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मिलावटी इतिहास क्यों


आजकल  टी वी पर कुछ नाम-मात्र ‘ऐतिहासिक’ सीरयल दिखाये जा रहै हैं जिन का मुख्य अभिप्राय अपने देश के लोक प्रिय नायकों की जीवनियों से छेड़ छाड़ कर के पैसा कमाना है। हालांकि अफवाहें फैलाना जुर्म है, मगर इन सीरियलों को निर्माता देश की नयी पीढी को गुमराह कर के देश द्रोह कर रहै हैं और हम अपने नायकों का अपमान देख देख कर अपना टाईम-पास कर रहै हैं।

अपनी बनावटी ‘इमानदारी’ दिखा कर कानूनी शिकंजे से बचने के लिये, निर्माता टेलीकास्ट के आरम्भ में ऐक छोटा सा ‘नोटिस’ लिख देते हैं कि – ‘यह सीरियल ऐतिहासिक होने का दावा नहीं करता और मनोरंजन के लिये इस में नाटकीय बदलाव किये गये हैं।’ जितनी देर में ऐक सामान्य आदमी किसी नोटिस को आराम से पढ सकता है उस से डेढ गुणा समय ज्यादा वह नोटिस टेलिकास्ट होना चाहिये, लेकिन जानबूझ कर यह औपचारिक नोटिस सक्रीन पर छोटी सी लिखावट में कुछ ही सैकिंड दिखाया जाता है ताकि उसे कोई पढ़ ही ना सके।

कलात्मिक दृष्टिकोण से इन सीरियलों का स्तर बहुत ही घटिया है। वास्तव में सभी सीरियल आजकल भडकीले कास्टयूम की माडलिंग ही करवा रहै हैं जिन का उस समय की वेष भूषा से कोई सम्बन्ध नहीं। वर्षों बीत जाने के बाद भी किसी पात्र में ‘बढती उमर’ का कोई प्रभाव ही दिखाई नहीं देता।

पाशर्व-संगीत का शौर इतना ज्यादा होता है कि संवाद सुनाई ही नहीं पडते क्योंकि लगातार कुछ ना कुछ ‘बजता’ ही रहता है। सब से सस्ता काम होता है किसी ‘सनैर-डर्म’ वाले को बैठा दिया जाता है और वह मतलब बेमतलब हर संवाद के अन्त में अपने डर्म पर चोट मारता रहता है। बीच बीच में अगर ज्यादा प्रभाव देना हो तो ‘सनैर-डर्म’ पर ही ऐक ‘रोल’ बजा देता है। थोडी बहुत चीं-पौं के स्वर कभी कभी दूसरे इन्स्ट्रूमेनट से भी सुना दिये जाये। दिन हो या रात, अन्दर हों या बाहर, सीन और भाव चाहे कैसे भी हों – सरकस की तरह लगातार ऐक ही तरह का शौरमयी ‘संगीत’ गूंजता रहता है। इन निकम्मे संगीत निर्देशकों को चाहिये कि कभी मुगले आजम (नौशाद) और आम्रपाली (शंकर जयकिशन) जैसी फिल्मों से सीखें कि ऐतिहासिक वातावरण का पार्शव संगीत कैसा होता है।

इन सभी सीरियलों में ऐक समानता देखने को मिले गी। ऐतिहासिक नायक (या नायका) को बचपन से ही उछल-कूद तरह की बाजीगिरी में दक्षता हासिल होती है। घोडे पर तलवार बाजी करना, ऊंची इमारतों से छलांगे लगाना, और अकेले ही दरजनों विरोधियों को परास्त करना आदि तो उन के लिये मामूली बातें हैं मगर अपने साथ होने वाले षटयंत्रों के विषय में वह नितान्त मूर्ख बने रहते हैं। उन में साधारण सूझ बूझ भी नहीं होती। उन के परिवार में पिता आम तौर पर ऊपर से अडियल और कडक, परन्तु अन्दर से ‘लाचार’ होता है और सौतेली मातायें या प्रेमिकायें नायक-नायका के खिलाफ हर तरह के षटयंत्र रचती रहती हैं जिन में से नायक नायका हर ऐपीसोड में किस्मत के भरोसे बाल बाल बचते रहते हैं।

इस तरह के ‘ऐतिहासिक’ सीरयल आजकल सालों साल चलते रहते हैं। जिस मुख्य ऐतिहासिक घटना के साथ नायक नायका की पहचान होती है उसे दिखाये जाने से पहले ही अचानक सीरियल समाप्त हो जाते है क्यों कि तब तक सिक्रिपट काफी दिशा हीन हो चुका होता है और दर्शकों को उस नायक नायका की जीवनी में कोई दिलचस्पी ही नहीं रहती। ऐतिहासिक तौर पर जो पात्र कभी आपस सें मिले ही नहीं थे, जिन्हों ने कभी अपने विरोधी को प्रत्यक्ष रूप में कभी देखा ही नहीं था उन के बीच में चटपटे कटाक्षी वार्तालाप इन सीरियलों का मुख्य आकर्षण बना दिये जाते है – क्योंकि दर्शकों को पहले ही बताया जा चुका है कि जिसे वह अपना इतिहास समझ रहै हैं उस के साथ तो मनोरंजन के लिये खिलवाड किया जा रहा है।

अगर आप के दिल में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान है तो ज़रा सोचिये, ऐसा जान बूझ कर क्यों किया जा रहा है? क्या जानबूझ कर हमारी आगामी पीढियों को देश के इतिहास से विमुख करने की चेष्टा हो रही है? हमारे मानव संसाधन-विकास मन्त्री क्या सो रही हैं या उन्हें इतिहास की जानकारी ही नहीं? दिखाई गयी पटकथा के बारे में निर्माताओं से ऐतिहासिक प्रमाण क्यों नहीं मांगे जाते? क्या हम हिन्दुस्तानियों में मनोरंजन की भूख आजकल इतनी ज्यादा बढ चुकी है कि हम घटिया से घटिया कुछ भी बकवास सहने के लिये तैयार हैं?

चांद शर्मा

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