हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में

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ऐक अनार सौ बीमार


 

कुछ लोगों को हमैशा शिकायत करते रहने की आदत बन चुकी है। उसी आदत के कारण वह सभी जगह मीडिया पर अपने उतावले-पन और ‘राजनैतिक सूझ-बूझ’ का परिचय भी देते रहते हैं। हर बात में सरकार को कोसते रहते हैं। ‘मोदी जी ने यह नहीं किया, वह नहीं किया’ – ‘वह सैकूलर बन गये हैं’, ‘विदेशों में सैर करते फिरते हैं’। ‘काला धन वापिस ला कर अभी तक ग़रीबों में बांटा क्यों नहीं गया’? ‘गऊ हत्या बन्द क्यों नहीं करी गयी’ – आदि। अगर यह शिकायतें ‘AAP’ वाले करें तो हैरानी की कोई बात नहीं क्योंकि उन्हें और कुछ करना आता ही नहीं। मगर जब वह लोग करते हैं जो आज से 6-7 महीने पहले ‘मोदी-समर्थक’ बनने का दावा करते थे तो उन की सूझ बूझ और उतावले-पन पर हैरानी होती है। 

निराशा का वातावरण

उन उतावले मोदी समर्थकों को इतना पता होना चाहिये कि अगले पाँच वर्ष में अगर नरेन्द्र मोदी देश का कुछ भी ‘चमत्कारी’ भला ना भी करें, और जितना बुरा आजतक हो चुका है उसे आगे फैलने से ही रोक सकें तो वही उन की बहुत बडी कामयाबी हो गी। हमारे हर तन्त्र में गद्दार, भ्रष्ट और स्वार्थी लोग जम चुके हैं। उन को उखाड कर इमानदार लोगों को बैठाना है। उन को अपनी-अपनी जिम्मेदारी सम्भालने और समझने के लिये भी वक्त देना हो गा।

क्या हम मनमोहन सिहं और उन की किचन-सरकार को भूल चुके हैं जिस ने पिछले दस वर्षों में देश को अमेरिका का गुलाम ही नहीं, सोनिया परिवार का ही गुलाम बना दिया था। जिन के काल में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। जो अपने स्वाभिमान को ताक पर रख कर कहते थे कि “मैं मजबूर था, ” जिन के मन्त्री मण्डल के आदेश को ऐक मूर्ख छोकरे ने टी वी पर फाड कर रद्दी की टोकरी में फैंक दिया था। जिन के शासन में पाकिस्तानी हमारे देश के जवानों के सिर काट कर ले गये थे और सरकार ने सैनाध्यक्ष को वर्दी पहना कर उस की विधवा को सांत्वना देने के लिये भेज दिया था – बस। वह सरकार जो नकसलियों के खिलाफ बल प्रयोग करने में हिचकती थी। जिस सरकार का प्रधान मन्त्री किसी के साथ भी सोनिया-राहुल के आदेशानुसार कोई भी समझोता कर सकता था जो मालकिन और छोटे मालिक को पसन्द हो। जिन्हें अपनी इज्जत का कोई ख्याल नहीं था वह देश की इज्जत क्या खाक बचायें गे।

सकारात्मिक सोच

हमारे देश के चारों तरफ छोटे छोटे देश भी मनमोहन सरकार ने भारत के दुशमन बना दिये थे जिन्हें सम्भालने का काम नरेन्द्र मोदी ने अपना पद सम्भालते ही कामयाबी के साथ करना शुरु कर दिया है। देश के आर्थिक और तकनीकी विकास के लिये बाहर से साधन जुटाने मे सफ़लता हासिल करी है। दिशाहीन मन्त्रालयों को दिशा निर्देश और ‘लक्ष्य ’दिये हैं जिन की रिपोर्ट बराबर मांगी जा रही है। राज्यों से ‘परिवारवादी सरकारों’ को उखाड फैंका है और यह काम अभी दो साल तक और चले गा। राज्यसभा में मोदी जी के पास बहुमत नहीं है। विपक्षी लोग ‘रिशतेदारियां बना कर’, ऐकजुट हो कर सरकार के लिये आये दिन अडचने खडी कर सकते हैं, कर रहै हैं, और करते रहैं गे। कई विपक्षी राज्य सरकारें मोदी जी के साथ नहीं हैं। वह तभी बदलें गी जब वहां इलेक्शन हों गे। वह मोदी जी की नीतियों को आसानी से स्वीकार नहीं करें गे। कुछ बातों के लिये कानूनों और शायद संविधान में भी संशोधन करने पडें गे। इन सब कामों में समय लगे गा।

राष्ट्र-निर्माण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं होती, नागरिकों की भी होती है। सरकार तो सिर्फ दिशा-निर्देश देती है। क्या हम ने कभी अपने आप से पूछा कि पिछले 6-7 महीनों में हम ने कौन कौन से सकारात्मिक काम निजि तौर पर करे हैं? क्या पुरानी खराब आदतों को छोड कर अच्छी नयी बातें अपने रोज़ मर्रा के जीवन में पनाई हैं? क्या हम ने स्वच्छता, स्वदेशी, राष्ट्र भाषा, समय की पाबन्दी, ट्रेफ़िक नियमों का पालन, कामकाज में इमानदारी को अपनाया है? क्या अपने कार्य क्षेत्र में जहां तक हमारा अधिकार है, वहां लागू किया है? क्या अपने उच्च अधिकारी को उन बातों में सहयोग दिया है? अधिकांश लोग अपने मन में जानते हैं कि उन्हों ने वैसा कुछ भी नहीं किया।

हमारी खुशनसीबी

काँग्रेस की मनहूस ज़माने के उलट आज हमारी खुशनसीबी है कि वर्षों के बाद हमारे पास ऐसा इमानदार, कर्मठ, देश सेवक प्रधान मन्त्री है जिस का निजि स्वार्थ कुछ भी नहीं है। जो दिन में 18 घन्टे काम करता है, देश के प्रति समर्पित है, देश की मिट्टी में पढा और बडा हुआ है। भारतीय-संस्कृति से जुडा हुआ है। जो दिखावे की गरीबी नहीं करता, जिस को कोई व्यसन नहीं है। जिस के परिवार का कोई व्यकति सरकारी तन्त्र में झांक भी नहीं सकता। जिस का दिमाग़ 16 वीं सदी का नहीं बल्कि भविष्य की 21 वीं सदी की सोच रखता है।

उतावले मोदी समर्थकों ने ऐक वोट मोदी जी को दे कर जो ‘अहसान’ किया है उस के ऐवज़ में मोदी जी कोई जादुई-चमत्कार नहीं कर सकते। अगर उन्हें अपने किये पर अफसोस हो रहा है तो फिर से सोनिया-मनमोहन, मायावती-मुलायम या केजरीवाल में से किसी को भी बुला लें। मगर याद रहै। मोदी सरकार से अच्छी देश को समर्पित सरकार अगले भविष्य में दोबारा नहीं आये गी।

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है।

बडी मुद्दत से होता है चमन में दीदावर पैदा।

थोडा संयम और धैर्य रखो – अपनी और देश की किस्मत को लात मत मारो। सरकार को हर वक्त कोसते रहने से कोई देश प्रगति नहीं कर सकता। प्रगति सरकार के साथ सहयोग करने से होती है।

अगर आप इन विचारों से सहमत हैं तो केवल लाईक करने या ‘सही लिखा है’ कहने के बजाये इसे शेयर करें और फैलायें। अगर असहमत हैं तो अपने सुझाव और कारण अवश्य लिखें ताकि मुझे भी अपनी सोच को सुधारने का अवसर मिले।

चांद शर्मा

नोबल पुरस्कार का चमत्कार


कैलाश सत्यार्थी को बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिये नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो अचानक सभी भारतीयों का दिल गर्व से भर गया। मुझे भी यह मानने में कोई झिझक नहीं कि मेरा दिल शर्म से भर गया। मैं ने इस महा पुरुष का नाम ही पहली बार सुना है। शायद मेरे जैसे अज्ञानी भारत में ऐक दो तो और भी मिल जाये गे।

बचपन से आज तक मैं तो यही सुनता रहा हूँ कि भारत में बच्चों से प्यार करने वाले का नाम जाहरलाल नेहरू था जिन का जन्मदिन बाल-दिवस के तौर पर बच्चों से हम लोग मनवाते रहते हैं।

  • बच्चों से प्यार करने वाले अन्य महा पुरुष का नाम स्वामी अग्निवेश है जो बन्धुआ मजदूरी करते हुये बच्चों की नौकरी लड-झगड कर छुडवा तो देते हैं लेकिन फोटो खिचने और अखबार में खबर छपने के बाद फिर उन बच्चों के खाने-पीने और शिक्षा-दीक्षा का क्या होता है और वह आगे जीवन में क्या करते हैं यह कोई नहीं जानता।
  • ऐक और ग्रौन-अप बच्चे का नाम भी बाल-संरक्षण जुडा हुआ है वह मास्टर पप्पू उर्फ राहुल गाँधी का है। उन्हों ने बच्चों को भोजन के साथ शिक्षा का अधिकार भी दिलवा दिया था। वह अधिकार क्या हैं, और किधर से प्राप्त हो सकता है यह आप सडक पर किसी भी भीख मांगते बच्चे को बुला कर पूछ सकते हैं।
  • मीडिया में आये दिन पढने को मिलता है कि अमुक स्थान पर ऐक बच्चा खुले बोर वेल में गिर गया था जिसे निकालने के लिये दूर दराज से मिलिट्री के उपकरण मंगाये जाते हैं, ऐम्बुलेंस खडी करी जाती हैं, मुख्यमंत्री या कोई अन्य मन्त्री बच्चे की शिक्षा और इलाज के लिये लाखों रुपये के अनुदान की घोषणा भी तुरन्त ही कर देते हैं। लगे हाथों यह भी पता चलता है कि बच्चे की मां बच्चे को राम-भरोसे छोड कर किसी खेत में मजदूरी कर रही थी जब बच्चा बोर-वेल में गिर गया था। दिन भर इस शो का लाईव-टेलीकास्ट चलता रहता है। बच्चा कभी-कभार बच जाता है और कभी नहीं भी। लेकिन उस के बाद आगे इस तरह की घटना को रोकने के लिये, लापरवाई से अन-ढके बोर-वेल के कारण बच्चे की मुत्यु के लिये किसे और कब सजा दी गयी यह शायद कैलाश सत्यार्थी को भी पता नहीं होगा।
  • कितने ही जीते-जागते बच्चे अपहरण हो कर अपने माता पिता से हमेशा के लिये बिछुड जाते हैं। उन्हे ना तो मृत समझा जाता है और ना ही जीवत। बहुत कुछ हाथ पाँव मारने के बाद पुलिस में रिपोर्ट तो दर्ज हो जाती है लेकिन कितने बच्चे उन ऐफ-आई-आर के रजिस्ट्रों से बाहर निकल कर घर वापिस लौटते हैं यह भी शायद कैलाश सत्यार्थी को पता नहीं होगा।

हमारे देश के माननीय सांसद बच्चों के प्रति अपराध करने वालों को मृत्युदण्ड की सजा क्यो नहीं देते – शायद इस का उत्तर भी कैलाश सत्यार्थी को पता नहीं होगा। अगर किसी सुरेन्द्र कोली जैसे अपराधी को फांसी की सजा हो भी जाये तो वह फांस पर लटकने के बजाये सजा को ही वर्षों तक अपीलों के रास्ते लटकाता रहता है। यह बालाधिकार से ऊपर मानवाधिकार के पेड का फल है जिस को जरूरत से ज्यादा ही सींचा जा रहा है।

वैसे कैलाश सत्यार्थी की बात पर वापिस लौटने पर मझे पता चला कि सत्यार्थी जी को कई विशव-व्यापी संस्थाओं से पुरस्कार और सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं। वह ऐक मशहूर आदमी हैं। फिर हमारे देश ने आज तक उन्हें कोई भारत रत्न, या कम से कम पद्मश्री जैसा कोई छोटा-मोटा सम्मान ही क्यों महीं दिया। क्या वह आज तक इस के काबिल भी नहीं थे जो हम सचिन तेन्दूलकर, सैफअली खां, और महेन्द्र सिहं धोनी वगैरा के हाथों में फौरन थमा देते हैं।

पता चला कि तो कैलाश सत्यार्थी मध्य प्रदेश में विदिशा के रहनेवाले हैं मगर वहां से तो पिछले दस वर्षों से सुषमा स्वराज का नाम या दिग्विजय सिहं का नाम ही सुनने को मिला है। क्या विदिशा के लोगों को भी यह विचार कभी नहीं आया कि विदिशा में ही इस विश्व-ख्याति चेहरे को सासंद या विधायक ही बना दें ताकि वह देश की और मानवता की सेवा करता रहै?

खैर अब तो कैलाश सत्यार्थी पर पुरस्कारों और दूसरी सुविधाओं की झडी जरूर लग जाये गी। मीडिया – जो आज तक उन के बारे में उदासीन रहा अब दिन रात उन के नाम के ढोल पीटने में लग चुका है। ऐसे कितने ही अनजान चेहरे और भी भारत में जरूर हों गे अगर मीडिया उन को ढूडने की कोशिश करे। हमें भी केवल यह जानने की इच्छा रहती है संसद के पहले दिन रेखा और सचिन के दाहिने और बायें कौन कौन संसद में बैठा था या संजय दत्त ने जेल में क्या-क्या खाया था और शारूख खां की नयी पिकचर ने पहले ही दिन कितने करोड कमाये ।

चाँद शर्मा

मां का सपना


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिये वरूण गांधी की दावेदारी घोषित कर के मेनका गांधी ने अपना उतावलापन ही दिखाया है। हर मां का सपना होता है कि उसी का पुत्र राजसिहांसन की सब से बडी पदवी पर बैठे। कौशल्लया से लेकर कैकेयी, सत्यवती, कुन्ती, जीजाबाई, इन्दिरा गांधी, और सोनियां गांधी वही करती रही हैं जो अब मेनका गांधी ने चाहा है लेकिन मेनका गांधी ने यह कह कर वरुण की सहायता नहीं करी बल्कि उस के रास्ते में कांटे बो दिये हैं।

वरुण युवा हैं, पढे लिखे हैं, लेकिन वह कितने सक्षम हैं यह प्रमाणित करने का उन के पास अभी तक कोई महत्वपूर्ण अवसर नहीं आया है। अभी तक वरूण गांधी अपनी मां के संरक्षण में अपना पब्लिक मेकअप ही करते रहै हैं। संजय मेनका और गांधी परिवार के सदस्य की पहचान के साथ ही जुडे हुये हैं और उसी के आधार पर संसद के सदस्य बने हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के साधारण कार्यकर्ता भी नहीं रहै। नेहरू गांधी परिवार का सदस्य होना भारत में राजनैजिक ऊचाई की पादान पर चढने का सफल परमिट माना जाता था लेकिन आज कल यही स्टिकर अभिशाप बन कर वरूण को आगे नहीं बढने देगा। उत्तर प्रदेश में बाप-बेटे मुलायम-अखिलेश सरकार की विफलता के तुरन्त बाद मां-बेटे वरुण-मेनका की सरकार को लोग पसन्द नहीं करें गे। अभी तक तो वरुण की पहचान ‘म्माज ब्वाय’ ही है। उस को अपनी स्वतन्त्र पहचान लोगों के दिलों में बैठानी होगी।

राहुल गांधी ने अपनी कथनी और करनी से साबित कर दिया है कि वह किसी पदवी के लायक नहीं। काँग्रेस में ही अब उसे प्रियंका गांधी से बदली करने की बातों पर विचार हो रहा है क्योंकि काँग्रसियों के नेतृत्व के लिये नेहरू गांधी परिवार का वारिस होना ही ऐकमात्र अनिवार्य योग्यता मानी जाती है – भारतीय जनता पार्टी में यह नहीं। काँग्रेस पार्टी में कोई भी नवजात नेहरू गांधी परिवार का पट्टा गले में डाल कर घर से बाहर निकले तो काँग्रेसी हाथ जोड कर मुख्य मंत्री से प्रधान मंत्री तक की कुर्सियां उस के स्वागत में खाली कर के खडे हो जाते हैं परन्तु भारतीय जनता पार्टी में ऊपर उठने के लिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा और हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीयता की सोच के साथ सक्षमता का होना भी जरूरी है।

वरूण को स्पष्ट करना हो गा कि उन के विचार स्वयं सेवक संघ की विचार धारा और हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीयता के कितने समीप हैं। धारा 370, समान आचार संहिता, और नेहरू गांधी की धर्म निर्पेक्षता और इसी प्रकार के अन्य विषयों के बारे में उन के स्पष्ट विचार क्या हैं।

वरूण का प्रशासनिक अनुभव ना होने के बराबर है क्यों कि आज तक उस ने किसी महत्वपूर्ण पद पर काम नहीं किया। यूनिवर्स्टी की डिग्री के साथ अनुभव लेने में जो समय लगता है उसे टेलीस्कोप नहीं किया जा सकता। वरूण को पहले पार्टी के अन्दर अपनी संगठन योग्यता दिखानी होगी फिर किसी दूसरे मुख्य मंत्री के मन्त्री मंडल में किसी पद पर प्रशासनिक अनुभव लेना होगा तब जा कर वह स्वतंत्र तौर पर मुख्यमंत्री के सपने साकार करने की सोच सकते हैं।

मां का सपना और आशीर्वाद अपनी जगह है लेकिन उस के साथ पार्टी के कार्यकर्ताओं का सहयोग और समर्थन होना भी जरूरी है जिस के लिये वरूण को पहले जमीन से जुडना होगा और जमीन पर ही बैठना होगा। अगर वरूण यह सभी कुछ कर चुके हैं या करने पर कटिबद्ध हैं तो उन के लिये मुख्य मंत्री तथा उस से भी ऊपर सभी रास्ते खुले हैं। अभी से वरुण का नाम उछाल देने से कटुता या प्रतिस्पर्धा के वरूण के सिवाये वरुण हाथ कुछ नहीं लगे गा। यह सभी जानते हैं कि आज अगर वरूण और मेनका गांधी भारतीय जनता पार्टी के साथ जुडे हुये हैं तो इस में राष्ट्रीयता की भावना के साथ पदवी की चाहत भी जुडी हुयी है। मां के सपने को साकार करने के लिये उन को पहले इस आक्षेप से मन कर्म और वचन के साथ बाहर आना होगा।

चाँद शर्मा

 

 

 

शंकराचार्य तथा अन्य गुरू


“गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा ।

गुरुर्साक्षात् परब्रह्मं, तस्मे श्री गुरवे नमः” ।।

आदि शंकराचार्य कि लिखे इस श्लोक का प्रयोग हमारे देश के आधुनिक गुरू-जन अपना प्रवचन शुरु करने से पहले करते हैं ताकि श्रोताओं को कोई गल्तफहमी ना रहै, वह इसी श्लोक को सुन कर आंखें बन्द करें, और क्षमता की परवाह किये बिना सामने बैठे गुरु को साक्षात ब्रह्मा, विष्णु या महेश की तरह  सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान और सर्व-व्यापक ईश्वर मान लें।

हिन्दू धर्माचार्यों की विमुखता

हिन्दूओं का दुर्भाग्य था हमारे धर्माचार्यों ने अपने आप को देश के राजनैतिक वातावरण से अलग थलग रख कर, अपने अध्यात्मिक उत्थान तथा मोक्ष की प्राप्ति में लगे रहै और कुछ ने अपने आर्थिक उत्थान की राह पकड ली।अगर हिन्दू धर्माचार्यों में राजनैतिक जागृति होती तो बटवारे के पश्चात उन्हें भारत को ऐक हिन्दू राष्ट्र घोषित करवाने के लिये प्रयत्न करते रहना चाहिये था ताकि हिन्दू धर्म का सभी दिशाओं में बिखराव ना होता। घायल तथा बटवारे के कारण विक्षिप्त हिन्दू समाज धर्म निर्पेक्षता की ओर पलायन ना करता और हम मानसिक दिशा हीनता से बच जाते। आज हमारे सामने अल्प संख्यक तुष्टिकरण, धर्मान्तरण और कम्यूनिजम नक्सलवाद जैसी समस्यायें पैदा ना होतीं। इस दुनियां में कम से कम भारत ऐक हिन्दू देश के नाम का परचम लहराता। लेकिनदेश की विरासत को सम्भालने के बजाये धर्माचार्यों ने पूर्वज ऋषियों की सनतान कहलाने के बजाय गांधी को अपना ‘नया राष्ट्रपिता’मान लिया। धर्महीन नेहरू ने जब भारत के ‘स्वर्ण युग’को ‘गोबर युग’की उपाधि दी तो किसी धर्मगुरू ने आपत्ति नहीं जताई। सभी नेहरू परिवार की राजनैतिक अगुवाई के आगे नतमस्तक रहे और कई तो आज भी हैं। यहां तक कि जब सोनियां ने कहा “भारत हिन्दू देश नहीं है ”, राहुल ने कहा “भारत को सब से बडा खतरा भगवा आतन्कवाद से है”, और मनमोहन सिहं ने यह कह कर कि “देश के साधनों पर प्रथम हक अल्प-संख्यकों का है” उन के तुष्टिकरण के लिये सरकारी खज़ाने खोल दिये तो भी हमारे शंकराचार्य मौन साघे रहै। तुष्टिकरण के खर्चे का ‘जजिया टैक्स’अब सभी हिन्दू चुका रहै हैं।

चलो अब थोडे से गर्व की बात है इस निर्वाचन में कुछ धर्म गुरूओं ने राजनैतिक साहस बटोरा और अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दिशा में खुल कर अपनी अपनी सोचानुसार राजनैतिक दलों का समर्थन भी किया। इस दिशा में पहल स्वामी राम देव ने करी। उन्हों ने योग को जनजन तक फैला कर योग का डंका दुनियां भर में बजवाया है लेकिन इनाम में उन्हे राजधानी दिल्ली के अन्दर ही जिल्लत के साथ त्रास्दी उठानी पडी। अधिकांश धर्माचार्यों ने राजनीति से मूहँ फैरना ही उचित समझा। अब स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने विधान सभा चुनावों से पहले वर्षों पुरानी सांई बाबा की पूजा पर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं और उन के समर्थन में नागा साधु साईं भक्तों को सबक सिखाने के लिये तत्पर हो गये हैं। इस से हिन्दू समाज का विघटन होगा और ऐक नया हिन्दू विरोधी ‘साईं वोट बैंक’खडा हो जाये गा। इस से पहले स्वामी स्वरूपानन्द ने ‘हर हर मोदी’के नारे पर भी आपत्ति दर्ज करा कर अपनी राजनैतिक सोच जाहिर कर दी थी।

धर्माचार्यों का निजि राजनैतिक झुकाव जिधर भी हो लेकिन देश की धर्महीन राजनीति में उन का का प्रत्यक्ष योग्दान सराहनीय है और आशा है अल्पसंख्यकों की तरह अब हिन्दू भी अपनी आस्थाओं के आधार पर अपने ही देश में राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हों गे तथा अपने समाज की समस्याओं का निवारण राजनेताओं से अधिकार स्वरूप मांगे गे। धर्माचार्य भी हिन्दू समाज के प्रति उत्तरदाई हों गे।

हिन्दू धर्म का विग्रह

सिकन्दर के आक्रमण से पहले भारत में जैन और बौद्ध धर्म के विहार और मठ आदि बन चुके थे। समय के साथ साथ समाज में कई कुरीतियां, अन्ध विशवास और आकर्मणतायें भी फैल गयी थीं। देश छोटे छोटे राज्यों में बट गया था। उस समय तक्षशिला के ऐक साधारण आचार्य चाण्क्य ने राजनैतिक ऐकता फिर से देश में जगा का सत्ता परिवर्तन किया था जिस के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त मौर्य ने शक्तिशाली भारत का पुनर्त्थान किया। लेकिन सम्राट अशोक का शासन समाप्त होते ही शक्तिशाली भारत फिर से कमजोर हो गया। बहुत से राज वँशों ने बुद्ध अथवा जैन मत को अपनाया तथा कई राजा संन्यास ले कर भिक्षुक बन स्वेछा से मठों में रहने लगे थे।

कई नागरिक भी घर-बार, व्यवसाय, तथा कर्म त्याग भिक्षु बन के मठों में रहने लगे थे। मूर्ति पूजा भी खूब होने लगी थी। कई मठ और मन्दिर आर्थिक दृष्टि से समपन्न होने लगे। कोई अपने आप को बौध, जैन, शैव या वैष्णव कहता था तो कोई अपनी पहचान ‘ताँत्रिक’ घोषित करता था। धीरे धीरे कोरे आदर्शवाद, अध्यात्मवाद, और रूढिवादिता में पड कर हिन्दू कर्म की वास्तविकता से दूर होते चले गये और राजनैतिक ऐकता की अनदेखी भी करने लगे थे। क्षत्रीय युवाओं ने शस्त्र त्याग कर भिक्षापात्र हाथों में पकड लिये और पुजारी-वर्ग ने ऋषियों के स्थान पर अपना अधिकार जमा लिया था।

हिन्दूओं का स्वर्ण युग

आज बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हमारे देश की सामाजिक और राजनैतिक कुरीतियों को दूर करने के लिये और हिन्दू समाज को फिर से ऐक करने के लिये केरल में जन्में आदि शंकराचार्य ने बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई थी। केवल 32 वर्ष के जीवन काल में ही आदि शंकराचार्य ने हिन्दू समाज को संगठित रखने के लिये समस्त भारत की पदयात्रा करी थी और देश के चारों कोनों में ऐक ऐक शंकराचार्य की अध्यक्षता में चार मठ स्थापित किये थे जो आज दूआरका, जगन्नाथपुरी, श्रृंगेरी और बद्रिकाश्रम के नाम से जाने जाते हैं।

यह आदि शंकराचार्य का प्रताप था कि गुप्त काल के समय भारत में हिन्दू विचार धारा का पुर्नोत्थान हुआ। इस काल को हिन्दूओ का ‘सुवर्ण-युग’ कहा जाता है। तब अंग्रेजी के बिना ही हर क्षेत्र में प्रगति हुई थी। संस्कृत साहित्य में अमूल्य और मौलिक ग्रन्थों का सर्जन हुआ था तथा संस्कृत भाषा कुलीन वर्ग की पहचान बन गयी थी। दुनियां में भारत का विश्वगुरू कि तरह आदर सम्मान था और भारत को ऐक सैन्य तथा आर्थिक महा शक्ति होने के कारण ‘सोने की चिडिया’कहा जाता था।

लेकिन गुप्त वँश के पश्चात देश में फिर से सत्ता का विकेन्द्रीय करण हो गया और कई छोटे छोटे प्रादेशिक राज्य उभर आये थे। उस काल में कोई विशेष प्रगति नहीं हुयी। कट्टर जातिवाद, राज घरानो में जातीय घमण्ड, और छुआ छूत के कारण समाज घटकों में बटने लग गया था। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य विलासिता में घिरने लगे। संकुचित विचारधारा के कारण लोगों ने सागर पार जाना छोड दिया जिस के कारण सागर तट असुरक्षित हो गये, सीमाओं पर सारा व्यापार आक्रामिक अरबों, इरानियों और अफग़ानों के हाथ चला गया। सैनिकों के लिये अच्छी नस्ल के अरबी घोडे भी उप्लब्द्ध नहीं होते थे। अहिंसा का पाठ रटते रटते क्षत्रिय भूल गये थे कि धर्म-सत्ता और राजसत्ता की रक्षा करने के लिये समयानुसार हिंसा की भी जरूरत होती है। अशक्त का कोई स्वाभिमान, सम्मान या अस्तीत्व नहीं होता। इन अवहेलनाओं के कारण देश सामाजिक, आर्थिक, सैनिक और मानसिक दृष्टि से दुर्बल, दिशाहीन और असंगठित हो गया। यह सब इतिहास में है सिर्फ  बासी याद्दाशत को ताजा करने के लिये संक्षेप में दोहराया है।

हमारे आधुनिक गुरू

आज फिर से हिन्दू धर्म के विघटन की जड यही ‘घर्म-गुरु’ हैं जिन्हें सिर्फ पैसा और बडे बडे आश्रम बनाने से मतलब है जहाँ वह अपना जीवन ऐश से गुजार सकें। यही गुरु आजकल आदि शंकराचार्य के श्लोक को रट कर हिन्दू समाज को गुमराह करने का काम करते हैं और अपने अपने चेलों को हिन्दू धर्म की मुख्य धारा से भटका कर उन्हें अपने बनाये हुये घटकों में बांट रहै हैं।अब तो यह महाठग ‘धर्म निर्पेक्ष’ बनने लग पडे हैं ताकि इन्हें ‘ग्लोबल मार्किट’ से चेले चेलियां मिल सकें। इन की दृष्टी में सिवाये इन के अपने घटक के, बाकी सभी धार्मिक औपचारितायें ढोंग होती हैं। इन में से अधिकतर कईयों ने किसी वेद, शास्त्र, उपनिष्द आदि का कोई अध्ययन नहीं किया होता और परम्परागत धर्म को नकारने के लिये सिर्फ ऊपर से चिकनी चुपडी बातें और मनघडंत कथायें सुनाते हैं।अपने ही नाम का कीर्तन कराते हैं,भक्तों से अपने चर्ण स्पर्ष करवाते हैं, गुरु दक्षिणा बटोरते हैं। अकसर गर्मियों में सैर करने अमेरिका आदि चले जाते हैं और वहाँ गुरुदक्षिणा डालरों में कमाते हैं। वहां उन्हों ने पहले सी ही अपने किसी स्थानीय भक्त को अपना ‘ऐजेन्ट’ मनोनीत किया होता है जो गुरू की फोटो रख कर गुरू महाराज का ‘प्री-रिकार्डिड’ प्रवचन और गीत सुनाता रहता है। इन गुरूजनो का देश के तत्कालिक आर्थिक,राजनैतिक, और प्रकृतिक विपदाओं से कोई सरोकार नहीं होता। इन का मकसद केवल अपने भक्तों की संख्या बढा कर अपने निजि धर्म की ब्रांचे खोलना मात्र ही होता है।

गुरूजनों का मेकअप उन की विदुत्ता और मानसिक्ता का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब होता है। माथे पर कई रंगों के लेप, लम्बे काले (अकसर ‘डाई’ किये) बाल, भगवे रंग के बढिया डिजाईनर रेशमी कपडे, गले में मोटे मोटे रुद्राक्ष की मालायें,और हाथों में कई तरह की रत्न जडित चमतकारी अंगूठियां इन का सार्वजनिक पहरावा है। निजि रहवास और गाडी ऐयर कण्डीशन्ड होनी चाहिये। गुरू जी कंदमूल तो क्या, आम आदमियों के जैसा खाना नहीं खाते। उन के लियेभोजन बनाने और परोसने की जिम्मेदारी किसी खास चेला-चेली की रहती हैं। वह केवल ‘स्पेशल-प्रसाद’ से ही संतुष्ट हो कर जीवन बिताते हैं।आर्थिक तथा राजनैतिक दृष्टी से सामर्थवान चेले चेलियां ही गुरु महाराज से निजि तौर पर आशीर्वाद पा सकते हैं अन्य भक्तों को दूर से प्रणाम करने कहा जाता है। गीता ज्ञान बांटने के बावजूद साल में ऐक बार किसी आडिटोरियम में गुरू महाराज अपने चेलों से अपनी ‘नशवर देह’ का जन्मदिन भी मनवाते हैं।

नैतिक जीवन का ‘गुरूमन्त्र’ वह किसी ‘पासवर्ड’ की तरह अपने चेलों के कान में ही बताते हैं ताकि उस के ‘गुरूमन्त्र’ से किसी अन्य घटक के हिन्दू को फायदा ना पहुँचे और ‘ट्रेड-सीक्रेट’ बना रहै। सच पूछो तो इन धर्म गुरुओं का योग्दान आम हिन्दू समाज को कुछ नहीं है। यह केवल अपनी अपनी धर्म दुकाने चला रहै हैं और हिन्दू समाज को विघटन को और ले जा रहै हैं। अगर आज गुरु महाराज के पदचिन्हों पर सभी चलें – सिर, दाढी, मूंछ के बाल, माथे पर चन्दन का तिलक, और भगवे वस्त्र पहन कर सभी सरकारी कर्मचारी दफ्तरों में बैठ जायें तो इक्कीसवीं सदी में भारत की छवि का अन्दाजा लगाया जा सकता है।

कोई हिन्दू नहीं जानता कि ऋषि वासिष्ठ, विशवमित्र या व्यास का जन्म कब हुआ था क्योंकि हमारे पुरातन ऋषि मुनि अपनी ‘मार्किटिंग’ करना नहीं जानते थे। किसी ऋषि-मुनि ने निजि ‘ब्रांड’ का समुदाय या घटक धर्म नहीं बनाया था। लेकिन इस तरह के पाखँडियों पर अंकुश लगाने, और समाज का सही दिशा में मार्गदर्शन करने के लिये आदि शंकराचार्य ने चारों मठों में ऐक ऐक शांकराचार्य की स्थापना करी थी।

आंकलन

क्या इस बात का आंकलन करना जरूरी नहीं कि जागरूक हिन्दू समाज की ऐसी दुर्दशा क्यों है। बहस होनी चाहिये कि आज की परिस्थिति में यह चारों शंकराचार्य हिन्दू समाज के उत्थान के लिये क्या योग्दान दे रहै है। चारों शंकराचार्य ने अपने अपने कार्य क्षेत्र में-

  • अन्धविशवास कुरीतियों, तथा हिन्दू विरोधी मिथ्या प्रचार के विरुध क्या किया है?
  • दलित समस्या, दहेज प्रथा, अन्य रीति रिवाजों या ड्रग, हिंसा, बलात्कार, तलाक, भ्रूण हत्या आदि के बारे में कभी कोई सक्षम सुझाव हिन्दू समाज को दिया है।
  • क्या कभी ‘वेलेन्टाईन-डे’ तरह की बाहरी कुरीतियों, ‘लिविंग-इन रिलेशनस’ आदि का सक्षम विरोध या समर्थन किया है।
  • मन्दिरों, प्राचीन धरोहरों और यात्रियों की सुवाधाओं की दिशा में भी क्या कोई प्रयत्न किया है।
  • आत्मा परमात्मा, भौतिक विज्ञान, आयुर्वेद या किसी अन्य विषय पर ने कोई ग्रंथ, ‘थियोरी ’ विश्व पटल पर रखी है ?
  • हिन्दू धर्म के प्रचार के लिये कितने पुस्तकालय या परिशिक्षण के लिये कोई कोर्स चलाये हैं ?
  • उच्च शिक्षा संस्थानों मेंभारतीय वैदिक संस्कृति के पाठन के लिये कोई ‘सिलेबस’ तैय्यार किया है जिसे प्रथम वर्ष से स्नातकस्तर तक क्रमशा ले जाया जा सके।इस का विशलेषण होना चाहिये कि क्या वह शिक्षा आधुनिक परिपेश की जरूरतों को ध्यान में रख कर दी जाये गी या सिर्फ ‘पौंगे-पण्डित’ ही तैय्यार करे गी। इस विषय पर आधुनिकता के माप दण्ड क्या और किस प्रकार निर्धारित किये जायें गे।
  • हिन्दू समाज को धर्मान्तरण और आतन्कवाद से सुरक्षित रखने के लिये उन्हों ने सरकार से क्या आशवासन मांगा है ?
  • जब दूसरे धर्मों के लोग ऐक वोट बैंक संगठित कर के इस देश में मनमाने तरीके से अपनी बात मनवा सकते हैं तो हिन्दू धर्म गुरू क्यों लाचार बने बैठे हैं?

आज के हिन्दू समाज में आम तौर पर यह धारणा है कि इन घटक गुरूओं की तरह हमारे शंकराचार्य भी केवल मठों तक ही सीमित हैं और आदि शंकराचार्य के युग में ही जी रहै हैं। आदि शंकराचार्य ने तो पैदल ही समस्त भारत के दूर दराज इलाकों का भ्रमण किया था परन्तु आज के जमाने में यातायात की सुविधायें होने के बावजूद हमारे आधुनिक शंकराचार्य सांप की तरह कुण्डली मार कर अपने मठों में ही जमे रहते हैं जबकि हिन्दू समाज धर्म निर्पेक्षता के बहाने तेजी से पलायनवाद की और जा रहा है। यह जरूरी है कि शंकराचार्य के योग्दान का हिन्दू समाज की जानकारी के लिये और इस संस्थान का आदर्श स्थापित करने के लिये आंकलन कर के प्रचारित किया जाये और हिन्दू धर्म गुरू परदे सा बाहर निकल कर धर्म रक्षा के लिये मैदान में खुले आम आयें।

चाँद शर्मा

 

 

अंग्रेज़ी-भक्तों का हिन्दी विरोध


उपनेशवाद का युग समाप्त होने के बाद आज भी इंग्लैंड को विश्व में ऐक सैन्य तथा आर्थिक महाशक्ति के तौर पर माना जाता है। उच्च तथा तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इंग्लैंड का आज भी ऐकाधिकार है। यह दबदवा राजनैतिक कारणों से नहीं, बल्कि अंग्रेजी भाषा के कारण है। अंग्रेज़ों ने अपने ऐक ‘डायलेक्ट’(अपभ्रंश) को विकसित कर के अंग्रेज़ी भाषा को जन्म दिया, लिपि रोमन लोगों से ली और भाषा का आधार बना कर विश्व पर शासन कर रहै हैं। अंग्रेजी से प्राचीन हिन्दी भाषा होते हुये भी हम मूर्ख हिन्दुस्तानी अपनी ही भाषा को स्वदेश में ही राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दे पाये – यह बदनसीबी नहीं तो और क्या है जो हम लोगों में राष्ट्रीय स्वाभिमान शून्य है।

पिछडी मानसिक्ता वाले देशों में आज भी यही समझा जाता है कि अंग्रेजी भाषा के बिना दुनियां का काम ही नहीं चल सकता और विकास के सारे कम्प्यूटर ठप हो जायें गे। दास-बुद्धियों को भ्रम है कि विश्व में केवल अंग्रेजी ही सक्ष्म भाषा है जबकि विकसित देश भी दबी जबान में संस्कृत भाषा का गुण गान ही नहीं कर रहै, उसे सीखने के मार्ग को अपना चुके हैं। हमारे देश के मानसिक गुलाम फिर भी यह मानने को तैयार नहीं कि कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा ना हो कर केवल परम्परागत भाषा है जिस में लिखा कुछ जाता है और पढा कुछ और ही जाता है। उस की तुलना में हिन्दी पूर्णत्या ऐक वैज्ञानिक भाषा है जिस में जो लिखा जाता है वही पढा भी जा सकता है। विश्व की किसी भी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखा जा सकता है और सक्ष्मता से पढा जा सकता है। अंग्रेजी में अपने नाम को ही लिख कर देख लीजिये पढने के बाद आप कुछ और ही सुनाई दें गे।

राष्ट्रभाषा का विरोध

नरेन्द्र मोदी सरकार ने राष्ट्रभाषा को महत्व देने का उचित निर्णय लिया है। यह भी अपेक्षाकृत था कि मोदी विरोधी नेता और अपना चुनावी वर्चस्व बनाये रखने वाले प्रान्तीय नेता इस का विरोध भी करें गे। बी जे पी में ही कई छिपे मोदी-विरोधी सरकार को हिन्दी अति शीघ्र लागू करने के लिये उकसायें गे भी ताकि सरकार गलतियां करे, और उकसाई गयी पथ-भ्रष्ट जनता का कडा विरोध भी झेले।

नीचे लिखे तत्वों का दूआरा प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से भारत में हिन्दी का विरोध और अंग्रेजी के समर्थन में स्वाभाविक हैः-

  • विदेशी पत्र-पत्रिकाओं के मालिक, जिन के व्यवसायिक उद्द्श्य हैं।
  • योरूपीय देश, कामनवेल्थ देश, और भारत विरोधी देश जो अंग्रेजी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा बनाये रखना चाहते हैं।
  • कम्पयूटर तथा अंग्रेजी-साफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियां।
  • विदेशों में बस चुके कई भारतीय युवा जो विदेशी कम्पनियों की नौकरी करते हैं और भारत से आऊट सोर्सिंग के जरिये से अपने ही देसवैसियों से सस्ते में विदेशी कम्पनियों के लिये काम करवाते हैं।
  • काल सैन्टर के मालिक और कई कर्मचारी।
  • कुछ ईसाई संस्थान, कानवेन्ट स्कूल और मैकाले भक्त प्रशासनिक अधिकारी।
  • उर्दू-भाषी जिहादी तथा धर्म निर्पेक्ष।

इलेक्शन में हार हुये नेताओं को तो नये मुद्दों की तालाश रहती है। सत्ता से गिर चुकने का बाद करुणानिधि और उस की श्रेणी के कई अन्य प्रान्तीय नेताओं को सत्ता की सीढी चढने के लिये फिर से हिन्दी विरोध का मुद्दा बैठे बैठाये मिल गया है। करुणानिधि और उस की श्रेणी के अन्य साथी कृप्या यह तो बतायें कि उन के प्रान्तों में क्या सभी लोग अंग्रेजी में ही लिखते पढते हैं? सच्चाई तो यह है कि उन्हीं के प्रान्तों के अधिकाँश लोग आज भी अशिक्षित और गरीब हैं। वह अंग्रेजी पढे या ना पढें उन्हें विदेशों में नहीं जाना है। भारत में ही रोजी-रोटी के लिये रोजगार ढूंडना है। लेकिन इन नेताओं को इन बातों से कोई सरोकार नहीं। उन्हें तो पिछले सत्तर वर्षों की तरह अपने परिवारों की खातिर सत्ता में बने रहना है, मुफ्त लैपटाप, रंगीन टेलीविजन, साईकिलें और ऐक रुपये किलो चावल आदि की भीख से लोगों का तुष्टिकरण कर के वोट बटोरते रहना है। इस लिये अब धीरे धीरे दूसरे प्रान्तो से भी कुछ चुनाव-हारे क्षेत्रीय नेता अपना अंग्रेजी प्रेम दिखायें गे और विकास की दुहाई दें गे। मोदी विरोधी फौज में लाम बन्द होना शुरु करें गे। यह नेता क्या जनता को बतायें गे कि उन के शासन काल में उन्हों ने युवाओं को देश की राष्ट्रभाषा के साथ जोडने के सम्बन्ध में आज तक क्या कुछ किया? अपने प्रान्तों में ही कितने अंग्रेजी स्कूल खोले? युवाओं को विदेशों में या देश में ही रोजगार दिलवाया? अपने देश की राष्ट्रभाषा कि विकास के लिये क्या किया? देश की ऐकता और पहचान के लिये क्या यह उन का कर्तव्य नहीं था? प्रान्तीयता के नाम पर उकसाने वाले नेताओं का स्वाभिमान तब क्यों बेबस हो गया था जब अंग्रेजों ने भारत में प्रान्तीय भाषाओं को हटा कर अंग्रेजी उन के सिरों पर थोप दी थी?

व्यवस्था परिवर्तन

व्यवस्था परिवर्तन की शुरूआत राष्ट्रभाषा के सम्मान के साथ होनी चाहिये ताकि जनता में भारतीयता के प्रति आत्म विशवास का संचार हो। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में मंत्री मण्डल के अधिकांश सदस्यों का हिन्दी में शप्थ लेना और  राष्ट्रभाषा को सरकारी काम काज की भाषा बनाना ऐक अच्छी शुरूआत है। अब आगे संसद की कारवाई हिन्दी में चले और सरकारी काम काज हिन्दी में हो, ई-गवर्नेंस में भी हिन्दी को प्रमुखता से जोडा जाये तो देश में ऐक नया आत्म विशवास जागे गा। किसी पर भी अंग्रेजी के इस्तेमाल पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई गयी लेकिन राष्ट्रभाषा के पक्ष में ऐक साकारात्मिक पहल जरूर करी गयी है।

पिछले साठ वर्षों से हम ने अपने देश की राष्ट्रभाषा को वह सम्मान नहीं दिया जो मिलना चाहिये था। हम अंग्रेजी की चाकरी ही करते रहै हैं और अपनी भाषा के इस्तेमाल से हिचकचाते रहै हैं। अपनी भाषा सीखने के लिये साठ वर्ष का समय प्रयाप्त होता है और अनिच्छा होने पर साठ जन्म भी कम होते हैं।इस का अर्थ अंग्रेजी का बहिष्कार करना नहीं है केवल अपनी राष्ट्रभाषा का सत्कार करना है। जनता अपेक्षा करती है कि भारत के संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को देश की राष्ट्रभाषा का ज्ञान और सम्मान अवश्य होना चाहिये। अगर उन्हें अभी भी हिन्दी नहीं आती तो अपने प्रांत की भाषा (मातृभाषा) का इस्तेमाल तो कर सकते हैं जिस का ट्रांसलेशन करा जा सकता है।

आम देशवासियों को भी अगर अपने आप को भारतीय कहने में गर्व है तो अपने देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी को भी गर्व से प्रयोग करना चाहिये। अंग्रेजी लिखने पढने में कोई बुराई नहीं, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि केवल अंग्रेजी लिखने पढने के कारण ही कोई व्यक्ति महान नहीं होता। उसी तरह हिन्दी लिखने पढने वाला अनपढ नहीं होता। लेकिन हिन्दी लिखने पढने वाला राष्ट्रभक्त अवश्य होता है और राष्ट्रभाषा को नकारने वाला निश्चित ही गद्दार होता है।

स्पीड में सावधानी जरूरी

हिन्दी के प्रचार, विस्तार और प्रसार में उतावलापन नहीं करना चाहिये। समस्याओं का धैर्य से समाधान करना चाहिये लेकिन विरोध का दमन भी अवश्य कडाई से करना चाहिये। देश में स्पष्ट संदेश जाना चाहिये कि सरकार देश की राष्ट्र भाषा को समय-बद्धता के साथ लागू करे गी, समस्याओं को सुलझाया जाये गा मगर जो नेता अपनी नेतागिरि करने के लिये विरोध करें गे उन के साथ कडाई से उसी तरह से निपटा जाये गा जैसे देश द्रोहियों के साथ करना चाहिये।

सरकार को हिन्दी प्रोत्साहन देना चाहिये लेकिन अंग्रेजी परन्तु अगले पाँच वर्षों तक अभी रोक नहीं लगानी चाहिये।

  • हिन्दी का अत्याधिक ‘संस्कृत-करण’ना किया जाये। अगर अन्य भाषाओं के जो शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन चुके हैं तो उन्हें सरकारी मान्यता भी दे देनी चाहिये।
  • सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी को ‘अनिवार्य विषय’ के तौर पर ना पढाया जाये। अंग्रेजी को ऐच्छिक विषय (इलेक्टिव) की तरह पढाना चाहिये या ऐडिश्नल विषय की तरह पढाना चाहिये और उस के लिये अतिरिक्त फीस वसूलनी चाहिये।
  • उच्च शिक्षा तथा नौकरियों के लिये सभी कम्पीटीशनों में भाग लेने के लिये हिन्दी के प्रयोग की सुविधा होनी चाहिये। अगले पाँच वर्षों तक अंग्रेजी में भी परीक्षा देने की सुविधा रहनी चाहिये लेकिन नौकरी या प्रमोशन देने के समय “अगर दो प्रतिस्पर्धियों की अन्य योग्यतायें बराबर हों ” तो हिन्दी माध्यम के प्रतिस्पर्धी को प्राथमिकता मिलनी चाहिये।
  • जिन सरकारी विभागों या मंत्रालयों में हिन्दी अपनाई जाये वहाँ सभी तरह के आँकडे हिन्दी में रखने और उन का विशलेषण करने की पूरी सुवाधायें पूर्व उपलब्द्ध होनी चाहियें।
  • निजि स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढाई की छूट रहनी चाहिये जिस के लिये विद्य़ार्थी विध्यालय को तय शुदा फीस दें गे।
  • जो लोग विदेशों में जा कर बसना चाहते हों या नौकरी करना चाहैं उन के लिये अंग्रेजी सीखने की सुवाधायें सभी यूनिवर्स्टियों में रहनी चाहियें जिस में फीस का खर्च विध्यार्थी खुद उठायें।
  • हमारे देश में कम्पयूटर तथा साफ्टवेयर विकास की प्रयाप्त क्षमता है इस लिये अंग्रेजी में लिख गये साफ्टवेयर में हिन्दी के बटन लगाने के बजाये कम्पयूटर साफ्टवेयर को हिन्दी में ही मौलिक रूप से तैय्यार करना चाहिये।
  • समय समय पर कम्पयूटर साफ्टवैयर इंजीनियरों को सरकारी सम्मान देना चाहिये।
  • प्रत्येक स्तर पर हिन्दी लागू करने के लिये ऐक सैल का गठन करना चाहिये। सैल का अध्यक्ष हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनो भाषाओं की अच्छी जानकारी रखने वाला व्यक्ति होना चाहिये। विशेष तौर पर वह व्यकति ‘हिन्दी-उन्मादी’नहीं होना चाहिये। उसे अंग्रेजी भाषा से ‘नफरत’भी नहीं होनी चाहिये, तभी वह निष्पक्ष रह कर स्कारात्मिक ढंग से दैनिक समस्याओं का समाधान कर सकता है।
  • जो संस्थान अपना काम राष्ट्रभाषा में करें उन्हें आयकर, विक्रय कर आदि में कुछ छूट मिलनी चाहिये। इसी तरह हिन्दी के उपकरणों पर कुछ आर्थिक छूट दी जा सकती है। महानगरों को छोड कर मध्य वर्ग के शहरों में बिल बोर्ड हिन्दी या प्रान्तीय़ भाषा में होने चाहियें।

प्रवासी भारतीय

  • प्रवासी भारतीय जब भी ऐतक दूसरे से मिलें तो आपस में हिन्दी का प्रयोग ही करें।
  • ई मैग्जीनस में हिन्दी में पोस्ट लिखने का प्रयास करें।
  • अपने बच्चों को हिन्दी सिखाने में गर्व करें।

जन संख्या के आधार पर चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा देश है। अतः संख्या के आधार पर चीनी भाषा हिन्दी से ऐक कदम आगे तो है लेकिन अपनी जटिल लिपि के कारण वह हिन्दी का मुकाबला नहीं कर सकती। अगर भारत वासियों में यह लग्न, साहस और कर्मठता पैदा हो जाये तो हिन्दी ही अंग्रेजी का स्थान अन्तरराष्ट्रीय भाषा के तौर पर ले सकती है। भारत के पास कम्पयूटर साफ्टवेयर की सक्ष्म युवा शक्ति है जो अपने दाश का भाषा को विश्व में मान्यता दिला सकते हैं। जो कदम आगे बठाया है वह पीछे नहीं हटना चाहिये।

चाँद शर्मा

2013 in review


The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2013 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Sydney Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 36,000 times in 2013. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 13 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

सच हुये सपने अपने


26 मई 2014 को सभी राष्ट्रवादियों के सपने साकार हो गये हैं क्यों कि आज विदेशी शासन के साथ साथ स्वतंत्र भारत से नेहरू युग का अन्त भी हो गया है। चुनावों में काँग्रेस पार्टी के विनाश तथा परिवार वाद की राजनीति का भी विनाश हो चुका है। देश में सम्पूर्ण बहुमत के साथ भारत की अपनी सरकार है जिस का आधार भारतीय संस्कृति पर स्थिर है।

27 मई 1964 को उस जवाहरलाल नेहरू का देहान्त हुआ था जो स्वयं अपने बारे में कहा करते थे कि ‘मैं विचारों से अंग्रेज़, रहन-सहन से मुसलिम और आकस्माक दु्र्घना से ही हिन्दू हूं’। 27 मई का महत्व इस लिये ऐतिहासिक है कि इसी दिन को नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय सरकार का प्रथम कार्य दिवस है। नरेन्द्र मोदी अपने आप को गर्व से राष्ट्रवादी हिन्दू कहते हैं – यही फर्क नेतृत्व में आया है और प्रत्येक भारतवासी में आये गा।

बटवारे के तुरन्त बाद ही भारत को पुनः खण्डित करने की प्रतिक्रिया नेहरू जी ने अपना पद सम्भालते ही शुरू कर दी थी। भाषा के आधार पर देश को बाँटा गया। हिन्दी को राष्ट्रभाषा तो घोषित करवा दिया लेकिन सभी प्रान्तों को छूट भी दे दी कि जब तक चाहें सरकारी काम काज अंग्रेज़ी में करते रहें। शिक्षा माध्यम प्रान्तों की मन मर्जी पर छोड़ दिया गया। फलस्वरूप कई प्रान्तों ने हिन्दी को नकार कर केवल प्रान्तीय भाषा और अंग्रेज़ी भाषा को ही प्रोत्साहन दिया और हिन्दी आज उर्दू भाषा से भी पीछे खड़ी है। भारत इतिहास के  स्वर्ण-युग को पंडित नेहरू ने “गोबर युग” कह कर नकार दिया था। आज़ादी के बाद देश में काँग्रेस बनाम नेहरू परिवार का ही शासन रहा है, इस लिये जवाहरलाल नेहरू की उपलब्धियों का सही आंकलन नहीं किया गया। आने वाली पीढीयां जब भी उन की करतूतों का मूल्यांकन करें गी तो उन की तुलना तुग़लक वंश के सर्वाधिक पढे-लिखे सुलतान मुहम्मद बिन तुग़लक से अवश्य करें गी और तभी भारत के इतिहास में नेहरू जी को उनका यत्थेष्ट स्थान प्राप्त होगा।  भारत के युवाओं की विचारधारा परिवारवाद के बारे में बदले गी। देश में ऐकता, सुरक्षा, स्वालम्बन और आत्म-विशवास की लहर जोर पकडे गी।

भारत जागृतिकी शुरूआत हो चुकी है। पवित्र गंगा को अब कोई ‘रिवर गेंजिज़’नहीं कहै गा गंगा माता ही कहैं गे और उस की पवित्रता को बहाल करें गे। काशमीरी शरणार्थी सुरक्षा और इज्जत के साथ अपने घरों में लौट कर नया जीवन आरम्भ करें गे। संसद भवन हमारे शासन तन्त्र में पवित्र मन्दिर की तरह पवित्र स्थल है। राष्ट्र के शहीदों को ही भारत रत्न का सम्मान प्राप्त होगा। परिवारिक शासकों के किले धवस्त हो चुके हैं और जो इक्का-दुक्का बचे हैं उन की बुनियादें भी हिल चुकी हैं। देश के भण्डारों को किस प्रकार लूटा गया है इस की जवाबदेही भी निशचित होगी।

आज जनता में संवैधिनिक संस्थानों  के प्रति आदर और उत्साह है। देश की जनता अपने आप नरेन्द्र मोदी की विजय को अपनी विजय की तरह मना रही है। यही लक्षण हैं कि अब अच्छे दिन शुरू हो चुके हैं। सभी की मेहनत रंग लाई है। सभी भारतवासियों के लिये इस शुभ घडी पर हार्दिक मुबारकबाद।

चाँद शर्मा

 

 

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