हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में

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भारतीय नागरिक्ता सस्ती क्यों


डालर और रुपये की कीमत के अनुपात से अमेरिका भारत से 60 गुणा अमीर देश है। मगर अमेरिका अपने देश की नागरिक्ता उन्हीं लोगों को प्रदान करता है जो आर्थिक तौर पर अपना खर्चा उठा सकें या कोई दूसरा समृद्ध अमेरिकन नागरिक उन का खर्च उठाने की जिम्मेदारी ले। इस के अतिरिक्त जन्म से लेकर प्रार्थना पत्र देने की तारीख तक आवेदक का पूरा रेकार्ड प्रमाणित रूप में चैक किया जाता है। आवेदक के लिये जरूरी है कि वह अंग्रेज़ी लिखने पढने में कुशल हो। लिखित टेस्ट से निश्चित किया जाता है कि आवेदक को अमेरिका की जंगे-आजादी का इतिहास, संविधान, प्रशासनिक ढांचे तथा अमेरिका की आस्थाओं की पूरी जानकारी है। सब से छान बीन हो जाने के बाद आवेदक को अमेरिका के प्रति पूर्णत्या समर्पित होने की शप्थ और अपने पिछले देश से सभी भावनात्मिक और संवैधानिक सम्बन्धों का त्याग करना अनिवार्य होता है। तब जा कर वह नागरिक बनता है लेकिन उसे अपने जीने के लिये सभी सुविधायें अपनी आय से खरीदनी पडती हैं। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता।

अमेरिका की तुलना में आज भारत में चारों तरफ से मुफ्तखोर बंगलादेशी, पाकिस्तानी आतंकी, माओवादी, क्रिकेट या ग़जल-प्रेमी, ड्रगपैडलर-विदेशी नेताओं के भ्रष्टाचार के कारण घुसे चले आ रहै हैं। चेकिंग तो दूर, मूर्खता-वश हमारी सरकारें बाहरी लोगों को देश में आने के बाद अनुमति (विजा) प्रदान कर अपनी पीठ थपथपाने लगती हैं। विज़ा अवद्धि समाप्त हो जाने के बाद भी बहुत सारे विदेशी वापिस ही नहीं जाते और इधर-उघर छिप जाते हैं। अगर घुस-पैठिये पकडे भी जायें तो उन को प्रशासनिक अधिकारी वापिस नहीं भेज सकते क्यों कि कई धर्म-निर्पेक्ष और देश-द्रोही भारतीय नेता और मीडिया उन के समर्थन में खडे हो जाते हैं और मामला ठंडे बस्ते में पहुंच जाता है। यही देश द्रोही नेता अपने लिये वोट बैंक खडा करने के लिये उन भिखमंगों को पहचान-पत्र, राशन-कार्ड और कई तरह की सरकारी सुविधाओं के योग्य बनवा देते हैं जिस का आर्थिक बोझ आम नागरिकों पर सदा के लिये पड जाता है। देश को दीमक खाने लग जाती है।

बाहर से लाये गये यह अनपढ, बीमार और निकम्मे लोग और उन के परिवार बडे बडे शहरों में झोंपडिया बना कर सरकारी जमीन पर कबजा कर लेते हैं। हमारी नदियों के जल को दूषित करते हैं। जहां चाहें सडकों, बस्तियों और सार्वजनिक स्थलों को शौचालय बना डालते हैं। हमारे सरकारी अस्पताल इन्हीं लोगों से भरे रहते हैं। ऊपर से यही लोग हमारे देश में वोटर बन कर हमारे मूल-नागरिकों के लिये भ्रष्ट सरकारों को चुनते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है। क्या इन कीडों से भारत कभी छुटकारा पा सके गा? निराशजनक तो कहैं गे ‘नहीं’ – लेकिन अगर आप में कछ आत्म विशवास और स्वाभिमान है तो ‘अवश्य।’

अब जरा सोचियेः-

  • अगर जम्मु-कशमीर की कोई लडकी भारत के किसी व्यक्ति से शादी कर ले तो क्यों वह जम्मू-कशमीर में भी अपनी सम्पति तथा वोट देने का अधिकार खो बैठती है जबकि वही लडकी अगर किसी पाकिस्तानी कशमीरी से शादी कर ले तो अपने साथ उस ‘भारत-शत्रु’ को भी भारत की नागरिकता दिलवा सकती है। इस तरह की घातक धारा 370 क्यों समाप्त नहीं होनी चाहिये?
  • आम तौर पर भारत से मुस्लिम लडकियां पाकिस्तानी युवकों से विवाह कर के अपने ससुराल पाकिस्तान नहीं जातीं। उल्टे विवाह के बाद उस का पाकिस्तानी पति भारत का नागरिक क्यों बन जाता है और हमारी बढी हुय़ी जनसंख्या को 10 -12 बच्चों का योग्दान कर देता है। कई पाकिस्तानी-पति तो बच्चों के साथ अपनी पत्नी को तलाक दे कर वापिस पाकिस्तान चले जाते हैं और वहां और निकाह कर लेते हैं। भारतीय मुस्लिम युवा निकाह कर के अपनी ऐक से ज्यादा पत्नियों को को भारत में ही बसा देते हैं ताकि यहां की जनसंख्या बराबर बढती रहै। ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या हमारे पास जन-संख्या की कमी है?
  • हम चारों तरफ से आतंकी मुस्लिम देशों से घिरे हुये हैं। फिर किन कारणों से हमारे देश के सभी सीमावर्ती राज्यों में बार्डर के साथ लगने वाली लगभग सारी जमीन मुस्लिमों के हाथ बिक चुकी है? देश की लग भग सभी तटीय क्षेत्रों की जमीन भी मुस्लिमों की मलकीयत क्यों बनती जा रही है? क्या यह देश के सुरक्षा के लिये आने वाला खतरा नहीं है? सीमा और तटों के 10 किलोमीटर अन्तर्गत आने वाली जमीन को हम रक्षा-मंत्रालय को क्यों नहीं सौंप देते ताकि हमारी सीमायें सुरक्षित रहैं और वहां आने जाने पर पूरा नियन्त्रण रक्षा बलों का ही रहै? यह भी जानना चाहिये कि इस बिक्री में विदेशी धन तो नहीं लग रहा।
  • अनजान बन कर हम इस तरह से अपने देश को क्यों बर्बाद करते जा रहै हैं? क्या देश से ज्यादा हम अपनी झूठी धर्म-निर्पेक्षता और मानवाधिकारों को प्रेम करने लग चुके हैं? क्यों हमारे युवाओं के पास देश के बारे में सोचने की आदत ही नहीं रही? जिन लोगों ने हम से नफरत कर के देश का बटवारा करवाया उन्हीं को संतुष्ट रखने के लिये आज फिर से भारत के नागरिक अपने देश के ज्ञान-ग्रंथों और परम्पराओं को त्यागते क्यों चले जा रहै हैं ?
  • किसी को कोई शक नहीं रहना चाहिये कि पाकिस्तान का जन्म भारत की शत्रुता के कारण ही हुआ है और रिशता हमें निभाना ही पडे गा। क्या हम अपने देश के नागरिकों पर यह पाबन्दी नहीं लगा सकते कि अगर वह किसी विदेशी से खास तौर पर अपने निकटतम शत्रु-देश पाकिस्तान से विवाह करें गे तो उन की भारतीय नागरिक्ता समाप्त कर दी जाये गी और विवाहित-विदेशी को भारत में अस्थाई तौर पर भी नहीं आने दिया जाये गा ?
  • किसी को भी भारत की नागरिकता प्रदान करने से पहले क्यों हम आवेदक से कुछ शर्तें नहीं मनवाते कि वह भारत की राष्ट्र भाषा सीखे, भारत की संस्क़ृति के साथ समान आचार संहिता को अपनाये, भारत का मूल निवासी होने के नाते अपने आप को हिन्दूओं का वंशज कहै और वन्देमात्रम कहने से परहेज ना करे। अगर उसे यह सब पसंद नहीं तो कहीं और जा कर रहै। क्या हमारे पास जन-संख्या की कमी है? क्यों हम अपने देश के हितों की रक्षा अमेरिका की तरह से नहीं कर सकते?

हमें अपने मन, वचन और कर्म से पूरे विश्व को संदेश देना होगा कि भारत कोई सार्वजनिक अन्तर्राष्ट्रीय सराय स्थल नहीं कि कोई भी यहां आकर अपना बिस्तर लगाले और हम उस की चाकरी में जुट जायें। हमें सडी गली काँग्रेसी धर्म-निर्पेक्षता को त्याग कर स्वाभिमान से कट्टर हिन्दूराष्ट्र वाद को अपनाना होगा नहीं तो हम सभी बेघर हो जायें गे और हमारे लिये विश्व में कोई दरवाजा नहीं खोले गा। हम सभी हिन्दू हैं, भारत हमारा घर और हमारी पहचान है। हम इसे मिटने नहीं दें गे।

चाँद शर्मा

 

शंकराचार्य तथा अन्य गुरू


“गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा ।

गुरुर्साक्षात् परब्रह्मं, तस्मे श्री गुरवे नमः” ।।

आदि शंकराचार्य कि लिखे इस श्लोक का प्रयोग हमारे देश के आधुनिक गुरू-जन अपना प्रवचन शुरु करने से पहले करते हैं ताकि श्रोताओं को कोई गल्तफहमी ना रहै, वह इसी श्लोक को सुन कर आंखें बन्द करें, और क्षमता की परवाह किये बिना सामने बैठे गुरु को साक्षात ब्रह्मा, विष्णु या महेश की तरह  सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान और सर्व-व्यापक ईश्वर मान लें।

हिन्दू धर्माचार्यों की विमुखता

हिन्दूओं का दुर्भाग्य था हमारे धर्माचार्यों ने अपने आप को देश के राजनैतिक वातावरण से अलग थलग रख कर, अपने अध्यात्मिक उत्थान तथा मोक्ष की प्राप्ति में लगे रहै और कुछ ने अपने आर्थिक उत्थान की राह पकड ली।अगर हिन्दू धर्माचार्यों में राजनैतिक जागृति होती तो बटवारे के पश्चात उन्हें भारत को ऐक हिन्दू राष्ट्र घोषित करवाने के लिये प्रयत्न करते रहना चाहिये था ताकि हिन्दू धर्म का सभी दिशाओं में बिखराव ना होता। घायल तथा बटवारे के कारण विक्षिप्त हिन्दू समाज धर्म निर्पेक्षता की ओर पलायन ना करता और हम मानसिक दिशा हीनता से बच जाते। आज हमारे सामने अल्प संख्यक तुष्टिकरण, धर्मान्तरण और कम्यूनिजम नक्सलवाद जैसी समस्यायें पैदा ना होतीं। इस दुनियां में कम से कम भारत ऐक हिन्दू देश के नाम का परचम लहराता। लेकिनदेश की विरासत को सम्भालने के बजाये धर्माचार्यों ने पूर्वज ऋषियों की सनतान कहलाने के बजाय गांधी को अपना ‘नया राष्ट्रपिता’मान लिया। धर्महीन नेहरू ने जब भारत के ‘स्वर्ण युग’को ‘गोबर युग’की उपाधि दी तो किसी धर्मगुरू ने आपत्ति नहीं जताई। सभी नेहरू परिवार की राजनैतिक अगुवाई के आगे नतमस्तक रहे और कई तो आज भी हैं। यहां तक कि जब सोनियां ने कहा “भारत हिन्दू देश नहीं है ”, राहुल ने कहा “भारत को सब से बडा खतरा भगवा आतन्कवाद से है”, और मनमोहन सिहं ने यह कह कर कि “देश के साधनों पर प्रथम हक अल्प-संख्यकों का है” उन के तुष्टिकरण के लिये सरकारी खज़ाने खोल दिये तो भी हमारे शंकराचार्य मौन साघे रहै। तुष्टिकरण के खर्चे का ‘जजिया टैक्स’अब सभी हिन्दू चुका रहै हैं।

चलो अब थोडे से गर्व की बात है इस निर्वाचन में कुछ धर्म गुरूओं ने राजनैतिक साहस बटोरा और अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की दिशा में खुल कर अपनी अपनी सोचानुसार राजनैतिक दलों का समर्थन भी किया। इस दिशा में पहल स्वामी राम देव ने करी। उन्हों ने योग को जनजन तक फैला कर योग का डंका दुनियां भर में बजवाया है लेकिन इनाम में उन्हे राजधानी दिल्ली के अन्दर ही जिल्लत के साथ त्रास्दी उठानी पडी। अधिकांश धर्माचार्यों ने राजनीति से मूहँ फैरना ही उचित समझा। अब स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने विधान सभा चुनावों से पहले वर्षों पुरानी सांई बाबा की पूजा पर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं और उन के समर्थन में नागा साधु साईं भक्तों को सबक सिखाने के लिये तत्पर हो गये हैं। इस से हिन्दू समाज का विघटन होगा और ऐक नया हिन्दू विरोधी ‘साईं वोट बैंक’खडा हो जाये गा। इस से पहले स्वामी स्वरूपानन्द ने ‘हर हर मोदी’के नारे पर भी आपत्ति दर्ज करा कर अपनी राजनैतिक सोच जाहिर कर दी थी।

धर्माचार्यों का निजि राजनैतिक झुकाव जिधर भी हो लेकिन देश की धर्महीन राजनीति में उन का का प्रत्यक्ष योग्दान सराहनीय है और आशा है अल्पसंख्यकों की तरह अब हिन्दू भी अपनी आस्थाओं के आधार पर अपने ही देश में राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित हों गे तथा अपने समाज की समस्याओं का निवारण राजनेताओं से अधिकार स्वरूप मांगे गे। धर्माचार्य भी हिन्दू समाज के प्रति उत्तरदाई हों गे।

हिन्दू धर्म का विग्रह

सिकन्दर के आक्रमण से पहले भारत में जैन और बौद्ध धर्म के विहार और मठ आदि बन चुके थे। समय के साथ साथ समाज में कई कुरीतियां, अन्ध विशवास और आकर्मणतायें भी फैल गयी थीं। देश छोटे छोटे राज्यों में बट गया था। उस समय तक्षशिला के ऐक साधारण आचार्य चाण्क्य ने राजनैतिक ऐकता फिर से देश में जगा का सत्ता परिवर्तन किया था जिस के फलस्वरूप चन्द्रगुप्त मौर्य ने शक्तिशाली भारत का पुनर्त्थान किया। लेकिन सम्राट अशोक का शासन समाप्त होते ही शक्तिशाली भारत फिर से कमजोर हो गया। बहुत से राज वँशों ने बुद्ध अथवा जैन मत को अपनाया तथा कई राजा संन्यास ले कर भिक्षुक बन स्वेछा से मठों में रहने लगे थे।

कई नागरिक भी घर-बार, व्यवसाय, तथा कर्म त्याग भिक्षु बन के मठों में रहने लगे थे। मूर्ति पूजा भी खूब होने लगी थी। कई मठ और मन्दिर आर्थिक दृष्टि से समपन्न होने लगे। कोई अपने आप को बौध, जैन, शैव या वैष्णव कहता था तो कोई अपनी पहचान ‘ताँत्रिक’ घोषित करता था। धीरे धीरे कोरे आदर्शवाद, अध्यात्मवाद, और रूढिवादिता में पड कर हिन्दू कर्म की वास्तविकता से दूर होते चले गये और राजनैतिक ऐकता की अनदेखी भी करने लगे थे। क्षत्रीय युवाओं ने शस्त्र त्याग कर भिक्षापात्र हाथों में पकड लिये और पुजारी-वर्ग ने ऋषियों के स्थान पर अपना अधिकार जमा लिया था।

हिन्दूओं का स्वर्ण युग

आज बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हमारे देश की सामाजिक और राजनैतिक कुरीतियों को दूर करने के लिये और हिन्दू समाज को फिर से ऐक करने के लिये केरल में जन्में आदि शंकराचार्य ने बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई थी। केवल 32 वर्ष के जीवन काल में ही आदि शंकराचार्य ने हिन्दू समाज को संगठित रखने के लिये समस्त भारत की पदयात्रा करी थी और देश के चारों कोनों में ऐक ऐक शंकराचार्य की अध्यक्षता में चार मठ स्थापित किये थे जो आज दूआरका, जगन्नाथपुरी, श्रृंगेरी और बद्रिकाश्रम के नाम से जाने जाते हैं।

यह आदि शंकराचार्य का प्रताप था कि गुप्त काल के समय भारत में हिन्दू विचार धारा का पुर्नोत्थान हुआ। इस काल को हिन्दूओ का ‘सुवर्ण-युग’ कहा जाता है। तब अंग्रेजी के बिना ही हर क्षेत्र में प्रगति हुई थी। संस्कृत साहित्य में अमूल्य और मौलिक ग्रन्थों का सर्जन हुआ था तथा संस्कृत भाषा कुलीन वर्ग की पहचान बन गयी थी। दुनियां में भारत का विश्वगुरू कि तरह आदर सम्मान था और भारत को ऐक सैन्य तथा आर्थिक महा शक्ति होने के कारण ‘सोने की चिडिया’कहा जाता था।

लेकिन गुप्त वँश के पश्चात देश में फिर से सत्ता का विकेन्द्रीय करण हो गया और कई छोटे छोटे प्रादेशिक राज्य उभर आये थे। उस काल में कोई विशेष प्रगति नहीं हुयी। कट्टर जातिवाद, राज घरानो में जातीय घमण्ड, और छुआ छूत के कारण समाज घटकों में बटने लग गया था। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य विलासिता में घिरने लगे। संकुचित विचारधारा के कारण लोगों ने सागर पार जाना छोड दिया जिस के कारण सागर तट असुरक्षित हो गये, सीमाओं पर सारा व्यापार आक्रामिक अरबों, इरानियों और अफग़ानों के हाथ चला गया। सैनिकों के लिये अच्छी नस्ल के अरबी घोडे भी उप्लब्द्ध नहीं होते थे। अहिंसा का पाठ रटते रटते क्षत्रिय भूल गये थे कि धर्म-सत्ता और राजसत्ता की रक्षा करने के लिये समयानुसार हिंसा की भी जरूरत होती है। अशक्त का कोई स्वाभिमान, सम्मान या अस्तीत्व नहीं होता। इन अवहेलनाओं के कारण देश सामाजिक, आर्थिक, सैनिक और मानसिक दृष्टि से दुर्बल, दिशाहीन और असंगठित हो गया। यह सब इतिहास में है सिर्फ  बासी याद्दाशत को ताजा करने के लिये संक्षेप में दोहराया है।

हमारे आधुनिक गुरू

आज फिर से हिन्दू धर्म के विघटन की जड यही ‘घर्म-गुरु’ हैं जिन्हें सिर्फ पैसा और बडे बडे आश्रम बनाने से मतलब है जहाँ वह अपना जीवन ऐश से गुजार सकें। यही गुरु आजकल आदि शंकराचार्य के श्लोक को रट कर हिन्दू समाज को गुमराह करने का काम करते हैं और अपने अपने चेलों को हिन्दू धर्म की मुख्य धारा से भटका कर उन्हें अपने बनाये हुये घटकों में बांट रहै हैं।अब तो यह महाठग ‘धर्म निर्पेक्ष’ बनने लग पडे हैं ताकि इन्हें ‘ग्लोबल मार्किट’ से चेले चेलियां मिल सकें। इन की दृष्टी में सिवाये इन के अपने घटक के, बाकी सभी धार्मिक औपचारितायें ढोंग होती हैं। इन में से अधिकतर कईयों ने किसी वेद, शास्त्र, उपनिष्द आदि का कोई अध्ययन नहीं किया होता और परम्परागत धर्म को नकारने के लिये सिर्फ ऊपर से चिकनी चुपडी बातें और मनघडंत कथायें सुनाते हैं।अपने ही नाम का कीर्तन कराते हैं,भक्तों से अपने चर्ण स्पर्ष करवाते हैं, गुरु दक्षिणा बटोरते हैं। अकसर गर्मियों में सैर करने अमेरिका आदि चले जाते हैं और वहाँ गुरुदक्षिणा डालरों में कमाते हैं। वहां उन्हों ने पहले सी ही अपने किसी स्थानीय भक्त को अपना ‘ऐजेन्ट’ मनोनीत किया होता है जो गुरू की फोटो रख कर गुरू महाराज का ‘प्री-रिकार्डिड’ प्रवचन और गीत सुनाता रहता है। इन गुरूजनो का देश के तत्कालिक आर्थिक,राजनैतिक, और प्रकृतिक विपदाओं से कोई सरोकार नहीं होता। इन का मकसद केवल अपने भक्तों की संख्या बढा कर अपने निजि धर्म की ब्रांचे खोलना मात्र ही होता है।

गुरूजनों का मेकअप उन की विदुत्ता और मानसिक्ता का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब होता है। माथे पर कई रंगों के लेप, लम्बे काले (अकसर ‘डाई’ किये) बाल, भगवे रंग के बढिया डिजाईनर रेशमी कपडे, गले में मोटे मोटे रुद्राक्ष की मालायें,और हाथों में कई तरह की रत्न जडित चमतकारी अंगूठियां इन का सार्वजनिक पहरावा है। निजि रहवास और गाडी ऐयर कण्डीशन्ड होनी चाहिये। गुरू जी कंदमूल तो क्या, आम आदमियों के जैसा खाना नहीं खाते। उन के लियेभोजन बनाने और परोसने की जिम्मेदारी किसी खास चेला-चेली की रहती हैं। वह केवल ‘स्पेशल-प्रसाद’ से ही संतुष्ट हो कर जीवन बिताते हैं।आर्थिक तथा राजनैतिक दृष्टी से सामर्थवान चेले चेलियां ही गुरु महाराज से निजि तौर पर आशीर्वाद पा सकते हैं अन्य भक्तों को दूर से प्रणाम करने कहा जाता है। गीता ज्ञान बांटने के बावजूद साल में ऐक बार किसी आडिटोरियम में गुरू महाराज अपने चेलों से अपनी ‘नशवर देह’ का जन्मदिन भी मनवाते हैं।

नैतिक जीवन का ‘गुरूमन्त्र’ वह किसी ‘पासवर्ड’ की तरह अपने चेलों के कान में ही बताते हैं ताकि उस के ‘गुरूमन्त्र’ से किसी अन्य घटक के हिन्दू को फायदा ना पहुँचे और ‘ट्रेड-सीक्रेट’ बना रहै। सच पूछो तो इन धर्म गुरुओं का योग्दान आम हिन्दू समाज को कुछ नहीं है। यह केवल अपनी अपनी धर्म दुकाने चला रहै हैं और हिन्दू समाज को विघटन को और ले जा रहै हैं। अगर आज गुरु महाराज के पदचिन्हों पर सभी चलें – सिर, दाढी, मूंछ के बाल, माथे पर चन्दन का तिलक, और भगवे वस्त्र पहन कर सभी सरकारी कर्मचारी दफ्तरों में बैठ जायें तो इक्कीसवीं सदी में भारत की छवि का अन्दाजा लगाया जा सकता है।

कोई हिन्दू नहीं जानता कि ऋषि वासिष्ठ, विशवमित्र या व्यास का जन्म कब हुआ था क्योंकि हमारे पुरातन ऋषि मुनि अपनी ‘मार्किटिंग’ करना नहीं जानते थे। किसी ऋषि-मुनि ने निजि ‘ब्रांड’ का समुदाय या घटक धर्म नहीं बनाया था। लेकिन इस तरह के पाखँडियों पर अंकुश लगाने, और समाज का सही दिशा में मार्गदर्शन करने के लिये आदि शंकराचार्य ने चारों मठों में ऐक ऐक शांकराचार्य की स्थापना करी थी।

आंकलन

क्या इस बात का आंकलन करना जरूरी नहीं कि जागरूक हिन्दू समाज की ऐसी दुर्दशा क्यों है। बहस होनी चाहिये कि आज की परिस्थिति में यह चारों शंकराचार्य हिन्दू समाज के उत्थान के लिये क्या योग्दान दे रहै है। चारों शंकराचार्य ने अपने अपने कार्य क्षेत्र में-

  • अन्धविशवास कुरीतियों, तथा हिन्दू विरोधी मिथ्या प्रचार के विरुध क्या किया है?
  • दलित समस्या, दहेज प्रथा, अन्य रीति रिवाजों या ड्रग, हिंसा, बलात्कार, तलाक, भ्रूण हत्या आदि के बारे में कभी कोई सक्षम सुझाव हिन्दू समाज को दिया है।
  • क्या कभी ‘वेलेन्टाईन-डे’ तरह की बाहरी कुरीतियों, ‘लिविंग-इन रिलेशनस’ आदि का सक्षम विरोध या समर्थन किया है।
  • मन्दिरों, प्राचीन धरोहरों और यात्रियों की सुवाधाओं की दिशा में भी क्या कोई प्रयत्न किया है।
  • आत्मा परमात्मा, भौतिक विज्ञान, आयुर्वेद या किसी अन्य विषय पर ने कोई ग्रंथ, ‘थियोरी ’ विश्व पटल पर रखी है ?
  • हिन्दू धर्म के प्रचार के लिये कितने पुस्तकालय या परिशिक्षण के लिये कोई कोर्स चलाये हैं ?
  • उच्च शिक्षा संस्थानों मेंभारतीय वैदिक संस्कृति के पाठन के लिये कोई ‘सिलेबस’ तैय्यार किया है जिसे प्रथम वर्ष से स्नातकस्तर तक क्रमशा ले जाया जा सके।इस का विशलेषण होना चाहिये कि क्या वह शिक्षा आधुनिक परिपेश की जरूरतों को ध्यान में रख कर दी जाये गी या सिर्फ ‘पौंगे-पण्डित’ ही तैय्यार करे गी। इस विषय पर आधुनिकता के माप दण्ड क्या और किस प्रकार निर्धारित किये जायें गे।
  • हिन्दू समाज को धर्मान्तरण और आतन्कवाद से सुरक्षित रखने के लिये उन्हों ने सरकार से क्या आशवासन मांगा है ?
  • जब दूसरे धर्मों के लोग ऐक वोट बैंक संगठित कर के इस देश में मनमाने तरीके से अपनी बात मनवा सकते हैं तो हिन्दू धर्म गुरू क्यों लाचार बने बैठे हैं?

आज के हिन्दू समाज में आम तौर पर यह धारणा है कि इन घटक गुरूओं की तरह हमारे शंकराचार्य भी केवल मठों तक ही सीमित हैं और आदि शंकराचार्य के युग में ही जी रहै हैं। आदि शंकराचार्य ने तो पैदल ही समस्त भारत के दूर दराज इलाकों का भ्रमण किया था परन्तु आज के जमाने में यातायात की सुविधायें होने के बावजूद हमारे आधुनिक शंकराचार्य सांप की तरह कुण्डली मार कर अपने मठों में ही जमे रहते हैं जबकि हिन्दू समाज धर्म निर्पेक्षता के बहाने तेजी से पलायनवाद की और जा रहा है। यह जरूरी है कि शंकराचार्य के योग्दान का हिन्दू समाज की जानकारी के लिये और इस संस्थान का आदर्श स्थापित करने के लिये आंकलन कर के प्रचारित किया जाये और हिन्दू धर्म गुरू परदे सा बाहर निकल कर धर्म रक्षा के लिये मैदान में खुले आम आयें।

चाँद शर्मा

 

 

अंग्रेज़ी-भक्तों का हिन्दी विरोध


उपनेशवाद का युग समाप्त होने के बाद आज भी इंग्लैंड को विश्व में ऐक सैन्य तथा आर्थिक महाशक्ति के तौर पर माना जाता है। उच्च तथा तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इंग्लैंड का आज भी ऐकाधिकार है। यह दबदवा राजनैतिक कारणों से नहीं, बल्कि अंग्रेजी भाषा के कारण है। अंग्रेज़ों ने अपने ऐक ‘डायलेक्ट’(अपभ्रंश) को विकसित कर के अंग्रेज़ी भाषा को जन्म दिया, लिपि रोमन लोगों से ली और भाषा का आधार बना कर विश्व पर शासन कर रहै हैं। अंग्रेजी से प्राचीन हिन्दी भाषा होते हुये भी हम मूर्ख हिन्दुस्तानी अपनी ही भाषा को स्वदेश में ही राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दे पाये – यह बदनसीबी नहीं तो और क्या है जो हम लोगों में राष्ट्रीय स्वाभिमान शून्य है।

पिछडी मानसिक्ता वाले देशों में आज भी यही समझा जाता है कि अंग्रेजी भाषा के बिना दुनियां का काम ही नहीं चल सकता और विकास के सारे कम्प्यूटर ठप हो जायें गे। दास-बुद्धियों को भ्रम है कि विश्व में केवल अंग्रेजी ही सक्ष्म भाषा है जबकि विकसित देश भी दबी जबान में संस्कृत भाषा का गुण गान ही नहीं कर रहै, उसे सीखने के मार्ग को अपना चुके हैं। हमारे देश के मानसिक गुलाम फिर भी यह मानने को तैयार नहीं कि कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा ना हो कर केवल परम्परागत भाषा है जिस में लिखा कुछ जाता है और पढा कुछ और ही जाता है। उस की तुलना में हिन्दी पूर्णत्या ऐक वैज्ञानिक भाषा है जिस में जो लिखा जाता है वही पढा भी जा सकता है। विश्व की किसी भी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखा जा सकता है और सक्ष्मता से पढा जा सकता है। अंग्रेजी में अपने नाम को ही लिख कर देख लीजिये पढने के बाद आप कुछ और ही सुनाई दें गे।

राष्ट्रभाषा का विरोध

नरेन्द्र मोदी सरकार ने राष्ट्रभाषा को महत्व देने का उचित निर्णय लिया है। यह भी अपेक्षाकृत था कि मोदी विरोधी नेता और अपना चुनावी वर्चस्व बनाये रखने वाले प्रान्तीय नेता इस का विरोध भी करें गे। बी जे पी में ही कई छिपे मोदी-विरोधी सरकार को हिन्दी अति शीघ्र लागू करने के लिये उकसायें गे भी ताकि सरकार गलतियां करे, और उकसाई गयी पथ-भ्रष्ट जनता का कडा विरोध भी झेले।

नीचे लिखे तत्वों का दूआरा प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से भारत में हिन्दी का विरोध और अंग्रेजी के समर्थन में स्वाभाविक हैः-

  • विदेशी पत्र-पत्रिकाओं के मालिक, जिन के व्यवसायिक उद्द्श्य हैं।
  • योरूपीय देश, कामनवेल्थ देश, और भारत विरोधी देश जो अंग्रेजी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा बनाये रखना चाहते हैं।
  • कम्पयूटर तथा अंग्रेजी-साफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियां।
  • विदेशों में बस चुके कई भारतीय युवा जो विदेशी कम्पनियों की नौकरी करते हैं और भारत से आऊट सोर्सिंग के जरिये से अपने ही देसवैसियों से सस्ते में विदेशी कम्पनियों के लिये काम करवाते हैं।
  • काल सैन्टर के मालिक और कई कर्मचारी।
  • कुछ ईसाई संस्थान, कानवेन्ट स्कूल और मैकाले भक्त प्रशासनिक अधिकारी।
  • उर्दू-भाषी जिहादी तथा धर्म निर्पेक्ष।

इलेक्शन में हार हुये नेताओं को तो नये मुद्दों की तालाश रहती है। सत्ता से गिर चुकने का बाद करुणानिधि और उस की श्रेणी के कई अन्य प्रान्तीय नेताओं को सत्ता की सीढी चढने के लिये फिर से हिन्दी विरोध का मुद्दा बैठे बैठाये मिल गया है। करुणानिधि और उस की श्रेणी के अन्य साथी कृप्या यह तो बतायें कि उन के प्रान्तों में क्या सभी लोग अंग्रेजी में ही लिखते पढते हैं? सच्चाई तो यह है कि उन्हीं के प्रान्तों के अधिकाँश लोग आज भी अशिक्षित और गरीब हैं। वह अंग्रेजी पढे या ना पढें उन्हें विदेशों में नहीं जाना है। भारत में ही रोजी-रोटी के लिये रोजगार ढूंडना है। लेकिन इन नेताओं को इन बातों से कोई सरोकार नहीं। उन्हें तो पिछले सत्तर वर्षों की तरह अपने परिवारों की खातिर सत्ता में बने रहना है, मुफ्त लैपटाप, रंगीन टेलीविजन, साईकिलें और ऐक रुपये किलो चावल आदि की भीख से लोगों का तुष्टिकरण कर के वोट बटोरते रहना है। इस लिये अब धीरे धीरे दूसरे प्रान्तो से भी कुछ चुनाव-हारे क्षेत्रीय नेता अपना अंग्रेजी प्रेम दिखायें गे और विकास की दुहाई दें गे। मोदी विरोधी फौज में लाम बन्द होना शुरु करें गे। यह नेता क्या जनता को बतायें गे कि उन के शासन काल में उन्हों ने युवाओं को देश की राष्ट्रभाषा के साथ जोडने के सम्बन्ध में आज तक क्या कुछ किया? अपने प्रान्तों में ही कितने अंग्रेजी स्कूल खोले? युवाओं को विदेशों में या देश में ही रोजगार दिलवाया? अपने देश की राष्ट्रभाषा कि विकास के लिये क्या किया? देश की ऐकता और पहचान के लिये क्या यह उन का कर्तव्य नहीं था? प्रान्तीयता के नाम पर उकसाने वाले नेताओं का स्वाभिमान तब क्यों बेबस हो गया था जब अंग्रेजों ने भारत में प्रान्तीय भाषाओं को हटा कर अंग्रेजी उन के सिरों पर थोप दी थी?

व्यवस्था परिवर्तन

व्यवस्था परिवर्तन की शुरूआत राष्ट्रभाषा के सम्मान के साथ होनी चाहिये ताकि जनता में भारतीयता के प्रति आत्म विशवास का संचार हो। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में मंत्री मण्डल के अधिकांश सदस्यों का हिन्दी में शप्थ लेना और  राष्ट्रभाषा को सरकारी काम काज की भाषा बनाना ऐक अच्छी शुरूआत है। अब आगे संसद की कारवाई हिन्दी में चले और सरकारी काम काज हिन्दी में हो, ई-गवर्नेंस में भी हिन्दी को प्रमुखता से जोडा जाये तो देश में ऐक नया आत्म विशवास जागे गा। किसी पर भी अंग्रेजी के इस्तेमाल पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई गयी लेकिन राष्ट्रभाषा के पक्ष में ऐक साकारात्मिक पहल जरूर करी गयी है।

पिछले साठ वर्षों से हम ने अपने देश की राष्ट्रभाषा को वह सम्मान नहीं दिया जो मिलना चाहिये था। हम अंग्रेजी की चाकरी ही करते रहै हैं और अपनी भाषा के इस्तेमाल से हिचकचाते रहै हैं। अपनी भाषा सीखने के लिये साठ वर्ष का समय प्रयाप्त होता है और अनिच्छा होने पर साठ जन्म भी कम होते हैं।इस का अर्थ अंग्रेजी का बहिष्कार करना नहीं है केवल अपनी राष्ट्रभाषा का सत्कार करना है। जनता अपेक्षा करती है कि भारत के संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को देश की राष्ट्रभाषा का ज्ञान और सम्मान अवश्य होना चाहिये। अगर उन्हें अभी भी हिन्दी नहीं आती तो अपने प्रांत की भाषा (मातृभाषा) का इस्तेमाल तो कर सकते हैं जिस का ट्रांसलेशन करा जा सकता है।

आम देशवासियों को भी अगर अपने आप को भारतीय कहने में गर्व है तो अपने देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी को भी गर्व से प्रयोग करना चाहिये। अंग्रेजी लिखने पढने में कोई बुराई नहीं, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि केवल अंग्रेजी लिखने पढने के कारण ही कोई व्यक्ति महान नहीं होता। उसी तरह हिन्दी लिखने पढने वाला अनपढ नहीं होता। लेकिन हिन्दी लिखने पढने वाला राष्ट्रभक्त अवश्य होता है और राष्ट्रभाषा को नकारने वाला निश्चित ही गद्दार होता है।

स्पीड में सावधानी जरूरी

हिन्दी के प्रचार, विस्तार और प्रसार में उतावलापन नहीं करना चाहिये। समस्याओं का धैर्य से समाधान करना चाहिये लेकिन विरोध का दमन भी अवश्य कडाई से करना चाहिये। देश में स्पष्ट संदेश जाना चाहिये कि सरकार देश की राष्ट्र भाषा को समय-बद्धता के साथ लागू करे गी, समस्याओं को सुलझाया जाये गा मगर जो नेता अपनी नेतागिरि करने के लिये विरोध करें गे उन के साथ कडाई से उसी तरह से निपटा जाये गा जैसे देश द्रोहियों के साथ करना चाहिये।

सरकार को हिन्दी प्रोत्साहन देना चाहिये लेकिन अंग्रेजी परन्तु अगले पाँच वर्षों तक अभी रोक नहीं लगानी चाहिये।

  • हिन्दी का अत्याधिक ‘संस्कृत-करण’ना किया जाये। अगर अन्य भाषाओं के जो शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन चुके हैं तो उन्हें सरकारी मान्यता भी दे देनी चाहिये।
  • सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी को ‘अनिवार्य विषय’ के तौर पर ना पढाया जाये। अंग्रेजी को ऐच्छिक विषय (इलेक्टिव) की तरह पढाना चाहिये या ऐडिश्नल विषय की तरह पढाना चाहिये और उस के लिये अतिरिक्त फीस वसूलनी चाहिये।
  • उच्च शिक्षा तथा नौकरियों के लिये सभी कम्पीटीशनों में भाग लेने के लिये हिन्दी के प्रयोग की सुविधा होनी चाहिये। अगले पाँच वर्षों तक अंग्रेजी में भी परीक्षा देने की सुविधा रहनी चाहिये लेकिन नौकरी या प्रमोशन देने के समय “अगर दो प्रतिस्पर्धियों की अन्य योग्यतायें बराबर हों ” तो हिन्दी माध्यम के प्रतिस्पर्धी को प्राथमिकता मिलनी चाहिये।
  • जिन सरकारी विभागों या मंत्रालयों में हिन्दी अपनाई जाये वहाँ सभी तरह के आँकडे हिन्दी में रखने और उन का विशलेषण करने की पूरी सुवाधायें पूर्व उपलब्द्ध होनी चाहियें।
  • निजि स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढाई की छूट रहनी चाहिये जिस के लिये विद्य़ार्थी विध्यालय को तय शुदा फीस दें गे।
  • जो लोग विदेशों में जा कर बसना चाहते हों या नौकरी करना चाहैं उन के लिये अंग्रेजी सीखने की सुवाधायें सभी यूनिवर्स्टियों में रहनी चाहियें जिस में फीस का खर्च विध्यार्थी खुद उठायें।
  • हमारे देश में कम्पयूटर तथा साफ्टवेयर विकास की प्रयाप्त क्षमता है इस लिये अंग्रेजी में लिख गये साफ्टवेयर में हिन्दी के बटन लगाने के बजाये कम्पयूटर साफ्टवेयर को हिन्दी में ही मौलिक रूप से तैय्यार करना चाहिये।
  • समय समय पर कम्पयूटर साफ्टवैयर इंजीनियरों को सरकारी सम्मान देना चाहिये।
  • प्रत्येक स्तर पर हिन्दी लागू करने के लिये ऐक सैल का गठन करना चाहिये। सैल का अध्यक्ष हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनो भाषाओं की अच्छी जानकारी रखने वाला व्यक्ति होना चाहिये। विशेष तौर पर वह व्यकति ‘हिन्दी-उन्मादी’नहीं होना चाहिये। उसे अंग्रेजी भाषा से ‘नफरत’भी नहीं होनी चाहिये, तभी वह निष्पक्ष रह कर स्कारात्मिक ढंग से दैनिक समस्याओं का समाधान कर सकता है।
  • जो संस्थान अपना काम राष्ट्रभाषा में करें उन्हें आयकर, विक्रय कर आदि में कुछ छूट मिलनी चाहिये। इसी तरह हिन्दी के उपकरणों पर कुछ आर्थिक छूट दी जा सकती है। महानगरों को छोड कर मध्य वर्ग के शहरों में बिल बोर्ड हिन्दी या प्रान्तीय़ भाषा में होने चाहियें।

प्रवासी भारतीय

  • प्रवासी भारतीय जब भी ऐतक दूसरे से मिलें तो आपस में हिन्दी का प्रयोग ही करें।
  • ई मैग्जीनस में हिन्दी में पोस्ट लिखने का प्रयास करें।
  • अपने बच्चों को हिन्दी सिखाने में गर्व करें।

जन संख्या के आधार पर चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा देश है। अतः संख्या के आधार पर चीनी भाषा हिन्दी से ऐक कदम आगे तो है लेकिन अपनी जटिल लिपि के कारण वह हिन्दी का मुकाबला नहीं कर सकती। अगर भारत वासियों में यह लग्न, साहस और कर्मठता पैदा हो जाये तो हिन्दी ही अंग्रेजी का स्थान अन्तरराष्ट्रीय भाषा के तौर पर ले सकती है। भारत के पास कम्पयूटर साफ्टवेयर की सक्ष्म युवा शक्ति है जो अपने दाश का भाषा को विश्व में मान्यता दिला सकते हैं। जो कदम आगे बठाया है वह पीछे नहीं हटना चाहिये।

चाँद शर्मा

काँग्रेसी दीमक का प्रकोप


काँग्रेस ने देश का तीन हथियारों से विनाश किया है।

पहला विनाश – विकास के नाम गाँधी-नेहरू परिवारों के नाम पर योजनायें तैयार हो जाती रही हैं और फिर कुछ समय बाद ही उन योजनाओं में से घोटाले और जाँच कमेटियाँ आदि शुरु होती रही हैं। भ्रष्टाचार सभी तरह के विकास योजनाओं को निगलता रहा है। मीडिया कुछ दिन तक ढोल पीटता है, जाने पहचाने बुद्धिजीवी टीवी पर बहस करते हैं, कुछ गिरफतारियाँ होती हैं, अपराधी जमानतों पर छूट जाते हैं और चींटी की चाल से अदालतों में केस रैंगने लगते हैं। लम्बे अरसे के बाद ज्यादातर आरोपी सबूतों के अभाव के कारण छूट जाते हैं।

दूसरा विनाश तुष्टीकरण के नाम पर किया है। अल्प संख्यकों, दलितों, महिलाओं, विकलांगों, वरिष्ट नागरिकों, किसानों, उग्रवादियों तथा ‘स्वतन्त्रता सैनानियों’ के नाम पर कई तरह की पुनर्वास योजनायें, स्शकतिकरण कानून, विशेष अदालतें, वजीफे, सबसिडिज, कोटे, बनाये जाते रहै हैं। आरक्षण के बहाने समाज को बाँटा है, भ्रष्टाचार के रास्ते खोलने के लिये कई कानूनों में भारी छूट दी है। इन सब कारणों से समाज के अंग मुख्य धारा से टूट कर अलग अलग टोलियों में बटते रहै हैं।

तीसरा विनाश बाहरी शक्तियों के तालमेल से किया है। पाकिस्तानी और बंगलादेशी घुसपैठियों के अतिरिक्त नेपाल, तिब्बत और श्रीलंका से शर्णार्थी यहाँ आकर कई वर्षों से बसाये गये हैं। जिन के खाने खर्चे का बोझ भी स्थानीय लोग उठाते हैं। मल्टीनेशनल कम्पनियाँ अपने व्यापारिक लाभ उठा रही हैं।  बडे शहरों में अविकसित राज्यों से आये बेरोजगार परिवार सरकारी जमीनो पर झुग्गियाँ डाल कर बैठ जाते हैं, मुफ्त में बिजली पानी सिर्फ इस्तेमाल ही नहीं करते बल्कि उसे वेस्ट भी करते हैं। फिर ‘ गरीबी हटाओ ’ के नारे के साथ कोई नेता उन्हें अपना निजि वोट बैंक बना कर उन्हें अपना लेता है और इस तरह शहरी विकास की सभी योजनायें अपना आर्थिक संतुलन खो बैठती हैं। अंत में य़ह सभी लोग ऐक वोट बैंक बन कर काँग्रेस को सत्ता में बिठा कर अपना अपना ऋण चुका देते हैं।

उमीद किरण को ग्रहण                                                   

काँग्रेस के भ्रष्टाचार से तंग आकर स्वामी रामदेव ने भारत स्वाभिमान आन्दोलन के माध्यम से देश में योग, स्वदेशी वस्तुओं के प्रति जाग़ृति, शिक्षा पद्धति में राष्ट्रभाषा का प्रयोग, विदेशों में भ्रष्ट नेताओं के काले धन की वापसी और व्यवस्था परिवर्तन आदि विषयों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चेतना की ऐक लहर पैदा करी। उन के प्रयास को विफल करने के लिये काँग्रेस ने अन्ना हजारे और केजरीवाल को भ्रष्टाचार के विरूद्ध नकली योद्धा के तौर पर खडा करवा दिया। काँग्रेस तो अपना वर्चस्व खो ही चुकी है इस लिये काँग्रेसियों के सहयोग से अब नये शासक आम आदमी के नाम से खडे हो चुके हैं जो स्वामी रामदेव और नरेन्द्र मोदी का विरोध करें गे। भ्रष्टाचार से लडने के लिये जनलोक पाल का ऐक सूत्री ऐजेंडा ले कर भेड चाल में बरगलाये गये युवा, स्वार्थी और दलबदलू नेता अब आम आदमी पार्टी की स्दस्यता पाने की दौड में जुट रहै हैं। वास्तव में यह लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं बल्कि देश की संस्कृति की पहचान की रक्षा करने वाले स्वामी रामदेव, विकास पुरुष नरेन्द्र मोदी और आम आदमी के खिलाफ ही लडें गे और देश को आर्थिक गुलामी और आराजिक्ता की तरफ धकेल दें गे।

‘AAP’ के नेताओं की नीयत और नीति

अमेरिका और उस के सहयोगी योरोपीय देश नहीं चाहते कि भारत विकसित होकर आधुनिक महा शक्ति बने और उन का प्रति स्पर्द्धी बन जाये। वह भारत को ऐक साधारण, गरीब और दया पर जीने वाला देश ही बने रहना चाहते है ताकि यह देश अपनी सँस्कृति से दूर उन्ही देशों का पिछलग्गू बना रहै, और ऐक अन्तरराष्ट्रीय मण्डी या सराय बन जाये जहाँ विदेशी मौज मस्ती के लिये आते जाते रहैं। भारत के ‘आम आदमियों ’ की आकाँक्षायें केवल अपनी शरीरिक जरूरतों को पूरा करने में ही सिमटीं रहैं।

अनुभव के आभाव में केजरीवाल और उन के मंत्री पंचायती सूझबूझ ही भारत की राजधानी का शासन चला रहै हैं। कल को यही तरीका राष्ट्रीय सरकार को चलाने में भी इस्तेमाल करें गे तो यह देश ऐक बहुत बडा आराजिक गाँव बन कर रह जाये गा जिस में अरेबियन नाईटस के खलीफों की तरह सरकारी नेता, कर्मचारी भेष बदल आम आदमी की समस्यायें हल करने के लिये कर घूमा करें गे। उन की लोक-लुभावन नीतियाँ भारत को महा शक्ति नहीं – मुफ्तखोरों का देश बना दें गी जहाँ ‘आम आदमी ’ जानवरों की तरह खायें-पियें गे, बच्चे पैदा करें और मर जायें – यह है ‘AAP’ की अदूरदर्शी नीति।

केवल खाने पीने और सुरक्षा के साथ आराम करना, बच्चे पैदा करना और मर जाना तो जानवर भी करते हैं परन्तु उन का कोई देश या इतिहास नहीं होता। लेकिन कोई भी देश केवल ‘आम आदमियों ’ के बल पर महा शक्ति नहीं बन सकता। ‘आम आदमियों ’ के बीच भी खास आदमियों, विशिष्ठ प्रतिभाओं वाले नेताओं की आवशक्ता होती है। जो मानव शरीरिक आवशयक्ताओं की पूर्ति में ही अपना जीवन गंवा देते हैं। उन के और पशुओं के जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं रहता।

फोकट मे जीना

लडकपन से अभी अभी निकले आम आदमी पार्टी के नेता यह नहीं जानते कि हमारे पूर्वजों ने मुफ्त खोरी के साथ जीने को कितना नकारा है और पुरुषार्थ के साथ ही कुछ पाने पर बल दिया है। आज से हजारों वर्ष पूर्व जब अमेरिका तथा योरुपीय विकसित देशों का नामोनिशान भी कहीं नहीं था भारत के ऋषि मनु ने अपने विधान मे कहा थाः-

यत्किंचिदपि वर्षस्य दापयेत्करसंज्ञितम्।

व्यवहारेण जीवंन्तं राजा राष्ट्रे पृथग्जनम्।।

कारुकाञ्छिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः।

एकैकं कारयेत्कर्म मसि मसि महीपतिः ।। (मनु स्मृति 7- 137-138)

राजा (सभी तरह के प्रशासक) अपने राज्य में छोटे व्यापार से जीने वाले व्यपारियों से भी कुछ न कुछ वार्षिक कर लिया करे। कारीगरी का काम कर के जीने वाले, लोहार, बेलदार, और बोझा ढोने वाले मज़दूरों से कर स्वरुप महीने में एक दिन का काम ले।

नोच्छिन्द्यात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णाया।

उच्छिन्दव्ह्यात्मनो मूलमात्मानं तांश्च पीडयेत्।।

तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः।

तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति सम्मतः ।। (मनु स्मृति 7- 139-140)

(प्रशासन) कर न ले कर अपने मूल का उच्छेद न करे और अधिक लोभ वश प्रजा का मूलोच्छेदन भी न करे क्यों कि मूलोच्छेद से अपने को और प्रजा को पीड़ा होती है। कार्य को देख कर कोमल और कठोर होना चाहिये। समयानुसार राजा( प्रशासन) का कोमल और कठोर होना सभी को अच्छा लगता है।

अतीत काल में लिखे गये मनुसमृति के यह श्र्लोक आजकल के उन नेताओं के लिये अत्यन्त महत्वशाली हैं जो चुनावों से पहले लेप-टाप, मुफ्त बिजली-पानी, और तरह तरह के लोक लुभावन वादे करते हैं और स्वार्थवश बिना सोचे समझे देश के बजट का संतुलन बिगाड देते हैं। अगर उन्हें जनता का आवशक्ताओं का अहसास है तो सत्ता समभालने के समय से ही जरूरी वस्तुओं का उत्पादन बढायें, वितरण प्रणाली सें सुधार करें, उन वस्तुओं पर सरकारी टैक्स कम करें नाकि उन वस्तुओं को फोकट में बाँट कर, जनता को रिशवत के बहाने अपने लिये वोट संचय करना शुरु कर दें। अगर लोगों को सभी कुछ मुफ्त पाने की लत पड जाये गी तो फिर काम करने और कर देने के लिये कोई भी व्यक्ति तैयार नहीं होगा।

सिवाय भारत के आजकल पानी और बिजली जैसी सुविधायें संसार मे कहीं भी मुफ्त नहीं मिलतीं। उन्हें पैदा करने, संचित करने और फिर दूरदराज तक पहुँचाने में, उन का लेखा जोखा रखने में काफी खर्चा होता है। अगर सभी सुविधायें मुफ्त में देनी शुरू हो जायें गी तो ऐक तरफ तो उन की खपत बढ जाये गी और दूसरी तरफ सरकार पर बोझ निरंकुशता के साथ बडने लगे गा। क्या जरूरी नहीं कि इस विषय पर विचार किया जाये और सरकारी तंत्र की इस सार्वजनिक लूट पर अंकुश लगाया जाये। अगर ऐसा नहीं किया गया तो फोकट मार लोग देश को दीमक की तरह खोखला करते रहैं गे और ऐक दिन चाट जायें गे।

आरक्षण और सबसिडी आदि दे कर इलेक्शन तो जीता जा सकता है परन्तु वह समस्या का समाधान नहीं है। इस प्रकार की बातें समस्याओं को और जटिल कर दें गी। इमानदार और मेहनत से धन कमाने वालों को ही इस तरह का बोझा उठाना पडे गा जो कभी कम नहीं होगा और बढता ही जाये  गा।

 चाँद शर्मा

 

त्रिशंकु चुनावी नतीजे


बिना परिश्रम अगर कुछ प्राप्त हो जाये तो उस की कीमत नहीं आंकी जाती। यह बात हमारे लोकतन्त्र और मत देने के अधिकार के साथ भी सार्थक है। कहने को दिल्ली में 68 प्रतिशत मत दान हुआ जो पिछले चुनावों से ज्यादा है लेकिन इस से कहीं ज्यादा मत दान दूसरे राज्यों में हुआ है। देश की राजधानी से 32 प्रतिशत पढे लिखे और जागरूक मत दाता वोट डालने नहीं गये क्यों कि उन्हें लोकतंत्र के बजाये आराम करना ज्यादा पसंद था। अगर दिल्ली में आज त्रिशंकु विधान सभा है तो उस के लिये दिल्ली के मतदाता जिम्मेदार हैं जो अपने वोट का महत्व नहीं समझे और भ्रामित रहै हैं। प्रजातंत्र को सफल बनाने के लिये वोटरों में जागरुक्ता होनी चाहिये । जो मतदाता दो मुठ्ठी अनाज और ऐक बोतल शराब पर बिक जायें उन्हें तो मत दान का अधिकार ही नहीं होना चाहिये। हमारे देश की दुर्दशा का ऐक मुख्य कारण अधिक और अनाधकृत मतदाता हैं। ऐसे नेता चुन कर आते हैं जिन्हें बाहर से ताला लगा कर रखना पडता है कि वह दूसरे राजनैतिक दल के पास बिक ना जायें – ऐसे प्रजातंत्र पर शर्म आनी चाहिये।

लोकतन्त्र के मापदण्ड

अगर कोई भी राजनैतिक दल विधानसभा या संसद के चुनाव में 51 प्रतिशत से कम प्रत्याशी खडे करता है तो ऩिशचित है कि वह सरकार नहीं चलायें गे। वह केवल विजयी उमीदवारों के बलबूते पर सिर्फ जोड-तोड ही करें गे। यही बात स्वतन्त्र प्रत्याशियों पर भी लागू होती है। उन की निजि योग्यता और लोकप्रियता चाहे कुछ भी हो लेकिन सफल हो कर वह अपने आप को बेच कर पैसा कमाने या कोई पद प्राप्त करने के इलावा जनता के लिये कुछ नहीं कर सकते। उन्हें वोट देना ही बेकार है। लोकतंत्र में राजनैतिक दलों का महत्व है क्यों कि उन के पास संगठन, सोच, अनुशासन और जवाबदारी होती है।

केवल विरोध के नकारात्मिक मुद्दे पर संगठन खडा कर के देश का शासन नहीं चलाया जा सकता। ऐमरजैंसी के बाद जनता पार्टी सिर्फ इन्दिरा गाँधी के विरोध के आधार पर ही गठित करी गयी थी जिस में मुलायम, नितिश, लालू, राजनारायण, चरण सिहं, बहुगुणा, वाजपायी, जगजीवनराम से ले कर हाजी मस्तान आदि तक सभी शामिल थे। तीन वर्ष के समय में ही जनता पार्टी अपने अन्तर-विरोधों के कारण बिखर गयी थी और आज उसी पार्टी के बिखरे हुये टुकडे कई तरह के जनता दलों के नाम से परिवारवाद और व्यक्तिवाद को बढावा दे रहै हैं। आम आदमी पार्टी भी कोई संगठित पार्टी नहीं बल्कि सिर्फ भ्रष्टाचार के विरुध जनता के रोष का प्रतीक है जिस के पास सिर्फ ऐक मात्र मुद्दा है जनलोकपाल बिल पास करवाना और सत्ता में बैठना। इस से आगे देश की दूसरी समस्याओं और उन के समाधान के बारे में नीतियों के बारे में उन के पास कोई सकारात्मिक सोच, संगठन, आदर्श, अनुभव या टेलेन्ट नहीं है। जैसे गलियों से आकर हताश लोगों की भीड चौराहों पर भ्रष्टाचार के विरूध नारे लगाने लग जाती है तो अगले चौराहे पर जाते जाते भीड का स्वरूप भी घटता बढता रहता है। उन को संगठित रखने का कोई भी ऐक मात्र मुद्दा भारत जैसे देश का शासन नहीं चला सकता। शासक के लिये कुछ गुण भी चाहियें। शालीनता, गम्भीरता, योग्यता और अनुभव आदि आम आदमी पार्टी के सदस्यों में बिलकुल ही नहीं दिख रहै। यह केवल उग्रवादी युवाओं का अनुभवहीन नकारात्मिक जमावडा है जो सत्ता मिलने पर ऐक माफिया गुट का रूप ले ले गा।

आम आदमी पार्टी की परीक्षा

दिल्ली के 68 प्रतिशत मतदाताओं ने बी जे पी को ही स्पष्ट मत से सब से बडी पार्टी माना है। केजरीवाल ने दिल्ली का चुनाव काँग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा था इसलिये त्रिशंकु विधान सभा बनने की सूरत में वह काँग्रेस को समर्थन नहीं दे सकते लेकिन उन से बिना शर्त समर्थन ले तो सकते हैं। सकारात्मिक राजनीति करने के लिये उन्हें बी जे पी को समर्थन देना चाहिये था – और सरकार के अन्दर रह कर या बाहर से सरकार के भ्रष्टाचार पर नजर रखनी चाहिये थी। लेकिन केजरीवाल ने तो नकारात्मिक राजनीति करनी है इसलिये वह दोबारा चुनाव के लिये तैय्यार है जिस का खर्च दिल्ली के लोगों पर पडे गा।

अगर केजरीवाल स्वयं सरकार नहीं बना सकता तो चाहे तो काँग्रेस से समर्थन ले ले या बी जे पी से – सरकार बना कर अपना कुछ ऐजेण्डा तो पूरा कर के दिखायें। दिल्ली से भ्रष्टाचार खत्म करना, नागरिक सुरक्षा, महंगाई, बिजली – पानी के रेट कम करना आदि पर तो कुछ यथार्थ में कर के दिखलायें। वह जिम्मेदारी से भाग क्यों रहै हैं।

लोकतन्त्र के लिये खतरा

पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस ने देश का ताना बाना ऐसा भ्रष्ट किया है कि आज सवा अरब की आबादी में 500 इमानदार भारतीय ढूंडने मुशकिल हैं जो संसद में बैठाये जा सकें। काँग्रेस के भ्रष्टाचार से तंग आ कर भारत के लोग आजतक इमानदार लोगों को ही तलाशते रहै हैं – चाहे कहीं से भी मिल जायें। अब कुछ विदेशी और कुछ देसी तत्व नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रवादी बातों से इतना परेशान हैं कि वह भारत की राजसत्ता नरेन्द्र मोदी के बजाये किसी दूसरे के हाथ में देने का षटयंत्र कर रहै थे जो अपनी ‘इमानदारी’  का ढोल पीट कर काँग्रेस का विकल्प बन सकें और उसी खोज में उन्हें केजरीवाल की प्राप्ति हो गयी। उन की आम आदमी पार्टी जिसे अब आराजिक्ता आवाहन पार्टी कहना सही होगा अब देश को भूल-भूलियां में धकेलने के लिये विदेशियों की पैदायश के तौर पर उभर चुकी है। यह तसवीर आने वाले लोकसभा चुनाव में और स्पष्ट हो जाये गी। यह पार्टी नरेन्द्र मोदी की लोक प्रियता में सेंध लगाये गी और मीडिया इसे बढ चढ कर इस्तेमाल करे गा।

क्या आम आदमी पार्टी पूरे हिन्दुस्तान में भ्रष्ट काँग्रेस का विकल्प बन सकती है ? क्या उन के पास इतना संगठन, योग्यता, अनुभव और ‘इमानदार’ प्रशासक हैं कि वह देश को चला सकें ? भ्रष्टाचार से जूझने के जोश में हमारे युवा बिना सोचे समझे केजरीवाल के मकड़ जाल में फंसते चले जा रहै हैं । वह नहीं जानते कि इस पार्टी के पीछे कौन लोग खडे हैं। युवाओं ने शायद इस पार्टी के नेताओं के ये बयान शायद याद नहीं रखे…

  • आप कांग्रेस से गठबंधन कर सकती है – शाजिया इल्मी
  • तरुण तेजपाल निर्दोष है – शाजिया इल्मी
  • नरेन्द्र मोदी मानवता का हत्यारा है – संजय सिंह
  • (भगवान शिव को) ठंड में हिमालय पर बैठा दिया और कपडे भी नही दिए बिचारे को और सर के ऊपर से गंगा निकाल दी तो वो शंकर तांडव नही तो क्या डिस्को करेगा – कुमार विशवास
  • पदम् श्री मेरे पाँव की जूती है – कुमार विशवास
  • इशरत जहाँ मासूम थी – योगेन्द्र यादव
  • 42%भारतीय चाहते हैं की राहुल गाँधी जी प्रधानमन्त्री बने – योगेन्द्र यादव
  • बटला हाउस फर्जी है – अरविन्द केजरीवाल
  • राजीव गाँधी इकलौते ऐसे नेता थे, जिन्होंने आम आदमी की भलाई के लिए काम किया – अरविन्द केजरीवाल
  • राहुल गाँधी जी को देश की समस्याओं की समझ है – अरविन्द केजरीवाल
  • भारत के लिए हिन्दू शक्तियां खतरा है – प्रशांत भूषण
  • कश्मीर को पकिस्तान को दे देना चाहिए – प्रशांत भूषण

AAP वाले सिर्फ दिल्ली में आराजिक्ता फैलाने के इलावा और कुछ नहीं कर सकें गे। सात आठ यार दोस्त अगर कहीं इकट्ठे बैठ जायें जो ऐक दूसरे को ज्यादा जानते भी नहीं, चुनाव से कुछ वक्त पहले ही मिले हैं, तो उन को सरकार नहीं कहा जा सकता वह केवल ऐक चौकडी ही होती है जिसे अंग्रेड़ी में कैकस कहते हैं।

आम आदमी पार्टी पूरी तरह से हिन्दू विरोधी और मुस्लिम समर्थक पार्टी है। उन के चुनावी उमीदवार आम तौर पर वह लोग हैं जो वर्षों तक काँग्रेस या बी जे पी के टिक्ट पाने के लिये झक मारते रहै हैं और अब इमानदारी का नकाब लगा कर आम आदमी बन बैठे हैं। यह सिर्फ भ्रष्टाचार विरोधी वोटों का बटवारा करवा कर काँग्रेस का फायदा करवायें गे। वह नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में राष्ट्रवादी सरकार बनने के रास्ते में रोड़े अटकायें गे।

चुनौती स्वीकार करो

अगर केजरीवाल और उन के साथियों में हिम्मत है तो अभी काँग्रेस या बी जे पी से बिना शर्त समर्थन के आधार पर कुछ तो कर के दिखायें। देश के शासन की बागडोर के साथ जुआ नहीं खेला जा सकता। आम आदमी पार्टी की ऐकमात्र सोच है कि सिर्फ वही अकेले इमानदार हैं और बाकी सभी बेईमान हैं। केजरीवाल का कहना था कि जब वह दिल्ली में अपनी सरकार बनायें गे तो राम लीला ग्राउंड में विधान सभा का सत्र करें गे और उस में जनलोक पाल बिल पास करें गे। उतना कर देने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाये गा। इमानदार बनने के लिये नारे लगाने के बजाये इमानदार बन कर दिखाओ। कम से कम अपना स्टेंड तो साफ करो। पहली चुनौती को स्वीकार करो, सरकार बनाओ और कुछ कर के दिखाओ।

केजरीवाल तो अब फिर से चुनाव के लिये भी तैय्यार हैं जैसे कोई जादू उन के पक्ष में हो जाये गा। अगर दोबारा चुनाव करवाये जायें और फिर भी त्रिशंकु परिणाम आये तो कितनी बार दिल्ली में केजरीवाल नया मतदान करवाते रहैं गे ? अगर यह हाल लोकसभा के चुनाव में हुआ तो बार बार चुनाव करवाने और देश में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये कौन जिम्मेदार होगा ? अगर हम चाहैं तो इस के विकल्प तलाशे जा सकते हैं जैसे किः-

  1. त्रिशंकु परिणाम के कारण या तो अगले पाँच वर्षों तक दिल्ली के नागरिकों को लोकतंत्र से वंचित किया जाये और उप राज्यपाल का शासन लागू रहै।
  2. दिल्ली में चुने गये विधायकों को इकठ्ठा कर के उन्हीं में से ऐक वैकल्पिक सरकार बनाई जाये जो सदन में पार्टी रहित साधारण बहुमत के अनुसार पाँच वर्ष तक काम करे और चाहे तो अपना मुख्यमंत्री आवश्क्तानुसार बदलती रहै।
  3. दोबारा या जितनी भी बार चुनाव कराये जायें उन का खर्च मत दाताओं से अतिरिक्त कर के तौर पर वसूला जाये।

केजरीवाल जी – हरियाणा और लोकसभा का लालच करने से पहले जो कुछ दिल्ली में प्लेट पर प्राप्त हुआ है उस की चुनौती में सफल हो कर दिखाओ यदि ऐसा नहीं करते तो आम आदमी पार्टी जनता के साथ ऐक धोखा है उसे राजनैतिक पार्टी कहलाने का कोई अधिकार नहीं।

चाँद शर्मा

केजरीवाल से सवाल


भारत में जहाँ हवा और सूर्य की रौशनी जा सकती है वहाँ पर भ्रष्टाचार भी जा चुका है। पिछले सात दशकों में हमारे समाज की मान्यताओं में जो बदलाव आये हैं उन में प्रमुख स्थान भ्रष्टाचार को मिला है। किसी भी काम को शार्टकट से करने लेना या करवाने वाले को ‘हैल्पफुल एटिच्यूड’, ‘टैक्ट फुल’, ‘अडजस्टेबल’, या ‘ओपन-माईडिड’ कह कर दरकिनार कर दिया जाता है। जो नियमों के अनुसार चले उसे ‘रिजिड’, ‘दकियानूस’ या ‘रेडटेपिस्ट’ की उपाधि मिल जाती है। यही वजह है कि भ्रष्टाचार अब हमारी रगों में समा गया है।

लेकिन कहीं भी अन्धेरा ज्यादा देर तक नहीं रहता। सुबह जरूर होती है। अब फिर से लोग भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं। पिछले दो दश्कों से तो हम बेसबरी से इमानदार व्यक्ति की तलाश कर रहै हैं। जिस ने भी अपने आप को ‘इमानदार’ बताया हम ने उसे ही प्रधानमन्त्री की कुरसी आफ़र कर दी। राजीव गान्धी, वी पी सिहँ, आई के गुजराल और मनमोहन सिहं आदि जैसे कई ‘इमानदार’ आये और भ्रष्टाचार के साथ साथ कई अन्य रोग भी हमारी राजनीति में लगा गये।

अन्ना और स्वामी रामदेव

इसी वातावरण में ऐक नाम अन्ना हजारे का भी उभरा जो महाराष्ट्र की राजनीति में अनशन कर के मशहूर होते गये। अन्ना अपने आप को गाँधी वादी कहते रहै हैं। सत्य तो यह है कि जब गाँधी जी ने बिडला हाऊस के प्रांगण में ‘हेराम’ कह कर अन्तिम सांस लिया था तो अन्ना नौ दस वर्ष की आयु के रहै होंगे। फिर भी वह गाँधी की तरह अपनी जिद मनवाने के लिये आमरण-अनशन का सहारा लेते रहै हैं। वह बात अलग है कि अपने आप को ‘री-यूज़’ करने के लिये अन्ना खुद ही कोई ना कोई बहाना ले कर अनशन खोलते भी रहै हैं।

अन्ना को राष्ट्रीय मंच पर स्वामी रामदेव लाये जो भ्रष्टाचार के खिलाफ सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रहै थे बल्कि व्यवस्था परिवर्तन का सक्षम विकल्प भी दे रहै थे। उस विकल्प को ठोस रूप दिया जा चुका था। उनकी योजना में स्वदेशी वस्तुओं का दैनिक जीवन में इस्तेमाल, भ्रष्ट व्यकतियों का राजनीति से निष्कासन, हिन्दी तथा प्रान्तीय भाषाओं के माध्यम से उच्च शिक्षा, योगाभ्यास के दूआरा चरित्र निर्माण और भारत स्वाभिमान की पुनर्स्थापना आदि शामिल थे। स्वामी राम देव अपने विकल्प को प्रत्यक्ष रूप देने के लिये ऐक सक्ष्म संगठन भारत स्वाभिमान भी स्थापित कर चुके थे। भारत स्वाभिमान की बहती गंगा में हाथ धोने के लिये अन्ना भी ऐक जनलोक पाल का घिसापिटा विषय लेकर कूद पडे।

थोडे ही समय पश्चात अन्ना ने अपने समर्थकों के साथ, जिन में केजरीवाल, किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश आदि अग्रेसर थे दिल्ली में अनशन पर बैठ गये। स्वामी रामदेव और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थन से देश भर में इमानदारी की चिंगारी शोलों में परिवर्तित हो चुकी थी। युवा वर्ग उत्साहित हो कर स्वामी रामदेव के साथ उन के नये समर्थक अन्ना के गीत भी गाने लगा। भाण्ड मीडिया ने शंख नाद किया की “सरकार पाँच दिन में हिल गयी… ! ”

सत्ता में बैठी काँग्रेस ने नबज को पकडा और अन्ना से तोलमोल शुरु हो गया जिस में केजरीवाल और स्वामी अग्निवेश और कपिल सिब्बल थे। आननफानन में समझोता होगया – केजरीवाल और अग्निवेश ने जोश में अपनी पीठ थपथपाई और यह कह कर सरकार का भी धन्यवाद कर दिया कि समझोता कर के “सरकार ने उन्हें अपेक्षा से अधिक दे दिया है.. !”

सफलता के जोश में अन्ना और उन के साथियों ने पहले स्वामी रामदेव का साथ छोडा। फिर केजरीवाल ने अन्ना को भी किनारे कर दिया और अपनी राजनैतिक पार्टी खडी कर दी। अन्ना का प्रभाव टिमटिमाने लगा तो वह मायूस और बीमार पड गये, मगर केजरीवाल को चेतावनी दे गये कि “ राजनीति में ना तो मेरा फोटो इस्तेमाल करना और ना ही मेरा नाम इस्तेमाल करना।”  किरण बेदी भी केजरीवाल से अलग हो गयीं। केजरीवाल नें राजनीति में अपने कदम जमाने शुरु किये। थोडे ही दिनों में जग जाहिर होगया कि सरकार का समझोता केवल छलावा था जिस का मकसद भारत स्वाभिमान आन्दोलन को कमजोर करना था। उस के बाद की कहानी सभी जानते हैं।

जोश में दिशीहीनता

केजरीवाल को काँग्रेस ने इस्तेमाल करना शुरू किया। अपनी निष्पक्षता दिखाने के लिये केजरीवाल नें भी बीजेपी नेताओं के साथ काँग्रेस के नेताओं पर भी  भ्रष्टाचार के आक्षेप लगाये। भारत में प्रगट हुये ऐकमात्र इमानदार केजरीवाल के साथ वह महत्वकाँक्षी नेता जुडने लग गये जिन के मन में चुनाव जीतने की ललक थी लेकिन न्हें कोई बडी पार्टी टिकट नहीं देती थी। मोमबत्तियों के सहारे भ्रष्टाचार के अन्धेरे को मिटाने का प्रयास करते करते युवा तो दिशा हीन हो कर थकते जा रहै थे। यह सब कुछ काँग्रेस की इच्छा के अनुकूल हो रहा था। रामदेव के संस्थानों के खिलाफ सी बी आई और सरकारी तंत्र कारवाई तेज होती गयी लेकिन केजरीवाल ने स्वामी रामदेव के समर्थन में ऐक शब्द भी नहीं कहा।

आदि काल से भारत की पहचान केवल हिन्दू देश की ही रही है। स्वामी रामदेव भारत की संस्कृति की पुनर्स्थापना की बात कर रहै थे। केजरीवाल इन विषयों से अलग हो कर जामा मसजिद के इमाम अब्दुल्ला  बुखारी को संतुष्ट करने में जुटे रहै और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से दूरी बनाने या कोसने में तत्पर रहै। काँग्रेस के साथ कदम मिलाने के लिये केजरीवाल ने अपने आप को धर्म निर्पेक्ष बताने का मार्ग चुना और इमानदारी का बुर्का ओढ लिया।

भ्रष्टाचार विरोध में सेंध

यह सर्व-विदित सत्य है कि भ्रष्टाचार करने और भ्रष्टाचारी कामों को छुपाने के साधन उसी के पास होते हैं जो सत्ता में रहता है। इस देश में पिछले छः दशकों से काँग्रेस ही सत्ता में रही है। अतः भ्रष्टाचार के लिये सर्वाधिक जिम्मेदारी काँग्रेस की है।  भ्रष्टाचार के पनपने में बी जे पी या अन्य दलों का योग्दान अगर कुछ है तो वह आटे में नमक के बराबर है।

मुख्यता सभी इमानदार लोगों को काँग्रेस के विरुद्ध ऐक जुट होना चाहिये था ताकि भ्रष्टाचार विरोधी वोटों का बिखराव ना हो। छोटे दलों से तो बाद में भी निपटा जा सकता है। लेकिन अब केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी वोटों का बिखराव करने के लिये अपनी पार्टी को खडा किया है। इस का फायदा सिर्फ काँग्रेस को होगा और वह सत्ता में बनी रहै गी। अगर कुछ थोडे से केजरीवाल के समर्थक चुनाव जीत गये तो वह अपनी सरकार कभी नहीं बना सकें गे। वह केवल पिछलग्गू बने रहैं गे।

सरकार का काम केवल भ्रष्टाचार बन्द करना ही नहीं होता। सरकार पर देश का प्रशासन, सुरक्षा, विकास और विदेश नीति की जिम्मेदारी होती है। ऐक जनलोकपाल को कुर्सी पर तैनात कर देने से ही देश की दूसरी समस्यायें अपने आप हल नहीं करी जा सकतीं। केजरीवाल के पास कोई इस तरह की प्रतिभा या संगठन नहीं जो सरकार की जिम्मेदारियों को निभा सके। देश को इमानदारी के जोश मे इकठ्टी करी गयी भीड के सपुर्द नहीं किया जा सकता। दूर की बातें अगर दरकिनार भी करें तो भी आजतक स्थानीय बातों पर ही केजरीवाल ने अपनी राय कभी व्यक्त नहीं करी। अगर उन की नियत साफ है तो सार्वजनिक तौर पर बताये कि निम्नलिखित मुद्दों पर उन की राय क्या हैः-

  1. इनकम टैक्स कमिश्नर रहते हुए उन्हों ने कितने भ्रष्ट नेताओं को बेनकाब किया।
  2. उन की पत्नी पिछले दो दशकों से दिल्ली में ही असिस्टेन्ट इंकमटेक्स कमिश्नर के पद पर किन कारणों से तैनात रही हैं।
  3. काशमीर समस्या के समाधान के लिये उन की तथा उन की पार्टी की सोच क्या है।
  4. अयोध्या में राम जन्म भूमी विवाद के बारे में उन की पार्टी की सोच क्या है।
  5. बटला हाउस इनकाउंटर में शहीद मोहनचंद्र शर्मा के बारे क्या सोचते है।
  6. माओवादी नेता बिनायक सेन को AAP की कोर कमेटी में क्या काम दिया गया है।
  7. इमाम बुखारी के खिलाफ दर्जनों अरेस्ट वारंट है, उसके साथ अपने सम्बन्ध के बारे में क्या कहना है।
  8. कृषि घोटाला में शरद पवार के नाम पर चुप्पी क्यों साध रखी है।
  9. अनशन के दौरान, भारत माता की तस्वीर क्यों हटाई गयी थी।
  10. लोकपाल जैसी संस्था में योग्यता के बजाये आरक्षण क्यों होना चाहिये।

य़ह केवल वही प्रश्न हैं जिन का सम्बन्ध दिल्ली चुनावों से है। केजरीवाल के लिये यह केवल लिट्मस टेस्ट है कि पार्टी अध्यक्ष के नाते इन का उत्तर दें। इन बातों को केवल कुछ सदस्यों की निजि राय कह कर दर किनार नहीं किया जा सकता। कोई भी भीड चाहे कितनी भी जोश से भरी हो वह होश का स्थान नहीं ले सकती। अगर वास्तव में केजरीवाल भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते हैं तो पहले सभी भ्रष्टाचारी विरोधियों के साथ ऐक जुट हो कर भारत को काँघ्रेस मुक्त करें क्यों की काँग्रेस ही भ्रष्टाचार का वट वृक्ष है। काँग्रेस की तुलना में बी जे पी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारतीय संस्कृति का वट वृक्ष है। अगर उन में कुछ भ्रष्टाचार है तो उस से बाद में निपटा जा सकता है।

चाँद शर्मा

सम्मान और पहचान


बच्चे पैदा करना, खाना, पीना, सुरक्षित और आराम से रहना – यह सभी काम जानवर भी करते हैं। इन सब ‘सहूलतों’ को हम ‘विकास’ या ‘सुशासन’ भी कह सकते हैं। इन के अतिरिक्त मानवों को जो बातें जानवरों से अलग करती है वह है अपना ‘सम्मान’ और अपनी ‘पहचान’।

निजि पहचान’ धर्म से होती है जो जन्म से पहले ही माता-पिता की निजि पहचान से जुडा रहता है। धर्म के अनुसार ही मानवों का नाम रखा जाता है जो जीवन पर्यन्त चलता है। रीति रिवाज, खान पान निर्धारित होता है, जीवन की मर्यादायें, कर्तव्य और अधिकार, अच्छे – बुरे का अन्तर विरासत में प्राप्त होता है। धार्मिक पहचान मृत्यु के पश्चात भी अचल रहती है क्यों कि दाह संस्कार और मरणोपरान्त की सभी रस्में अगली पीढियां धर्मानुसार ही निभाती हैं।

‘सम्मान’ नागरिकता के साथ जुडा होता है। सरकार तथा दूसरे नागरिकों की तुलना में किसी को क्या अधिकार या कर्तव्यों का पालन करना है यह नागरिक्ता के साथ जुडा विषय है। किसी अन्य देश की नागरिक्ता प्रप्त होने पर धर्म की पहचान तो वही रहती है परन्तु अधिकार और कर्तव्य नये देश के नियमों के अनुसार बदल जाते हैं।

जहाँ तक हिन्दूओं के सम्मान की बात है तो विभाजन के बाद कांग्रेस और सैकूलर पंथियों ने हमें तीसरे या चौथे दर्जे का नागरिक बना डाला है। हिन्दूओं की तुलना में दूसरे धर्म वालों को  सर्वोच्च अधिकार और सुविधायें प्राप्त हैं। अगर ऐक मुस्लिम दुर्घटना में मर जाये तो मुआवजा 15 से पचास लाख तक मिलता है लेकिन अगर कोई हिन्दू ड्यूटी पर भी मर जाये तो मुआवजा सिर्फ पांच लाख तक सीमित हो जाता है। यह केवल ऐक उदाहरण है। भारत में अब हिन्दूओं की सब से बडी जिम्मेदारी अल्पसंख्यकों को खुश रखने की है।

हिन्दूओं की पहचान के सभी चिन्ह ऐक के बाद ऐक तेजी से मिटाये जा रहै हैं। हिन्दू कानूनों में सरकारी दखलअन्दाजी, मन्दिरों की सम्पति पर सरकारी या अल्प संख्यकों के कबजे, हिन्दू मर्यादाओं का सरकारी बहिष्कार तथा उपहास, हिन्दू साधू-संतों का तिरस्कार आदि इसी के कुछ जवलन्त उदाहरण हैं।

अब देश की हिन्दू जनता को 2014 के चुनाव में फैसला करना है कि ‘विकास’ और ‘सुशासन’ का खोखला धर्म निर्पेक्ष ‘कांग्रेसी जीवन’ जानवरों की तरह से जीना है या सम्मान और अपनी पहचान के अनुसार ‘मानवी हिन्दू जीवन’ जीना है।

अब वक्त है अपने और अपने पूर्वजों के सम्मान और पहचान की खातिर हाथ में मतपत्र लेकर ऐकजुट हो जाओ वर्ना तुम्हारी दास्तां भी ना होगी दास्तानों में।

चाँद शर्मा

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