हिन्दू धर्म वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष में

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सुधारक, निन्दक या सहायक


 

सोशल मीडिया में प्रखर ज्ञानियों के कुछ कमेन्ट्स पढ कर केवल औपचारिकता के नाते केवल अपने विचार लिख रहा हूँ। यह किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं मेरे निजि विचार हैं अगर किसी को तर्क-संगत ना लगे, तो ना आगे पढें और ना मानें। मेरे पास केवल ऐक साधारण व्यक्ति का दिमाग़ है, पहिरावा और साधन हैं और मैं जो कुछ साधारण बुद्धि से समझता हूँ वही दूसरों के साथ कई बार बाँट लेता हूँ। किसी दूसरे को सुधारने या बिगाडने का मेरा कोई लक्ष्य नहीं है।

सामान्य भौतिक ज्ञान

भौतिक शास्त्र के सामान्य ज्ञान के अनुसार सृष्टि की रचना अणुओं से हुई है जो शक्ति से परिपूर्ण हैं और सदा ही स्वाचालति रहते हैं। वह निरन्तर एक दूसरे से संघर्ष करते रहते हैं। आपस में जुड़ते हैं, और फिर कई बार बिखरते-जुड़ते रहते हैं। जुड़ने–बिखरने की परिक्रिया से वही अणु-कण भिन्न भिन्न रूप धारण कर के प्रगट होते हैं तथा पुनः विलीन होते रहते हैं। जिस प्रकार प्रिज़म के भीतर रखे काँच के रंगीन टुकड़े प्रिज़म के घुमाने से नये नये आकार बनाते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक बार अणुओं के बिखरने और जुड़ने से सृष्टि में भी सृजन–विसर्जन का क्रम चलता रहता है। पर्वत झीलें, महासागर, पशु-पक्षी, तथा मानव उन्हीं अणुकणों के भिन्न-भिन्न रूप हैं। सृष्टि में जीवन इसी प्रकार अनादि काल से चल रहा है।

जीवत प्राणी

हर जीवित प्राणी में भोजन पाने की, फलने फूलने की, गतिशील रहने की, अपने जैसे को जन्म देने की तथा संवेदनशील रहने की क्षमता होती है। सभी जीवत प्राणी जैसे कि पैड़-पौधे, पशु-पक्षी भोजन लेते हैं, उन के पत्ते झड़ते हैं, वह फल देते हैं, मरते हैं और पुनः जीवन भी पाते हैं। पशु-पक्षियों, जलचरों तथा मानवों का जीवन भी वातावरण पर आधारित है। यह प्रतिकूल वातावरण से अनुकूल वातावरण में अपने आप स्थानान्तरण कर सकते हैं। अपने–आप को वातावरण के अनुसार थोड़ा बहुत ढाल सकते हैं। मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो ना केवल अपने आप को वातावरण के अनुरूप ढाल सकता है अपितु वातावरण को भी परिवर्तित करने की क्षमता प्राप्त कर चुका है। कई प्रकार के वैज्ञियानिक आविष्कारों दुआरा मानव वातावरण को नियन्त्रित कर चुका है।

जीवन-आत्मा

जीवन आत्मा के बल पर चलता है। आत्मा ही हर प्राणी की देह का संचालन करती है। जिस प्रकार बिजली कई प्रकार के उपकरणों को ऊरजा प्रदान कर के उपकरणों की बनावट के अनुसार विभिन्न प्रकार की क्रियायें करवाती है उसी प्रकार आत्मा हर प्राणी की शारीरिक क्षमता के अनुसार भिन्न भिन्न क्रियायें करवाती है। जिस प्रकार बिजली एयर कण्डिशनर में वातावरण को ठंडा करती है, माइक्रोवेव को गर्म करती है, कैमरे से चित्र खेंचती है, टेप-रिकार्डर से ध्वनि अंकलन करती है, बल्ब से रोशनी करती है तथा करंट से हत्या भी कर सकती है – उसी प्रकार आत्मा भिन्न-भिन्न शरीरों से भिन्न-भिन्न क्रियायें करवाती है। बिजली काट देने के पशचात जैसे सभी उपकरण  अपनी-अपनी चमक-दमक रहने का बावजूद निष्क्रिय हो जाते हैं उसी प्रकार शरीर से आत्मा निकल जाने पर शरीर निष्प्राण हो जाता है।

ऐकता और भिन्नता

हम कई उपकरणों को एक साथ एक ही स्त्रोत से बिजली प्रदान कर सकते हैं और सभी उपकरण अलग अलग तरह की क्रियायें करते हैं। उसी प्रकार सभी प्राणियों में आत्मा का स्त्रोत्र भी ऐक है और सभी आत्मायें भी ऐक जैसी ही है, परन्तु वह भिन्न-भिन्न शरीरों से भिन्न-भिन्न क्रियायें करवाती है। आत्मा शेर के शरीर में हिंसा करवाती है और गाय के शरीर में दूध देती है, पक्षी के शरीर में उड़ती है तथा साँप के शरीर में रेंगती है। इसी प्रकार मानव शरीर में स्थित आत्मा केंचुऐ के शरीर की आत्मा से अधिक प्रभावशाली है। आत्मा के शरीर छोड़ जाने पर सभी प्रकार के शरीर मृत हो जाते हैं और सड़ने गलने लगते हैं। आत्मिक विचार से सभी प्राणी समान हैं किन्तु शरीरिक विचार से उन में भिन्नता है।

कण-कण में ईश्वर

इन समानताओं के आधार पर निस्सन्देह सभी प्राणियों का सृजनकर्ता कोई एक ही है क्योंकि सभी प्राणियों में ऐक ही सृजनकर्ता की छवि का प्रत्यक्ष आभास होता है। थोड़ी बहुत विभिन्नता तो केवल शरीरों में ही है। सभी प्राणियों में ऐक ही सर्जन कर्ता की छवि निहारना तथा सभी प्रणियों को समान समझना ऐक वैज्ञिानिक तथ्य है अन्धविशवास नहीं और यह सिद्धान्त वेदों के प्रकट होने से भी पूर्व आदि-वासियों को पता था जो प्राकृति के अंगों में भी, ईश्वर को कण-कण में अनुभव करते थे और इन में मानवों से लेकर चूहे तक सभी शामिल हैं। स्नातन धर्म की शुरुआत यहीं से हुयी है।

ईश्वर की मानवी परिभाषा

ईश्वरीय शक्तियों को मानवी परिभाषा में सीमित नहीं किया जा सकता। उन के बारे में अभी विज्ञान भी बहुत कुछ नहीं जानता। जिस दिन विज्ञान या कोई महाऋषि जिन में स्वामी दयानन्द भी शामिल हैं ईश्वर को अपनी परिभाषा में बान्ध सके गे उसी दिन ईश्वर सीमित हो कर ईश्वर नहीं रहै गा। ईश्वर की शक्तियों के कुछ अंशों को ही जाना जा सकता है जैसे अन्धे आदमियों ने हाथी को पहचाना था। ईशवर अनादी तथा अनन्त है और वैसे ही रहै गा। यही सब से बडा सत्य है।

समुद्र के जल में आथाह शक्ति होती है। बड़े से बड़े जहाज़ों को डुबो सकता है। लेकिन अगर उस जल को किसी लोटे में भर दिया जाये तो उस जल में भी समुद्री जल के सभी गुण विधमान होंते हैं लेकिन लोटे में रखा जल में जहाज़ को डुबोने की शक्ति नहीं हो गी । अगर उस जल को वापिस समुद्र में डाल दिया जाये तो फिर से जहाज़ों को डुबोने की शक्ति उस जल को भी प्राप्त हो जाये गी। यह बात भी पूर्णत्या वैज्ञानिक सत्य है।

मूर्ति की आवश्यक्ता

जैसे समुद्र के जल की सभी समुद्रिक विशेषतायें लोटे के जल में भी होती हैं उसी तरह चूहे में भी ईश्वरीय विशेषतायें होना स्वाभाविक है। लेकिन वह परिपूर्ण नहीं है और वह ईश्वर का रूप नहीं ले सकता। आप निराकार वायु और आकाश को देख नहीं सकते लेकिन अगर उन में पृथ्वी तत्व का अंश ‘रंग’ मिला दिया जाये तो वह साकार रूप से प्रगट हो सकते हैं । यह साधारण भौतिक ज्ञान है जिसे समझा और समझाया जा सकता है। आम की या ईश्वर की विशेषतायें बता का बच्चे और मुझ जैसे अज्ञानी को समझाया नहीं जा सकता लेकिन अगर उसे मिट्टी का खिलोना या माडल बना की दिखा दिया जाये तो किसी को भी मूल-पाठ सिखा कर महा-ज्ञानी बनाया जा सकता है। इस लिये मैं मूर्ति निहारने या उस की पूजा करने में भी कोई बुराई नहीं समझता। मूर्तियों का विरोध करना ही जिहादी मानसिक्ता है।

तर्क और आस्था

जहां तर्क समाप्त होता है वहीं से आस्था का जन्म होता है। जहां आस्था में तर्क आ जाये वहीं पर आस्था समाप्त हो जाती है और विज्ञान शुरु हो जाता है। दोनो गोलाकार के दो सिरे हैं। हम जीवन में 99 प्रतिशत काम आस्थाओं के आधार पर ही करते हैं और केवल 1 प्रतिशत तर्क पर करते हैं। माता-पिता की पहचान भी आस्था पर होती है। कोई भी व्यक्ति अपना DNA टेस्ट करवा कर माता पिता की पहचान सिद्ध नहीं करवाता। सूर्य की पेन्टिगं पर ‘ओइम’ लिख कर उसे अपना झण्डा बना लेना आर्य समाज की आस्था है, जो किसी वैज्ञानिक तर्क पर आधारित नहीं है, ऐक तरह का असत्य, और मूर्ति पूजा ही है।  लेकिन अपनी आस्था का आदर तर्कशास्त्री आर्य समाजी भी करते हैं।

हिन्दू-ऐकता

आर्य-समाजी संगठन ने मूर्ति पूजा को तालिबानी तरीके का ऐक मुद्दा बना कर हिन्दू-ऐकता को कमजोर किया है। आज स्नातनी-मन्दिर और आर्य-समाजी मन्दिर अलग अलग बने दिखाई देते हैं। मेरा निजि मानना है कि वैदिक धर्म और सनातन धर्म ऐक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वैदिक धर्म वैज्ञानिक बातों को शुष्क तरीके से ज्ञानियों के लिये समझाता है तो सनातन धर्म उन्हीं बातों को आस्थाओं में बदल कर दैनिक जीवन की सरल दिनचर्या बना देता हैं। दोनों ऐक दूसरे के पूरक हैं। आम के चित्र से बच्चे को आम की पहचान करवाना अधर्म या मूर्खता नहीं इसी तरह किसी चित्र से भगवान के स्वरूप को समझने में भी कोई बुराई नहीं वह केवल ट्रेनिंग ऐड है। बिना चित्रों के तो विज्ञान की पुस्तक भी बोरिंग होती है। आप अपने घर में अतिथियों को अपनेविवाह और जन्म दिन की ऐलबम दिखाते हो तो क्या वह सभी ‘असत्य ’ होता है?

भगवान राम ने भी रामेश्वरम पर शिवलिंग स्थापित कर के मूर्ति पूजा करी थी। तो क्या भगवान राम आर्य नहीं थे? कोई भी स्नातनी हिन्दू आर्य-समाजियों को मूर्ति पूजा के लिये बाध्य नहीं करता। लेकिन जिस तरह घरों में आर्य-समाजी अपने माता-पिता की तसवीरें लगाते हैं स्वामी दयानन्द सरसवती के चित्र लगाते हैं उसी तरह शिव, राम, और कृष्ण के चित्र भी लगा दें तो सारा हिन्दू समाज ऐक हो जाये गा। सभी स्नातनी हिन्दू आर्य हैं और वेदों, उपनिष्दों, रामायण, महाभारत, दर्शन शास्त्रों और पुराणों को लिखने वाले सभी ऋषि आर्य थे। आर्य-समाजी नहीं थे। आर्य-समाज तो ऐक संगठन का नाम है।

आर्य समाजी सुधारक

हर आर्य-समाजी अपने आप को स्नातन धर्म का ‘सुधारक’ समझता है चाहे उस ने वेदों की पुस्तक की शक्ल भी ना देखी हो। आधे से ज्यादा आर्य समाजियों ने तो ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ भी नहीं पढा होगा। जरूरत है आर्य समाजी अपनी तालिबानी मानसिक्ता पर दोबारा विचार करेँ। आर्य समाजी कहते हैं ‘जर्मन और अंग्रेज़ों ने हमारे वेद पढ कर सारी प्रगति करी है। वैज्ञानिक अविष्कार किये हैं।’ चलो – यह बात तो ठीक है। उन्हों ने हमारे ग्रंथ पढ कर और रिसर्च करी, मेहनत करी और अविष्कार किये। अब आर्य समाजी यह बताये कि उन्हों ने अपने ग्रंथ पढ कर कौन-कौन से अविष्कार किये हैं। स्वामी दयानन्द ने उन्हें वेदों का महत्व बता दिया फिर आर्य समाजी किसी ऐक अविष्कार का नाम तो बताये। अगर नहीं करे तो क्यों नहीं करे?  क्या उस के लिये भी जर्मन, अंग्रेज़ या स्नातनी हिन्दू कसूरवार हैं? दूसरों को कोसते रहने से क्या मिला? आर्य समाजी कभी स्नातनी हिन्दूओं को कभी जैनियों – बौधों और सिखों का विरोध कर के हिन्दू ऐकता को  खण्डित करने के इलावा और क्या करते रहै हैं? दूसरों की ग़लतियां निकालने के इलावा इन्हों ने और क्या किया है – वह बताने का प्रयास क्यों नहीं करते?

हम ने अकसर आर्य समाजियों को स्नातनी विदूवानों को पाखणडी या मिथ्याचारी कहते ही सुना है। आर्य समाजियों के लिये अब चुनौती है कि दूसरों की निन्दा करते रहने के बजाये अब वह अपने वैदिक ज्ञान का पूरा लाभ उठाये और ‘मेक इन इण्डिया’ की अग्रिम पंकित में अपना स्थान बनाये। आस्था का दूसरा नाम दृढ़ निश्चय होता है। आप किसी भी मूर्ति, वस्तु, स्थान, व्यक्ति, गुरु के साथ आस्था जोड कर मेहनत करने लग जाईये सफलता मिले गी। वैज्ञानिक की आस्था अपने आत्म विशवास और सिखाये गये तथ्यों पर होती है। वह प्रयत्न करता रहता है और अन्त में अविष्कार कर दिखाता है।

जिहादी मानसिक्ता

किसी हिन्दू को अपने आप को आर्य कहने के लिये आर्य समाज से प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं। सभी हिन्दू आर्य हैं और सभी आर्य हिन्दू हैं। फिर आर्य समाज ने दोनो के बीच में अन्तर क्यों डाल रखा है।  स्नातन धर्म ने तो स्वामी दयानन्द को महर्षि कह कर ही सम्बोधित किया है। लेकिन यह समझ लेना कि स्वामी दयानन्द सर्वज्ञ थे और उन में कोई त्रुटि नहीं थी उसी इस्लामी मानसिक्ता की तरह है जैसे मुहम्मद के बाद कोई अन्य पैग़म्बर नहीं हो सकता।

अधाकांश आर्य समाजियों के मूहँ से वेदिक ज्ञान कम और दूसरों के प्रति आलोचनायें, निन्दा, गालियां ही अधिक निकलती हैं जैसे सत्य समझने – समझाने का लाईसेंस केवल उन्हीं के पास है। सत्य की खोज के बहाने सभी जगह वह यही खोजने में लगे रहते हैं हर धर्म घटक में गन्दगी कहाँ पर है। इसे सत्य की खोज तो बिलकुल ही नहीं कहा जा सकता।

चुनौती

कुछ करना है तो आर्य समाजियों को युवाओं में नैतिकता का पाठ पढाने की चुनौती स्वीकार करनी चाहिये। लव-जिहाद, लिव-इन-रिलेशस, वेलेन्टाईन-डे, न्यू-इयर-डे, आतंकवादियों आदि की विकृतियों को भारत में फैलने से रोकने के लिये क्या करना चाहिये, उस पर विचार कर के किसी नीति को सफलता से अपनाये और सक्षम कर के दिखायें।

बच्चों और युवाओं को वेद-ज्ञान, संस्कृत भाषा का आसान तरीके से ज्ञान का पाठ्य क्रम तैय्यार कर के ऐसा साहित्य तैय्यार करें ताकि वह ‘जेक ऐण्ड जिल’ को भूल कर भारतीयता अपनायें और साथ ही साथ ज्ञान भी हासिल करें। ज्ञान का अर्थ कुछ मंत्र रटा कर तोते की तरह बुलवाना नहीं होता, बल्कि ज्ञान को इस्तेमाल कर के वह अपनी जीविका इज्जत के साथ कमा सकें। युवाओं को व्यकतित्व विकास की शिक्षा आधुनिक तकनीक के साथ लेकिन भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुरूप किस प्रकार दी जाये इस को क्रियात्मिक रूप देना चाहिये। व्यकतित्व ऐसा होना चाहिये जो दुनियां के किसी भी वातावरण में आत्म विश्वास और दक्षता के साथ आधुनिक उपकरणों के साथ काम कर सके। ऐसा व्यकतित्व नहीं बने कि वह केवल दूर-दराज गाँव में छिप कर, या दोचार भजन गा कर ही अपनी जीविका कमाने लायक ही बन पायें।

किसी प्रकार का साफ्टवेयर या हार्डवेयर अपनी वैदिक योग्यता से सम्पूर्ण स्वदेश बनायें ताकि हमें बाहर से यह सामान ना मंगवाना पडे। हमारे पास इंजीनियर, तकनीशियन, प्रयोग-शालायें, अर्थ-शास्त्री आदि सभी कुछ तो है। अब क्यों नहीं हम वह सब कुछ कर सकते जो अंग्रेज़ों और जर्मनी वालों ने आज से 200 वर्ष पूर्व  “हमारी नकल मार के” कर दिखाया था। इस प्रकार के कई सकारात्मिक काम आर्य समाजी अब कर के दिखा सकते हैं। उन्हें चाहिये कि आम लोगों को प्रत्यक्ष प्रमाण दिखायें कि हमारा यह हमारा ज्ञान विदेशियों ने चुराया था, अब हमारे पास है जिस का इस्तेमाल कर के हम विश्व में अपनी जगह बना रहै हैं। रोक सको तो रोक लो। केवल मूर्ति पूजा का विरोध कर के और अपने वेदों का खोखला ढिंढोरा पीट कर आप विश्व में अपनी बात नहीं मनवा सकते। कुछ कर के दिखाने की चुनौती आर्य बन्धुओं, वेदान्तियों और प्रचारकों को स्वीकार करनी पडे गी।

सत्यं वदः – प्रियं वदः

बहस और शास्त्रार्थ में ना कोई जीता है और ना ही कोई जीते गा। मैं भारत की प्राचीन उपलब्धियों का पूर्ण समर्थन करता हूँ लेकिन लेकिन आर्य समाजी मानसिक्ता का नहीं। सत्य को कलात्मिक तरीके से कहना ही वैज्ञानिक कला है। ऐक नेत्र हीन को सूरदास कहता है तो दूसरा अन्धा – बस यही फर्क है। “सत्यं वदः – प्रियं वदः ” का वेद-मंत्र  आर्यसमाजी भूल चुके हैं। इस लिये किसी की आस्था का अपमान कर के सत्यवादी या सुधारक नहीं बन बैठना चाहिये। यही भूल स्वामी दयानन्द ने भी कर दी थी। अब उसी काम का टेन्डर आमिर खान ने भर दिया है और प्रोफिट कमा रहा है। जो कुछ बातें आर्य समाजी करते रहै हैं वही आमिर खान ने भी करी हैं जिस का समर्थन फेसबुक पर आर्य समाजी कर के हिन्दूओं का मज़ाक उडा रहै हैं। सोच कर देखो – दोनों में कोई फर्क नहीं।

मेरा लक्ष्य केवल अपने विचार को दूसरों के साथ शेयर करना है किसी को मजबूर करना या उन का सुधारक बनना नहीं है। मुझे भी अब आगे बहस नहीं करनी है। जो सहमत हों वही अपनी इच्छा करे तो मानें। वेदिक विचार और सनातनधर्म की आस्था दोनों ऐक ही सिक्के के पहलू हैं और दोनों बराबर हैं। किसी को भी अपने मूहँ मियां मिठ्ठू बन कर दूसरे का सुधारक बनने की जरूरत नहीं।

चाँद शर्मा

निर्धारित स्थान कम होने के कारण श्री वेदानुरागी जी की टिप्पणियों का उत्तर यहां दिया जा रहा हैः –

 

आप की टिप्पणियों के बारे में मैं केवल अपने विचारों को स्पष्ट कर रहा हूँ उन को मानना या ना मानना आप की मरज़ी है। आर्य-समाजी अपने वेदिक ज्ञान की चोरीका दोष दूसरों के सिर मढ़ते रहने के बजाये खुद कोई चमत्कारी अविष्कार कर के दिखायें तभी देश और वेदों का गौरव वास्तव में बढे गा।

भगवान की सारी परिभाषायें मानवों ने ही बनाई हैं। भगवान उन परिभाषाओं से परे भी हो सकते हैं जो आजतक बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और ऋषियों ने बनाई हैं। ईश्वर को देखने और दिखाने का दावा करने वाले सभी प्रवक्ता उन अन्धे आदमियों की तरह हैं जिन्हों ने हाथी को टटोल कर प्रमाणित कर दिया था। इस लिये यह कहना कि ईश्वर यह कर सकता है, वह नहीं कर सकता आदि बेकार की बातें हैं।

इस देश में हजारों ऋषि-मुनि हुये हैं जो स्वामी दयानन्द सरस्वती से भी अधिक विद्वान थे। उन सभी के ज्ञान को केवल सत्यार्थ-प्रकाश पढ कर पाखण्ड’, ‘असत्य, याअनर्गलबातें कहना, अपने आप को सभी का सुधारक बोल कर अपने मूहँ मियां मिठ्ठू बने रहना तालिबानी मानस्क्ता नहीं तो और क्या है? स्वामी दयानन्द ने अपने विचारों का ऐक थिसिस सत्यार्थ-प्रकाश लिखा है वह उन के व्यक्तिगत विचार थे। कोई भी स्नातक कुछ गिने-चुने विषयों में पारंगत हो सकता है, विश्वविधालय की सभी फैक्लटियों में पारंगत नहीं माना जाता। स्नातन धर्म के किसी भी प्राचीन ऋषि, या महऋषि ने सर्वज्ञ होने का दावा कभी नहीं किया।

आदि-मानव समस्त प्राकृतिक आपदाओं तथा उपलब्धियों का कारण अदृष्य शक्तियों को मानते थे। धीरे-धीरे आर्य समाज की स्थापना से सैंकडों वर्ष पूर्व स्नातन धर्म के ऋषि मुनियों ने अपने बौधिक ज्ञान की शक्ति से अदृष्य शक्तियों  को पहचाना तथा उन्हें प्राकृति के साथ जोड़ कर उन्हें देवी देवताओं की संज्ञा दे दी। ऋषि मुनियों ने अपनी कलपना को विज्ञान की कसौटी पर परखा और परमाणित भी किया है। उन के संकलित परिणाम वेद, पुराण, उपनिष्द तथा दर्शनशास्त्रों के रुप में संकलित किये गये हैं जिन्हें वेदिक-धर्म कहा जाता रहा है।

आर्यशब्द का प्रयोग श्रेष्ठ तथा सभ्यव्यक्ति के लिये किया जाता है भारत में बाहर से आने वालों को उन की सभ्यता और रहन सहन के अनुसार यवन, मलेच्छ, विधर्मी, दस्यु या अनार्य कह कर पहचाना जाता था।आर्य-समाजऐक संस्था का नाम है इसी संस्था के लोगों को आजकल आर्य-समाजीकहा जाता है। वास्तव में सभी स्नातन धर्मी आर्यहैं और सभी आर्यहिन्दू हैं। इस ऐकता को समझना चाहिये। उसी तरह आर्य-समाजियों के अपने आप को हिन्दू कहने में शर्माना नहीं चाहिये।

आदि काल से ही हिन्दू धर्म ईश्वर को निराकार तथा सर्वव्यापी मानता आया है किन्तु हिन्दू ईश्वर का आभास सृष्टि की सभी कृतियों में भी निहारते हैं। हिन्दू धर्म ने कुछ सार्थक चिन्हों, मूर्तियों तथा चित्रों को भी महत्व दे कर अपनाया है। भले ही चित्र यथार्थ में वस्तु नहीं है लेकिन चित्र बालक को वस्तु का यथार्थ रूप पहचानने और उस के गुण-दोषों को समझने में पूर्णत्या सहायक होते हैं।

जब आप कोई फिल्म देखते हैं तो फिल्म की कहानी, पात्र, दृष्य और सम्वाद सभी कुछ ‘असत्य’ है लेकिन फिर भी फिल्म के वातावरण के साथ अपनी भावनाओं को जोड कर दर्शक हँसते, रोते और भावुक हो जाते हैं। उसी तरह मन्दिर या किसी धर्म-स्थल के वातावरण में भक्त अपनी भावनाओं को जोड कर भगवान के प्रति समर्पित हो जाते हैं।

आराधक की भावनायें जब मूर्ति के साथ जुड़ जाती हैं तभी उसी प्रतिमा के अन्दर आराधक आराध्य का आभास महसूस कर सकता है। किसी भी विषय से सम्बन्धित अगर कोई ट्रैनिंग-ऐड नौसिखियों के इलावा अगर किसी विकसित के लिये भी इस्तेमाल कर दी जाये तो वह कोई बहुत बडा अपराध नहीं हो सकता। अगर कोई व्यस्क भी अपनी इच्छा से मूर्ति पूजा कर लें तो उस में कोई बुराई नहीं है।

आप का कथन “ईश्वर चूहे में है लेकिन चूहा ईश्वर नहीं है”- लेकिन चूहा भी उसी ईश्वर का अंश तो हैअगर आप किसी रंग-बिरंगे शीशों-जडित कमरे में खडे होकर अपना प्रतिबिम्ब देखें गे तो वह हर शीशे में टुकडे के रंग के अनुसार ही दिखाई दे गा। इस का अर्थ यह नहीं कि आप को ‘बांट’ दिया गया है। उसी तरह सृष्टिकर्ता भगवान का प्रतिबिम्ब भी हर क़ृति में है, जिस में चूहा भी शामिल है। भगवान की छवि चूहे या किसी भी छोटे-बडे जीव में निहार लेना भगवान को टुकडों में बांटना नहीं होता। उस के लिये फतवा जारी कर देना कि मूर्ति को ईश्वर मान कर उसकी पूजा करना आध्यात्मिक अपराध है केवल तालिबानी मानसिक्ता के सिवा और कुछ नहीं।

जिस तरह वायु सभी जगह मौजूद है परन्तु अदृष्य है, रंग या धूयें के माध्यम से प्रगट हो कर दिखाई दे देती है, उसी तरह ईश्वर भी सभी जगह मौजूद है मगर दिखाई नहीं देते। वह किसी भी स्थान पर किसी अन्य माध्यम से प्रगट होने का आभास दे सकते हैं। मैं ने चूहे की मूर्ति पूजा करने को नहीं कहा था लेकिन चूहे के कारण सभी मूर्तियों में भगवान का ना होने का फतवा देना भी ज्ञानयुक्त नहीं था।

अगर भगवान की मूर्ति से थोडा प्रसाद चूहे ने उठा लिया था तो भगवान क्या बालक मूलशंकर की शंका को समाप्त करने के लिये वहां चूहे को प्रसाद चुराने के अपराध में भस्म कर देते? अगर आप ही का अबोध ग्रैंडसन आप के खाने की प्लेट में से बिना पूछे कुछ उठा कर खा ले तो क्या आप उसे दण्ड दें गे?

अगर कोई अपनी आस्था किसी वस्तु में रखता है तो आप का क्या जाता है। आप उस पर बेकार नुक्ताचीनी मत करो। मूर्ति पूजा विरोधी तालिबानी ऐजेण्डा मत अपनाओ। हिन्दू समाज में राजनैतिक ऐकता लाने के लिये सब घटकों के साथ चलो। इस प्रकार का कथन कि “हम तो सभी के सुधारक हैं ” उद्दण्ड मानसिक्ता का प्रतीक है ।

आप ने लिखा है कि “आर्य समाज के विद्वान शोध कर नए साधन बनायेंगे लेकिन पहले उनके समुचित वेतन की व्यवस्था कर…अरब रुपया खर्च कर के एक शोध केंद्र बना कर दीजिये…गुरुकुल आर्य समाज के सब से ज्यादा हैं। ” अगर आप योरुप के वैज्ञानकों की जीवनियां पढें तो आप को पता चले गा कि उन में से किसी के पास सरकारी साधन नहीं थे। उन्हों ने पहले अपने सीमित साधनों के बल पर ही अपने प्रयासों को शुरु किया था। आविष्कार करने के लिये पहले उद्देश की कल्पना करनी पडती है फिर उस का चित्र बनता है। चित्र के अनुसार अविष्कार की मूर्ति (माडल) तैय्यार की जाती है। फिर माडल को साकार करने के लिये सीमित साधन, लग्न, आस्था, सकारात्मिक सोच और हिम्मत की जरूरत पडती है। शुष्क विज्ञान की जरूरत इस के बाद पडती है।

राईट बन्धु उडने की कल्पना कर के अपने जिस्म पर पक्षियों की तरह पंख लगा कर छत से कूद पडे थे। हिम्मत के सहारे काम करते रहै और ऐक दिन हवाई जहाज बन गया। योरुप के वैज्ञानिक हमारा वेदिक ज्ञान चुरा कर अविष्कार के बाद अविष्कार करते चले गये और हमारे स्वदेशी आर्य समाजी केवल मूर्ति विरोध को अपना ऐजेंडा बना कर आज भी वहीं खडे हैं।

जार्ज स्टीफ्नसन ने जब देगची के उबलते पानी में जब भाप की शक्ति को देखा तो पहले उस को प्रयोग में लाने के लिये कल्पना के सहारे चित्र बनाये जो आर्य-समाजी सोच के अनुसारअसत्यथे। ऐक बालक ने देगची के उबलते पानी में जब भाप की शक्ति को देखा तो उस ने अपनी इमेजिनेश्न, आस्था, सकारात्मिक वैज्ञानिक सोच और लग्न के सहारे स्टीम इंजन बना कर दिखा दिया।

चित्र का बनाना इस्लाम में भी अपराध है इस लिये आज तक किसी मुस्लिम ने भी कोई अविष्कार नहीं किया। शुष्क वेदिक ज्ञान होते हुये भी हमारे पास कल्पना की उडान, सक्रात्मिक सोच और हिम्मत नहीं थी इसी लिये आर्य-समाजी भी कोई अविष्कार नहीं कर सकते और केवल मूर्तियों के माडलों के बहिष्कार पर ही फतवा जारी करते रहै हैं।

आप का तर्क है कि “आपके पुराणों में लिखा है की गणेश जी का सर शिव जी ने हाथी के बच्चे का सर काट कर लगा दिया था तो आप क्या ऐसा कर के दिखा सकते हैं ? यदि नहीं तो कम से कम इस झूठी कहानी को तो नकार दीजिये” पुराणों में भी शुष्क वेदिक ज्ञान को कलात्मिक ढंग से समझाया गया है।

‘कनसेपेप्ट’ हमेशा काल्पनिक, और कई बार फूहड तथा हास्यस्पद भी होती है लेकिन जब लग्न और ‘टैक्नोलोजी’ के सहारे वह साकार हो उठती है तो उसे ही अविष्कार कहा जाता है। ‘कनसेपेप्ट’ दीर्घायु होती है मगर ‘टैक्नोलोजी’ तेज़ी से बदलती रहती है। पुराणों की कल्पना को आज के विज्ञान ने साकार कर के दिखा दिया है। अगर स्वामी जी के नीरस दिमाग़ में थोडी कलात्मिक कल्पना शक्ति भी होती तो उन्हों ने पुराणिक ज्ञान की निन्दा नहीं करनी थी। स्नातन धर्म हिन्दू विचारधारा का कलात्मिक पक्ष है जब कि वेदिक धर्म वैज्ञानिक पक्ष है – दोनो ऐक दूसरे के पूरक हैं। ऐक दूसरे के बिना अधूरे हैं।

पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं। प्राचीन काल में इतिहास, आख्यान, संहिता तथा पुराण को ऐक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता था। इतिहास लिखने का कोई रिवाज नहीं था पौराणिक कथायें इतिहास, साहित्य तथा दंत कथाओं का मिश्रण हैं। इतिहास की विक्षप्त श्रंखलाओं को पुनः जोड़ने के लिये हमें पुराणों तथा महाकाव्यों पर शोध करना होगा।

जिन संत कवियों के अंशो का सहारा आप ने लिया है वह ना तो वेदिक साहित्य के ज्ञाता थे और ना ही संस्क़त भाषा के सनात्क थे। जो कुछ उन के निजि विचार थे वह उन्हों ने अपभ्रंश भाषाओं में लिख डाले हैं। सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा कलात्मिक उन्नति के लिये उन्हें कीर्तिमान नहीं माना जा सकता। अगर में कहूँ कि ऐक कवि ने यह भी लिखा है “ तेरी सूरत में रब दिखता है यारा मैं क्या करूं? ” तो केवल इसी आधार पर आप मूर्ति पूजा करने लग जायें गे?

 

अय्याश मुस्लिम शाहजादों और शासकों के मनोरंजन के लिये श्री कृष्ण के बारें में कई मन घडन्त ‘छेड-छाड’ की अशलील कहानियाँ, चित्रों और गीतों का प्रसार भी हुआ था। लेकिन कृष्ण का महत्व कपडे और माखन चुराने या 16 हज़ार रानियां रखने के कारण नहीं है – गीता के ज्ञान के कारण है। दुर्भाग्य यह है कि आर्य-समाजी तो गीता और मनुस्मृति के भी विरोघी हैं।

 

रीति-रिवाज सामाजिक होते हैं, उन्हें समयानुसार बदला जा सकता है। शिक्षण संस्थानों के ध्वस्त हो जाने से हिन्दू अशिक्षित हो गये। कई कुरीतियों ने जन्म लिया था। हिन्दू दैनिक जीवन-यापन के लिये मुस्लमानों की तुलना में असमर्थ होने लगे थे। अपनी तथा परिवार की जीविका चलाने के लिये कई बुद्धि जीवियों ने साधारण पुरोहित बन कर कर्म-काँड का आश्रय लिया जिस के कारण हिन्दू समाज में दिखावटी रीति रिवाजों और पाखण्डों का चलन पड गया। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विवाह नहीं किया था इस लिये वह गृहस्थाश्रम की जिम्मेवारियों को नहीं समझते थे वरना रीति रीवाजो के लिये ब्राहमणों को दोषी ना बोलते। निर्वाह के लिये उन्हें समर्थ हिन्दूओं से दक्षिणा के बजाय दान और दया पर आश्रित होना पडा और यजमानों को रीति रीवाजों की आवश्यक्ता जताने के लिये ग्रन्थों में बेतुकी और मन घडन्त कथाओं को भी जोड दिया।

 

भारत में सती प्रथा बाहर से आयी है। उस का समर्थन हिन्दूओं ने कभी नहीं किया। यदि आप इस तथ्य को प्रमाणों के साथ जानना चाहें तो इस लिंक पर पढ सकते हैं जो विषय को संक्षिप्त रखने के लिये मैं यहां पर दोबारा नहीं लिख रहा हूँ।

 

आर्य-समाजी संगठन ने मूर्ति पूजा को तालिबानी तरीके का ऐक मुद्दा बना कर हिन्दू-ऐकता को कमजोर किया है। आज स्नातनी-मन्दिर और आर्य-समाजी मन्दिर अलग अलग बने दिखाई देते हैं। वैदिक धर्म वैज्ञानिक बातों को शुष्क तरीके से ज्ञानियों के लिये समझाता है तो सनातन धर्म उन्हीं बातों को आस्थाओं में बदल कर दैनिक जीवन की सरल दिनचर्या बना देता हैं। दोनों ऐक दूसरे के पूरक हैं।

हिन्दू समाज में महिलाओं के विशिष्ठ स्थान का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक हिन्दू देवता के साथ उस की पत्नी का नाम, चित्र, तथा प्रतिमा का भी वही महत्व  होता है जो देवता के लिये नियुक्त है। पत्नियों को देवी कह कर सम्बोधित किया जाता है। हिन्दूओं का धर्मान्तरण कराने के लिये अकसर कहा जाता है कि सती प्रथा की आड में हिन्दू विधवाओं को जीवित जला दिया जाता था तथा हिन्दू जन्म के समय ही कन्याओं का वध कर देते थे। दुष्प्रचार के प्रभाव तथा निजि अज्ञानता के कारण हिन्दू अपने आप को हीन समझ कर आज भी उन की हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं और अपने धर्म के प्रति शर्मिन्दा हो जाते हैं। वह नहीं जानते कि वास्तव में इन बातों का हिन्दू धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। तथ्य इस के विपरीत है। प्रमाण जानने के लिये कृप्या यह लिंक देख लें। http://wp.me/p2jmur-5J .

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49 – वीरता की प्रतियोग्यतायें


 स्नातन धर्म के सभी देवी देवता शस्त्र धारण करते हैं। युद्धाभ्यास केवल क्षत्रियों तक ही सीमित नहीं थे, अन्य वर्ग भी इस का प्रशिक्षण ले सकते थे। शस्त्र ज्ञान के क्षेत्र में महिलायें भी पुरुषों के समान ही निपुण थीं। ऋषि वात्सायन कृत काम-सूत्र में महिलाओं के लिये तलवार, छडी, धनुषबाण के साथ युद्धकलाभ्यास के लिये भी प्रोत्साहन दिया गया है।

युद्ध कला साहित्य

विज्ञान तथा कलाओं की भान्ति युद्ध कला तथा शस्त्राभ्यास का उद्गम भी वेद ही हैं। वेदों में अठारह ज्ञान तथा कलाओं के विषयों पर मौलिक ज्ञान अर्जित है। अग्नि पुराण का उपवेद ‘धनुर्वेद’ पूर्णत्या धनुर्विद्या को समर्पित है। अग्नि पुराण में धनुर्वेद के विषय में उल्लेख किया गया है कि उस में पाँच भाग इस प्रकार थेः-

  • यन्त्र-मुक्ता – अस्त्र-शस्त्र के उपकरण जैसे घनुष और बाण।
  • पाणि-मुक्ता – हाथ से फैंके जाने वाले अस्त्र जैसे कि भाला।
  • मुक्ता-मुक्ता – हाथ में पकड कर किन्तु अस्त्र की तरह प्रहार करने वाले शस्त्र जैसे कि  बर्छी, त्रिशूल आदि।
  • हस्त-शस्त्र – हाथ में पकड कर आघात करने वाले हथियार जैसे तलवार, गदा अदि।
  • बाहू-युद्ध – निशस्त्र हो कर युद्ध करना।

युद्ध कला परिशिक्षण

प्रथम शताब्दि में भी में युद्ध कला तथा शस्त्राभ्यास के विषयों पर संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे गये थे। आठवीं शताब्दी के उद्योत्ना कृत ग्रंथ ‘कुव्वालय-माला’ में कई कई युद्ध क्रीडाँओं का उल्लेख किया गया है जिन में धनुर्विद्या, तलवार, खंजर, छडियों, भालों तथा मुक्कों के प्रयोग से परिशिक्षण दिया जाता था।

शिक्षार्थियों की दक्षता आँकने के लिये प्रतिस्पर्धायें आयोजित करी जाती थीं। रामायण में राम दूारा शिव धनुष उठा कर अपनी शारीरिक क्षमता का प्रमाण देने का वृतान्त सर्व विदित है। महाभारत मे भी उल्लेख मिलते हैं जब गुरु द्रौणाचार्य ने  कौरव पाँडव राजकुमारों के लिये प्रतिस्पर्धायें आयोजित कीं थीं। सभी राजकुमारों को ऐक मिट्टी के बने पक्षी की आँख पर लक्ष्य साधना था जिस में केवल अर्जुन ही सफल हुआ था। इसी प्रकार उर्जुन नें द्रौप्दी के स्वयंबर के समय नीचे रखे तेल के कढाहे में देख कर ऊपर घूमती हुई मछली की आँख को बींध दिया था। ऐक अन्य महाभारत कालीन उल्लेख में निशस्त्र युद्ध कला का वर्णन है जिस में दो प्रतिदून्दी मुक्कों, लातों, उंगलियों तथा अपने शीश के आघातों से परस्पर युद्ध करते हैं।

निशस्त्र युद्धाभ्यास  – बाहु-युद्ध 

सुश्रुत लिखित सुश्रुत संहिता में मानव शरीर के 107 स्थलों का उल्लेख है जिन में से 49 अंग अति संवेदनशील बताये गये हैं। यदि उन पर घूंसे से या किसी अन्य वस्तु से आघात किया जाये तो मृत्यु हो सकती है। भारतीय शस्त्राभ्यास के समय उन स्थलों पर आघात करना तथा अपने आप को आघात से कैसे बचाना चाहिये सिखाया जाता था।  

लगभग 630 ईस्वी में पल्लवराज नरसिंह्म वर्मन ने कई पत्थर की प्रतिमायें लगवायीं थी जिन को निश्स्त्र अभ्यास करते समय अपने प्रतिदून्दी को निष्क्रय करते दर्शाया गया था।

युद्ध क्रीडा

कुश्ती को मल-युद्ध कहा जाता था। हनुमान, भीम, और कृष्ण के बडे भाई बलराम इस कला में निपुण थे। आज भी भारतीय खिलाडी उन्हीं में से किसी ऐक को अपना आराघ्य मान कर अभ्यास करते हैं।

प्रथम शताब्दी की बुद्ध धर्म की कृति ‘लोटस-सूत्र’ में भी मुक्केबाज़ी, मुष्टिका प्रहार, अंगों को जकडना तथा उठा कर फैंकने आदि के अभ्यासों का उल्लेख मिलता है।   

तीसरी शताब्दी में पतंजली योग सूत्र के कुछ अंश, तथा नट नृत्य कला की मुद्रायें भी युद्ध क्रीडाओं सें शामिल करी गयीं थीं।

प्राचीन काल से कलारिप्पयात, वज्र-मुष्ठि तथा गतका आदि कलायें युद्ध परिशिक्षण का अंग रही हैं।

कलारिप्पयात  

कलारिप्पयात विश्व का सर्व प्रथम युद्ध अभ्यास है। इस की शुरुआत केरल के चौला राजाओं के काल से हुयी। यह अति उग्र और भयानक कलाभ्यास है जिस में लात, घूंसों के आघातों से क्रमशः निरन्तर कठिन और उग्र शस्त्रों का प्रयोग भी किया जाता है। इस में खंजर, तलवार, भाले सभी कुछ प्रयोग किये जाते हैं तथा उन के अतिरिक्त ऐक अन्य भयानक शस्त्र धातु मे बना हुआ चाबुक भी प्रयोग में आता है। खंजर तीन धार वाले तथा अत्यन्त तीखे होते हैं। आघात मर्म स्थलों पर और वध करने की धारणा से किये जाते हैं।कलारिप्पयात  का मुख्य हथियार ऐक लचीली दो घारी तलवार होती है जिसे प्रतिस्पर्धी अपनी कमर पर लपेट कर रखते हैं। युद्ध के समय इसे हाथ में गोलाकार स्थिति में पकड कर रखा जाता है और फिर अचानक प्रतिदून्दी पर अघात किया जाता है। सावधान ना रहने की अवस्था में प्रतिस्पर्धी की मृत्यु निशचित है। यह विश्व भर में ऐक अनूठा शस्त्र है। इस कला का अभ्यास कडे नियमों तथा कुशल गुरू के सन्निध्य में किया जाता है। 

इस कला के शिक्षार्थी शिव और शक्ति को अपना आराध्य मानते हैं। बुद्ध धर्म के साथ साथकलारिप्पयात का प्रसार दूरगामी पूर्वी देशों में भी हुआ। बुद्ध प्रचारक दूरगामी देशों की यात्रा करते थे इस लिये दूसरे धर्म के हिंसक विरोधियों से अपनी सुरक्षा के लिये वह इस कला का प्रयोग भी सीखते थे।इस का प्रयोग केवल प्रतिरक्षा के लिये ही होता था अतः कलारिप्पयात कला बुद्ध धर्म की  अहिंसा की नीति के अनुकूल थी।

वज्र मुष्टि  

वज्रमुष्टि का अर्थ है इन्द्र के वज्र का समान मुष्टिका से प्रहार करना। क्षत्रियों को युद्ध में कई बार अपने वाहन और शस्त्रों के खो जाने के कारण निशस्त्र हो कर पैदल भी युद्ध करना पडता था। यद्धपि युद्ध के नियमानुसार निशस्त्र पर प्रहार करना नियम विरुद्ध था तथापि नियम का उल्लंघन करने वाले भी सभी जगह होते हैं। अतः कुटिल शत्रुओं से युद्ध की स्थिति में क्षत्रिय मल युद्ध तथा मुष्टिका प्रहारों से अपना बचाव करते थे। आघात तथा बचाव के विधान परम्परा गत पीढी दर पीढी सिखाये जाते थे।

वज्र मुष्टि का अभ्यास शान्ति काल में सीखा जाता था और सभी प्रकार के आक्रमण तथा बचाव के गुर सिखाये जाते थे। संस्कृत में उन्हें संस्कृत नट कहा जाता है। नट को जाग्रित करने की अध्यात्मिक  कला  कठिन परिश्रम, अनुशासन नियमों के पालन तथा ऐकाग्रता की साधना के पश्चात ही सम्भव थी। मुसलिमों के आगमन और अधिकरण के पश्चात इस कला के विशेषज्ञ मार दिये गये और यह समाप्त हो गयी। 1804 ईसवी में अँग्रेज़ों ने इस पर पूर्णत्या प्रतिबन्ध लगा दिया। 

गतका

गतका पंजाब का युद्ध कौशल है। यह दो अथवा चार टोलियों में खेला जाता है। प्रतिस्पर्धियों के पास बेंत, तलवार या खडग (खाँडा) आदि हथियार होते हैं तथा गोलाकार ढाल भी होता है। इस को योरुपीय तलवारबाज़ी की तरह ही खेला जाता है और इस कला में पँजाब के निहँग समुदाय की गतका बाजी अति लोकप्रिय प्रदर्शन है।

भारतीय युद्ध कलाओं का निर्यात

भारत के युद्ध कौशल क्रीडायें जैसे कि जूडो, सुम्मो मलयुद्ध बुद्ध प्रचारकों के साथ साथ चीन, जापान तथा अन्य पू्रवी देशों में प्रचिल्लत हुयीं। 

जापान की युद्ध कला सुमराई में भी कई विशेषतायें भारतीय संस्कृति से परिवर्तित हुईं जैसे कि तलवारों की पवित्रता, वीरगति की लालसा तथा अपने स्वामी के लिये प्राणों का बलिदान करने की भावना, मानव का प्राणायाम के माध्यम से पांच महाभूतों के साथ ऐकाकार करना आदि मानसिक्तायें भारत की उपज हैं। यदि मन और शरीर में ऐकाग्रता है तो शरार की क्षमतायें असीमित हो जाती हैं। इस सिद्धान्त को आधार मान कर बुद्ध धर्म के ऐक प्रचारक बौधिधर्म ने शाओलिन मन्दिर का निर्माण चीन में किया था जहां से युद्ध कलाओं की इस परम्परा की शुरुआत हुयी।

  • जूडो तथा कराटे खेल में ऐक शिक्षार्था तथा गुरु के सम्बन्ध भारत की गुरु शिष्य परम्परा के अनुकूल और प्रभावित हैं।
  • इसी प्रकार प्राणायाम के माध्यम से श्वास नियन्त्रण भी ताये क्वान दो कराते का प्रमुख अंश बन गया।

बोधि धर्मः

बोधिधर्म का जन्म कच्छीपुरम, तामिलनाडु के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 522 ईसवी में वह चीन के महाराज लियांग-नुति के दरबार में आया। उस ने चीन के मोंक्स को कलारिप्पयातकी कला का प्रशिक्षण दिया ताकि वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकें।  शीघ्र ही वह शिक्षार्थी इस कला के पारांगत हो गये जिसे कालान्तर शाओलिन मुष्टिका प्रतियोग्यता के नाम से पहचाना गया। बोधिधर्म ने जिस कला के साथ प्राणा पद्धति (चीं) को भी संलगित किया और उसी से आक्यूपंक्चर का समावेश भी हुआ। ईसा से 500 वर्ष पूर्व जब बुद्ध मत का प्रभाव भारत में फैला तो नटराज को  बुद्ध धर्म संरक्षक के रूप में पहचाना जाने लगा। उन का नया नामकरण नरायनादेव ( चीनी भाषा में  ना लो यन तिंय) पडा तथा उन्हें पूर्वी दिशा मण्डल के संरक्षक के तौर पर जाना जाता है।

वल्लमकली नाव स्पर्धा

केरल में वल्लमकली नाव स्पर्धा ऐक आकर्षक क्रीडा है जिस में सौ से अधिक नाविक ऐक साथ सागर में नौका दौड की प्रतियोग्यता में भाग लेते हैँ। इस के सम्बन्ध में ऐक रोचक कथा हैः 

चार सौ वर्ष पूर्व चन्दनवल्लम मुख्यता युद्ध में प्रयोग किये जाते थे। चन्दनवल्लम बनाने के लिये 20 से 30 लाख सिक्कों तक की लागत आती था और निर्माण में दो वर्ष से अधिक समय लगता था।  

चम्पाकेसरी प्रदेश के राजा ने अपने मुख्य नाव निर्माता को आदेश दिया कि वह ऐक ऐसी नाव का निर्माण करे जिस में ऐक सौ सिपाही  ऐक साथ नाव खेने का काम कर सकें। इस प्रकार की क्षमता प्राप्त कर के उस ने अपने प्रतिदून्दी कायामुखम के राजा को प्राजित किया।

प्राजित राजा ने गुप्तचर भेज कर चन्दनवल्लम के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाही। ऐक गुप्तचर नें नाविक की पुत्री को प्रेम जाल में फाँस कर उस की माता का स्नेह भी प्राप्त कर लिया। फलस्वरूप माँ-बेटी दोनो ने नाविक पर प्रभाव डाल कर उसे भेजे गये गुप्तचर को नाव निर्माण की कला सिखाने के लिये विवश कर दिया।

नाव निर्माण की कला सीखने के पश्चात अगले ही दिन गुप्तचर चुपचाप अपने प्रदेश चम्पाकेसरी चला गया। कायामुखम के राजा ने नाविक निर्माता को बन्दी बना कर कारागार में डाल दिया। परन्तु उसे शीघ्र ही रिहाई मिल गयी क्यों कि अगली लडाई में कायामुखम को पुनः प्राजय का मुहँ देखना पडा। पता चला कि नाविक ने केवल नाव बनाने की कला ही सिखाई थी परन्तु चन्दनवल्लम का वास्तविक ज्ञान नहीं दिया था।

वल्लमकली क्रीडा भिन्न भिन्न जातियों, धर्मों तथा प्रदेशों के लोगों को ऐक सूत्र में बाँधती है। नौका पर बैठे सभी शरीर ऐक साथ विजय लक्ष्य के सूत्र में बँध जाते हैं। आजकल भी यह नौका दौड पर्यटकों को आकर्षित करती है।

चाँद शर्मा

33 – सृष्टि का काल चक्र


आधुनिक वैज्ञानिक अब कहते हैं कि हमारी सृष्टि में अनगिनत ग्रह प्रति दिन पैदा हो रहे है और कई ग्रह अपना समय पूरा कर के विलीन हो रहै हैं – लेकिन हिन्दूग्रंथ तो आधुनिक वैज्ञानिकों से हजारों वर्षों पहले से ही कहते आ रहै हैं कि सृष्टि अनादि है – उस का कोई आरम्भ नहीं, सष्टि अनन्त है – उस का कोई अन्त भी नहीं। भारत के अंग्रेजी-प्रेमी शायद आज भी नहीं जानते कि केवल हिन्दू शास्त्रों के समय सम्बन्धी आँकडे ही आधुनिक वैज्ञानिक खगोल शास्त्रियों के आँकडों से मेल खाते हैं।

समय की गणना

आधुनिक वैज्ञानिक यह भी मानने लगे हैं कि सृष्टि के कालचक्र में ब्रह्मा का (यूनिवर्स) ऐक दिवस और रात्रि, पृथ्वी के एक दिवस और रात्रि के समय से 8.64 कोटि वर्षों बडी होती है। मनु स्मृति के प्रथम अध्याय में इस धरती के समय का विस्तरित उल्लेख किया गया है। आँख झपकने में जो समय लगता है उसे ऐक निमिष कहा गया है। निमिष के आधार पर समय तालिका इस प्रकार हैः-

  • 18 निमिष = ऐक कास्था
  • 30 कास्था = 1 कला
  • 30 कला = 1 महू्र्त
  • 30 महूर्त = अहोरात्र
  • 30 अहोरात्र = 1 मास

ऐक अहोरात्र को सूर्य कार्य करने के लिये दिन, तथा विश्राम करने के लिये रात्रि में विभाजित करता है। प्रत्येक मास के दो ‘पक्ष’ होते हैं जिन्हें ‘शुकल-पक्ष’ और ‘कृष्ण-पक्ष’ कहते हैं। पँद्रह दिन के शुकल पक्ष में चाँदनी रातें होती हैं तथा उतनी ही अवधि के कृष्ण पक्ष में अन्धेरी रातें होती हैं। सभी माप दण्डों का सरल आधार ‘30’ की संख्या है। यह समय विभाजन प्रत्यक्ष, वैज्ञानिक, और प्रकृति के अनुकूल है।

दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है जब सभी जीव अपने आप जाग जाते है। नदियों के जल में स्वच्छता और प्रवाह होता है, कमल खिलते है, ताज़ा हवा चल रही होती है तथा प्रकृति सभी को नये, शुद्ध वातावरण का आभास दे देती है। उसी प्रकार जब सूर्यास्त के साथ रात होती है, पशु पक्षी अपने आवास की ओर अपने आप लौट पडते हैं, नदियों का जल धीमी गति से बहने लगता है, फूल मुर्झा जाते है तथा प्रकृति सभी गति विधियां स्थागित करने का संकेत दे देती है। इन प्रत्यक्ष तथ्यों की तुलना में रोमन कैलेण्डर के अनुसार चाहे दिन हो या रात, 12 बजे जब तिथि बदलती है तो प्रकृति में कोई फेर बदल प्रत्यक्ष नहीं होता। सभी कुछ बनावटी और बासी होता है।

पाश्चात्य केलैण्डर

रोमन कैलेण्डर को जूलियस सीज़र ने रोम विजय के पश्चात ग्रैगेरियन कैलेण्डर के नाम से लागू करवाया था। इस कैलेण्डर का आज भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

वैसे तो ईसाई ऐक ईश्वर को मानने का दावा करते हैं और अधिक देवी देवताओं में विशवास करने के लिये हिन्दूओं का उपहास उडाते हैं। किन्तु उन के पास कोई जवाब नहीं कि उन्हों ने अपने दिनों तथा महीनों को देवी देवताओं के नामों से क्यों जोडा हुआ हैं। उन के सप्ताह में सन गाड का दिन – ‘सनडे’’ मून गाडेस का दिन – ‘मनडे, ट्यूज देवता का दिन – ‘ट्यूजडे, वुडन देवता का दिन – ‘वेडनेसडे, थोर देवता का दिन – ‘थर्सडे, फ्रिग्गा गाडेस का दिन – ‘फ्राईडे, तथा सैटर्न देवता का दिन – ‘सैटरडे होता है। वास्तव में सप्ताह के दिनों के नाम भी रोमन वासियों नें भारत से ही चुराये हैं क्यों कि हमारे पूर्वजों ने दिनों के नाम सौर मण्डल के ग्रहों पर रखे गये थे जैसे कि रविवार (सूर्य), सोमवार (चन्द्र), मंगलवार (मंगल), बुद्धवार (बुद्ध), बृहस्पतिवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र), और शनिवार (शनि)। क्योंकि बडी वस्तु को ‘गुरु’ कहा जाता है और छोटी को ‘लधु ’ – इसलिये बृहस्पतिवार को गुरुवार भी कहा जाता है। हमारे पूर्वजों को आधुनिक वैज्ञानिकों से बहुत पहले ही ज्ञात था कि बृहस्पति सौर मण्डल का सब से बडा ग्रह है।

पोर्तगीज भाषा में कैलैण्डर शब्द को ‘कालन्दर’ बोलते हैं जो संस्कृत के शब्द ‘कालन्तर’ (काल+अन्तर) का अपभृंश है। संस्कृत में कालन्तर उसी श्रेणी का शब्द है जैसे युगान्तर, मनवन्तर, कल्पान्तर आदि हैं। इन मापदण्डों का प्रयोग सौर मण्डल की काल गणना के लिये किया जाता है। रोमन कैलैण्डर के महीने सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर का स्त्रोत्र भी संस्कृत के क्रमशः सप्तमबर (सप्त+अम्बर), अष्टाम्बर, नवम्बर, तथा दशम्बर से है जिनका शब्दिक अर्थ सातवें, आठवें, नवमें और दसवें अम्बर (आसमान) से है।

अंग्रेजों का अपना कोई कैलैण्डर नहीं था और वह जूलियन कैलैण्डर  को इस्तेमाल करते थे जिस में या साल ‘मार्च’ के महीने से शुरु होता था। साल में केवल दस महीने ही होते थे। मार्च से गिनें तो सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें महीने ही बनते हैं। जैसे जैसे अंग्रेजों में वैज्ञानिक जागृति आई तो उन्हों ने 1750 में ग्रीगेरियन कैलैण्डर (रोमन कैलैण्डर) को सरकारी कैलैण्डर बनाया और समय गणना को नयी सीख अनुसार पूरा करने के लिये दो महीने ‘जनवरी’ और ‘फरवरी’ भी जोड दिये। परम्परागत जनवरी 31 दिन का था और फरवरी में कभी 28 और कभी 29 दिन होते थे जिस का वैज्ञानिक आधार कुछ नहीं था। पश्चात ब्रिटिश संसद ने अपना वर्ष को मार्च के बदले जनवरी 1772 से प्रारम्भ करना शुरू किया क्यों कि क्रिस्मस के बाद पहला महीना जनवरी आता था।

राशी चक्र की वैज्ञानिक्ता

पाश्चात्य कैलेण्डर की तुलना में भारत का विक्रमी कैलेण्डर पृथ्वी के सौर मण्डल पर आधारित और वैज्ञानिक है। हमारी पृथ्वी सू्र्य की परिक्रमा लगभग सवा तीन सौ पैंसठ दिन में करती है। ऋगवेद में अनगिनित ताराग्रहों का वर्णन है, जिन को विभाजित कर के पृथ्वी दूारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा के मार्ग का मानचित्र बनाया गया है। मार्ग की पहचान के लिये सितारों के दर्श्नीय फैलाव के अनुरूप, उन के काल्पनिक रेखा चित्र बना कर उन्हें आकृतियों से मिलाया गया है। प्रत्येक विभाग को किसी जन्तु या वस्तु की आकृति के आधार पर ऐक राशि का नाम दिया गया है। राशियों के भारतीय रेखा चित्र आज विश्व भर में ज़ोडियक साईन के नाम से जाने जाते है। केवल ज़ोडियक नामों को ही स्थानीय देशों की भाषा में परिवर्तित किया गया है चित्र भारतीय चित्रों की तरह ही हैं।

360 दिनों को 12 राशियों में बाँट कर वर्ष के अन्दर 30 दिनों के बारह मास बनाये गये हैं। यह वह समय है जब पृथ्वी सूर्य परिक्रमा करते समय एक राशि भाग में लगाती है। दूसरे शब्दों में सूर्य पृथ्वी के उस राशि भाग में रहता है। उसी अवधि को ऐक मास कहा गया है। भारतीय कैलेन्डर के अनुसार स्दैव मास के प्रथम दिन पर ही सूर्य ऐक से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। यह सब कुछ वैज्ञानिक है और प्रत्यक्ष है। बारह राशियों के इसी वैज्ञानिक तथ्य को सूर्य के रथ के पहिये की बारह कडियाँ के रूप में चित्रों के माध्यम से भी दर्शाया गया है। राशियों की आकृतियों के आधार पर ही नाविक उन्हें ऐक से बारह अम्बरों (आसमान के टुकडों) की भान्ति भी पहचानने लगे थे।

महीनों के नामों की बैज्ञानिकता

हमारे समस्त वैदिक मास (महीने) का नाम 28 में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं l जिस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर होता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस मास का नाम हुआ l 1. चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास l 2. विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास l 3. ज्येष्ठा नक्षत्र से ज्येष्ठ मास l 4. पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा से आषाढ़ l 5. श्रावण नक्षत्र से श्रावण मास l 6. पूर्वाभाद्रपद या उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद l 7. अश्विनी नक्षत्र से अश्विन मास l 8. कृत्तिका नक्षत्र से कार्तिक मास l 9,. मृगशिरा नक्षत्र से मार्गशीर्ष मास l 10. पुष्य नक्षत्र से पौष मास l 11. माघा मास से माघ मास l 12. पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास l

भारतीय खगोल वैज्ञानिकों ने पाश्चात्य वैज्ञानिकों से पूर्व इस तथ्य पर भी विचार किया था कि सूर्य की परिकर्मा में पृथ्वी को सवा 365 दिन लगते हैं। अतः हिन्दू कैलेण्डरों के अन्दर प्रत्येक बारह वर्ष के पश्चात ऐक वर्ष तेरह महीनों का आता है जो दिनों की कमी को पूरा कर देता है। इसी बारह वर्ष की अवधि का सम्बन्ध भारत के कुम्भ आयोजनों से भी है जो हरिदूआर, प्रयाग, काशी तथा नाशिक में हजारों वर्षों से आयोजित किये जा रहै हैं। इस की तुलना में रोमन कौलेण्डर में यह काल लगभग मास के दूसरे या तीसरे सप्ताह में आता है, जो वैज्ञानिक ना हो कर केवल परम्परागत है। रोमन कैलेण्डर के 30 दिनों या 31 दिनों के महीनों तथा फरवरी में 28 या 29 दिनों के होने का कारण वैज्ञानिक नहीं, बल्कि काम चलाऊ है।

अप्राकृतिक रोमन कैलेण्डर हमारे ऊपर उस समय थोपा गया था जब अंग्रेज़ विश्व में अपना उपनेष्वाद फैला रहे थे। ब्रिटेन का अपना कोई कैलेण्डर नहीं था। इसाई देश होने के कारण उन्हों ने रोमन कैलेण्डर को अपना रखा था। ब्रिटेन का समय भारत से लग भग साढे पाँच घन्टे पीछे चलता है। जब भारत में प्रातः साढे पाँच बजे सूर्योदय होता है तो उस समय इंग्लैण्ड में मध्य रात्रि का समय होता है। भारत के ‘प्रत्यक्ष सूर्योदय’ के समय नया दिन आरम्भ करने की प्रथानुसार अंग्रेजों ने अपने देश में मध्य रात्रि के समय नया दिन घोषित कर लिया और उसी प्रथा को अपनी सभी कालोनियों पर थोप दिया। भारत के अतिरिक्त किसी कालोनी का निजि कैलेण्डर नहीं था, अतः किसी देश ने कोई आपत्ति भी नहीं जतायी। ग़ुलाम की भान्ति उन्हों ने अंग्रेजी मालिक का हुक्म स्वीकार कर लिया। किन्तु भारत में स्थानीय पाँचांग चलता रहा है जिस की अनदेखी भारत के सरकारी तन्त्र ने धर्म निर्पेक्षता की आड में करी है।

युग-काल का विधान

हमारे पूर्वजों ने केवल पृथ्वी की समय गणना का विधान ही नहीं बनाया था, बल्कि उन्हों ने सृष्टि की युग गणना का विधान भी बनाया था जिस के आँकडों को आज विज्ञान भी स्वीकारनें पर मजबूर हो रहा है।

भारतीय गणना के अनुसार चार युगों का ऐक चतुर्युग होता है। यह वह समय है जो ‘हमारा सूर्यमण्डल’ अपने से बडे महासूर्य मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। यह गणना मन-घडन्त नहीं अपितु ऋगवेद के 10800 पद्धो तथा 432000 स्वरों में दी गयी है।

सतयुग, त्रेता, दूापर, और कलियुग चार युग माने जाते हैं। चार युगों से ऐक चतुर्युग बनता है। चतुर्युग के अन्दर युगों के अर्न्तकाल का अनुपात 4:3:2:1 होता है। अतः प्रत्येक युग की अवधि इस प्रकार हैः-

  • सतयुग – 17 लाख 28 हज़ार वर्ष
  • त्रेता युग – 12 लाख 96 हज़ार वर्ष
  • दूापर युग – 8 लाख 64 हज़ार वर्ष
  • कलियुग – 4 लाख 32 हज़ार वर्ष  (कुल जोड – 432000 वर्ष)

71 चतुर्युगों से ऐक मनवन्तर बनता है (30 करोड 67 लाख 20 हज़ार वर्ष) यह वह समय है जो महासूर्य मण्डल अपने से भी अधिक विस्तरित सौर मण्डल की परिकर्मा करने में लगाता है। इस से आगे भी बडे सूर्य मण्डल हैं जिन की परिकर्मा हो रही है तथा वह अनगिनित हैं।

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन 

सृष्टि के सर्जन तथा विसर्जन का चक्र निरन्तर निर्विघ्न चलता रहता है। सर्जन 4.32 करोड वर्ष (ऐक चतुर्युग) तक चलता है जिस के पश्चात उतने ही वर्ष विसर्जन होता है। सृष्टि-कल्प वह समय है जब ब्रह्मा सृष्ठि की रचना करते हैं । इसी के बराबर समय का प्रलय-कल्प भी होता है। प्रलय-कल्प में सृष्ठि का विसर्जन होता है । सृष्ठि और प्रलय ऐक दूसरे के पीछे चक्र की तरह चलते रहते हैं जैसे हमारे दिनों के पीछे रातें आती है।  सर्जन-विसर्जन के समय का जोड 8.64 करोड वर्ष होता है जिसे ब्रह्मा का ऐक दिवस (अहरोत्रा) माना गया है। ऐसे 360 अहरोत्रों से ब्रह्मा का ऐक वर्ष बनता है जो हमारे 3110.4 केटि वर्षों के बराबर है।

हिन्दू शास्त्रों ने ऐक कल्प को 14 मनुवन्तरों में विभाजित किया है। प्रत्येक मनुवन्तर में 30844800 वर्ष होते हैं अथवा 308.448 लाख वर्ष होते हैं।

हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार वर्तमान सृष्टि की रचना श्वेतावराह कल्प में 1.972 करोड वर्ष पूर्व हुई थी। उस के पश्चात छः मनुवन्तर बीत चुके हैं और सातवाँ वैभास्वत मनुवन्तर अभी चल रहा है। पिछले मनुवन्तर जो बीत चुके हैं उन के नाम स्वयंभर, स्वारोचिश, ओत्तमी, तमस, रविवत तथा चक्षाक्ष थे।

सातवें मनुवन्तर के 28 चतुर्युग भी बीत चुके हैं और हम 29वें चतुर्युग के कलियुग में इस समय (2012 ईसवी) जी रहे हैं । वर्तमान कलियुग के भी 5004 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं

भागवत पुराण के अनुसार भक्त ध्रुव के पिता राजा उत्तानपाद स्वयंभर मनु के युग में हुये थे जो आज (2012 ईसवी) से 1.99 करोड वर्ष पूर्व है। पाश्चात्य वैज्ञानिक इन गणाओं की अनदेखी करते रहे लेकिन जब अमेरिकन शोधकर्ता माईकल ए क्रामो ने कहा कि मानव आज से 2 करोड वर्ष पूर्व धरती पर आये तो भागवत पूराण के कथन की पुष्टि हो गयी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यह काल गणना खगौलिक है। इस गणना के अनुसार आज की मानवी घटनाओं को जोडना उचित नहीं होगा। जैसे हाथी तोलने वाले माप दण्डों से स्वर्ण को नहीं तोला जाता उसी प्रकार किसी व्यक्ति की आयु का आंकलन ‘लाईट-यीर्स’ या ‘नैनो-सैकिण्डस में नहीं किया जाता।

भारतीय कैलैण्डर की उपेक्षा 

अंग्रेज़ी पद्धति अनुसार प्रशिक्षित भारतीय युवा अपने गौरवशाली पूर्वजों की उपलब्धियों को भूल कर अपने आप में ही गर्वित रहते हैं। जो कुछ अंग्रेज़ थूकते रहै मैकाले प्रशिक्षित भारतीय उसे खुशी से चाटते रहै हैं। आज से केवल पचास वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज घटनाओं को भारत के देसी महीनों के माध्यम से याद रखते थे किन्तु वह प्रथा अब लुप्त होती जा रही है। भारत के अंगेजी प्रशक्षित आधुनिक युवा देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते। कदाचित वह समझते हैं कि भारत का अपना कोई कैलेण्डर ही नहीं था और रोमन कैलेण्डर के बिना हम प्रगति ही नहीं कर सकते। अपनी मनोविकृति के कारण हम आदि हो चुके हैं कि सत्य वही होता है जिसे पाश्चात्य वैज्ञानिक माने। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व पश्चिम के वैज्ञानिक ऐक स्वर में बोल रहे थे कि चन्द्रमां पर जल नहीं है। परन्तु जब भारत के चन्द्रयान ने चाँद की धरती पर जल के प्रमाण दिये तो अमेरिकी नासा ने भी पुनः खोज कर के भारत के कथन की पुष्टि कर दी।

अंतरीक्ष की भारतीय समय सारणी को भी आज के विज्ञान के माध्यम से परखा जा सकता है। यदि यह काम विदेशी ना करें तो भारत के वैज्ञानिकों को स्वयं करना चाहिये। हमारी उपलब्धियों को स्वीकृति ना देना पाश्चात्य देशों के स्वार्थ हित में है क्यों कि उन्हों ने भारत की उपलब्धियों को हडप कर अपना बनाया हुआ है। लेकिन हम किस कारण अपने पूर्वजों की धरोहर उन्हें हथियाने दें ? हम अपनी उपलब्दधियों की प्रमाणिक्ता पाने के लिये पाश्चात्य देशों के आगे हाथ क्यों फैलाते रहते हैं ?

आजकल कुछ देश भक्त अंग्रेजी नव-वर्ष पर अपने मन की भड़ास निकालते हैं जो कि ऐक शुभ संकेत है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। अपनी उप्लब्द्धी की जानकारी भी रहनी चाहिये और उसे यथा सम्भव अंग्रेज़ी कैलेण्डर का साथ मिलाते रहना चाहिये। दुर्भाग्यवश अंग्रेजी कैलेण्डर ही अन्तरराष्ट्रीय मान्यता रखता है उसे बदलने के लिये पहले अपने घर में भारतीय कैलेण्डर की जानकारी तो होनी चाहिये। आज के युवा अपने देसी महीनों के नाम भी क्रमवार नहीं बता सकते जो पिछली पीढी तक सभी गाँवों में प्रचिल्लत थे। क्या हम अपने प्राईमरी स्कूलों में यह जानकारी फिर से पढा सकें गे?

चाँद शर्मा

 

32 – विज्ञान-आस्था का मिश्रण


जो बात समझ में ना आये उसे अंग्रेजी भाषा में मिथ कहा जाता है। स्नातन धर्म के वैदिक गूढ ज्ञान तथा उसी ज्ञान का कलात्मिक चित्रण जब पाश्चात्य विचारकों की समझ में नहीं आया तो उन्हों ने उसे ‘मिथ या ‘माईथोलोजी कह कर अपना पल्ला झाड लिया। उन्हीं के प्रभाव तले प्रशिक्षित कुछ बन्दरछापी भारतीयों नें भी स्नातन धर्म को ‘माईथोलोजीकह कर भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को विश्वविद्यालयों के क्षेत्र से निष्कासित कर दिया। कमी ज्ञान में नहीं थी – परन्तु उन की गुलामी भरी सोच और समझ में थी।

हिन्दू धर्म का अध्यात्मवाद पूर्णत्या आस्थाओं और विज्ञान का मिश्रण है। उदाहरण के लिये श्रीमद भाग्वद गीता के इस कथन की वैज्ञानिक्ता परख लीजिये –

‘जैसे घडे के फूट जाने के बाद घडे की मिट्टी पुनः मिट्टी में मिल जाती है, समुद्र में उठी लहरों का जल पुनः समुद्र में समा जाता है, स्वर्ण आभूषणों को गलाने के बाद स्वर्ण पुनः अपने मौलिक रूप में परिवर्तित हो जाता है – उसी प्रकार शरीर में बन्धी आत्मा शरीर छोड देने के पश्चात पुनः परमात्मा में विलीन हो जाती है। अन्ततः सृष्टी में सभी अपने अपने मौलिक स्वरुप में जा मिलते हैं’।

गीता के इस अध्यात्मवाद में छुपी भौतिक विज्ञान की सत्यता को क्या कोई वैज्ञानिक नकार सकता है?

पूर्णत्या वैज्ञानिक मानवीय आस्थायें

विश्व में इसाई तथा इस्लाम दो अन्य मुख्य धर्म हैं। इन दोनों धर्मों के जनकों के कर्म क्षेत्रों की भूमि मध्य ऐशिया में थी। दोनो धर्म स्नातन धर्म से कई शताब्दियों पश्चात आये। उन का आपसी अन्तर काल लगभग सात सौ वर्षों का है। उन दोनों धर्मों की अधिकाँश आस्थायें स्नातन धर्म और पुराणों में थोडा बहुत फेर बदल कर के विकसित हुयी हैँ, किन्तु दोनों धर्म भूगौलिक क्षेत्र तथा समय की सीमा में बन्धे हुये हैं।

उन की तुलना में स्नातन धर्म की विशेषता है कि उस के देवी देवता, पूर्वज किसी विशेष भूगौलिक क्षेत्र में सीमित नहीं रहै बल्कि उन्हों ने समस्त ब्रह्माण्ड में अपने पद चिन्ह छोडे हैं। धार्मिक आस्थायें समय और स्थान की सीमा से आज़ाद हैं। स्नातन धर्म के देवी देवता जहां चाहें प्रगट हो सकते हैं और जब चाहे अन्तर्ध्यान हो सकते हैं। इतना ही नहीं, स्नातन धर्म ने आस्थाओं और मानस चित्रण के साथ वैज्ञानिक तथ्यों को भी कलात्मिक ढंग से जोड़ा है। उसी चित्रण को हम अपना अध्यात्मिक साहित्य मानते हैं जिसे पौराणिक साहित्य या पाश्चात्य विचारकों की भाषा में ‘माईथोलोजी’कहा जाता है।

ज्ञान का आँकलन 

स्नातन धर्म की विचारधारा हर प्रकार के वैचारिक आँकलन के लिये खुली पुस्तक की तरह है। आस्थाओं की नींव रखने के लिये भी प्रमाणिता के धरातल की आवशक्ता होती है। जब तर्क के बाद तर्क ऐक ही निर्णय का आभास प्रगट कते हैं तभी आस्था जन्म लेती है। गर्व की बात है कि हिन्दू धर्म की आस्थाओं को चुनौती कभी भी दी जा सकती है और उन की शाशवता को कोई खतरा नहीं है। इसी लिये वैज्ञिानिक तथ्यों के साथ हिन्दू आस्थाओं पर पुनर्विचार और आँकलन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। स्नातन धर्म में आस्थाओं को चुनौती देने वालों को मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता। 

हिन्दू धर्म के अनुयायी स्दैव धार्मिक विषयों को औपचारिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलत करने का अनुगृह करते रहे हैं क्यों कि उन्हें पूर्ण विशवास है कि यदि हिन्दू आस्थाओं को विज्ञान और आधुनिक उपक्रमों के साथ तर्क की कसौटी पर परखा जाये गा तो तथ्य आस्थाओं के पक्ष में प्रमाणित हो जायें गे और भ्रामिकता मिट जाये गी। हिन्दू धर्म को दोनों परिस्थितियाँ स्वीकार है । यही हिन्दू धर्म की प्रबल शक्ति है। हिन्दू धर्म की आस्थायें तथा मान्यतायें इतनी सुदृढ हैं कि उन्हें आलोचना का कोई भय नहीं है। 

हिन्दू धर्म को धर्मान्धता या नास्तिकता से भी कोई खतरा नहीं है। धार्मिक आस्थाओं को खुले आम नकारने वाले को भी ना केवल बोलने दिया जाता है और सुना जाता है, बल्कि उसे अपनी नकारात्मिक अनास्तिक्ता का प्रचार भी करने दिया जाता है। यह सिद्ध करता है कि हिन्दू धर्म में विज्ञान तथा आस्थायें ऐक दूसरे के विपरीत ना हो कर ऐक दूसरे की पूरक हैं।

सृष्टि सर्जन

स्नातन मत के माध्यम से वैज्ञायानिक विचारों का उदय ऋगवेद से प्रारम्भ हुआ। वेदों के विचार से सृष्टि की रचना से पूर्व कुछ नहीं था। यह अवस्था उस रेखा को उजागर करती है जो शून्य तथा गुण-सम्पन्न भौतिक्ता के मध्य में रहती है। इसी समय को पाश्चात्य विचारकों की ‘बिग-बैंग थ्यिोरी के साथ जोडा है। यह विचार उस सत्य की ओर ईशारा करता है जो पूर्णतया वैज्ञायानक विचार है ना कि अन्ध-विशवास। जिस ‘बोसोनो अणु या ‘गाड-पार्टिकल के बारें में विश्व के वैज्ञानिक आज खोज में जुटे हैं उसी परिस्थिति का बखान भारतीय ग्रंथ हजारों वर्षों से करते चले आ रहै हैं। यहाँ पर केवल दो ही तथ्यों को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। 

मनु स्मृति के प्रथम अध्याय में ही सृष्टि की रचना, पृथ्वी पर जीवों के जन्म तथा उन की प्रकृति के बारे में विस्तरित जानकारी इस प्रकार उप्लब्द्ध हैः-

       आसीदितं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।

       अप्रतक्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ।।

       ततः स्वयंभूभर्गवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।

       महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः।। (मनु स्मृति 1 – 5-6)

अर्थात – पहले यह संसार तम (अन्धकार) प्रकृति से घिरा था, जिस से कुछ भी ज्ञात नहीं होता था। अनुमान करने योग्य कोई रूप नहीं था जिस से तर्क दूारा लक्षण स्थिर कर सके। सभी ओर अज्ञान और शून्य की अवस्था थी। इस के बाद प्रलयावस्था के नाश करने वाले लक्षण सृष्टि के सामर्थ्य से युक्त, स्वयंभु भगवान महाभूतादि (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) पंच तत्वों का प्रकाश करते हुए प्रकट हुए। (यहाँ यह स्पष्टीकरण भी जरूरी है कि ‘तम’ का अपना कोई अस्तीत्व नहीं होता। ‘रौशनी का अभाव’ ही तम की अवस्था है।)

पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का प्रगट होना आधुनिक भौतिक विज्ञान का जन्म है क्यों कि उन्हीं महाभूतों के मिश्रण से ही सृष्टी के अन्य पदार्थ विकसित हुये या मानव दूारा विकसित किये गये हैं। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार प्रथम जीवन जल और गर्मी से उत्पन्न हुआ। जल सूर्याग्नि की तपश और वायु के कारण आकाश में उडता है तथा फिर वर्षा के रूप में पुनः पृथ्वी पर आता है जिस से पैड-पौधे जन्म लेते हैं, जीव उत्पन्न होते हैं और पश्चात मानव का जन्म होता है। यही आस्थायें मानवी विज्ञान का आधार हैं जिन्हें सरलता के साथ समझाने के लिये हम देवी देवता का रूप में चित्रण भी कर सकते हैं और उन्हीं तथ्यों को आधार बना कर रौचक कथायें भी लिख सकते हैं। समस्त वेदों, उपनिष्दों, पुराणों में मनुस्मृति की तरह ही सृष्टि की उत्पत्ति का बखान किया गया है और कहीं भी विरोधाभास नहीं है।

जीव-विज्ञान

हमारे पूर्वजों को सभी प्रकार के जीवों से ले कर मानव के जन्म तक का पूर्ण ज्ञान था। बृहत विष्णु पुराण के अनुसार सब से पहले जल में सृष्टि हुई फिर वानर जो कि मानवों के अग्रज हैं। यही विचारधारा कालान्तर डारविन नें अपने नाम से पंजीकृत करवा कर ‘एवोलुशन थियोरी के नाम से प्रचारित कर ली। आदिकाल से पशु-पक्षी अपने जैसे जीवों को ही उत्पन्न करते चले आ रहै हैं। पशु पक्षियों ने अपनी संतानों को परिशिक्षण देने के लिये कोई विद्यालय नहीं बनाये। फिर भी उन के नवजात अपनी जाति के रहन-सहन को अपने आप ही सीख जाते हैं। डिस्कवरी तथा नेशनल ज्योग्राफिक टी वी चैनलों पर इन सभी तथ्यों को अब प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। प्राणी-विज्ञान के इसी तथ्य को डारविन से सैंकडों वर्ष पूर्व मनुसमृति में इस प्रकार उजागर किया गया थाः-  

       यं तु कर्मणि यस्मिन्स न्ययुड्क्त प्रथमं प्रभुः।

       स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः ।। (मनु स्मृति1- 28)

       अर्थात- पहले ब्रह्मा ने जिस जीव को जिस कार्य में नियुक्त किया, वह बारम्बार उत्पन्न हो कर भी अपने पूर्व-कर्म को करने लगा।

विष्णु के दस अवतार भी सृष्ठि सर्जन की कहानी को कलात्मिक ढंग से उजागर करते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति से ही समस्त जीवों में आत्मा बार बार उसी परमात्मा की ही पुनर्वृति करती है। इसी विचार को छन्दोग्य उपनिष्द ने भी व्यक्त किया है। पौराणिक कथाओं तथा लोक कथाओं में पशु-पक्षियों और पैड-पौधों का मानवी भाषा में बात करना इस वैज्ञानिक तथ्य को प्रमाणित करता है कि ना केवल पशु-पक्षियों में बल्कि पैड-पौधों में भी जीवन के साथ साथ संवेदनायें भी विद्यमान है। इसी तथ्य की पुनर्वृति करने के लिये विश्व के आधुनिक वैज्ञिानिकों और तर्क शास्त्रियों ने सर जगदीशचन्द्र बोस को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया था। 

कर्म विधान

श्रीमद्भागवद गीता मेंकर्म विधान की व्याख्या की गयी है। मानव कर्म करता है तो प्रतिक्रिया ईश्वर करता है। जो बोया जाये गा वही काटा जाये गा का विधान सर्व-सम्मत है। 

कर्म विधान में फल के अनुसार चार प्रकार के कर्म हैं-

  • निष्काम-कर्म – जो कर्म निजि मोक्ष प्राप्ति के लिये करे जाते है। इन से अपने कर्तव्यों के पालन के प्रति पूर्णत्या संतुष्टि मिलती है जैसे मानव सेवा तथा ज्ञान का वितरण आदि।
  • पुण्य-कर्म – जव क्रम तथा उस को करने का उद्देष्य पवित्र हों तो उन्हें पुण्य-कर्म कहा जाता है जैसे किसी की जान बचाना।
  • पाप-कर्म – जिस कर्म का उद्देष्य तथा कर्म दोनो ही किसी का अनिष्ट करने के लिये किये जायें वह पाप-कर्म होते हैं।
  • मिश्रित-कर्म – जब कर्म तो अच्छा हो किन्तु उस के पीछे उद्देष्य अच्छा ना हो या उद्देष्य तो अच्छा हो परन्तु कर्म अच्छा ना हो।जैसे कोई अच्छी फसल पाने के लिये अन्य जीवों का नाश कर देना।

कर्मों का ही ऐक अन्य वर्गीकरण इस प्रकार हैः-

  • क्रियामान-कर्म – जो कर्म वर्तमान में किये जाते हैं तथा उन कर्मों से अन्य कर्म उत्पन्न होते हैं।
  • संचित-कर्म – जो कर्म भूत काल में किये गये थे परन्तु उन का फल अभी आना बाकी है।
  • प्रारब्ध – जो कर्म भूत काल में किये गये थे परिपक्व होने के पश्चात उन के फल वर्तमान में प्रगट हो रहे हों उन्हें प्रारब्ध अथवा भाग्य कहा जाता है। हमारा जन्म मरण सभी कुछ प्रारब्ध का परिणाम है।

यह प्रारब्ध का परिणाम है कि कोई राजा के महल में पैदा हो जाता है तो कोई निर्धन की कुटिया में जन्म लेता है। कुछ पूर्ण्त्या स्वस्थ, सुन्दर, गोरे, काले, लम्बे, छोटे पैदा होते हैं तो कुछ कमज़ोर, बीमार, विकृत पैदा होते हैं। मानव स्वयं अपनी प्रारब्ध का निर्माण करता है। जो हम इस जन्म में कर रहे होते हैं परिपक्व हो कर वही हमें अगले जन्म में प्राप्त हो गा। कर्म ही सृष्टि का मूल कारण है। मानव पर केवल उस के निजि कर्मों का ही असर नहीं पडता अपितु वह दूसरों के, अपने सम्वन्धियों, तथा जाति वालों के संयुक्त कर्मों से भी प्रभावित होता है। वैचारिक वैज्ञानिक्ता इस के विपरीत नहीं हो सकती।

कारण तथा प्रभाव का रहस्य  

आस्था है कि पुण्य कर्मों से पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसी बात को वैज्ञानिक आधार से समझने के लिये यदि कोई कडवी या तीखी मिर्च युक्त वस्तु खाये गा तो स्वाद भी कडुआ या जलाने वाला हो जायेगा। इस के उपरान्त वही व्यक्ति यदि कुछ मीठा खा लेगा तो भले ही प्रथम कर्म का प्रभाव पूर्णत्या नष्ट नहीं होगा किन्तु वर्तमान स्वाद कुछ सुखमय अवश्य हो जाये गा। कडुवे और मीठे कर्मों के परस्पर अनुपात के आधार पर ही व्यक्ति के जीवन में सुख और दुःख निर्भर करते हैं। 

कर्म के प्रभाव की व्याख्या को आज विश्व के वैज्ञिानिक तथा दार्शनिक भीकारण तथा प्रभाव(ऐक्शन ऐण्ड रीऐकशन थियोरी)के नाम सेप्रमाणित मानते हैं। कर्म का अर्थ क्रिया से है। प्रमाणित तथ्य है कि प्रत्येक क्रिया के समान उस की प्रतिक्रिया भी होती है। जो कोई भी कर्म करता है ईश्वर उस का फल कर्म करने वाले को अवश्य देता है।

हिन्दू धर्म की आस्थाये तथा विचारधारायें बारबार प्रमाणित होकर हिन्दू साहित्य के माध्यम मे हमें प्राप्त हुयी हैं। इस लिये स्नातन धर्म यथार्थ में ज्ञान और आस्था का मिश्रण है।

चाँद शर्मा

15 – विशाल महाभारत


महाभारत को पहले भारत संहिता कहा जाता था। ज्ञान तथा जीवन दर्शन का ग्रँथ होने के कारण इसे पंचम वेद भी कहते हैं। कालान्तर इस का नाम महाभारत पडा। विश्व साहित्य में महाभारत सब से विशाल महाकाव्य है जिस के रचनाकार मह़ृर्षि वेद व्यास थे। रामायण की तरह इस महाकाव्य को भी विश्व की सभी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है तथा भारत के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के लेखक भी इस ग्रंथ से प्ररेरित हुये हैं। महाभारत का रूपान्तर काव्य के अतिरिक्त कथा, नाटक, और कथा-चित्रावलियों में भी हो चुका है। भारत की समस्त नृत्य शैलियों तथा संगीत नाटिकाओं में भी इस महाकाव्य के कथांशों को दर्शाया जाता है। महाभारत कथाओं पर कितने ही श्रंखला चल-चित्रों का निर्माण भी हो चुका है तथा अभी भी इस महाकाव्य का कथानक इतना सशक्त है कि आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर के बेनहूर, हैरी पाटर, अवतार और लार्ड आफ दि रिंग्स से भी अधिक भव्य चल-चित्रों का निर्माण सफलता पूर्वक किया जा सकता है।

भारतीय जीवन का चित्रण

यह महाकाव्य भारतीय जीवन के सभी अंगों का विस्तरित चित्रण करता है। प्राचीन काल में सेंसर शिप नहीं होती थी। शेक्सपियर आदि के नाटकों के मूल संस्करणों में भद्दी गालियों से भरे सम्वाद भी मिलते हैं जो आजकल विश्व विद्यालयों के संस्करणों में पुनः सम्पादित कर के निकाल दिये जाते हैं। यथार्थवाद के नाम पर भी कई चल चित्रों में गाली गलौच वाली भाषा के संवाद होते हैं किन्तु महाभारत के रचना कार ने अपनी लेखनी पर स्वेच्छिक नियंत्रण रखा है। कौरवों तथा पाँडवों के जन्म से जुडे़ कथानक को अलंकार के रूप से लिखा गया है  ताकि उस में कोई अशलीलता ना आये। पाठक चाहें तो उसे यथार्थ से जोड कर देखें, चाहे तो ग्रंथकार की कल्पना को सराहें। किन्तु जो कुछ और जैसे भी लिखा है वह वैज्ञियानिक दृष्टि से भी सम्भव है।

युगों की ऐतिहासिक कडी

महाकाव्य रामायण की गाथा त्रैता युग की घटना है तो महाभारत की कथा दूआपर युग से आरम्भ हो कर कलियुग के आगमन तक का इतिहास है। कुछ पात्र तो रामायण और महाभारत में संयुक्त पात्र हैं जैसे कि देवऋर्षि नारद, भगवान परशुराम तथा हनुमान जो कि सतयुग, त्रेता, दूआपर और कलियुग को जोडने की कड़ी बन चुके हैं। यह पात्र स्नातन धर्म की निरन्तर श्रंखला को आदि काल से आधुनिक युग तक जोडते हैं।

कौरवों तथा पाँडवों को मिला कर महाभारत के युद्ध में 18 अक्षौहिणी सैनाओं ने भाग लिया था। ऐक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथ, 21870 हाथी, 109350 पैदल ऐर 65610 घुड सवार होते हैं। युद्ध के उल्लेख महाकाव्यों के अनुरूप भव्य होते हुये भी सैनिक दृष्टि से तर्क संगत हैं तथा ऐक विश्व युद्ध का आभास देते हैं।

महाभारत मुख्यता कौरव-पाँडव वंशो, उन के वंशजों तथा तत्कालीन भारत के अन्य वंशों के परस्पर सम्बन्धों, संघर्षों, रीति रिवाजों की गाथा है जो अंततः निर्णायक महाभारत युद्ध की ओर बढ़ती है। महाभारत युद्ध अठारह दिन चलता है और उस में दोनों पक्षों की अठारह अक्षोहणी सेना के साथ भारत के लग-भग सभी क्षत्रिय वीरों का अंत हो जाता है। महाभारत कथानक में सभी पात्र निजि गाथा के साथ संजीव हो कर जुड़ते हैं तथा मानव जीवन के उच्चतम एवं निम्नतम व्यव्हारिक स्तरों को दर्शाते हैं। लग भग एक लाख श्र्लोकों  में से छहत्तर हजार श्र्लोकों में तो पात्रों के आख्यानों का उल्लेख है जो महाकाव्य को महायुद्ध के कलाईमेक्स की ओर ले जाते हैं।

महाभारत काल में दर्शायी गयी भारतीय सभ्यता एक अति विकसित सभ्यता है तथा दर्शाये गये पात्र महामानव होते हुये भी यथार्थ स्वरूप लगते हैं। कथानक के पात्र केवल भारत में ही नहीं अपितु स्वर्ग लोक और पाताल लोक में भी विचरते हैं। एक उल्लेखनीत तथ्य और भी उजागर होता है कि रामायण का अपेक्षा महाभारत में राक्षस पात्र बहुत कम हैं जिस से सामाजिक विकास का आभास मिलता है। 

नैतिक महत्व 

रामायण में तो केवल राम का चरित्र ही आदर्श कर्तव्यपरायणता का प्रत्येक स्थिति के लिये  कीर्तिमान है किन्तु महाभारत में सामाजिक जीवन की कई घटनाओं तथा परिस्थतियों में समस्याओं से जूझना चित्रित किया गया है। महाभारत में लग भग बीस हजार से अधिक श्र्लोक धर्म ऐवं नीति के बारे में हैं।

श्रीमद् भागवद गीता

श्रीमद् भागवद गीता महाभारत महाकाव्य का ही विशिष्ठ भाग है। यह संसार की सब से लम्बी दार्शनिक कविता है। गीता महाभारत युद्ध आरम्भ होने से पहले भगवान कृष्ण और कुन्ती पुत्र अर्जुन के बीच वार्तालाप की शैली में लिखी गयी है। गीता की दार्शनिक्ता  संक्षिप्त में उपनिष्दों तथा हिन्दू विचारधारा का पूर्ण सारांश है। गीता का संदेश महान, प्रेरणादायक, तर्क संगत तथा प्रत्येक स्थिति में यथेष्ठ है। संक्षिप्त में गीता सार इस प्रकार हैः-

  • जब भी संसार में धर्म की हानि होती है ईश्वर धर्म की पुनः स्थापना करने के लिये किसी ना किसी रूप में अवतरित होते हैं।
  • ईश्वर सभी प्रकार के ज्ञान का स्त्रोत्र हैं। वह सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ्य तथा सर्व व्यापक हैं। 
  • म़त्यु केवल शरीर की होती है। आत्मा अजर और अमर है। वह पहले शरीर के अंत के पश्चात दूसरे शरीर में पुनः प्रवेश कर के नये शरीर के अनुकूल क्रियायें करती है।
  • जन्म-मरण का यह क्रम आत्मा की मुक्ति तक निरन्तर चलता रहता है।
  • सत्य और धर्म स्दैव अधर्म पर विजयी होते हैं।
  • सभी एक ही ईश्वर की अपनी अपनी आस्थानुसार आराधना करते हैं किन्तु ईश्वर के जिस रूप में आराधक आस्था व्यक्त करता है ईश्वर उसी रूप को सार्थक कर के उपासक की आराधना को स्वीकार कर लेते हैं। इसी वाक्य में हिन्दू धर्म की धर्म निर्पैक्षता समायी हुयी है।
  • हर प्राणी को अपनी निजि रुचि के अनुकूल धर्मानुसार कर्म करना चाहिये तथा अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना चाहिये।
  • हर प्राणी को बिना किसी पुरस्कार के लोभ या त्रिरस्कार के भय के अपना कर्तव्य पालन करना चाहिये तथा अपने मनोभावों को कर्तव्य पालन करते समय विरक्त रखना चाहिये।
  • प्राणी का अधिकार केवल कर्म पर है, कर्म के फल पर नहीं। कर्म फल ईश्वर के आधीन है।
  • अहिंसा परम धर्म है उसी प्रकार धर्म रक्षा हेतु हिंसा भी उचित है।
  • अति सर्वत्र वर्जित है।

आत्म विकास

महाभारत की कथा में श्रीकृष्ण की भूमिका अत्यन्त महत्वशाली है। युद्ध को टालने की सभी कोशिशें असफल होने के पश्चात श्रीकृष्ण ने उस महायुद्ध के संचालन में ऐक विशिष्ट भूमिका निभाई तथा आसुरी और अधर्म प्रवृति की शक्तियों पर विजय पाने का मार्ग भी दर्शाया। किसी आदर्श की सफलता के लिये युक्ति प्रयोग करने का अनुमोदन किया। कौरव सैना के अजय महारथियों का वध युक्ति से ही किया गया था जिस के प्रमुख सलाहकार श्रीकृष्ण स्वयं थे। कोरे आदर्श, अहिंसा तथा निष्क्रियता से अधर्म पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। उस के लिये कर्मयोग तथा युक्ति का प्रयोग नितान्त आवश्यक है।  

श्रीमद् भागवद गीता में मानव के आत्म विकास के चार विकल्प योग साधनाओं के रूप में बताये गये हैं –

  • कर्म योगः – कर्म योग साधना कर्मठ व्यक्तियों के लिये है। इस का अर्थ है कि प्रत्येक परिस्थिति में अपना कर्तव्य निभाओं किन्तु अपने कर्म के साथ किसी पुरस्कार की चाह अथवा त्रिरस्कार का भय त्याग दो। 
  • भक्ति योगः- भक्ति योगः साधना निष्क्रयता का आभास देता है। ईश्वर में श्रद्धा रखो तथा जब परिस्थिति आ जाये तो अपना कर्तव्य निभाओं किन्तु अपने कर्म को ईश्वर की आज्ञा समझ कर करो जिस में निजि स्वार्थ कुछ नहीं होना चाहिये। अच्छा – बुरा जो कुछ भी फल निकले वह ईश्वरीय इच्छा समझ कर हताश होने की ज़रूरत नहीं। कर्ता ईश्वर है और जैसा ईश्वर रखे उसी में संतुष्ट रहो।
  • राज योगः – राज योगः का सिद्धान्त अष्टांग योग भी कहलाता है। य़म, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्यहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि इस योग के आठ अंग हैं जिन का निरन्तर अभ्यास मानव को स्वस्थ शरीर तथा पूर्णत्या विकसित दिमागं की क्षमता प्रदान करता है जिस से मानव प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य तथा स्थित प्रज्ञ्य रह कर अपने कर्तव्य तथा कर्म का चयन कर सके। इस प्रकार मानव अपनी इन्द्रियों तथा भावनाओं को वश में रखते हुये संतुलित निर्णय तथा कर्म कर सकता है। 
  • ज्ञान योगः – ज्ञान योगः की साधना उन व्यक्तियों के लिये है जो सूक्षम विचारों के साथ अपने कर्तव्य पालन के सभी तथ्यों पर विचार कर के उचित निर्णय करने में कुशल हों। कुछ भी तथ्य छूटना नहीं चाहिये। ज्ञान योगः साधना कठिन होने के कारण बहुत कम व्यक्ति ही इस मार्ग पर चलते हैं।

मध्य मार्ग इन सभी साधनाओं का मिश्रण है जिस में छोड़ा बहुत अंग निजि रुचि अनुसार चारों साधनाओं से लिया जा सकता है। कर्मठ व्यक्ति कर्म योग को अपनाये गा किन्तु भाग्य तथा ईश्वर के प्रति श्रद्धालु भक्ति मार्ग को अपने लिये चुने गा। तर्कवादी राज योग से निर्णय तथा कर्म का चेयन करें गे और योगी संन्यासी तथा दार्शनिक साधक ज्ञान योग से ही कर्म करें गे। पशु पक्षी अपने कर्म निजि परिवृति के अनुसार करते हैं जिस लिये उन्हें कर्ता का अभिमान या क्षोभ नहीं होता। सारांश सभी का ऐक है कि अपना कर्म निस्वार्थ हो कर करो और फल की चाह ना करो।

गीता की दार्शनिक्ता विश्व में सब से प्राचीन है और वह सभी जातियों देशों के लिये प्रत्येक स्थिति में मान्य है। हिन्दू विचार धारा सब से सरल तथा सभी विचारधाराओं का संक्षिप्त विकलप है।

ऐतिहासिक महत्व

मानव सृष्टि के इतिहास में भारत का इतिहास सर्वप्राचीन माना जाता है। भारत के सूर्यवंश और चन्दवंश का इतिहास जितना पुराना है उतना पुराना इतिहास विश्व के अन्य किसी भी वंश का नहीं है। यदि रामायण सूर्यवंशी राजाओं का इतिहास है तो महाभारत चन्द्रवंशी राजाओं का इतिहास है। चीन सीरिया और मिश्र में जिन राजवंशों का वृतान्त पाया जाता है वह चन्द्रवंश की ही शाखायें हैं।

उन दिनों इतिहास, आख्यान, संहिता तथा पुराण को ऐक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता था। रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं जिन को केवल साहित्य समझ कर अछूता छोड़ दिया गया है। महाभारत काल के पश्चात से मौर्य वंश तक का इतिहास नष्ट अथवा लुप्त हो चुका है। इतिहास की विक्षप्त श्रंखलाओं को पुनः जोड़ने के लिये हमें पुराणों तथा महाकाव्यों पर शोध करना होगा।

चाँद शर्मा

 

12 – दर्शनशास्त्र – तर्क विज्ञान


आज कल अंग्रेज़ी विचारक जब किसी तथ्य का विशलेषण करते हैं तो उस का थ्री डाईमेंशनल वुयू लेते हैं जैसे कि लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई। किन्तु सही अनुमान लगाने के लिये लक्ष्य के आगे, पीछे, दाहिने, बाँयें, ऊपर और नीचे भी देखना पडता है। इसी को उन्हीं की भाषा में सिख्सअथ डाईमेंशनल वुयू कह सकते है। दर्शन शास्त्रों ने आज से हजारों वर्ष पूर्व ऐसा ही किया था और विश्व में तर्क विज्ञान लोजिक की नींव डाली थी।

मानव की अतृप्त जिज्ञासा उसे सृष्टि के अदभुत रहस्यों का अनुसंधान करने के लिये स्दैव ही प्रोत्साहित करती रही है। सृष्टि को किस ने बनाया, मैं कौन हूँ, मैं कहाँ से आया हूँ, मृत्यु के पश्चात मैं कहाँ जाऊँगा आदि मूल प्रश्नों का उत्तर खोजने में मानव आदि काल से ही लगा रहा है। इन्हीं रहस्यों की खोज ने दार्शनिक्ता के साहित्य को जन्म दिया है। ऋषि मुनियों ने समाधिष्ट हो कर आत्म चिन्तन तथा अन्तर विशलेष्ण कर के उन जटिल प्रश्नों का उत्तर खोजा है।

तथ्यों की सच्चाई को देखना ही उन का दर्शन करना है अतः इस क्रिया को दर्शन ज्ञान की संज्ञा दी गयी है। स्नातन धर्म विचारधारा केवल एक ही परम सत्य में विशवास रखती है किन्तु उसी सत्य का छः प्रथक -प्रथक दृष्टिकोणों से आंकलन किया गया है। यही छः वैचारिक आंकलन (सिख्सअथ डाईमेंशनल वुयू) स्नातन धर्म की दार्शनिक्ता पद्धति का आधार हैं। इन षट् दर्शनों में बहुत सी समानतायें हैं क्यों कि सभी विचारधारायें उपनिष्दों से ही उपजी हैं, विशलेषण की पद्धति में भिन्नता है।

दर्शन शास्त्रों की शैली 

दर्शन शास्त्रों को संस्कृत सूत्रों में लिखा गया है। सूत्र लेखन एक विशष्ठ कला है जिस में कम से कम शब्दों का प्रयोग कर के अधिकत्म भावार्थ दिया जाता है। किसी विषय की पुनार्वृति नहीं की जाती। इस प्रक्रिया से सूत्रों का मूल अर्थ समझने में कुछ कठिनाई भी अवश्य होती है। जन-साधारण उन्हें केवल व्याख्या, टिप्पणी अथवा मीमांसा की सहायता से ही समझ सकते हैं। सौभाग्य से हिन्दू धर्म साहित्य में बहुत से विदऊआनो ने मीमांसायें लिखी हैं जो जन साधारण को उपलब्ध हैं। हिन्दू दर्शन शास्त्र के प्रति बढ़ती हुई रुचि की वजह से कई नये परन्तु सक्ष्म मीमांसाकारों ने भी अपना अमूल्य योग-दान दिया है जिन में रामकृष्ण मिशन के वैदान्ती अग्रगण्य हैं। जिन वैज्ञानिक तथ्यों पर सभी आधुनिक वैचारिक भी एकमत हैं वह इस प्रकार हैः-

  • सृष्टि चक्र अनन्त, निरन्तर तथा चिरन्तर हैं। सृष्टि का ना कोई आदि है ना कोई अन्त है। सृष्टि चक्र में सृष्टि का स़ृजन, पालन तथा हनन शामिल है।
  • आत्मा जीवन मृत्यु का निमित हैं। आत्मा बार बार पुनर्जन्म लेती रहती है।
  • धार्मिक मूल्य ही सृष्टि, मानव जीवन तथा प्रारब्ध का आधार हैं।
  • ज्ञान तथा योग मोक्ष और मुक्ति प्राप्ति का साधन हैं।

षट दर्शन

दर्शन शास्त्रों में अध्यात्मिक दार्शनिक्ता के साथ साथ मनोविज्ञान, भौतिक ज्ञान, तथा कई विषयों जैसे कि हिप्नोटिज्म तथा मेसमेरिज्म, हठयोग आदि, पर सूक्षम ज्ञान को उदाहरण सहित दर्शाया गया है। इन ग्रंथों को यदि मानवी ज्ञान का कोष (एनसाईक्लोपीडिया) कहा जाय तो वह भी पर्याप्त ना होगा। प्रत्येक विषय के तत्वों का निचोड कर के पुनः व्याख्या के साथ समझाया गया है।

उदाहरण के लिये, दर्शन शास्त्रों में दार्शनिक्ता से करी गयी छानबीन का ऐक नमूना इस प्रकार है।

ऐक छोटे से छोटे कीट से ले कर बडे से बडे सम्राट तक सभी हर समय तीनों प्रकार के – अध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःखों से छुटकारा पाने का यत्न करते रहते हैं, किन्तु छुटकारा फिर भी नहीं मिलता। मृगतृष्णा के सदृश जिन वस्तुओं के पीछे मनुष्य सुख समझकर दौडता रहता है, प्राप्त होने पर वे दःख का कारण ही सिद्ध होती हैं। इस लिये तत्वदर्शी के लिये निम्न चार प्रश्न उपस्थित होते हैं –

  • हेय – दुःख का वास्तविक स्वरूप क्या है जिस का त्याग किया जा सके।
  • हेय हेतु – दुःख कहाँ से उत्पन्न होता है – उस के कारण को पहचानना।
  • हान –  दुःख रहित अवस्था कैसी होती है।
  • हानोपाय – दुःख निवृति का उपाय क्या है।

इन चारों रहस्यपूर्ण प्रश्नों को समझने के लिये दर्शन शास्त्रों में इन तीन तत्वों को  छोटे छोटे और सरल सूत्रों में युक्ति युक्त कर के इस प्रकार वर्णन किया गया हैः-

  • चेतनतत्व आत्मा – दुःख किस को होता है जिस को दुःख होता है उस (जीव) का वास्तविक स्वरूप क्या है।
  • जडतत्व – जहाँ से दुःख की उत्पति होती है और जिस का धर्म ही दुःख है उसे प्रकृति कहते हैं। इस के यथार्थ स्वरूप को समझ लेने से पहला और दूसरा दोनों प्रश्न सुलझ जाते हैं।
  • चेतनतत्व परमातमा – ऊपरलिखित दोनों तत्वों के अतिरिक्त ऐक तीसरे तत्व को मानना भी आवश्यक हो जाता है जो पहले के अनुकूल और दूसरे के प्रतिकूल हो । जिस में पूर्ण ज्ञान हो, जो सर्वज्ञ हो, सर्व व्यापक और सर्व शक्तिमान हो। उसी के पास पहुँचना ही आत्मा का लक्ष्य है। इस तर्क से तीसरे और चौथे प्रश्न का उत्तर भी मिल जाता है।

दार्शनिक्ता के छः मुख्य स्त्रोत्र मीसांसा, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग वेदों के उपांग कहलाते हैं तथा उन का उदाहरण सहित सारांश इस प्रकार हैः –

मीमांसा शास्त्र – वेद मन्त्रों में आत्मा तथा परमात्मा की जानकारी को ज्ञानकाण्ड तथा कर्म काण्ड, उपासना और ज्ञानकाण्ड पर विचार करने को मीमांसा कहते हैं। मीमांसा के दो भाग हैं। कर्मकाण्ड को पूर्व मीमांसा तथा ज्ञानकाण्ड को उत्तरी मीमांसा कहते हैं। मीमांसा शास्त्र दर्शनों में सब से बडा है। इस के सुत्रों की संख्या 2644 है और इस में 909 अधिकरण हैं जो अन्य सभी दर्शनों की सम्मिलित संख्या के बराबर हैं। मीमांसा अधिकरणों के विषय ईश्वर, प्रकृति, जीवात्मा, पुनर्जन्म, मृत्यपश्चात अवस्था, कर्म, उपासना, ज्ञान, बन्ध और मोक्ष हैं। वेद मन्त्रों में बतलाई हुई शिक्षा का नाम कर्मकाण्ड है। कर्म तीन प्रकार के हैं जिन्हें नित्यकर्म (नित्य करने योग्य), निमत्तक कर्म (किसी कारण वश करने वाले कर्म – जैसे पुत्र होने पर उस का नामकरण करना) तथा काम्य कर्म (किसी इच्छा पूर्ति के लिये) कहते हैं। मन की वृतियों को सब ओर से हटा कर केवन एक लक्ष्य पर  केन्द्रित करने की शिक्षा का नाम उपासना है। ईसा से कोई 600-100 वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने मीमांसा शास्त्र की रचना करी थी। वह महाऋषि बाद्रायाण के शिष्य थे। इन के कथन का सार है कि कर्म के बिना सभी ज्ञान निष्फल है और वह सुखदायक नहीं हो सकता। जब तक सत्य बोलना क्रियात्मिक जीवन शैली में नहीं अपनाया जाता उस का कोरा ज्ञान होना बेमतलब है। केवल कर्म रहित ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती।

वेदान्त शास्त्र – इस दार्शनिक्ता के जनक महाऋषि बाद्रायण थे जो ईसा से 600-200 वर्ष पूर्व हुये। सारांश में विविधता केवल देखने में है परन्तु वास्तव में सभी में सृजनकर्ता की ही छवि है। ज्ञान प्रत्येक काल में बढता रहता है और उस का अर्जित करना कभी समाप्त नहीं होता। वैदिक ज्ञान संकलित ज्ञान का विशलेषण तथा ग्रहण करना निरन्तर क्रिया है। अतः वेदान्त शास्त्र आधुनिक विचारधारा का अग्रज है।

न्याय शास्त्र – ईसा से 400 वर्ष पूर्व गौतम ऋषि ने न्याय शास्त्र की रचना की थी। इस को तर्क विद्या भी कहा जाता है क्यों कि प्रत्येक विषय को तर्क की कसौटी से जाना और परखा गया है। न्याय सूत्र पाँच अध्यायों में विभक्त है। संसार में लोग दुःख से बचना चाहते हैं। यथार्थ ज्ञान का साघन प्रमाण है। प्रमाणों से किसी वस्तु की परीक्षा करना ही न्याय है। न्याय दर्शन के अनुसार चार मुख्य (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम) प्रमाण हैं जो आज भी विश्व भर के न्यायालयों की कार्य शैली की जड़ हैं। उदाहरण के तौर पर इन्द्रियों की अनुभूतियों से प्राप्त ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण माना जाता है। जैसे धुआँ अग्नि के बिना नहीं होता इस लिये धुआँ अग्नि का अनुमान प्रमाण है। अज्ञान तथा इच्छायें दुःख के जन्म का कारण हैं। अतः दुःख के निवारण का अचूक विकल्प इच्छाओं पर नियन्त्रण और ज्ञान है।

वैशेषिका शास्त्र वैशेषिक सूत्रों की संख्या 370 है जो दस अध्यायों में विभक्त है। विशेष शब्द से तात्प्रिय है वह गुण जो ऐक वस्तु को अन्य वस्तुओं से अलग करता हौ। उन विशोष तत्वों का ज्ञान ही सत्य की ओर ले जाता है। यदि कोई अन्धेरे में खम्बे को चोर समझ ले तो वास्तव में दर्शक नें चोर और खम्बे की समान विशेषता लम्बाई के आधार पर ही चोर से भय भीत होने का निर्णय कर लिया है जो सत्य से कोसों दूर है। य़दि उसे अन्य विशेषताओं का ज्ञान भी होता तो दर्शक को भय भीत ना होना पडता और वह दुःख रहित होता। दैनिक जीवन में हमारी मानसिक्ता इसी प्रकार से दुखों को प्रगट करती रहती है। ईसा से 300 वर्ष पूर्व काणाद ऋषि ने अणु विज्ञान को जन्म दिया।

सांख्य शास्त्र – यह भारत की प्राचीनतम दार्शनिक्ता है जिसे कपिल ऋषि नें ईसा से 600 वर्ष पूर्व व्याखित किया था। इस के 527 सांख्य सूत्र हैं और छः अध्यायों में विभक्त है।  सांख्य के बहुत से प्राचीन ग्रन्थ इस समय लुप्त हैं, कई ऐक के केवल नाम ही मिलते हैं। यह पूर्णत्या वैज्ञियानिक मार्ग है। दुःख के कारण अध्यात्मिक (निजि शरीर और बुद्धि सें असमंजस), अधिभौतिक (दूसरों के कारण) कारण, तथा अतिदैविक (प्राकृतिक आपदायें)। उन कारणों का ज्ञान और तर्क संगत विशलेशण ही सुख दुख को समान कर सकता है। जिस प्रकार जागा हुआ मनुष्य स्वप्नावस्था में देखे शरीर को सत्य नहीं मानता, उसी प्रकार सिद्ध पुरुष जिस शरीर से अपने शरीर का साक्षाताकार करता है उस शरीर को भी अपना नहीं मानता। उस के कर्मों में भी लिप्त नहीं होता। वह आत्मा को शरीर से अलग समझ कर परमात्मा से साक्षाताकार करता है और कर्म के अच्छे बुरे प्रभावों तथा परिणाम स्वरूप सुख दुख से भी मुक्त हो जाता है। सांख्य दर्शन ने विश्व की सभी दार्शनिक्ताओं विशेषकर यूनानीओं को प्रभावित किया है। गीता साँख्य योग का ही मुख्य ग्रन्थ है। सांख्य और योग के अभ्यन्तर रूप के अतिरिक्त कार्य क्षेत्र में उस का रूप कैसा होना चाहिये, इस बात को गीता में  विशेषता के साथ स्पष्ट शब्दों में दर्शाया गया है।   

योग शास्त्र – योग के दार्शनिक स्वरूप को समझने के लिये तो दर्शनों का ज्ञान आवश्यक है ही, परन्तु दर्शनों का यथार्थ ज्ञान भी योग दूआरा ही प्राप्त किया जा सकता है। दोनों ऐक दूसरे के पूरक हैं। यदि व्यवहार को शुद्ध और आहार को सात्ति्वक बना कर शरीर को ठीक रखें और विषयों से मन को हटा कर अनितर्मपख करें तो अपने भीतर के खजाने का पता लग सकता है। योग वास्तव में ऐक दर्शन नहीं है। वह तो वृत्तियों के रूप में  आत्मा के स्वरूप  को अनुभव करने की एक विशष्ट कला है। पर कला का भी दार्शनिक आधार होना चाहिये। जिस प्रकार न्याय (तर्क) का कला होने पर भी दर्शनों में समावेश किया जाता है उसी प्रकार योग की गणना दर्शनों में की गई है।  ईसा से 300 वर्ष पूर्व रचित पतंजलि योग सूत्र योग विद्या का विस्तरित ग्रंथ है। योग करना अपने आप को जानने का मार्ग है। साधारणत्या लोग आसन करने को ही योग समझते हैं, परन्तु योग का क्षेत्र अधिक विस्तरित है। इस के आठ अंग हैं। सदाचार तथा नैतिकता के सिद्धान्तों को यम कहते हैं। बिना स्वस्थ, स्वच्छ और निर्मल शरीर के योग मार्ग की प्रथम  सीढी पर पग धरना दुर्गम है।  स्वयं के प्रति अनुशासित और स्वच्छ रहना नियम हैं। शरीर के समस्त अंगों को क्रियात्मिक रखना आसन के अन्तर्गत आता है। प्राणायाम श्वासों को नियमित और स्वेच्छानुसार संचालित करना है। हर प्राणायाम शरीर और मन पर  अलग तरह के प्रभाव डालता है। पंचेन्द्रियों को संसार से हटा कर आत्म केन्द्रित करने की कला प्रत्याहार है। वह नियन्त्रित ना हों तो उन की अंतहीन माँगे कभी पूरी नहीं हो सकतीं। धारणा का अर्थ है मन का स्थिर केन्द्रण। ध्यान में व्यक्ति शरीर और संसार से विलग हो कर आद्यात्मा में खो जाता है। समाधि का अर्थ है साथ हो जाना। यह परम जागृति है। यही योग का लक्ष्य है।

दर्शन शास्त्र वैदिक ज्ञान को समझने में सहायक हैं। किन्तु हिन्दू इस संकलित ज्ञान को भी अंतिम परिकाष्ठा नही मानते। वह अतिरिक्त विशलेष्ण को प्रोत्साहित करते हैं क्यों कि वैचारिक स्वतन्त्रता ही स्नातन धर्म का आधार स्तम्भ है। य़ह हर मानव का अधिकार है कि वह चाहे तो पूरे को, या अधूरे को या किसी भी मत को स्वीकार ना करे। हिन्दू धर्म में वैचारिक विरोधाभास मान्य हैं। दर्शन शास्त्र ही विश्व में लोजिक और रीज़निंग के प्रथम ग्रंथ हैं जब कि योरूप के देशों के लोग हाथों की उंगलियों पर भी गिनना भी नहीं जानते थे।

चाँद शर्मा

10 – हिन्दूओं के प्राचीन ग्रंथ


हिन्दू धर्म में बाईबल या कुरान की तरह कोई एक पुस्तक नहीं जिस का निर्धारित पाठ करना हिन्दूओं के लिये अनिवार्य हो। हिन्दू धर्म ग्रंथों की सूची बहुत विस्तरित है। यह प्रत्येक हिन्दू की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह किसी एक पुस्तक को, या कुछ एक को, अथवा सभी को पड़े, और चाहे तो किसी को भी ना पढे़। वह चाहे तो उन का मनन करे, व्याख्या करे, उन की आलोचना करे या उन पर अविशवास करे। हिन्दू व्यक्ति यदि चाहे तो स्वयं भी कोई ग्रंथ लिख कर ग्रंथों की सूची में बढ़ौतरी भी कर सकता है। सारांश यह कि हिन्दू धर्म में ज्ञान अर्जित करना सभी प्राणियों का निजि लक्ष्य है। किसी इकलौती पुस्तक पुस्तिका पर इमान कर बैठना बाध्य नहीं है।

संक्षिप्त समझने के लिये हिन्दूओं की प्राचीन पुस्तकों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में रखा जा सकता हैः –

  • यथार्थ विज्ञान के मौलिक ग्रंथ
  • महा काव्य तथा इतिहास
  • सामाजिक ग्रंथ

1.    यथार्थ विज्ञान के मौलिक ग्रंथ


चार वेद ऋगवेद, यजुर्वेद, अथर्व-वेद तथा साम वेद स्नातन धर्म के मूल ग्रंथ हैं जो किसी एक ग्रंथाकार ने नहीं लिखे, अपितु कई परम ज्ञानी ऋषि मुनियों के अनुसंधान तथा उन की अनुभूतियों के संकलन हैं। वैदिक ज्ञान ऋषियों पर ईश्वर कृपा से उसी प्रकार प्रगट हुआ था जैसे साधारण मानव कुछ लिखने के लिये जब ऐकाग्र हो कर विचार करते हैं तो विचार अपने आप ही प्रगट होने लगते हैं। इस अवस्था को ईश्वरीय प्रेरणा कहा जाता है।

हिन्दूओं की आस्था है कि वैदिक ज्ञान ऋषियों को लिपि के स्वरूप में प्राप्त हुआ था। हो सकता है ऐसा विशवास किसी को अटपटा भी लगे किन्तु आज के युग में हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि कम्पयूटरों के माध्यम से साधारण मानव भी सम्पादित लेख लिपि की शक्ल में एक साथ कई स्थानों पर भेज सकते हैं तथा उस का छपा हुआ संस्करण प्राप्त भी कर सकते हैं। इतना ही नहीं कम्पयूटरों का साईज़ भी दिन प्रति दिन छोटा होता जा रहा है। टच स्क्रीन पर तो केवल छू कर ही वाँच्छित ज्ञान फारमेटिड रूप में प्राप्त किया जा सकता है। अतः वैदिक ऋषियों को यदि लिपि के स्वरूप में ज्ञान प्राप्त हुआ था तो यह अविशवास की बात भी नहीं। तकनीक बदलती रहती है लेकिन कानसेप्ट तो आज भी वही है। कुछ और समय पश्चात हिन्दूओं की वैदिक आस्था अपने आप ही और स्पष्ट हो जाये गी क्यों कि सर्व शक्तिमान ईश्वर के शब्द कोष में वैज्ञयानिकों वाला असम्भव शब्द नहीं होता।

वैदिक ज्ञान पहले तो श्रुति के रूप में गुरू-शिष्य सम्पर्क से वितरित होता रहा, पश्चात मर्हृषि वेद व्यास ने उस ज्ञान को लिखित रूप में संकलित किया। लिखित ज्ञान को स्मृति कहा जाता है। कमप्यूटर की भाषा में आज कल वेद हार्ड कापी में भी उपलब्द्ध हैं।

वैदिक ज्ञान केवल अध्यात्मिक ही नहीं अपितु उन सभी विषयों के बारे में था जो जीवन को प्रभावित करते हैं। वेदों में भौतिक, रसायन, राजनीति, कला-संस्कृति तथा अन्य कई विषय़ों पर मौलिक ज्ञान संचित है जो ऋषियों ने निजि अविष्कारिक यत्नों तथा अनूभूतियो सें संचित किया था। यह ज्ञान सूत्रों में उपलब्ध कराया गया है। आज की भाषा के एक्रोनिम्स की तरह सूत्रों की शैली सूक्ष्म होती है तथा स्मर्ण रखने के लिये सहायक होती है। किन्तु सूत्रों को विस्तार से पुनः व्याख्या कर के समझना पड़ता है।

वेदों में देवताओं, प्रकृतिक शक्तियों तथा औषधियों को सम्बोधन कर के उन का बखान किया गया है। इस शैली को अंग्रेज़ी में ‘ओड’ कहा जाता है जिस का प्रयोग कालान्तर अंग्रेजी साहित्य के रोमांटिक कवि जान कीट्स और शौलि ने सर्वाधिक किया था। संक्षेप में चार वेदों का मुख्य विषय-क्षेत्र इस प्रकार हैः –

  • ऋगवेद ऋगवेद में अध्यात्मिक (स्पिरचुअल), मौलिक ज्ञान (फन्डामेंटल साईंस), विज्ञान (एप्लाईड साईंस), सृष्टि का भौतिक ज्ञान ( एस्ट्रो-फिज़िक्स) तथा प्रशासनिक (गवर्नेंस) आदि विषय वर्णित हैं।
  • यजुर्वेद यजुर्वेद में संसारिक, सामाजिक नीतियों, परम्पराओं, अधिकारों तथा कर्तव्य़ों की मौलिक रूप रेखा है। ऐक प्रकार से यह प्रोसीजुरल विषयों का ग्रंथ है।
  • साम वेद सामवेद में आराधना, दार्शनिक्ता, योग ज्ञान, तथा कलात्मिक विषय जैसे कि संगीत आदि वर्णित हैं।
  • अथर्व-वेद अथर्व वेद में चिकित्सा तथा शरीर सम्बन्धी विषय वर्णित हैं।

उप वेद प्रत्येक वेद के एक या एक से अधिक कई उप वेद हैं जिन में मूल अथवा अन्य विषयों पर अतिरिक्त ज्ञान है। उप वेदों के अतिरिक्त छः वेद-अंग भी हैं जो वेदों को समझने में सहायक हैं।

उपनिष्द – वेदों के संकलन के पश्चात भी कई ऋषियों ने  अपनी अनुभूतियों से ज्ञान कोष में वृद्धि की है। उन्हों ने संकलित ज्ञान की व्याख्या, आलोचना तथा उस में संशोधन भी किया है। इस प्रकार के ज्ञान को उपनिष्दों तथा दर्शन शास्त्रों के रूप में संकलित किया गया है। उपनिष्दों की मूल संख्या लग भग 108 – 200 तक थी, किन्तु यह मानव समाज का दुर्भाग्य है कि अधिकत्म उपनिष्दों को अहिन्दूओं की धर्मान्धता के कारण नष्ट कर दिया गया था। आज केवल 10 उपनिष्द ही उपलबद्ध हैं।

षट-दर्शन सृष्टि के आरम्भ से ही मानव निजि पहचान, सृष्टि, एवं सृष्टि कर्ता के बारे में जिज्ञासु रहा है और उन से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर ढूंडता रहा है। इन्हीं प्रश्नों के उत्तरों की खोज ने ही हिन्दू आध्यात्मवाद की दार्शनिक्ता को जन्म दिया है। ऋषि मुनियों ने अपनी अन्तरात्मा में झांका तथा सूक्ष्मता से गूढ मंथन कर के तथ्यों का दर्शन किया। प्रथक – प्रथक ऋषियों ने जो संकलन किया था उसी के आधार पर छः प्रमुख विचार धाराओं को षट-दर्शन कहा जाता है, जो भारतीय दार्शनिक्ता की अमूल्य धरोहर हैं। दर्शन शास्त्रों में बहुत सी समानतायें हैं क्योकि उन का मूल स्त्रोत्र उपनिष्द ही हैं।

2.    महा काव्य तथा इतिहास

प्राचीन काल में कवि ही महाकाव्यों के माध्यम से इतिहास का संरक्षण भी करते थे। भारत में कई महाकाव्य लिखे गये हैं। उन में रामायण तथा महाभारत का विशेष स्थान है। क्योंकि रामायण तथा महाभारत ने भारत के जन जीवन तथा उस की विचार धारा को अत्याधिक प्रभावित किया है।

रामायण – रामायण  की रचना ऋषि वाल्मीकि ने की है तथा यह विश्व साहित्य का प्रथम ऐतिहासिक महा काव्य है। रामायण की कथा भगवान विष्णु के राम अवतार की कथा है। राम का चरित्र कर्तव्य पालन में एक आदर्श पुत्र, पति, पिता तथा राजा के कर्तव्य पालन का प्रत्येक स्थिति के लिये एक कीर्तिमान है।  महा काव्य में केवल राम का पात्र ही मर्यादा पुरुषोत्तम का है और रामायण के अन्य पात्र मानव गुणों तथा अवगुणों की दृष्ठि से सामान्य हैं। वाल्मीकि रामायण से प्रेरणा ले कर कई कवियों ने राम कथा पर महाकाव्यों की रचना की जिन में से गोस्वामी तुलसीदास कृत हिन्दी महा काव्य राम चरित मानस सर्वाधिक लोकप्रिय है। रामायण पर अनेक कवितायें, नाटक, निबन्ध आदि भी लिखे गये हैं तथा रामायण के कथानक पर बहुत से चल-चित्रों का भी निर्माण हुआ है। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि विश्व साहित्य में रामायण ही एकमात्र महाकाव्य है जिस की नायिका सीता अति सुन्दर राजकुमारी वर्णित है परन्तु उस के सौन्दर्य का वर्णन करते समय कवि उस में मातृ छवि ही देखता है तथा निजि माता की तरह ही सीता को सम्बोधन करता है। रामायण का अनुवाद विश्व की सभी भाषाओं में हो चुका है तथा भारतीय संस्कृति का कोई भी पहलू ऐसा नहीं जिसे इस महा काव्य ने छुआ ना हो।

महाभारतमहाभारत विश्व साहित्य का सब से विस्तरित ऐतिहासिक महाकाव्य है। मुख्यतः इस ग्रंथ में भारत के कितने ही वंशों की कथा को पिरोया गया है जो तत्कालित समय की घटनाओं तथा जीवन शैली का चित्रण करता है। इस महाकाव्य में हर पात्र मुख्य कथानक में निजि गाथा के साथ संजीव हो कर जुड़ता है तथा मानव जीवन की उच्चता और नीचता को दर्शाता है। रामायण में तो केवल राम का चरित्र ही आदर्श कर्तव्यपरायणता का प्रत्येक स्थिति के लिये  कीर्तिमान है किन्तु महाभारत में सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन की कई घटनाओं तथा परिस्थतियों में समस्याओं से जूझना चित्रित किया गया है। रामायण और महाभारत काल में दर्शायी गयी भारतीय सभ्यता एक अति विकसित सभ्यता है तथा दर्शाये गये पात्र महामानव होते हुये भी यथार्थ लगते हैं। जहाँ रामायण का कथाक्षेप भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा श्री-लंका के भूगौलिक क्षेत्र में विचरता है वहीं महाभारत का पटाक्षेप समस्त भारतवर्ष में फैला हुआ है। इस से प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल से ही भारत एक विस्तर्ति राष्ट्र था।

पुराण – महाकाव्यों के अतिरिक्त पौराणिक कथाओं में भी हिन्दू धर्म के विकास को भारत के राजनौतिक इतिहास तथा जन-जीवन की कथाओं के साथ संजोया गया है। पौराणिक कथायें देवी-देवताओं, महामानवों तथा जन साधारण के परस्पर सम्पर्कों का अदभुत मिश्रण हैं। कुछ कथायें यथार्थ में घटित एतिहासिक हैं तथा कुछ को बढा चढा कर भी दिखाया गया हैं। भारत का प्राचीन इतिहास आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया था अतः उस को पुनः ढूंडने के लिये पौराणिक इतिहास को आधार बना कर अन्य लिखित एतिहासिक कृतियों से तुलनात्मिक आंकलन किया जा सकता है। यदि हम पौराणिक कथाओं को इतिहास ना भी माने तो भी वह अपने आप में ऐक अमूल्य साहित्यक धरोहर हैं जिन पर प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिये।

3.    सामाजिक ग्रंथ

सामाजिक जीवन से जुड़े प्रत्येक विषय पर कई मौलिक तथा विस्तरित ग्रंथ उपलब्ध हैं जैसे कि आयुर्वेद, व्याकरण, योग शास्त्र, कामसूत्र, नाट्यशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि। उन सभी का वर्णन इस समय प्रासंगिक नहीं अतः केवल दो ही ग्रंथों को संक्षेप में यहाँ वर्णित किया है जिन्हों ने ना केवल भारतीय जीवन को अपितु समस्त विश्व के मानव जीवन को अत्याधिक प्रभावित किया है।

श्रीमद् भागवद् गीता मानव जीवन के हर पहलू से जुड़ी श्रीमद् भागवद् गीता सब से प्राचीन दार्शनिक ग्रंथ है जो आज भी हर परिस्थिति में अपनाने योग्य है। गीता समस्त वैदिक तथा उपनिष्दों के ज्ञान का सारांश है तथा सहज भाषा में कर्तव्यपरायणता की शिक्षा देती है। यदि कोई किसी अन्य ग्रंथ को ना पढ़ना चाहे तो भी पूर्णतया सफल जीवन जीने के लिये केवल गीता की दार्शनिक्ता ही पर्याप्त है।

मनु स्मृति – मनु स्मृति विश्व में समाज शास्त्र के सिद्धान्तों का प्रथम ग्रंथ है। जीवन से जुडे़ सभी विषयों के बारे में मनु स्मृति के अन्दर उल्लेख है। समाज शास्त्र के जो सिद्धान्त मनु स्मृति में दर्शाये गये हैं वह तर्क की कसौटी पर आज भी खरे उतरते हैं और संसार की सभी सभ्य जातियों में समय के साथ साथ थोड़े परिवर्तनों के साथ मान्य हैं। मनु स्मृति में सृष्टि पर जीवन आरम्भ होने से ले कर विस्तरित विषयों के बारे में जैसे कि समय-चक्र, वनस्पति ज्ञान, राजनीति शास्त्र, अर्थ व्यवस्था, अपराध नियन्त्रण, प्रशासन, सामान्य शिष्टाचार तथा सामाजिक जीवन के सभी अंगों पर विस्तरित जानकारी दी गई है। समाजशास्त्र पर मनु स्मृति से अधिक प्राचीन और सक्ष्म ग्रंथ अन्य. किसी भाषा में नहीं है।

हिन्दू ग्रंथों के कारण ही विश्व में भारत को सभ्यता का अग्रज तथा विश्व गुरू माना जाता है।  किन्तु आज अंग्रेज़ी पाठ्यक्रम पद्धति से पढ़े लिखे भारतीय युवाओं को अज्ञान के कारण अपने पूर्वजों पर गर्व और विशवास नहीं, और अपने आप पर भरोसा और साहस भी नहीं कि वह इस अनमोल विरासत को पुनः विश्व पटल पर सुशोभित कर सकें। वह मानसिक तौर पर प्रत्येक तथ्य को पाश्चात्य मापदण्डों से ही प्रमाणित करने के इतने ग़ुलाम हो चुके हैं कि मौलिक ग्रन्थ को अंग्रेज़ी प्रतिलिपि के आघार पर ही प्रमाणित करने की माँग करते हैं।

चाँद शर्मा

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