  7. मानव इतिहास – पुराण
  8. पाठ्यक्रम मुक्त हिन्दू धर्म

चौथा प्रकरण – व्यक्तिगत जीवन

(जीवन में आदर्शों की आधारशिला यम नियम हैं। जिन के अभ्यास से गुण अपने आप ही विकसित होने लगते हैं। सभी जीव काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की भावनाओं से प्रेरित हो कर कर्म करते हैं। आवेश की प्रधानताओं के अनुसार ही व्यक्तित्व बनता है। आवेशों को साधना से नियन्त्रित और संतुलित किया जा सकता है। जीवन में आत्म-निर्भरता, आत्म-नियन्त्रण, दक्ष्ता, तथा मितव्यता पर बल दिया जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मानव को जीवन के चार मुख्य उद्देश हैं जिन में से धर्म अकेले ही मोक्ष की राह पर ले जा सकता है। जीवन को चार प्राकृतिक भागों में विभाजित किया है, जिन्हेंब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम कहा जाता है। आजकल के जीवन में तनाव का मुख्य कारण आश्रम जीवन पद्धति का लुप्त होना है।)

  1. आदर्श जीवन का निर्माण
  2. मानव जीवन के लक्ष्य 
  3. व्यक्तित्व विकास
  4. जीवन के चरण

पाँचवां प्रकरण – हिन्दू समाज

(सामाजिक वर्गीकरण आज भी सभी देशों और जातियों में है जो नस्ल, रंग-भेद, या विजेता और पराजित  अवस्था के कारण है। वहाँ निचले वर्ण से ऊँचे वर्ण में प्रवेश लगभग असम्भव है, किन्तु हिन्दू समाज में मनु के वर्गीकरण का आधार रुचि, निपुणता, परस्पर-निर्भरता, श्रम-विभाजन, श्रमसम्मान तथासमाज के लिये व्यक्ति का योग्दान था। जन्म से सभी निम्न वर्ण माने जाते हैं किन्तु सभी अपने पुरुषार्थ से योग्यता और उच्च वर्णों में प्रवेश पा सकते हैं। यह दुर्भाग्य है कि आजकल सरकारी विभाग केवल जन्म-जाति के आधार पर पिछडेपन के प्रमाण पत्र, आरक्षण और विशेष सुविधायें राजनेताओं के स्वार्थ के  कारण प्रदान कर देते हैं। अन्य देशों और धर्मों की अपेक्षा हिन्दू समाज में प्राचीन काल से ही स्त्रियों को स्वतन्त्रता प्राप्त रही है। स्त्रियों के लिये कीर्तिमान के तौर पर ऐक आदर्श गृहणी को ही दर्शाया जाता है ताकि स्त्री पुरुष ऐक दूसरे के प्रतिदून्दी बनने के बजाय सहयोगी बने। धर्मान्तरण कराने के लिये हिन्दू विरोधी गुट छुआ-छूत, सती प्रथा तथा कन्याओं के वध का दुष्प्रचार करते रहै हैं जबकि हिन्दू समाज में सामाजिक शिष्टाचार का महत्व सभ्यता के आरम्भ से ही है।)

  1. हिन्दू समाज का गठन
  2. वर्ण व्यवस्था का औचित्य
  3. हिन्दू समाज और महिलायें
  4. सती तथा भ्रूण हत्या
  5. हमारी सामाजिक परम्परायें

छठा प्रकरण – प्राकृतिक जीवन

(पूजा पाठ करना प्रत्येक व्यक्ति का निजि क्षेत्र है। मन्दिरों का महत्व विद्यालयों जैसा है। क्रियाओं को निर्धारित प्रणाली से करना ही रीति रिवाज कहलाता है जो घटना के घटित होने के प्रमाण स्वरूप समाज में प्रसारण के लिये किये जाते हैं। यह समय और समाज की ज़रूरतों के अनुसार बदलते रहते हैं। पर्व नीरस जीवन में परिवर्तन तथा खुशी का रंग भरने के निमित हैं। हिन्दू पर्व भारत की ऋतुओं, पर्यावरण, स्थलों, देश के महा पुरुषों तथा देश में ही घटित घटनाओं के साथ जुड़े हैं। हमें विदेशों से पर्व उधार लेने की कोई आवश्यक्ता नहीं है। साधना का ऐक महत्व पूर्ण अंग वृत लेना है। साधनायें आवेशों, विकारों, मनोभावों तथा इन्द्रियों पर नियन्त्रण करने में सहायक है।)

  1. पूजा और रीति रिवाज
  2. पर्यावरण सम्बन्धित पर्व 
  3. राष्ट्र नायकों के पर्व
  4. वृत और स्वस्थ जीवन 

सातवां प्रकरण – हिन्दू गौरव

(वैज्ञानिक तथ्यों के मोती भारत के प्राचीन साहित्य में जहाँ तहाँ बिखरे पडे हैंक्योंकि विज्ञान के सभी विषय वेदों में बखान किये गये हैं। आज से हजारों वर्ष पूर्व भारत में उच्च शिक्षा के लिये विश्विद्यालय थे जहाँ से वैज्ञायानिक विचारों का उदय हुआ लेकिन आज से केवल आठ सौ वर्ष पूर्व तक विश्व की अन्य मानव जातियाँ डार्क ऐज में ही जीवन व्यतीत कर रही थीं। ज्ञान विज्ञान के सभी विषयों पर मौलिक शब्दावली और ग्रंथ भारत में लिखे गये थे। उदाहरण स्वरूप कुछ ही विषयों की जानकारी संक्षिप्त में यहाँ दी गयी है।)

  1. उच्च शिक्षा के संस्थान
  2. विज्ञान-आस्था का मिश्रण
  3. सृष्टि का काल चक्र
  4. गणित क्षेत्र में योगदान
  5. भारत का भौतिक ज्ञान
  6. तकनीकी उपलब्द्धियाँ
  7. ज्योतिष विज्ञान
  8. चिकित्सा क्षेत्र के जनक
  9. आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति

आठवां प्रकरण –कला-संस्कृति

(भाषा, भोजन, भेष, भवन और भजन देश की संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं। पाश्चात्य देशों के लोग जब तन ढकने के लिये पशुओं की खालें ओढते थे और केवल मांसाहार कर के ही पेट भरते थे तब भी भारत को ऐक अत्यन्त विकसित और समृद्ध देश के रूप में जाना जाता था। संस्कृत आज भी कम्पयूटरों के उपयोग के लिय सर्वोत्तम भाषा है और इस का साहित्य सर्वाधिक मौलिक, समृद्ध और सम्पन्न है। साहित्य सर्जन की सभी शैलियों का विकास भारत में ही हुआ था। भारतीय जीवन में अध्यात्मिक्ता के साथ साथ मर्यादित विलासता का भी समावेश रहा है। भारतीय खेलों के लिय किसी विश्ष्ट तथा महंगे साजोसामान की जरूरत नहीं पडती। विश्व में लगर प्रबन्ध का प्राचीनतम प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता स्थल से ही मिले हैं। भारतीय संगीत तुलना में आज भी पाश्चात्य संगीत से अधिक विस्तरित, वैज्ञानिक, कलात्मिक और प्रगतिशील है।)
 
  1. देव-वाणी संस्कृत भाषा
  2. विश्व को साहित्यिक देन
  3. समृद्ध भारतीय जन जीवन
  4. खेल कूद के प्रावधान 
  5. भारत की वास्तु कला
  6. हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति

नौवां प्रकरण – सैन्य क्षमता

(प्रजातान्त्रिक प्रतिनिधि सरकार की परिकल्पना को भारतवासियों ने रोम तथा इंग्लैंड से कई हजार वर्ष पूर्व यथार्थ रूप दे दिया था। राजगुरू राजाओं पर अंकुश रखते थे। भारत को ऐक समृद्ध सैनिक महाशक्ति माना जाता था। युद्ध-भूमि पर प्राण त्याग कर वीरगति पाना श्रेष्ठतम, और कायरता को अधोगति समझा जाता था। प्रथम शताब्दि में युद्ध कला, युद्ध-नियम तथा शस्त्राभ्यिास के विषयों पर संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे गये थे। भारत के प्राचीन ग्रन्थों में आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व विमानों तथा विमानों की संचलन प्रणाली सम्बन्धी निर्देश भी उपलब्द्ध हैं जिन में प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मिक जानकारी उपलब्द्ध है।)

  1. राजनीति शास्त्र का उदय
  2. राष्ट्वाद की पहचान – हिन्दुत्व
  3. भारत की सैनिक परम्परायें
  4. वीरता की प्रतियोग्यतायें
  5. प्राचीन वायुयानों के तथ्य
  6. अवशेषों से प्रत्यक्ष प्रमाण

दसवां प्रकरण – ज्ञानकोषों की तस्करी

ज्ञान-विज्ञान, कला और सभ्यता के सभी क्षेत्रों के जनक हिन्दूओं के पूर्वज ही थे। पाश्चात्य देशों के साथ भारतीय ज्ञान का प्रसार सिकन्दर से ही आरम्भ हुआ था। भारतीय ग्रन्थों के यूनानी भाषा में अनुवाद से आधुनिक विज्ञान का पुनर्जन्म योरुप रिनेसाँ के काल में हुआ। रिनेसाँ के युग में भारत खोजने के लिये योरूपीय देशों में होड सी मच गयी थी। भारत के ऋषियों ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पाश्चात्य बुद्धजीवियों की तरह कोई पेटेन्ट नहीं करवाये इस लिये जैसे जैसे योरुपीय उपनेषवाद विश्व में फैला तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान का हस्तान्तिकरण हो गया और विज्ञान के क्षेत्र से चर्च का हस्तक्षेप सीमित करने के लिये ‘धर्म-निर्पेक्षता’ का प्रयोग आरम्भ हुआ।

  1. भारत का वैचारिक शोषण
  2. भारतीय बुद्धिमता की चमक
  3. भारतीय ज्ञान का निर्यात
  4. योरुप में भारतीय रोशनी
  5. भारतीय ज्ञान का हस्तान्तिकरण
  6. पश्चिम से सूर्योदय पूर्व में अस्त

ग्यारहवां प्रकरण – विनाश लीला

देश तथा धर्म के लिये अपने शहीदों की उपेक्षा करने से बडा और कोई पाप नहीं होता। अति सदैव बुरी होती है। हिमालय की गोद में हिन्दू अपनी सुरक्षा के प्रति इतने निशचिन्त हो गये थे कि उन का संजोया हुआ सुवर्ण युग इस्लाम की विनाशात्मक काली रात में परिवर्तित हो गया। दिखावटी रीति रिवाजों और पाखण्डों का चलन बढ जाने से निर्धन लोग इस्लाम कबूलने लग गये। कर्मयोग को त्याग हिन्दू पलायनवाद पर आश्रित हो गये। अपने ही देश में आपसी असहयोग और अदूरदर्शता के कारण हिन्दू बेघर और गुलाम होते गये।

  1. क्षितिज पर अन्धकार
  2. इस्लाम का अतिक्रमण
  3. हिन्दू मान्यताओं का विनाश
  4. इस्लामीकरण का विरोध
  5. कुछ उपेक्षित हिन्दू शहीद
  6. अंग्रेजों की बन्दर बाँट

बारहवां प्रकरण – वर्तमान

धर्म राष्ट्रीयता से ऊपर होता है – बटवारे के बाद जब भारत की सीमायें ऐक बार फिर सिमिट गयीं तो हिन्दूओं को पाकिस्तान से निकलना पडा था। प्राचीन इतिहास से नाता तोड कर हम विश्व के सामने नवजात शिशु की तरह  प्रचारित किये गये विवादस्पद ‘राष्ट्रपिता’ का परिचय ले कर अपनी नयी धर्म-निर्पेक्ष पहचान बनाने में लगे हुए हैं। काँग्रेसी नेताओं ने आक्रान्ताओं को खण्डित भारत का फिर से हिस्सेदार बना लिया है और मुस्लमानों को प्रलोभनों से संतुष्ट रखना अब हिन्दूओं के लिये नयी ज़िम्मेदारी है। अपने वोट बैंक की संख्या बढा कर अल्पसंख्यक फिर से भारत को हडप जाने की ताक में हैं। उन्हों ने भारत में रह कर धर्म-निर्पेक्ष्ता के लाभ तो उठाये हैं किन्तु उसे अपनाया नहीं है। हमारे राजनैता उदारवादी बन कर अपने ही देश को पुनः दासता की ओर धकेल रहै हैं। हिन्दू धर्म सरकारी तौर पर बिलकुल ही उपेक्षित और अनाथ हो चुका है। हिन्दूओं की पहचान, राष्ट्रीय स्वाभिमान और आत्म-सम्मान  सभी कुछ नष्ट हो रहै हैं। हिन्दूओं में आज अपने भविष्य के लिये केवल निराशा और पलायनवाद है। अगर हमें अपनी संस्कृति की रक्षा करनी है तो एक राजनैतिक मंच पर इकठ्ठे होना पडे गा, उस सरकार को बदलना होगा जिस की नीति धर्म-निर्पेक्ष्ता की नही – धर्म हीनता की है़। गर्व से कहना हो गा कि हम हिन्दू हैं  और आदि काल से भारत हमारा देश है।  अगर अभी नहीं किया तो फिर कभी नहीं  होगा !  

  1. बटवारे के पश्चात भारत
  2. हिन्दू विरोधी गुटबन्दी
  3. आरक्षण की राजनीति
  4. अलगावादियों का संरक्षण
  5. अपमानित मगर निर्लेप हिन्दू
  6. हिन्दूओं की दिशाहीनता
  7. धर्म हीनता या हिन्दू राष्ट्र?
  8. ऐक से अनेक की हिन्दू शक्ति
  9. अभी नहीं तो कभी नहीं

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